Search

मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड दसम अध्यायः रावणक शुक्राचार्य सँ मंत्र लय साधना करब तथा राम द्वारा विघ्न

655 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड

दसम अध्याय

रावणक शुक्राचार्य सँ मंत्र लय साधना करब तथा राम द्वारा विघ्न

।चौपाइ।

रावण मन मन मानल हारि । महि नहि रहल शूर शक्रारि ॥१॥
मारुत-सुत-बल हृदय विचारि । जनिक मुष्टि शत-अशनि प्रहारि ॥२॥
शुक्रक निकट गेला अति दीन । बद्धाञ्जलि राजस-रस-हीन ॥३॥
शुक्र पुछल कहु नृप लङ्केश । कोन हेतु अयलहुँ एहि देश ॥४॥
शर जर्ज्जर अति कृशतर काय । कियक रहल अछि वदन सुखाय ॥५॥
कयल प्रणाम विनत शत बार । कहल दशानन शोक अपार ॥६॥
वचन एखन अछि ई कहबाक । नहि अछि राक्षसकुल रहबाक ॥७॥
लड़यित लड़यित भेलहुँ आँट । एको तरह नहि बाँचक बाट ॥८॥
मृतसमान अयलहुँ एहि ठाम । असुर-शमन सन जनमल राम ॥९॥
विद्यमान अपनैँ जहिठाम । असुरक हारि होइछ सङ्ग्राम ॥१०॥
कहलनि शुक्र ग्रहण करु मन्त्र । सिद्ध हयत तौँ होयब स्वतन्त्र ॥११॥
निकट न आओत कालक दूत । कि करत समर अमर पुरहूत ॥१२॥
गुप्त करू गय होमक कुण्ड । देखब बुझय न वानर-झुण्ड ॥१३॥
होमकुण्ड आगिक उठ धाह । तेहि सौँ उतपति रथ रथबाह ॥१४॥
नाना अस्त्र शस्त्र बहराय । तखन चलब रण-ध्वज फहराय ॥१५॥
अजर अमर रहुगय सभ काल । करु गय दीक्षाविधि प्रतिपाल ॥१६॥
विघ्न मध्य नहि होमय पाव । शत्रु तकैत रहै अछि दाव ॥१७॥
बलि सन राजा वञ्चित कयल । स्वयं विष्णु वामन-तन धयल ॥१८॥
बलि-हित करइत गेल एक आँखि । मन्त्रशक्ति की होयत राखि ॥१९॥
मीनादिक तन धयलनि जैह । स्वयं विष्णु रघुनन्दन सैह ॥२०॥
मन्त्र लेल होमक विधि पाय । मुदित दशानन लङ्का जाय ॥२१॥
अपन भवन अन्तर दशभाल । गुफा बनाओल जेहन पताल ॥२२॥
लङ्का-द्वार कपाट लगाय । होमक द्रव्य सकल मङ्गबाय ॥२३॥
होम करय लगला लङ्केश । मौन दृढ़ासन सय्यँम-वेश ॥२४॥
देखल विभीषण अम्बर-धूम । राजभवन सौँ अविरल घूम ॥२५॥
हे रघुनन्दन देखिय धूम । रवि-शशि-ग्रह-मण्डल काँ चूम ॥२६॥
सविधि होम-पूरणता पाय । रावण सत्य अमर भय जाय ॥२७॥
कयल जाय प्रभु शीघ्र उपाय । सिद्ध दशानन कर अन्याय ॥२८॥

भावार्थः

रावण मने-मन हारि मानि गेल । आब एहि पृथ्वीलोक मे मेघनाद नहि रहल । मारुतसुत हनुमानजीक बल हृदय मे विचारलक जिनकर एक मुक्का सैकड़ों वज्रक चोट समान होइत अछि । ओ अत्यन्त दीन बनि, राजसी ठाठबाठ सँ विरक्त भ’ हाथ जोड़िकय राक्षस सभक गुरु शुक्राचार्य लग पहुँचल । शुक्राचार्य पुछलनि – “कहल जाउ लंकेश रावण, अहाँ हमरा लग कोन प्रयोजन सँ अयलहुँ अछि ? अहाँक शरीर तँ तीर सँ क्षत-विक्षत भेल देखैत छी । अहाँ बहुते दुबरइयो गेल छी । अहाँक मुँह कियैक सुखा रहल अछि ?” नम्रतापूर्वक सौ बेर प्रणाम कय केँ रावण अपन अपार शोक सुनेलक आ कहलक – “एखन यैह कहय आयल छी जे आब राक्षस लोकनिक कुल नहि बचयवला अछि । हम लड़ैत-लड़ैत बेदम भ’ गेलहुँ । बचबाक एकहु टा रास्ता नहि देखाय दैत अछि । हम असमर्थ भेल एतय आयल छी । राक्षस सब लेल यम समान राम जन्म लेलनि अछि । जेतय अपने उपस्थित छी ओतय लड़ाइ मे राक्षस सब हारैत जा रहल अछि ।” शुक्राचार्य कहलनि – “हमरा सँ एकटा मंत्र लिय’ । यदि ई मंत्र सिद्ध भ’ जायत त अहाँ मुक्त भ’ जायब । यम केर दूतो अहाँ लग नहि आओत, युद्ध मे इन्द्रदेवो किछु नहि कय सकता । अहाँ चुपेचाप जाउ आ हवन-कुण्ड बनाउ । देखब, कहीं वानर सभक दल केँ ई पता नहि लागि जाइक । हवन-कुण्ड सँ आइगक ज्वाला निकलत, ताहि मे सँ एकटा रथ आ एकटा सारथि उत्पन्न होयत । भाँति-भाँतिक अस्त्र-शस्त्र सेहो निकलत । तखन अहाँ ध्वजा फहराबैत युद्ध लेल चलि पड़ब । एकर प्रभाव सँ सदा अजर-अमर रहब । दीक्षाक विधान पूरा करू । बीच मे विघ्न नहि हुअय । दुश्मन घात लगौने रहैत अछि । भगवान विष्णु स्वयं वामन-रूप धारण कय बलि जेहेन राजा केँ धोखा देलनि । बलिक हित करैत हमर एकटा आँखि चलि गेल । मंत्रशक्ति केँ सुरक्षित रखनाय कठिन अछि । जे मीन आदिक रूप मे अवतार लेलनि से भगवान विष्णु राम केर रूप मे अवतीर्ण भेल छथि ।” हवनक रीति जानिकय रावण शुक्राचार्य सँ मंत्रक दीक्षा लेलक । फेर प्रसन्न भ’ कय लंका गेल । ओ अपन महलक भीतर पाताल जेहेन एकटा गुफा बनेलक । लंकाक दरबाजा पर फाटक बन्द करा देलक । तखन हवनक सब सामग्री मंगबायल गेल । फेर ओ मौन भ’, अटल आसन लगाकय कड़ा संयमक संग बैसिकय हवन करय लागल । विभीषण आकाश मे धुआँ देखलनि जे राजभवन सँ लगातार निकलि रहल छल । ओ रामजी सँ कहलनि – “हे राम ! ई धुआँ देखल जाउ जे सूरज आ चाँद केँ छू रहल अछि । जँ रावण विधिपूर्वक हवन पूरा कय लेत त वास्तव मे अमर भ’ जायत । हे प्रभु ! एकर जल्द प्रतिकार कयल जाय । यदि रावण केँ सिद्धि भेटि गेल त अनर्थ भ’ जायत ।” ॥१-२८॥

।सोरठा।

शुनु अङ्गद हनुमान, जाउ सकल दल कहल प्रभु ॥२९॥
करब विघ्न मतिमान, होम दशानन करै अछि ॥३०॥

भावार्थः

सुनिकय रामजी कहलनि – “हे अंगद, हे हनुमान ! सदल-बल प्रयाण करू । रावण हवन कय रहल अछि । जाकय ओहि मे विघ्न करू ।” ॥२९-३०॥

।रूपमाला।

दशकोटि वानर गेल लङ्का, लाँघि सभ प्राकार ॥३१॥
जाय रावण-भवन-रक्षक, सभक कयल संहार ॥३२॥
बाजि गजकाँ पटकि मारल, घोरतर चित्कार ॥३३॥
तत विभीषण-वधू शरमा, कयल सूचित द्वार ॥३४॥

भावार्थः

दस करोड़ वानर लंका गेल । सब कियो चहारदिवारी सब नाँघिकय भीतर पैसल आ रावणक महल केर रक्षक सभक संहार कयलक । घोड़ा आ हाथी केँ पटकि-पटकिकय मारलक । ओ सब जोर-जोर सँ चिकरय लागल । ओतय विभीषणक पत्नी शरमा ओहि गुफाक गुप्तद्वार देखा देलिह ॥३१-३४॥

।चौपाइ।

पाथर-पिहित-गुहा दृढ़द्वार । अङ्गद जोर लात सौँ मार ॥३५॥
चूर चूर सभ कयल कपाट । कयल प्रवेश विदित भेल बाट ॥३६॥
अङ्गद कहल सकल दल आउ । करू कोलाहल ध्यान छोड़ाउ ॥३७॥
रावण ध्यानलीन नहि वाक । दृढ़ आसन से अनत न ताक ॥३८॥
पकड़ि पकड़ि सेवक काँ मार । फेकल वस्तु होम-सम्भार ॥३९॥
उप-साधक काँ कुण्डहिँ झोँक । शक के महावीरगण रोक ॥४०॥
स्रुव लेल खैँचि न दशमुख जान । स्रुवक मारि मारल हनुमान ॥४१॥
मारि बहुत रावण सहि लेथि । ध्यानदृष्टि नहि बाहर देथि ॥४२॥
अन्तष्पुर गेला युवराज । आनल मन्दोदरी समाज ॥४३॥
घिसिआबथि तनिकाँ धय झोँट । करथि उपद्रव कपि कय गोट ॥४४॥
फाड़ल वसन जेहन हो जाल । तदपि न ध्यान छोड़ दशभाल ॥४५॥
कानथि मन्दोदरी विषाद । हा सुत कतय गेलहुँ घननाद ॥४६॥
अहँ बिनु एत गोट गञ्जन भोग । जीवित की नहि विधिसंयोग ॥४७॥
शुनु प्राणेश्वर बिपति समाज । एखनहुँ धरि अहँ काँ नहि लाज ॥४८॥
उठु उठु समर करूगय जाय । की बैसल छी घर घुरिआय ॥४९॥
शुक्रक एतय लाग नहि मन्त्र । परमेश्वर रघुनाथ स्वतन्त्र ॥५०॥
मरण नीक बरु निस्सङ्कोच । वानर धय धर आँचर नोच ॥५१॥
की बैसल छी आश विचारि । हा हतभाग्या भेलहुँ उघारि ॥५२॥

भावार्थः

गुफाक द्वार मबजूती सँ पाथर सँ झाँपल छल । अंगद ओहि पर जोर सँ अपन लात सँ धक्का मारलनि । फाटक केँ चकनाचूर कय देलनि । रास्ता भेटि गेल आ सब गोटे ओहि मे प्रवेश कयलनि । अंगद कहलनि – सारा दल जुटाकय एतय आबू आ हल्ला मचाउ जाहि सँ रावणक ध्यान टूटय ।” रावण मौन साधिकय ध्यान मे लीन छल । अटल आसन लगौने छल । कतहु एम्हर-आम्हर तकितो तक नहि छल । वानरक दल सेवक सब केँ पकड़ि-पकड़िकय पीटय लागल । हवनक सामग्री केँ फेकय लागल । हवन मे केनिहार पुरोहित रहथि हुनका तँ हवन कुण्डहि मे झोंकि देलक । वानर सभक दल केँ के रोकि सकैत छल । लग सँ स्रुव तानि लेलक, मुदा रावण केँ किछु पता नहि चललैक । तखन हनुमानजी वैह स्रुव सँ पीटय लगलाह । रावण मारि बर्दाश्त करैत रहल, मुदा ध्यान तोड़ि बाहर नजरि नहि फेरलक । अंगद रनिवास मे पैसि गेलाह । परिजन-सहित मन्दोदरी केँ पकड़ि अनलनि । हुनका झोंटा पकड़िकय घिसियाबय लगलाह । कपिगण तरह-तरह सँ उधम मचबय लागल । कपड़ा सब फाड़ि-फाड़िकय जाल-सन बना देलक, तैयो रावणक ध्यान नहि टूटल । मन्दोदरी बिलखि-बिलखिकय कानय लगलिह – “हा पुत्र मेघनाद, तूँ कतय चलि गेलें ? तोरा बिना एतेक भारी दुर्दशा हमरा भोगय पड़ि रहल अछि । जिबैत छलें त कि नहि छल । विधिक विडम्बना छी । सुनू हे प्राणनाथ ! एतेक रास विपत्ति भोगय पड़ल, आबो अहाँ केँ लाज नहि लगैत अछि की ? उठू-उठू, जाकय लड़ाइ करू । घर मे पैसल कि घुरिया रहल ! शुक्राचार्यक मंत्र एतय काज नहि लागत । भगवान राम एहि सभक वश मे नहि छथि । अरे निर्लज्ज ! एहि सँ त लड़िकय मरि गेनाय नीक अछि । देखू, ई वानर पकड़ि-पकड़िकय हमर आँचर केना नोंचि रहल अछि । कोन आशा सँ, कि सोचिकय अहाँ बैसल छी ? हाय, हम अभागिन उघार भ’ रहल छी ।” ॥३५-५२॥

।सोरठा।

सहि न सकल दशमाथ, मन्दोदरि विकला वचन ॥५३॥
खड्ग लेल विश हाथ, कपिगण काँ मारय चलल ॥५४॥

भावार्थः

मन्दोदरीक ई विलाप-भरल वचन रावण बर्दाश्त नहि कय सकल । बस, बीसो हाथ मे तलवार लय केँ ओ कपि सब केँ मारय लेल चलि पड़ल ॥५३-५४॥

।चौपाइ।

सहि तरुआरि बालि-सुत अङ्ग । हँसि सभ चलल होम कय भङ्ग ॥५५॥
कयल कटक रामक तट गमन । होमक धूम-धार कय शमन ॥५६॥
देखल प्राणप्रिया लङ्केश । लगला करय ज्ञान-उपदेश ॥५७॥
रावण-भवन भालु कपि आब । ई सभ जानब काल-स्वभाव ॥५८॥
यम जेहि नगर पयर नहि देथि । कुशलक्षेम सीमहि बुझि लेथि ॥५९॥
जिबयित की नहि देखी आँखि । की लय करब प्राण धन राखि ॥६०॥
प्राणप्रिया परिहरु मन शोक । सकल विनाशि दृश्य अछि लोक ॥६१॥
जत हम-हम तत दुःख अपार । जत निर्म्मम तत दुःख-उधार ॥६२॥
सम्प्रति हम चललहुँ सङ्ग्राम । आइ कि बचता लक्ष्मण राम ॥६३॥
जौँ कदाच विधि हो विपरीति । तौँ हमरा मे राखब प्रीति ॥६४॥
हमर चिता मे करब प्रवेश । सीता मारि लेब एहि देश ॥६५॥
मन्दोदरी कहल शुनु नाथ । सभ गति अछि रघुनन्दन-हाथ ॥६६॥
वनचर चारि एक अति खर्व्व । हरण करय दुर्ज्जन-गण-गर्व्व ॥६७॥
तीनि राम मे दोसर राम । अवतरला अयला एहि ठाम ॥६८॥
राजस तामस रस दिय तोड़ि । राज्य विभीषण काँ दिय छोड़ि ॥६९॥
निर्ज्जन वन बसु मुनिक समाज । सानुकूल रहता रघुराज ॥७०॥
तनिक चरण मे ध्यान लगाउ । माया-सीता तत पहुँचाउ ॥७१॥
कयल बहुत युग राज्यक भोग । परिणत से प्राणान्तिक रोग ॥७२॥
कयल ककर नहि अहँ अपराध । वनिता-हरिणि-हरण बनि व्याध ॥७३॥
विषय मनोरथ-पुञ्ज हटाउ । अथवा रण मे माँथ कटाउ ॥७४॥
रावण कहल शोक-विस्तार । हम मानल मिथ्या संसार ॥७५॥
जाय करब जौँ वन मे वास । दुर्ज्जन करत बहुत उपहास ॥७६॥
साधन-योग्य न रहल शरीर । की हम की मारथु रघुवीर ॥७७॥
जानि जानकी आनल गेह । मरण राम-कर निस्सन्देह ॥७८॥
अपनहिँ पौरुष हम हठ ठानि । समर मरब की होयत हानि ॥७९॥
ककरो रहल न मन मे रोच । रण लड़ि मरब कोन सङ्कोच ॥८०॥
हमर राज्य जौँ पाओत आन । हमहूँ होयब स्वयं भगवान ॥८१॥
जायब तनिकहि अङ्ग समाय । जनु कटु धूम जलद बनि जाय ॥८२॥

भावार्थः

अंगद तलवारक वार केँ बर्दाश्त कय लेलनि आर हवन मे विघ्न कय केँ सब गोटे हँसिकय चलि पड़लाह । हवनक धुआँ खत्म कय सब अपन छावनी मे रामजी लग पहुँचलाह । ओम्हर रावण अपन प्रेयसी मन्दोदरी केँ देखलक आ हुनका ज्ञानक उपदेश दियए लागल – “रावणक महल मे भालू आ वानर आयल ई सब काल केर संकेत छी । एहि नगर मे त यमराजो पैर नहि राखि सकैत छलथि । सीमाक ओहि पार सँ कुशल-मंगल बुझिकय चलि जाइत छलथि । कहावत अछि, जियब त कि-कि न देखब । आब जीवन आ धन राखिकय कि करब ? हे प्रिये ! मन मे शोक जुनि करू । एहि संसार मे जे किछु देखाय पड़ैछ सब विनाशशील अछि । जतबेक ‘हम-हम’ केर भावना होयत ओतबेक बेसी दुःख होयत, आर ममता जतबेक घटैत जायत ओतबेक दुःख सँ उद्धार होइत जायत । एखन हम लड़य चललहुँ । आइ राम आ लक्ष्मण बचिकय जेता कतय ! यदि विधाता विपरीत होइथ अर्थात् जँ हमहीं मारल जाय त अहाँ हमरा मे अपन प्रेम बनेने राखब । हमर चिता मे समा जायब । सीता केँ सेहो मारिकय ओहि ठाम आनि लेब ।” मन्दोदरी कहलनि – “हे प्राणनाथ, सब किछु रामक हाथ मे अछि । चारि वनवासी जाहि मे एकटा बहुते छोट अछि (यानि राम, लक्ष्मण, सुग्रीव आ अंगद) से दुर्जन लोकनिक घमंड केँ चूर कय रहल अछि । राम नाम वला तीन अवतार मे (अर्थात् बलराम, दशरथपुत्र राम आ परशुराम मे) दोसर राम अवतार लेलनि अछि । वैह एतय अयला अछि । राजस (भोग-विलास आदि) आ तामस (क्रोध-द्वेष आदि) प्रति अपन लगाव छोड़ि देल जाउ । राज्य विभीषण केँ दय दियौन । निर्जन वन मे मुनि सभक मंडली मे जाकय बसू । भगवान राम अहाँ पर कृपालु रहता । हुनकर चरण मे ध्यान लगाउ आ मायास्वरूपा सीता केँ हुनका लग पहुँचा दियौन । अहाँ कतेको युगों धरि राज्यसुखक भोग कयलहुँ । वैह भोग आइ जानलेवा रोगक रूप मे परिणत भ’ गेल अछि । अहाँ नारीरूपी मृगी केँ फँसेबाक लेल व्याध बनिकय केकर-केकर अपराध नहि कयलहुँ । अहाँ चाही त विषय-भोगक लालच केँ छोड़ू या फेर लड़ाइ मे सिर कटाउ ।” रावण कहलक – “भारी शोक आबि गेल अछि । हम मानैत छी जे ई संसार मिथ्या छी । तैयो जँ हम जाकय वन मे बास करी त दुष्ट लोक सब हमर खिल्ली उड़ायत । आब हमर शरीर तपो करबाक लायक नहि रहल । चाहे हम राम केँ मारी या राम हमरा मारथि । हम जानि-बूझिकय सीता केँ अपना घर लय अनलहुँ । अवश्ये टा हमर मृत्यु रामक हाथ सँ होयत । हदि हम अपनहि बहादुरी सँ लड़ाइ शुरू करब आ लड़ाइक मैदान मे मरि जायब त कि हानि होयत ? हम मन मे केकरहु परवाह नहि कयलहुँ । तखन युद्ध मे लड़िकय मरी त एहि मे लाजे कथी के ? यदि हमर राज्य कियो आर लय लेत त हम सेहो अपने भगवान भ’ जायब । हम ओकरहि शरीर मे लीन भ’ जायब, जेना कड़ू धुआँ मेघ बनि जाइत अछि ।” ॥५५-८२॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे दशमोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्ड केर दसम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

Related Articles