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मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड – छठम् अध्यायः रावण केर राम संग युद्ध करब, लक्ष्मण केँ शक्तिबाण लागब

848 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

लङ्काकाण्ड – छठम् अध्याय

रावण केर राम संग युद्ध करब, लक्ष्मण केँ शक्तिबाण लागब

।सोरठा।

जखन शुनल बिस-कान, समर शयित अतिकाय-गण ॥१॥
दशमुख शोक-मलान, कोप-विवश हलचल पड़ल ॥२॥

भावार्थः

रावण ई समाचार सुनल जे अतिकाय आदि सेनापति मारल गेल । ई सुनिकय ओ शोक सँ मलिन भ’ गेल । फेर जोश मे आबिकय हलचल मचबय लागल ॥१-२॥

।चौपाइ।

मेघनाद लङ्का-रखबार । रावण कयल लड़य सञ्चार ॥३॥
विकट सुभट राक्षस लेल सङ्ग । चढ़ल दिव्य रथ कोप अभङ्ग ॥४॥
अस्त्र शस्त्र सभ लय लेल ताकि । प्रभु-सन्मुख रथ चलला हाँकि ॥५॥
आशीविष सन मारल बाण । कत जन कपिक छयित सन प्राण ॥६॥
सुग्रीवादिक यूथ-प्रधान । सभ रण शयन रहित भेल ज्ञान ॥७॥
कोप विभीषण देखलहिँ बाढ़ । गदापाणि निर्भय रण ठाढ़ ॥८॥
कलकौशल सारथि सौँ माँगि । मय-देल गमहिँ चलाओल साँगि ॥९॥
देखि विभीषण-नाशिनि शक्ति । बध-अयोग्य हमरा मे भक्ति ॥१०॥
अभय देल रण मे रघुवीर । लक्ष्मण आगु धनुष लय तीर ॥११॥
लक्ष्मण-हृदय लाग से साँगि । विषम तेहन शक पानि के माँगि ॥१२॥
मायाशक्ति जते संसार । सभहिक लक्ष्मण परमाधार ॥१३॥
शेष महाप्रभु से अवतार । सहथि सकल धरणिक जे भार ॥१४॥
कि करत ततय शक्ति-सङ्घात । जनि फण धरणि सिरिस-फुलपात ॥१५॥
कर रण मानव-लीलाभाव । रावण-मन उत्साह बढ़ाव ॥१६॥
लक्ष्मण केँ मूर्च्छित रण जानि । चलब उठाय यहन मन मानि ॥१७॥
कर सौँ बल सौँ जाय उठाब । जगदाधारक गरिम सुभाव ॥१८॥
उठला नहि कत कयल प्रयास । गर्व उठाओल छल कैलास ॥१९॥
तेहन अनर्थ देखि हनुमान । दौड़ला प्रबल जेहन पवमान ॥२०॥
रावण काँ मारल तत जाय । एक मुका दृढ़ हृदय तकाय ॥२१॥
लगइत अशनि-पतन प्रतिभसल । रोकि ठेघुन मुहभर से खसल ॥२२॥
सभ मुख सभ लोचन सभ कान । शोणित बहल पड़ल अज्ञान ॥२३॥
दशमुख घुर्णित-नयन अवाक । रथपर बैशल भयवश ताक ॥२४॥

रावण लंकाक रक्षाक भार मेघनाद केँ सौंपिकय लड़बाक लेल प्रयाण कयलक । ओ बड़का-बड़का योद्धा राक्षस सब केँ संग लय केँ अटूट जोशक संग दिव्य रथ पर सवार भ’ गेल । ताकि-ताकिकय सारा अस्त्र-शस्त्र जुटा लेलक आ रथ हाँकिकय रामक सोझाँ पहुँचि गेल । ओ साँप जेहेन लहरायवला तीर चलौलक जाहि सँ कतेको रास वानरक प्राण जाय जेकाँ भ’ गेल । सुग्रीव आदि जतेको दलपति सब रहथि सब रणभूमि मे सुति रहलाह । सभक होश हेराइत चलि गेलनि । विभीषण केँ हाथ मे गदा लेने निर्भीक ठाढ़ देखिते रावण तामश सँ भरि गेल आ चुपके सँ सारथी सँ ओ शक्ति (साँग) हथियार माँगि लेलक जे ओकरा मय दानव सँ भेटल रहैक । ओ अवसर देखि वैह शक्ति केँ चला देलक । विभीषण पर छोड़ल गेल ओहि शक्ति केँ देखि राम सोचलनि जे विभीषण हमर भक्त अछि, तेँ एकरा मृत्यु सँ बचेबाक चाही । एना सोचि राम हुनका युद्ध मे अभय केर वरदान दय देलनि । लक्ष्मण धनुष-बाण लेने आगू ढाढ़ रहथि । ओ शक्ति लक्ष्मणक हृदय मे जा लगलनि । ओ एहेन तेज छल जे लगला पर पानियो मँगबाक होश नहि रहैत छलैक । संसार मे जतेको माया शक्ति सब अछि, लक्ष्मण ओहि सभक मूल छथि । ओ ओहि शेषनाग केर अवतार धथि जे सारा धरतीक भार केँ सहैत छथि । एहेन लक्ष्मण केँ ओ शक्ति कि कय सकैत छल जिनकर फन पर धरतीक खसब शिरीषक फूल केर खसबाक बराबर अछि ? ओ त युद्ध मे मानवक लीला देखा रहल छथि आ रावणक मोन केँ उकसा रहल छथि । रावण लक्ष्मण केँ मूर्च्छित बुझिकय मोन मे सोचलक जे उठाकय लय जाय । फेर जोर लगाकय हाथ सँ उठाबय लागल, मुदा जगतक आधार शेषनागक अवतार लक्ष्मण मे असाधारण भारीपन स्वभावतः रहनि । कतेको प्रयास कयलक, मुदा लक्ष्मण केँ उठा नहि सकल, जखन कि ओकरा मोन मे कैलाश पर्वत उठेबाक घमंड रहैक । ई अनर्थ देखि हनुमान वायुवेग सँ दौड़लाह । ओतय जाकय रावणक छाती पर एक मुक्का लगौलनि । ओकरा बुझेलैक मानू वज्र खसि पड़ल हो । ओ ठेहुन रोपिकय मुँहें बले धरती पर खसि पड़ल । दसो मुँह आ बीसो आँखि सँ रक्त बहय लगलैक । ओ बेहोश भ’ कय पइड़ रहल । ओकर आँखि घूमय लगलैक । बोली हेरा गेलैक । रथ पर सूतल, ओ डर सँ ताकय लागल ॥३-२४॥

।सोरठा।

भुज भरि लेल उठाय, हनूमान सौमित्रि काँ ॥२५॥
देल ततय पहुँचाय, जगन्नाथ रघुनाथ तट ॥२६॥
रावण रथपर जाय, बैसलि शक्ति अनन्त तजि ॥२७॥
दशमुख संज्ञा-पाय, धयल शरासन कोपवश ॥२८॥

भावार्थः

हनुमानजी लक्ष्मण केँ अपन बाँहि मे लय केँ उठा लेलनि आ ओतय पहुँचलाह जेतय राम छलथि । ओ शक्ति शेषावतार लक्ष्मण केँ छोड़ि रावणक रथ पर जा बैसल । रावण केँ होश अयलैक । फेर कुपित भ’ ओ तीर-धनुष उठौलक ॥२५-२८॥

।रूपमाला।

सँभरि रथपर कर-शरासन, चलल रावण क्रुद्ध ॥२९॥
रामचन्द्रक निकट पहुँचल, करक निर्भय युद्ध ॥३०॥
हनूमान अमान-बल, वरयान चढ़ि रघुवीर ॥३१॥
कयल धनु-टङ्कार जेहन, अशनि-धुनि गम्भीर ॥३२॥
कहल प्रभु गम्भीर वचनहिँ, रे दशानन चोर ॥३३॥
कतय जयबह एहि समरसौँ, निकट अन्तक तोर ॥३४॥
हनल जे राक्षस-जनालय, तोहर अनुचर लोक ॥३५॥
तेहन गति हम करब, सम्प्रति छुटत तोहर शोक ॥३६॥

भावार्थः

हाथ मे तीन-धनुष लय सम्हरिकय रथ पर सवार क्रोधित रावण रामचन्द्रक समीप निर्भय भ’ कय युद्ध करय लेल पहुँचि गेल । असीम बलवान हनुमान केँ संग लय राम सेहो सुन्दर रथ पर सवार भेलाह । धनुषक डोरी खींचि तेहेन टङ्कार कयलनि मानू वज्र खसबा समान गम्भीर ध्वनि निकलल । फेर रामजी गम्भीर वचन कहलनि, अरे चोर दशानन ! एहि समर भूमि (युद्ध भूमि) सँ बचिकय तूँ कतय जएबें, तोहर अन्त नजदीक आबि गेलौक । लंका मे जे सब तोहर पाछाँ चलयवला राक्षस छल, ओकरा सब केँ हम मारि चुकल छी । आब तोहर एहेन करब जे तोहरा सारा शोक (कष्ट) सदा-सदा लेल दूर भ’ जेतौक ।” ॥२९-३६॥

।चौपाइ।

रामक वचन शुनल दशभाल । भ्रुकुटी कुटिल नयन सभ लाल ॥३७॥
पवन-तनय काँ शत्रु विचार । शर अनेक तनि काँ तन मार ॥३८॥
शर-व्रण-व्यथा वृथा मन मान । केसरि-नाद करथि हनुमान ॥३९॥
देखि शरजर्ज्जर मारुति-अङ्ग । कालरुद्र सम श्रीप्रभु-रङ्ग ॥४०॥
अश्वसहित रथ ध्वज रथवाह । धनुष शस्त्र सभ तन सन्नाह ॥४१॥
छत्र पताका सभ देल काटि । रघुवर शरक सहय के साटि ॥४२॥
रावण हृदय अशनि-शर मारि । भूधर उपर जेहन पाकारि ॥४३॥
थर थर दशमुख रण मे काँप । कर सौँ ससरि ससरि खस चाप ॥४४॥
रघुपति देखल रावण-रङ्ग । रविनिभ मुकुट शरैँ कय भङ्ग ॥४५॥
रे रे दशमुख खल कृशप्राण । एखन प्रहार करब नहि बाण ॥४६॥
घुरि केँ लङ्का लज्जित जाह । प्रातहिँ अबिहह जनु अगुताह ॥४७॥
देखिहह हमर समर-बल प्रात । अहह रहह हनुमान सौँ कात ॥४८॥
मुका तनिक लगताँ एक गोट । यमपुर जहबह कर्म्मक छोट ॥४९॥
शुनि रावण लज्जित चललाह । विकल अपन बल पाओल थाह ॥५०॥
लक्ष्मण मूर्छित धरणी-शयन । सकरुण देखल पङ्कजनयन ॥५१॥
कत विलाप कय कय प्रभु कान । विकल सकल अङ्गद हनुमान ॥५२॥
ततय विभीषण कहल उपाय । लङ्कादूत महाबल जाय ॥५३॥
वैद्य सुषेण जनिक थिक नाम । तनिकाँ लय आनथि एहि ठाम ॥५४॥
ओ औषधि कहता अनुकूल । लक्ष्मण काँ सञ्जीवन-मूल ॥५५॥
प्रभु-आज्ञा मारुत-सुत जाय । आनल तनिकाँ गमहिँ उठाय ॥५६॥
कहल वैद्य औषधिक ठेकान । रातिहिँ भरि मे जौँ पत आन ॥५७॥
तौँ बच लक्ष्मण वीरक प्राण । प्रात होयत होयत नहि त्राण ॥५८॥
के जायत लायत एत राति । सह सह करइछ राक्षस जाति ॥५९॥

।सोरठा।

नल त्रिरात्र घुरि आब, मैन्द द्विविद दुइ राति मे ॥६०॥
से सुग्रीव-प्रभाब, एकराति मे नील घुर ॥६१॥
चारि पहर मे आब, जाय द्रुहिणगिरि बालिसुत ॥६२॥
अड़ड़ा लागल नाव, राम विकल सकरुण कहल ॥६३॥

भावार्थः

रावण रामक बात सुनलक । सुनितहि ओकर भौंह टेढ़ आ आँखि लाल भ’ गेलैक । हनुमान केँ शत्रु बुझिकय रावण हुनका शरीर पर अनेकों तीर मारलक । तीरक घाव केँ बिना परवाह कएने हनुमानजी सिंह-गर्जना करय लगलाह । हनुमानजीक शरीर केँ तीर सँ क्षत-विक्षत देखि राम मानू प्रलयकाल केर रुद्र बनि गेलाह । राम तीर चलाकय रावण केँ घोड़ा-सहित रथ, ध्वजा, सारथी, धनुष आदि शस्त्र, शरीरक कवच, छत्र, पताका, सबटा केँ काटि देलनि । रामक बाण केर आघात के सहित सकैत अछि ? राम रावणक छाती पर ओहिना तीर मारलनि, जाहि तरहें इन्द्र पर्वत उपर वज्र मारैत छथि । लड़ाइ मे रावण थर-थर काँपय लागल । ओकर हाथ सँ धनुष खिसकि कय खसि पड़ैत अछि । राम रावणक एहेन अबस्था देखलनि आ ओकर सूरज समान चमकैत मुकुट केँ बाणक प्रहार सँ तोड़ि देलनि । राम कहलनि – “अरे रे दुष्ट रावण, आब तोहर प्राण कनिकबे बचि गेल छौक । एखन हम तोरा उपर तीर नहि चलायब । एखन तूँ लज्जित भ’ लंका जो । भोर होइतहि फेर अबिहें । हड़बड़ीक कोन बात ? काल्हि देखमें लड़ाइ मे हमर ताकत कतेक अछि । अरे, हनुमान सँ बचिकय रहिहें । हुनकर एक्के मुक्का खाकय तूँ अभागल यमलोक चलि जेमें ।” ई सुनिकय रावण लज्जित आ खिन्न भ’ कय घर लौटि गेल आ ओकरा अपन ताकतक हद (सीमा) थाह लागि गेलैक ॥३७-५०॥

संजीवनी अनबाक प्रयास; कालनेमिक कथा 

एम्हर राम करुण भाव सँ देखलनि जे लक्ष्मण धरती पर बेहोश पड़ल छथि । राम बिलखि-बिलखिकय कनैत छथि आ अंगद, हनुमान आदि सब घबरायल छथि । ओतय विभीषण एक गोट उपाय बतौलनि – “हनुमान केँ दूत बनाकय लंका पठाउ । सुषेण नामक जे वैद्य ओतय रहैत छथि, हुनका एतय आनि लेथि । वैह टा लक्ष्मण लेल उपयुक्त दवाइ सजीवन-मूल बतौता ।” राम केर आज्ञा पाबि हनुमानजी गेलाह आ वैद्य सुषेण केँ धीरे सँ उठा अनलथि । वैद्य संजीवनी दबाइ केर ठेकाना बतौलनि आ कहलनि जे यदि कियो राति भरि मे ओ दबाइ एतय आनि देत त वीर लक्ष्मण केर प्राण बचि सकैत छन्हि, नहि त भोरे होइते हिनका कियो नहि बचा सकतनि । राम बिलखैत कहलनि – “एतेक राति मे के जाकय आनत ? डेग-डेग पर राक्षस सभक भरमार अछि । नल तीन राति मे द्रुहिणाचल जा कय वापस लौटि सकैत छथि । मैन्द आ द्विविज दुइ राति मे । सुग्रीव सेहो दुइ राति मे घुरबाक शक्ति रखैत छथि । नील एक राति मे घुरि सकैत छथि । बालिक पुत्र अंगद चारि पहर मे लौटि सकैत छथि । नाव औघट मे अटैक गेल ।” ॥५१-६३॥

।चौपाइ।

समर-शूर रुद्रक अवतार । हनुमानक मुख राम निहार ॥६४॥
महावीर द्रुहिणाचल जाउ । मृतावस्थ सौमित्रि जियाउ ॥६५॥
कह हनुमान यथाज्ञा पाय । लायब पर्व्वत त्वरित उठाय ॥६६॥
सञ्जीवन औषधि अछि हाथ । चिन्ता परिहरु श्रीरघुनाथ ॥६७॥
जाइत अबइत हयत न देरि । आनब सञ्जीवन काँ फेरि ॥६८॥
सकरुण हृदय कयल नहि जाय । कपि-दल सकल विकल अकुलाय ॥६९॥
रावण काँ वार्ता भेल कान । औषध काज चलल हनुमान ॥७०॥
कालनेमि-गृह आतुर जाय । चिन्तातुर रावण असहाय ॥७१॥
बैसला अर्घ्यादिक सन्मान । से कयलनि जे उचित विधान ॥७२॥
अति आश्चर्य्य कथा ई लाग । राजागमन सुभवनक भाग ॥७३॥
कालनेमि कह कहु वृत्तान्त । नृप भय की अयलहुँ एकान्त ॥७४॥
की थिक से कहु करु जनु ब्याज । आनन-कमल मलिन भेल आज ॥७५॥
रावण कहल वचन छल-हीन । हमरहु सङ्कट काल-अधीन ॥७६॥
मय-देल साँगि चलाओल आज । लक्ष्मण मूर्छित से भल काज ॥७७॥
सञ्जीवन आनय हनुमान । अति-जब कयल वीर प्रस्थान ॥७८॥
कपट मुनिक पथ वेष बनाउ । मारुत-नन्दन काँ अटकाउ ॥७९॥
प्रातहिँ मरता लक्ष्मण नाम । विजय हमर होयत सङ्ग्राम ॥८०॥
रावण-वचन शुनल से कान । के रोकत चलइत हनुमान ॥८१॥
कालनेमि कह आज्ञा करब । मारीचक जकँ तकइत मरब ॥८२॥
हत भेल पुत्र पौत्र प्रिय लोक । अपनैँ काँ मन नहि हो शोक ॥८३॥
समर असुर-कुल-वीर विनाश । अपनैँ काँ अछि जिबइक आश ॥८४॥
कि करब सीता कि करब राज । डर सौँ समुचित जन के बाज ॥८५॥
मुनिगण सङ्ग बसू वन जाय । संयम नियम करू समुदाय ॥८६॥
मायामय जानू संसार । सभ जनले अछि ज्ञानविचार ॥८७॥
हम उपदेश कहै छी गूढ़ । काल-विवश ज्ञानी हो मूढ़ ॥८८॥
ताकब गय की देश विदेश । लोचन-पथ निज पुर परमेश ॥८९॥
रामचन्द्र विष्णुक अवतार । लक्ष्मण शेष धरणि धर भार ॥९०॥
सीता विष्णुक माया जानि । हठ परित्यागु हेतु की हानि ॥९१॥
हृदय-कमल प्रभु-ध्यान लगाउ । ई संसार-जलधि तरि जाउ ॥९२॥
भजु रघुनन्दन सीता-सहित । बैरि-भावनादिक सौँ रहित ॥९३॥
एखनहुँ धरि अछि विजयक आश । तूर झूर जनु लाग हुताश ॥९४॥

भावार्थः

एतेक कहिकय राम लड़ाइ मे बहादुर रुद्रावतार हनुमानजीक मुँह ताकय लगलाह आ कहलाह – “हे महावीर, अहीं द्रुहिणाचल जाउ आ मरणासन्न लक्ष्मण केँ जियाउ ।” हनुमान कहलनि – “यदि आज्ञा होइ त हम तुरत ओहि पर्वते केँ उठाकय आनि दी । हे राम, अपने चिन्ता जुनि करू । मानू संजीवनी बूटी हमर हाथहि मे अछि । हमरा जाइत आ अबैत देरी नहि लागत । हम संजीवनी लय केँ लौटब । हे राम, अहाँ हृदय मे करुण भाव जुनि आबय देल जाउ । अहाँ केँ सकरुण देखि सारा कपिगण आकुल-व्याकुल भ’ उठत ।” ॥६४-६९॥

ओम्हर रावण केँ खबरि लागि गेलैक जे हनुमान दबाइ आनय चललाह । रावण चिन्ता सँ व्याकुल भ’ असगरे कालनेमिक घर गेल । रावण ओतय बैसल । कालनेमि यथोचित रीति सँ अर्घ्य आदि दय केँ ओकर सत्कार कयलक । कालनेमि बाजल – “बड अचरज केर बात अछि । राजाक सवारी घर आयल, ई हमर सौभाग्यक बात थिक । कहू, कि हाल अछि ? कि अहाँ कोनो राजाक डर सँ असगर आयल छी ? कहू, नुकाउ जुनि । ओ राजा के छी ? अहाँक चेहरा आइ उदास लगैत अछि ।” ॥७०-७५॥

रावण ठीक-ठीक सब बात बता देलक – “हमहुँ काल केर वश मे छी, तेँ हमरहु उपर एकटा संकट आबि गेल अछि । आइ हम मय द्वारा प्रदत्त साँग (शक्ति) चलेलहुँ । ताहि सँ लक्ष्मण मूर्च्छित भेलथि, से त नीके भेल । मुदा महावीर हनुमान संजीवनी आनय लेल बड़ा वेग सँ चलि पड़लाह अछि । अहाँ मुनिक कपट वेष बनाकय हनुमान केँ अटकाउ । भोर होइतहि लक्ष्मण मरि जेताह, तहन लड़ाइ मे हमर जीत होयत ।” ॥७६-८०॥

कालनेमि रावणक बात सुनिकय कहलनि – “हनुमान केँ रास्ता चलैत भला के रोकि सकैत अछि ? तैयो हम अहाँक आज्ञा पूरा करब आ मारीच केर जेकाँ देखिते-देखिते मारल जायब । अहाँक बेटा मरल, पोता मरल आ आरो कतेको प्रिय लोक सब मरल, तैयो अहाँक मोन मे शोक नहि भेल । हमर राक्षस कुल केर वीर एक-एक कय केँ मारल जा रहल अछि; मुदा अहाँ केँ अपनहि टा जिबय केर आशा अछि । सीता केँ लय केँ आर राज्य केँ लय केँ अहाँ कि करब ? डरक मारे कियो अहाँ केँ उचित बात नहि कहैत अछि । अहाँ वन जा कय मुनि सभक संग निवास करू आ ओतय मिलि-जुलिकय संयम-नियम केर संग रहू । एहि संसार केँ मात्र माया (वंचना) बुझू । अहाँ केँ त ज्ञानक सारा बात जानकारी अछि । तैयो हम किछु रहस्यमय उपदेश कहैत छी । काल केर वश मे आबिकय ज्ञानवान पुरुष सेहो अज्ञानी भ’ जाइछ । अहाँ कियैक देश-विदेश ताकय लेल जायब । परम प्रभु तँ स्वयं अहाँक नगर मे आयल छथि । राम विष्णुक अवतार थिकाह आ लक्ष्मण धरतीक भार धारण करयवला शेषनागक अवतार छथि । सीता केँ विष्णुक स्त्री माया बुझू आ जिद्द छोड़ू । नाहक बर्बादी मे कियैक पड़ब । हृदय मे प्रभु राम केर ध्यान करू आर एहि संसाररूपी सागर केँ पार करू । सीता-सहित राम केर भजन करू जाहि मे वैरी आदि दुर्भावना सब नहि अछि । आबहु अहाँ केँ जीतक आशा बनल अछि, मानू सुखायल रुइया मे आइग लागि गेल हो ।” ॥८१-९४॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे षष्ठोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्ड केर छठम अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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