स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामयण
सुन्दरकाण्ड – दोसर अध्याय
सीताक खोज मे निकलल हनुमानजीक लंका मे रावणक महल घुमबाक प्रकरण
।षट्पद।
मारुत-नन्दन तखन सूक्ष्म-तन, निशिमे धय कहुँ ॥१॥
लङ्का कयल प्रवेश भ्रमित अतिगुप्त भय कहुँ ॥२॥
सीता तकयित ततय दशानन-मन्दिर गेला ॥३॥
देखि विभव-विन्यास बहुत मन विस्मित भेला ॥४॥
देखल लङ्का सकल थल, नहि प्रदेश बाँकी रहल ॥५॥
देखलनि नहि सीता कतहु, स्मरण भेल लङ्किनि-कहल ॥६॥
भावार्थः
तेकर बाद पवनसुत हनुमानजी राति मे सूक्ष्म शरीर धारण कय गुप्त रूप सँ लंका मे प्रवेश कयलनि । सीताक खोज मे घुमैत-घुमैत ओ रावणक महल मे पहुँचलाह । ओतुका ठाट-बाट देखि परम विस्मित भ’ गेलाह । लंकाक चप्पा-चप्पा केँ छानि लेलनि, कोनो स्थान देखब बाकी नहि रहलनि । मुदा कतहु सीता नहि देखाय पड़लिह । तखन लंकिनीक कहल बात मोन पड़लनि ॥१-६॥
।दोबय छन्द।
अरुण अशोक देवद्रुम-सोदर, तरु-तति आनत फलसौँ ॥७॥
उत्तम मणि-सोपान वापिका, पूरित निर्म्मल जलसौँ ॥८॥
कञ्चन महल कहल नहि जाइछ, चुम्बित जलधर-माला ॥९॥
मणिस्तम्भ-शतसौँ अतिशोभित, खग-मृग-परिवृत शाला ॥१०॥
भावार्थः
कल्पवृक्षक समान लाल अशोकक गाछ कतारबद्ध रूप सँ लागल छल । फल सँ भरल-पुरल छल । नीक-नीक रत्न सब सँ बनल सीढ़ीवला वापिका (सीढ़ीदार बावली – पोखरि) सब निर्मल जल सँ भरल छल । सोनाक महलक सुन्दरता अवर्णनीय छल, ओ सब जलधर-माला यानि मेघ सँ आच्छादित आकाश (गगन) केँ चूमि (छूबि) रहल छल । सौ-सौ टा मणिस्तम्भ (रत्नजटित पाया सब) ओकर शोभा आर बेसी बढ़ा रहल छल । चारू दिश मृग व पक्षी सब विराजमान छल ॥७-१०॥
।चौपाइ।
विस्मित-मन सन मारुत-पूत । देखयित जाथि रघूत्तम-दूत ॥११॥
कनक विहङ्गम जतय अनेक । वृक्ष शिंशपा देखल एक ॥१२॥
अति रमणीय निविड़ तरु-छाह । मारुत-नन्दन ततय गेलाह ॥१३॥
तेहि तरु ऊपर बैसला जखन । सीता काँ देखल से तखन ॥१४॥
भूतल देवी आबि कि गेलि । राक्षस-पुरी विकल-मन भेलि ॥१५॥
वेणी एक मलिन अति चीर । दीना दुर्ब्बलि मृदुल शरीर ॥१६॥
लङ्का-विषय यहनि के आन । सीता थिकि निश्चय अनुमान ॥१७॥
राम राम मुख करथि उचार । भूमि-लुठित मन दुःख अपार ॥१८॥
तहि तरु-मूल जानकी जानि । अपन भाग्यकाँ उत्तम मानि ॥१९॥
अति कृतार्थ भेलहुँ देखि आज । हम साधल रघुनायक-काज ॥२०॥
भावार्थः
विस्मित मन सन मारुत पूत (हनुमानजी) श्री रामजीक दूत सब किछु देखैत जा रहल छलथि । जेतय अनेकों विहंगम (सुन्दर-सुन्दर) कनक (चिड़ै-चुनमुन सब) छल, ताहि ठाम एकटा शीशम केर गाछ देखलनि । मारुत-नन्दन ओतय गेलाह । ताहि (शीशम केर) गाछ पर जखन बैसलाह, तखन सीताजी केँ देखलनि । जेना कोनो देवी धरती पर आबि गेलिह आर राक्षस सभक नगरी बुझि व्याकुल भ’ गेलिह अछि । केशक चोटी एक्केटा छन्हि । वस्त्र (चीर) मलिन छन्हि । कोमल शरीर दुब्बर भ’ गेल छन्हि । अत्यन्ता दीना (दुखिया जेहेन) लागि रहल छथि । अरे! लंका मे एहेन आर दोसर के भ’ सकैत अछि, ई निश्चय सीता थिकीह से अनुमान लागि गेलनि । ओ राम-राम रटि रहल छलथि । माटिये पर लोटायल रहथि । मोन मे अपार व्यथा भरल रहनि । ओहि गाछक जैड़ (मूल) मे जानकी छथि से जानिकय (विश्वास कय केँ) तथा अपना केँ परम भाग्यवान बुझिकय ओ सोचलनि – ‘आइ सीताक दर्शन पाबिकय परम कृतार्थ भ’ गेलहुँ । हम रघुनायक रामजीक काज साधि (पूरा कय) पेलहुँ ।’ ॥११-२०॥
।दोहा।
अन्तःपुर बाहरक शुनि, कल कल शब्द महान ॥२१॥
वृक्ष-खण्ड-संलीन-तन, कर विचार हनुमान ॥२२॥
भावार्थः
फेर हनुमानजी रनिवासक बाहर भारी हल्ला-गुल्ला होइत सुनलनि, आर गाछक डार्हिक बीच अपना केँ नुकौने सोचय लगलाह जे कि करी ॥२१-२२॥
अशोक वाटिका मे रावण द्वारा सीता केँ डर देखेनाय
।चौपाइ।
दशमुख वनिता-वृन्दक सङ्ग । आयल कज्जल-गिरि-वर रङ्ग ॥२३॥
किङ्किनि-नूपुर-शिञ्चित शूनि । दुष्ट निशाचर-आगम गूनि ॥२४॥
विश भुज लोचन दश गोट मुण्ड । सह सह सङ्ग राक्षसी-झुण्ड ॥२५॥
अति विस्मित मन कह हनुमान । देखल शुनइत छलहुँ जे कान ॥२६॥
रहला द्रम-दल दबकि नुकाय । अछि आगाँ कर्त्तव्य उपाय ॥२७॥
कर विचार रावण मन अपन । पूर्व्व रात्रि जे देखल सपन ॥२८॥
राम पठाओल वानर दूत । कामरूप बल बुद्धि बहूत ॥२९॥
टक टक ताकय तरु पर बैशि । बुझलक घाट बाट पुर पैशि ॥३०॥
कयल बहुत हम रामक दोष । एखनहु धरि हुनका नहि रोष ॥३१॥
कहिया मरण राम-कर हयत । माया-पाप-काय छुटि जयत ॥३२॥
एखनहु धरि नहि आबथि राम । कहिया होयत दिव्य सङ्ग्राम ॥३३॥
मनमे ज्ञान उपर अभिमान । चकमक भीतर आगि समान ॥३४॥
वचन-बाण तेहन अनुसरब । सीता-मन अति कलुषित करब ॥३५॥
स्वप्न सत्य तौँ कपि देखि लेत । रामचन्द्र काँ सभ कहि देत ॥३६॥
जौँ कपि होयता कहता जाय । लयोता सानुज राम बजाय ॥३७॥
ई मन गुनिकेँ सीता निकट । पहुँचल दशमुख दुम्मद विकट ॥३८॥
सीता-दशा कहल नहि जाय । आत्ममध्य जनु रहलि समाय ॥३९॥
भावार्थः
रावण महिला सभक एकटा झुंडक संग ओतय आयल । ओकर रंग काजरक पहाड़ समान छलैक । घुँघरू आ पैजनियाँक खनक सुनिकय हुनका बुझय मे अयलनि जे निशाचर रावण ओतय आयल अछि । ओकर बीस टा बाँहि (भुजा) छैक, बीस टा आँखि आ दस टा माथा छैक । संग मे अनगिनत राक्षसी सभक दल छलैक । परम विस्मयक संग हनुमानजी अपना आप सँ कहलनि, ‘जे कान सँ सुनैत रही, से आइ आँखि सँ देखलहुँ ।’ ओ गाछक झुरमुट मे नुका गेलाह, देखी आगू काजक कोन बाट निकलैत अछि । ओम्हर रावण अपन मोन मे विचार कय रहल अछि – पैछला राति सपना देखने रही । ‘राम एकटा बन्दर केँ दूत बनाकय पठेलनि अछि । ओ दूत इच्छानुसार अपन स्वरूप बदलय मे समर्थ अछि तथा परम बलवान एवं बुद्धिमान अछि । ओ गाछ पर बैसिकय टकटकी लगाकय देखि रहल अछि । नगर मे पैसिकय ओ सारा ठौर-ठेकाना जानि गेल अछि । हम रामक बहुत पैघ अपराध कयलहुँ अछि । मुदा हुनका एखनहुँ धरि हमरा उपर तामश नहि चढ़लनि अछि । कहिया हमर मरण रामक हाथ सँ होयत, जाहि सँ हमरा ई माया, पाप आ शरीर – एहि सब सँ छुटकारा भेटत । आब हम भीतर-भीतर त ज्ञान राखब, मुदा बाहर-बाहर अभिमान देखायब, जेना भीतर मे चमक बाहर मे छाउरे-छाउर वला आइग । एहेन वचनरूपी बाण छोड़ब, जाहि सँ सीताक मन कलुषित भ’ जाइन्ह । यदि हमर सपना सत्य अछि त बन्दर एना करैत देखबे करत आ ओ सबटा बात रामजी केँ सुनायत । अगर बन्दर होयत तँ राम केँ अपन भाइक संग बजा आनत ।’ मोन मे एना सोचिकय परम अभिमानी रावण सीता लग पहुँचल । सीताक हालत कहल नहि जा सकैछ । लगैत छल जे ओ अपनहि मे समाय गेल छलिह ॥२३-३९॥
।दोहा।
रावण सीता काँ कहल, सुमुखि सत्य वृत्तान्त ॥४०॥
राम न अयोता काज किछ, मनमे करु सिद्धान्त ॥४१॥
भावार्थः
रावण सीता सँ कहलक – ‘हे सुन्दरी, हम सत्य बात कहैत छी । रामचन्द्र कनिकबो काज नहि एता । ई बात अहाँ पक्का बुझि लियह ॥४०-४१॥
।चौपाइ।
वैदेही परिहरु सन्ताप । उचित कयल नहि अहँकाँ बाप ॥४२॥
रामक हाथ देल की जानि । कानन-वास अकारण हानि ॥४३॥
हेम-हरिण देखयित भेल लोभ । लङ्का देखि त्यागु मन क्षोभ ॥४४॥
शिव शिव आब कि रामक आश । लङ्का छोट हाथ उनचास ॥४५॥
जौँ नहि निर्गुण रहितथि राम । तौँ बसितथि नृप-दशरथ-धाम ॥४६॥
राम बसथि वनचर-गण सङ्ग । हमहुँ शुनल छल कथा-प्रसङ्ग ॥४७॥
बहुत तकायोल लोक पठाय । नहि भेटला रहलाह नुकाय ॥४८॥
जौँ हुनकाँ अहँ मे किछु प्रीति । अबितथि लय जइतथि रण जीति ॥४९॥
पामर रामक त्यागू आश । विद्यमान लङ्केश्वर दास ॥५०॥
हरि आनल अहँकाँ कत दूरि । एको बेरि की तकलनि घूरि ॥५१॥
बड़ कपटी छथि ज्ञान घमण्ड । दैवो देलथिनि समुचित दण्ड ॥५२॥
सकल सुरासुर-नारि समाज । सभक स्वामिनि होयब आज ॥५३॥
सीता मन जनु करु किछु छोट । भाग्य अहाँक भेल बड़ गोट ॥५४॥
तृण-अन्तरित अधोमुखि रुष्ट । रावण-वचनक उत्तर पुष्ट ॥५५॥
जे शिर शिवकाँ अर्प्पण कयल । प्रबल पाप चरण तत धयल ॥५६॥
धिक धिक रावण तोहर ज्ञान । काल-निकट अनहित हित मान ॥५७॥
जनिक त्रास बनि भिक्षुक रूप । हरि हरि हरि लयला की चूप ॥५८॥
कुक्कुर जनु मख-घृत लय जाय । मरबह खल पाछाँ पछताय ॥५९॥
मानुष मानह श्रीरघुवीर । परिचय मन तन लगलय तीर ॥६०॥
अयोता सानुज प्रभु रघुनाथ । विचलत गर्व्व तोर दश-माथ ॥६१॥
बाणक तेज समुद्र सुखाय । सायक सेतु-उदधि बन्धबाय ॥६२॥
अयोता निश्चय होयत मारि । निश्चय तोहर रणमे हारि ॥६३॥
मरबह पुत्र-निकर-बल-सहित । आयल निकट तेहन दिन अहित ॥६४॥
भावार्थः
हे विदेहसुता, अहाँ सन्ताप छोड़ू । पिता जनक अहाँ लेल उचित नहि कयलनि । कि सोचिकय ओ अहाँ केँ रामक हाथ मे सौंपलनि, जाहि सँ अहाँ केँ नाहक मे वनवास भोगय पड़ल । अहाँ त सोनाक हिरण देखिते लोभा गेलहुँ, फेर सोनाक लंका केँ देखिकय क्षोभ कियैक करैत छी ? अरे, आब रामक कोन भरोसा । कहावत अछि – लंका मे जे सब सँ छोट होइत अछि, ओहो उनचास हाथक होइत अछि । यदि राम मे किछु गुण रहितनि त राजा दशरथक घरहि मे हुनकर बास होइतन्हि । राम त वनचर सभक बीच मे रहैत छथि । हम त बातचीतक क्रम मे हुनकर हाल सुनने रही । कतेको दूत सब केँ पठाकय हुनक खोज सेहो करबेलहुँ, मुदा ओ कतहु नहि भेटलाह, नुकायल रहलाह । यदि अहाँ सँ हुनका कनिकबो प्रेम रहितनि तँ ओ जरूर अबितथि आ लड़ाइ मे जीतिकय अहाँ केँ छोड़ाकय लय जइतथि । आब कायर रामक भरोसा छोड़ू । लंकाक राजा रावण अहाँक दासक रूप मे सोझाँ मे ठाढ़ अछि । एतेक दूर सँ हम अहाँ केँ हरण कय अनलहुँ, मुदा एको बेर ओ अहाँक खोज कयलनि ? ओ बड़ा कपटी आ घमंडी छथि । दैव हुनका उचित दण्ड देलनि अछि । आइ अहाँ सब देवी, असुर सुन्दरी एवं नारी लोकनिक बीच सभक स्वामिनी बनब । हे सीता, अहाँ अपना केँ दीन (दुःखी) जुनि बुझू । अहाँक बड पैघ भाग्योदय भ’ गेल अछि ।” ॥४२-५४॥
एतेक सुनिकय सीता बीच मे तिनका (खोंटल घास) राखिकय नजरि झुकेने रुष्टभाव सँ रावणक कुबोल पर जोरदार जवाब देलिह – “तूँ जे अपन माथ शिव केँ अर्पित कयलें ताहि पर भारी पाप अपन पैर जमा देलकौक (अर्थात् भारी पापक कलंक लागि गेलौक) । अरे रावण ! तोहर ज्ञान केँ धिक्कार अछि । जखन काल (मृत्यु) नजदीक आबि जाइछ तखन अहिते कर्म सब मे हित देखाय लगैत छैक । अरे, तूँ त रामक डर सँ भिक्षुक वेष बनाकय हमरा चोराकय हरण कय अनलें, जेना कुक्कूर यज्ञकर्मक घी लय जाइत अछि । दुष्ट, तूँ पाछाँ पछताबा सँ मरबें । तूँ राम केँ मानव बुझैत छँ । तोरा हुनकर पहचान तखन हेतौक जखन तोहर शरीर मे हुनकर बाण लगतौक । जखन लक्ष्मण-सहित राम एथुन तखन रे दशकन्धर, तोहर सबटा घमंड चूर भ’ जेतौक । बाणक तेज सँ समुद्र केँ सुखाकय आ समुद्र मे बाणक पुल बनवाकय ओ अवश्य एथुन, लड़ाइ हेतौक आ ओहि मे अवश्य तूँहीं हारबें । तूँ अपन पुत्र सब आ सेना-समेत मरबें । तोहर ओ दुर्भाग्यक समय आबि गेल छौक ॥५५-६४॥
।दोहा।
सीता-वचन कठोर शुनि, रावण लय तरुआरि ॥६५॥
यहन कथा हमरा कहति, सद्यः हम देब मारि ॥६६॥
भावार्थः
सीताक कठोर वचन सुनिकय रावण तलवार उठौलक आ सीता सँ कहलक – “कि तूँ एहेन बात हमरा सोझाँ मे बजमें ? हम तुरत जान सँ मारि देबौक ।” ॥६५-६६॥
।चौपाइ।
मन्दोदरी कहल शुनु नाथ । अबला वध कि अपनैँ हाथ ॥६७॥
विदित वीर अपनैँ ई नारि । अपयश पाप देव जौँ मारि ॥६८॥
अबला ऊपर एतटा रोष । कड़रिक तरु पर शितुआ चोष ॥६९॥
कृपणा मलिना दुर्ब्बल देह । हिनका जीबहु मे सन्देह ॥७०॥
अन्न पानि कयलनि अछि त्याग । नहि करती पर-जन-अनुराग ॥७१॥
अहँकाँ कोन कमी प्राणेश । जीतल भुज-बल सकलो देश ॥७२॥
सुर गन्धर्व्व सकल जन नाग । कन्या लयलैँ मनता भाग ॥७३॥
कन्या-जन मद-चूर्णित-नयन । अपनहि सुखसौँ अउती शयन ॥७४॥
भावार्थः
ई सुनिकय मन्दोदरी कहलनि – “हे नाथ, सुनू । अपना हाथ सँ कि अबलाक वध करब । अहाँ प्रख्यात वीर छी आ ई नारी छथि । यदि अहाँ हिनकर वध करब त अहाँ केँ स्त्री-वध केर पापो लागत आ बदनामियो होयत । अबला पर अहाँ केँ एतेक तामश शोभा नहि दैत अछि । कहावत छैक जे केराक गाछपर शितुआ (खुरचनि) सेहो तेज धारवला कहाइत अछि । ई तँ दीन आ मलिन अबस्था मे पहुँचिकय दुब्बरो-पातर भ’ गेलि अछि । हिनकर त जिबइयो मे आब सन्देह अछि । ई खेनाय-पिनाय सेहो छोड़ि देने छथि । ई पराया पुरुष सँ कखनहुँ प्रेम नहि कय सकैत छथि । हे प्राणनाथ, अहाँ केँ कोन कमी अछि ? अहाँ अपन बाहुबल सँ सारा देश केँ जीति लेने छी । देव, गन्धर्व, नाग आ मानव, जिनकरो कन्या अहाँ ग्रहण करब ओ अपन सौभाग्य बुझता । मद सँ चूर्णित नयन (आँखि) वाली कन्या सब अपनहि प्रसन्नतापूर्वक अहाँक घर अओती ।” ॥६७-७४॥
।दोहा।
रावण राक्षसि सौँ कहल, उत्कट त्रास देखाय ॥७५॥
अनुकूला सीता करह, जे बल बुद्धि उपाय ॥७६॥
दूइ मासमे करति ई, जौँ हमरासौँ प्रेम ॥७७॥
सकल राज्य-रानी हयति, हिनका सभ सुख क्षेम ॥७८॥
बहुत बुझौलय नहि बुझथि, बीति जाय दुइ मास ॥७९॥
हम आज्ञा दय देल अछि, हिनकर करब विनाश ॥८०॥
भावार्थः
तखन रावण राक्षसी सब सँ कहलक – “घोर भय देखा-देखाकय अपन-अपन बल, बुद्धि आ युक्ति सँ सीता केँ राजी करैत रहे । यदि ई दुइ मास मे हमरा सँ प्रेम करत त सारा राज्यक रानी होयत आ एकर कल्याण हेतैक तथा सबटा सुख भेटतैक । यदि ई बहुत बुझेलो-सुझेलो पर नहि बुझत, आर दुइ मासक अवधि बीति जेतैक त हम आज्ञा दय दैत छियौक, एकर अन्त कय दिहनि ।” ॥७५-८०॥
।चौपाइ।
अन्तःपुर गेला दश-भाल । वनिता-परिवृत गर्व्व विशाल ॥८१॥
विकटादिक सीता तट जाय । भयभीता कर स्वाङ्ग बनाय ॥८२॥
व्यर्थ तोर तन यौवन आस । भेल न दशमुख सौँ सहवास ॥८३॥
केओ कह हिनक अङ्ग सभ काट । केओ कह जीह सँ शोणित चाट ॥८४॥
अपने हठ अपने सुख खाय । होयत की पाछाँ पछताय ॥८५॥
केओ तरुआरि तेज लय हाथ । काटि लिअ हम हिनकर माथ ॥८६॥
केओ दौड़य बड़ गोट मुह बाय । की विलम्ब हम जाइछि खाय ॥८७॥
त्रिजटा कहल करह अन्याय । सीता नहि जानह असहाय ॥८८॥
हिनकर निकट भ्रमहुँ जनु जाह । अपने अपन तन बरु खाह ॥८९॥
यहि खन हम देखल अछि सपन । होयत सत्य बुझल मन अपन ॥९०॥
भावार्थः
एतेक कहिकय नारी सब सँ घेरायल रावण भारी घमंडक संग अन्तःपुर चलि गेल । विकटा आदि राक्षसी सब तरह-तरह केर स्वांग रचि-रचिकय हुनका डराबय-धमकाबय लागल । ओ सब कहय – “यदि तूँ रावण सँ संग नहि करमे त तोहर शरीर मे ई यौवन बेकार चलि जेतौक ।” कियो राक्षसी कहय – “जीह सँ एकरा देहक सबटा खून चाटि जो । ई त अपनहि जिद्द सँ अपनहि सुख केँ खा रहल अछि । पाछाँ पछताकय कि हेतैक ।” कियो तेज तलवार हाथ मे लय केँ कहय – “कि हम एखनहिं एकर सिर काटि लिअ ?” कियो बहुते मुँह बाबिकय दौड़य आ कहय – “देरी कियैक करैत छँ ? कहे त हम तुरन्ते खा जाय ।” त्रिजटा नामक एकटा राक्षसी कहलक – “तूँ सब गोटे अन्याय करैत छँ । सीता केँ असहाय जुनि बुझे । गलतियो सँ एकरा लग नहि जहिहें; भले अपन देह केँ अपने खा जो । एखनहिं हम सपना देखलहुँ हँ । हमरा लगैत अछि, ई सत्य होयत ॥८१-९०॥
।रूपमाला।
चढ़ल ऐरावतक ऊपर, राम लक्ष्मण सङ्ग ॥९१॥
दग्ध लङ्कापुरी भय गेल, समर रावण भङ्ग ॥९२॥
राम-सेवा कर विभीषण, राज्य लङ्का पाय ॥९३॥
जानकी ई राम-अङ्क-स्थिता भेली जाय ॥९४॥
भावार्थः
देखलहुँ जे लक्ष्मणक संग राम ऐरावत (हाथी) पर सवार छथि । लंका जरि गेल अछि । युद्ध मे रावण हारि गेल अछि । लंकाक राज्य पाबिकय विभीषण रामक सेवा कय रहल छथि । ई जानकी रामक बगल मे जाकय ठाढ़ भ’ गेल छथि ॥९१-९४॥
।चौपाइ।
दशमुख नग्न सकल परिवार । तेल लगओलय भरल विकार ॥९५॥
गोबर डाबर मध्य नहाथि । खर पर चढ़ल याम्य दिश जाथि ॥९६॥
रावण मरता सहित समाज । प्राप्त विभीषण काँ भेल राज ॥९७॥
राम जानकी मिलि घर जयत । दुखमय लङ्का सत्वर हयत ॥९८॥
करत अनर्थ अखण्डित नोर । धन्य धन्य सीता हिय तोर ॥९९॥
करु करु धैरज कहब कि आन । मुठिएक धूरि न चान मलान ॥१००॥
भावार्थः
समूचा परिवार सहित रावण नंगटे अछि । विकार (मैल) सँ भरल आ तेल लगेने अछि । गोबर सँ भरल डाबर मे नहा रहल अछि । गधा पर चढ़ल दक्षिण दिश जा रहल अछि । परिवार-सहित रावणक मृत्यु हेतैक । विभीषण केँ राज्य भेटतैक । राम जानकी केँ अपना संग लय केँ घर जेताह । लंका तुरत दुःख मे डूबि जायत । अहाँक अविच्छिन्न अश्रुधारा अनर्थ करत । हे सीता, अहाँक हृदय धन्य अछि । आर कि कहू, धीरज राखू । मुठ्ठी भरि धुरा सँ चाँद म्लान नहि भ’ सकैत अछि ।” ॥९५-१००॥
।कवित्त घनाक्षरी।
।गीत।
त्रिजटा कहल शुनु जानकी नवीन कथा ॥१०१॥
वानर-विशेष वर वाटिका उजारलक ॥१०२॥
रक्षक प्रबल रण-दक्ष लक्ष लक्ष खेत ॥१०३॥
मुइल मुर्च्छित कतो रावण पुकारलक ॥१०४॥
“चन्द्र” भन यहन न देखल शुनल छल ॥१०५॥
अक्षयकुमार काँ पटकि झट मारलक ॥१०६॥
कतहुँ न हारलक वीरता प्रचारलक ॥१०७॥
रावण-पालित हाय लङ्कापुर जारलक ॥१०८॥
स्वप्न कथा राक्षसि-गण शुनिकेँ ॥१०९॥
त्यागि उपद्रव गेलि डराय ॥११०॥
मत-मातलि छलि जागलि थाकलि ॥१११॥
निन्द-विवश भेलि जहँ तहँ जाय ॥११२॥
सीता तखन विकलि मन-भीता ॥११३॥
दुःख-मूर्छिता रहित-उपाय ॥११४॥
कनयित कलपि कहथि की करु विधि ॥११५॥
प्रातहि राक्षसि जाइति खाय ॥११६॥
भावार्थः
त्रिजटा कहलक – “हे जानकी, सपनाक आरो-आर नवका बात सब सुनू । एकटा बानर अशोक वाटिका केँ उजाड़ि देलक । लड़ाइ मे माहिर लाखक-लाख बलवान रक्षकगण सब केँ पछाड़ि देलक । बहुते रास रक्षक सब मूर्च्छित भ’ गेल । किछु रावण केँ शोर पाड़य लागल । चन्द्रकवि कहैत छथि जे एना न कहियो देखल, न सुनल छल । ओ बन्दर अक्षयकुमार केँ पछाड़िकय मारि देलक । कतहु हारल नहि । अपन वीरताक डंका पीट देलक, आर रावण द्वारा रक्षित लंकापुरी केँ जरा देलक ।” सपनाक बात सुनिकय राक्षसी सब डरा गेल आ सीता केँ सतेनाय छोड़ि देलक । राक्षसी सब जे मदमाती, जागल आ थाकल छल, जहाँ-तहाँ जाकय नींदक मारल सुति रहल ॥१०१-११२॥
सीताक विलाप
तखन विकल (उदास), भयभीत (डरायल), निरुपाय आ वेदना सँ छटपटाइत सीता कनैत आ बिलखैत बाजय लगलिह – “हे विधाता, कि करू ? हमरा त भोर होइते राक्षसी सब खा जायत ॥११३-११६॥
।गीत काफी।
सपन हम देखल अचिन्तित राति ॥११७॥
विद्रुम-रक्त-वदन तेजोमय, अद्भुत वानर जाति ॥११८॥
प्रभु-प्रेषित पाथोनिधि सन्तरि, लङ्का-परिचय पाबि ॥११९॥
हम विधिहता शुनल शुभ वार्त्ता, इष्ट अनिष्ट कि भावि ॥१२०॥
जे दिन लङ्का प्रलय होइछ नहि, से दिन पापिक भाग ॥१२१॥
ई अन्याय घोर लङ्कामे, पानिसौँ आगि न लाग ॥१२२॥
सुरपति-सुतक पराभव-दायक, कोशल कौशल भूप ॥१२३॥
से शर से कर से रघुवर वर, कत बैसल छथि चूप ॥१२४॥
भावार्थः
हम आइ राति अजीब सपना देखलहुँ । एकटा अद्भुत जातिक बानर छल, जेकर मुँह मूँगा जेकाँ लाल आ चमकि रहल छलैक । प्रभु रामक पठायल ओ बानर समुद्र पारकय लंकाक हाल जानि गेल अछि । दुर्भाग्यक मारल हम ई शुभ समाचार सपना मे सुनलहुँ । के जानय, एहि सपनाक फल नीक होयबला अछि आ कि खराब होयबला अछि । जे दिन लंका मे प्रलय नहि होइछ, से दिन पापी लोकक भाग्य बुझू । लंका मे ई घोर अन्याय भ’ रहल अछि । पानि सँ कतहु कि आइग लगैत छैक ? सुरपति (इन्द्र) केर पुत्र (जयन्तक) दाँत खट्टा करयवला कौशल रखनिहार कोशल भूप (राजा राम) छथि, वैह बाण (शर) छन्हि आ वैह हुनकर हाथ (कर) छन्हि, से कतय चुप भ’ कय बैसल छथि ? ॥११७-१२४॥
।गीत।
से दिन कोना होयत मनोरथ पूर ॥१२५॥
रघुनन्दन-बल प्रलय पवन सम, अधम निशाचर तूर ॥१२६॥
देवर-तीर जेहन प्रलयानल, रावणगण वन झूर ॥१२७॥
के हम थिकहुँ ककर हम कामिनि, परिचय पओता क्रूर ॥१२८॥
सकल तमीचर तामस तम सम, श्रीरघुनन्दन सूर ॥१२९॥
हमर यहन गति दैव देखै छथि, नहि उपाय किछु फूर ॥१३०॥
तीरक तेज समुद्र सुखायत, जल थल ऊड़त धूर ॥१३१॥
कोटि शनैश्चर सहित सङ्कटा, लङ्का घर घर घूर ॥१३२॥
भावार्थः
ओहेन दिनक हमर मनोरथा कहिया पूरा होयत ? प्रलयंकर पवन-सम रामक बल नीच राक्षस सब केँ रुइया जेकाँ उड़ेता । प्रलयाग्नि-सम देवर लक्ष्मणक तीर रावणक गणरूपी वन केँ जरा देता । हम के छी, किनकर कामिनी (पत्नी) छी, से परिचय एहि क्रूर (राक्षसदल) केँ भेटि जेतैक । सूर्यक समान श्रीराम तामसी राक्षसरूपी अन्धकार केँ दूर कय देताह । विधाता हमर एहेन गति देखि रहल छथि, मुदा हुनका सब केँ कि करू से उपाय नहि फुरा रहल छन्हि । रामक बाणक तेज सँ समुद्र सुखा जायत, जल-थल सब दिश धूरा उड़त । एक करोड़ शनैश्चर (शनि ग्रह) सङ्कटा देवीक संग लंकाक हर घर मे घुमती ॥१२५-१३२॥
।गीत।
केहन विधि लिखल विपति-तति भाल ॥१३३॥
कुल पवित्र कुल-कामिनि हमरहि, कठिन विपति जंजाल ॥१३४॥
रघुनन्दन पति देवर लक्ष्मण, जनि डर काँपय काल ॥१३५॥
चोर दशानन त्रास देखाबय, अनुचित कह वाचाल ॥१३६॥
दनुज-वधू कह मारब काटब, चाटब शोणित लाल ॥१३७॥
यहि अवसर जौँ ओ प्रभु आबथि, देखथि सभटा हाल ॥१३८॥
काल-दूत जनि हेम-हरिण छल, छल न बुझल ततकाल ॥१३९॥
कालहि सिंह-घरणि तट निर्भय, गरवित सरव शृगाल ॥१४०॥
भावार्थः
विधाता हमर भाल मे केहेन विपत्ति सब लिखने छथि ? हम पवित्र कुल मे जन्म लेलहुँ आ पवित्र कुल मे ब्याहल गेलहुँ; तखन हमरहि माथ पर एहेन विपत्ति कियैक आबि गेल ? राम हमर पतिदेव छथि, लक्ष्मण हमर देवर छथि, हिनका सभक डर सँ कालहु काँपैत रहैत अछि । तखन ई चोर दशानन हमरा त्रास (डर) देखबैत अछि, वाचाल जेकाँ अनुचित कथा बजैत अछि । दनुज-वधू (राक्षसी) सब हमरा मारब-काटब आ शोणित चाटि जायब कहैछ । एहेन समय ओ प्रभु एतय आबथि आ हमर ई हालत केँ देखथि । ओ सोनाक हिरण नहि कालदूत छल से बात ताहि समय बुझय मे नहि आयल । कालवश ई सियार सब घमन्ड सँ बेधड़क (निर्भय भ’ कय) सिंहनीक सोझाँ आबिकय शोर मचा रहल अछि ॥१३३-१४०॥
।गीत।
हमर विधि प्राण अपन भेल भार ॥१४१॥
की सुख भुजि छथि ओई देहमे, कतहु कि नहि आधार ॥१४२॥
जौँ आबथि रघुनन्दन सानुज, लीला-सागर पार ॥१४३॥
गृद्धझुण्ड दशमुण्ड-मुण्ड पर कर खर नखर प्रहार ॥१४४॥
ककरा कहब केओ नहि मानुष, नहि कारुणिक चिन्हार ॥१४५॥
रक्षा करथि अरक्षित जनकाँ, केवल धर्म्म उदार ॥१४६॥
कठिन विषय विष तिष नहि भेटय, खड़ग न लग तिष-धार ॥१४७॥
शिव शिव जीव-घात वर मानल, धिक जीवन-संसार ॥१४८॥
रामचन्द्र-चन्द्रिका थिकहुँ हम, सपन न मन व्यभिचार ॥१४९॥
विधि बुधि विरहिणि व्याकुलि एकसरि, चित चिन्ता विस्तार ॥१५०॥
भावार्थः
हे विधाता ! हमर अपनहिं प्राण आब भार बनि गेल अछि । नहि जानि कोन सुख भोगबाक लेल ई प्राण हमर शरीर मे एखन धरि टिकल अछि । हमरा लेल एखन सहयोगक कोनो आधार तक नहि अछि । जौँ रघुनन्दन अनुज लक्ष्मण सहित एहि लीलारूप समुद्र केँ पार कय केँ आबि जाइत छथि, तँ एहि दशमुण्ड रावणक मुण्ड पर गिधक झुंड अपन तेज नख (नह) सँ प्रहार करैत देखायत । केकरा कहू, कियो लोको तक नहि अछि, जे हमर कारुणिक अबस्था केँ बुझि सकय । एहेन अरक्षित लोकक रक्षा मात्र उदार धर्म टा कय सकैत छथि । एहेन कठिन समय (विषय) मे विषो (जहरो) तक नहि भेटि रहल अछि आ न कोनो तेज धारवला तलवारे । हे शिव ! एहेन स्थिति मे हम तँ ‘जीव-घात’ (आत्महत्ये) केँ नीक बुझि लेलहुँ अछि, धिक्कार अछि एहेन जीवन-संसार केँ । रामचन्द्रक चन्द्रिका (रामरूपी चन्द्रमाक चान्दनी) थिकहुँ हम, हमरा त सपनहुँ मे मन मे व्यभिचारक विचार नहि अछि । (अर्थात् सपनहुँ मे राम सँ हमर मन विचिलित नहि भ’ सकैछ ।) विधिवश हम वियोगिनी व्याकुल आ असगर छी, तेँ चित्त मे अथाह चिन्ता भ’ रहल अछि ॥१४१-१५०॥
।सबैया मुदिरा।
हा रघुनाथ अनाथ जकाँ, दशकण्ठ-पुरी हम आइलि छी ॥१५१॥
सिंहक त्रास महावनमे हरिणीक समान डराइलि छी ॥१५२॥
चन्द्र चकोरि अहैँक सदा, हम शोक-समुद्र समाइलि छी ॥१५३॥
देवर-दोष कहू हम की, अपना अपराध सँ काइलि छी ॥१५४॥
भावार्थः
हे रघुनाथ, हम अनाथ जेकाँ एहि दशकण्ठ रावणक लंकापुरी मे आबि गेल छी । हम ओहिना त्रसित छी जेना सिंहक सोझाँ मे हरिणी डरायल रहैछ । हम त सदिखन अहीँ चन्द्र केर चकोरी छी जे शोक-समुद्र मे समायल छी । एहि मे हमर दिअर लक्ष्मणक कोनो दोष नहि कहल जा सकैछ, हमरहि अपराधक कारण ई सब भेल अछि ॥१५१-१५४॥
।दोहा।
जनक जनक जननी अवनि, रघुनन्दन प्राणेश ॥१५५॥
देवर लक्ष्मण हमर छथि, नैहर मिथिला देश ॥१५६॥
भावार्थः
राजा जनक जेहेन हमर पिता छथि, धरती जेहेन हमर माता छथि, राम जेहेन हमर पति छथि, लक्ष्मण जेहेन हमर दिअर छथि आर मिथिला जेहेन हमर नैहर अछि, तैयो हमर ई दुर्गतिक हाल अछि ॥१५५-१५६॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे सुन्दरकाण्डक दोसर अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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Ego kahabat chhai je Jekhan manus k uper naas sabar hoit chhai t okar budhi biprit bho jait chhai se haal hunkar sena k bho gel
अन्तःपुर बाहरक शुनि, कल कल शब्द महान ॥२१॥
वृक्ष-खण्ड-संलीन-तन, कर विचार हनुमान ॥२२॥
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