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मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड पाँचम अध्याय – अंगद केर दूत बनिकय रावण संग संवाद व अन्य प्रकरण

1806 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

लङ्काकाण्ड – पाँचम अध्याय

रावण द्वारा शुक केर अपमान, शुक केर कथा, माल्यवान केर निष्कासन 

।चौपाइ।

॥जयकरी इत्यपि नाम॥

शुक-मुख-वचन शुनल लङ्केश । मूढ़ तोर जानल बुढ़ वेश ॥१॥
शुक गुरुजकाँ की कहइछ ज्ञान । बाढ़ल मन मे बड़ अभिमान ॥२॥
रे पापिष्ठ नगर काँ छाड़ । बसय न देब भाँड़ सम राड़ ॥३॥
एखनहि प्राण तोर हम लेब । चर खर केँ मानब गुरु-देव ॥४॥
किङ्कर जानि कयल प्रतिपाल । सिंहक शासक शुभ्र शृगाल ॥५॥
रे हम त्रिभुवन शासक आज । नीति पढ़ाबय मन नहि लाज ॥६॥
प्राण हरण करितहुँ से क्रोध । बचला पूर्व्वक गुण अनुरोध ॥७॥
पुन जनु आबह राजद्वार । बिगड़ल बुद्धि बिलट व्यवहार ॥८॥
वानर-नख-दन्तक विष देह । औषध करह जाय निज गेह ॥९॥
जोड़ल हाथ कम्प बड़ अङ्ग । चलल भवन भय मानक भङ्ग ॥१०॥
मन मे शुक कह महाप्रसाद । हेतु कि ककरहु कहब समाद ॥११॥
शुक ब्रह्मिष्ठ छला द्विज जाति । वानप्रस्थ-विधि-रत दिन राति ॥१२॥
देव-वृद्धि सुख हो अभिराम । यज्ञ करथि असुर-क्षय-काम ॥१३॥
वज्रदंष्ट्र एक राक्षस घोर । आयल आश्रम बनि केँ चोर ॥१४॥
अयला ततय अगस्ति महान । शुक पाहुनक कयल सन्मान ॥१५॥
जखना कुम्भज गेला नहाय । वज्रदंष्ट्र तनि वेष बनाय ॥१६॥
छाग मांस होइछ मन खाइ । कहलनि तृप्त निजाश्रम जाइ ॥१७॥
शुक बनबाओल तेहने पाक । मुनि विलम्ब पूजा सन्ध्याक ॥१८॥
से राक्षस पुन चूपहि चूप । आयल बनि शुक-वधू स्वरूप ॥१९॥
मानुष-मासु परसि देल पात । अन्तर्हित अपने भय कात ॥२०॥
मानुष-मांस अमेध्य विचार । घोर कोप मुनि-मन सञ्चार ॥२१॥
रे शुक राक्षस हो तोँ जाय । मानुष-मांस तोँ दितैँ खोआय ॥२२॥
शुक-मन शुष्क कहल मुनि जैह । छाग मांस भोजन विधि सैह ॥२३॥
मुनि मुहूर्त भरि कयलनि ध्यान । जानल कर्म्म कयल केओ आन ॥२४॥
कहल अगस्ति तोहर नहि दोष । शाप अकारण मन घन रोष ॥२५॥
रामक जखन होयत अवतार । दशवदनक बनबह तोँ चार ॥२६॥
रामक दर्शन सौँ छुट शाप । कर जनु शुक किछु मन मे ताप ॥२७॥
शुक ब्राह्मण राक्षस तन पाय । भोगल कर्म्म लिखल कत जाय ॥२८॥
वैखानस सङ्ग कर तप वेश । राक्षसताक रहल नहि लेश ॥२९॥

भावार्थः

लंकापति रावण शुकक मुँह सँ उपर्युक्त बात सब सुनलक आ सक्रोध बाजल, “अरे मूढ़, हमरा बुझय मे आबि गेल । तूँ बहुते बूढ़ भ’ गेल छँ । अरे शुक, तूँ त गुरु जेकाँ हमरा ज्ञानक बात सब बता रहल छँ । तोहर मोन मे अभिमान बढ़ि गेल बुझाइछ । अरे परम पापी, तूँ हमर लंकापुरी सँ बाहर चलि जो । एहेन फूटल भाँड़ जेहेन राड़ केँ हम अपना नगर मे रहय नहि देब । एखनहिं हम तोहर जान लय लेब । गधा बराबर एहि दूत केँ हम अपन गुरुदेव मानि ली ? नौकर बुझिकय हम तोरा पोसलहुँ-पाललहुँ । कि सफेद सियार सिंहक शासक भ’ सकैत अछि ? अरे, आइ हम तीनू लोकक शासक छी, फेर हमरहि तूँ नीति पढ़बैत छँ ? मोन मे लाजो नहि लगैत छौक तोरा ? तामश त हमरा एतेक भेल अछि जे एखनहि हम तोहर जान लय लितहुँ, मुदा पिछला गुण सभक कारण तूँ एखन बचि गेलें । फेर कहियो एहि दरबार मे नहि अबिहें । जखन बुद्धि बिगैड़ जाइत छैक तखन चाइल उलैट जाइत छैक । तोहर शरीर मे बानर सभक नह आ दाँत केर जहर पसैर गेल छौक । अपन घर जाकय एकर इलाज करा ।” ॥१-९॥

एतेक सुनितहि शुकक देह थरथर काँपय लागल । ओ हाथ जोड़ि लेलक आ भयभीत भ’ सम्मान गमाकय अपन घर चलि गेल । शुक मनहि-मन कहलक – बड पैघ कृपा भेल जे जिन्दा छोड़ि देलक । हमर अपराध यैह भेल जे हम किनको समाद सुना देलियनि । शुक द्विज छल, ब्रह्माजीक साधक छल, दिन-राति वानप्रस्थ लोकनिक कार्य मे लागल रहैत छल । देवता सभक वृद्धि सँ नीक सुख भेटैत छलैक, तेँ असुर सभक नाश लेल ओ यज्ञ कयल करैत छल । एक समय वज्रदंष्ट्र नामक एक भयानक राक्षस चोर बनिकय ओकर आश्रम मे पैसि गेल । ओहि आश्रम मे महर्षि अगस्ति पधारलाह । शुक अतिथिक समुचित सत्कार कयलक । जखन अगस्ति मुनि स्नान करय गेलाह तखन वज्रदंष्ट्र हुनकर स्वरूप धारण कय लेलक आर कहलक – “मोन करैछ जे खस्सीक माँसु खाय आ तृप्त भ’ अपना आश्रम लौटि जाय ।” शुक तेनाही खस्सीक माँसु बनबौलक । मुनि केँ साँझक पूजा मे किछु समय लागि गेलनि । फेर ओ राक्षस चुपके सँ एक जातिक महिलाक रूप धारण कय केँ आबि गेल । ओ छद्मरूपा महिला मनुष्यक माँस पत्ता पर परोसि देलक आ अपने गायब भ’ गेल । मुनि अगस्ति जेनाही बुझलनि जे मनुष्यक अखाद्य माँस परोसल गेल अछि, तहिना क्रोध सँ आगिबबूला भ’ गेलाह, आर कहलनि – “अरे शुक, तूँ तुरन्त राक्षस बनि जो । आइ त तूँ हमरा मनुष्यक माँस खुआ दितें ?” एतेक सुनितहि शुकक प्राण सुखा गेलैक । ओ बाजल – “हे मुनि, अपने जे कहने रही सैह छागरक माँसु त भोजन मे देल गेल अछि ।” मुनि अगस्ति क्षणहि भरि मे ध्यानमग्न भेलाह आ फेर हुनका पता चलि गेलनि जे ई कुकर्म कियो आर कयलक अछि । अगस्ति कहलनि – “अहा ! एहि मे तोहर अपराध नहि अछि । बेसी तामसक कारण अनाहके मे हम तोरा श्राप दय देलियौक । जखन रामक अवतार होयत, तखन तूँ रावणक गुप्तचर बनमे । रामक दर्शन सँ तोहर ई श्राप दूर भ’ जयतौक । हे शुक, तूँ मोन मे कोनो सन्ताप जुनि करे ।” ॥१०-२७॥

एहि प्रकार सँ ब्राह्मण शुक राक्षसक शरीर पाबिकय कर्मक फल भोगलक । जे भाग्य मे लिखल रहैछ से टलत केना ? तखन ओ शुक संन्यासी सभक संग तप करय लागल आर ओकरा मे राक्षसत्वक लेशो मात्र नहि रहि गेलैक ॥२८-२९॥

।चौबेल छन्द।

शुक निष्काशन कयल दशानन, तखन कहल भल माल्यवान ॥३०॥
की निश्शङ्क चित्त लङ्कापति, कपि-डङ्का शुनि पड़य कान ॥३१॥
अपनहुँ आँखि प्रबल दल देखल, अपने काँ के कहत आन ॥३२॥
श्रीरघुवर परमेश समागम, नृपवर भय रहु सावधान ॥३३॥
सीता देल जाय रघुवर केँ, काल-दण्ड कर तनिक बाण ॥३४॥
शपथ खाय हम सत्य कहै छी, नहि तौँ बचत न अहँक प्राण ॥३५॥
कोटि कोटि हनुमान अधिक-बल, नख-दन्तायुध चढ़ल शाण ॥३६॥
प्रात पुरी प्रवेश करत सभ, शत शङ्कर नहि करत त्राण ॥३७॥
यदवधि सीता हरि आनल अछि, असगुन होइछ पुरी आबि ॥३८॥
तकरो शान्ति सविधि होमक थिक, काटल जाय अनिष्ट भावि ॥३९॥
रामचन्द्र नारायण निश्चय, तनिक चरण मे करु भक्ति ॥४०॥
जननी वैदेही का मानू, हरिमाया वर-आदि-शक्ति ॥४१॥
शुनि दशभाल लाल-लोचन कह, यम-कुबेर काँ हमर त्रास ॥४२॥
वानर-बल-आश्रित दुइ भ्राता, होयता राक्षस-जनक ग्रास ॥४३॥
जाह जाह घुरि एतय न आबह, बहुत वृद्ध गत-बुद्धि-ज्ञान ॥४४॥
रामचन्द्र दिशि मिलि आयल छह, ततहि जाह निर्व्वाह मान ॥४५॥

भावार्थः

जखन रावण शुक केँ निकाल-बाहर कय देलक तखन माल्यवावन् बजलाह – “हे लंकाधिपति, अपने केना चैन सँ छी जखन कि वानरी सेनाक डंकाक आवाज सुनाय दय रहल अछि ? अहाँ अपन आँखि सँ वानरक प्रबल सेना केँ देखलहुँ । तैयो अहाँ सँ आन कि कहत ? हे श्रेष्ठ राजा, परमेश्वर राम पधारि रहल छथि । अपने सावधान भ’ कय रहू । राम केँ सीता दय दियौन । हुनकर हाथक तीर मानू काल-दंड थिक । हम शपथ खा कय कहैत छी, एना नहि कयला सँ अहाँक जान नहि बचत । एहि वानरी सेना मे करोड़ों सैनिक हनुमान सँ बेसी ताकतवर अछि । ओकर नह दाँत मानू कि सोना पर चढ़ाकय तेज कयल गेल होइक । से सेना भोरे लंकापुरी मे प्रवेश करत । सौ टा भगवान् शंकरो अहाँक त्राण (रक्षा) नहि कय सकता । जहिया सँ अहाँ सीता केँ हरण कय अनलहुँ अछि, तहिये सँ एहि लंकापुरी मे अपशकुन होइत आबि रहल अछि । एहि अपशकुन केर शान्ति सेहो विधिपूर्वक कयल जेबाक चाही । भावी अमंगलक निराकरण कयल जाय । रामचन्द्र निःसन्देह नारायण-स्वरूप छथि । हुनकर चरणक भक्ति कयल जाउ । सीता केँ जगज्जननी, विष्णुक माया आदिशक्ति बुझू ।” ई सुनिकय रावणक आँखि तामसे लाल भ’ गेलैक । ओ बाजल – “यम आ कुबेर केँ सेहो हमर डर होइत छैक । केवल वानरी सेनाक ताकत वला ई दुनू भाइ राक्षस सभक भक्ष्य भ’ जायत । जाउ, अपन घर घुरि जाउ अहाँ । फेर एतय जुनि आयब । बहुत बूढ़ भ’ गेलहुँ आब । आब अहाँक समझ-बूझ सेहो हेरा गेल अछि । अहाँ राम सँ साँठ-गाँठ कय अयलहुँ अछि । ओतहि जाउ । ओतहि अहाँक निर्वाह होयत, ओतहि सम्मान भेटत ॥३०-४५॥

राम केर बाण सँ रावणक मुकुट खसब, मन्दोदरी द्वारा रावण केँ समझेबाक प्रसंग

।सवैया।

गिरिवर-उच्च सौध पर रावण बैसल बर-मन्त्री-गण सङ्ग ॥४६॥
कथक गाब रसभाव सुखद स्वर विविध ताल लय बाज मृदङ्ग ॥४७॥
मन्दोदरी निकट पट-भूषण-शोभित छथि शुनइत वर गान ॥४८॥
मदिरा पान-पात्र शोभित थल त्रास नाश अतिशय अभिमान ॥४९॥
रावण घन मुकुटाली चपला मन्दोदरी-श्रवण-ताटङ्क ॥५०॥
रावण काँ देखल रघुनन्दन भेल कोप मन भ्रुकुटी वङ्क ॥५१॥
दश किरीट अवदात छत्र महि खसल चलल रघुवर-कर तीर ॥५२॥
की थिक की थिक दशमुख लज्जित कहल बहल नहि प्रबल समीर ॥५३॥

भावार्थः

पहाड़क शिखर पर श्रेष्ठ मंत्री लोकनिक संग रावण बैसल छल । कत्थक-रस आ भाव सँ मुक्त मधुर स्वर मे गाबि गहल छल आ भाँति-भाँति केर ताल मे मृदंग बाजि रहल छल । लग मे बैसलि मन्दोदरी कपड़ा आ गहना सँ सजल बैसिकय सुन्दर संगीत सुनि रहल छथि । स्थान मदिरा सँ भरल प्याला सब सँ सुशोभित अछि । भय दूर भ’ गेल अछि आ भारी घमंड अत्यन्त बढ़ल अछि । रावणक माथक श्रेणीबद्ध मुकुट आ मन्दोदरीक कानक झुमका संगीतक स्वर पर डोलि रहल अछि । राम एहि रूप मे रावण केँ देखलनि । हुनकर मोन मे क्रोध जागि गेलनि आ भौंह टेढ़ भ’ गेलनि । राम एक बाण चलौलनि । रावणक दसो मुकुट आ श्वेत छत्र धरती पर खसि पड़ल । रावण लज्जित भ’ बाजि उठल – “अरे, ई कि छी ? ई केना खसल ? कोनो तेज हवा त नहि चलल अछि !” ॥४६-५३॥

।सोरठा।

शयन-भवन चललाह, मुकुट छत्र खसलय विमन ॥५४॥
पुन कहि हँसि उठलाह, शिर कटलय बढ़इछ विभव ॥५५॥

भावार्थः

मुकुट आ छत्र केर खसला सँ, जे अपशकुन थिक, चिन्तित भ’ रावण शयनकक्ष मे चलि गेल । फेर हँसिकय बाजि उठल – ‘अरे चिन्ताक कोनो बात अछि ? माथ कटले सँ हमर विभव (मान-सम्मान, यश-सम्पत्ति आदि) तँ बढ़िते अछि ।” ॥५४-५५॥

।मिथिला-सङ्गीतानुसारेण जयकरी छन्दः।

मन्दोदरि असगुन मन मानि । दैवक हतमति काँ नित हानि ॥५६॥
राम-अनादर-फल परिणाम । कुशल कतहु रह लङ्का गाम ॥५७॥
तखनहि सौँ मन बढ़ आतङ्क । खसल अकारण श्रुति-ताटङ्क ॥५८॥
रावण काँ कहलनि सति रीति । मर्य्यादा कत जतय अनीति ॥५९॥
हमरहु दुख देखी हित हानि । गेलहुँ वर्षा बाँधी पानि ॥६०॥
राम विमुख सुख-सिन्धु सुखाय । वधिर अन्ध कह जन-समुदाय ॥६१॥
अपमानित सोदर निर्भीत । घर-विरोध नाशक पथ थीक ॥६२॥
अपने काँ अछि कोप प्रचण्ड । नीति कहथि से पाबथि दण्ड ॥६३॥

भावार्थः

मन्दोदरी एकरा अपशकुन बुझिकय चिन्ता करय लगलिह – “जेकर बुद्धि केँ दैव मारि दैत छथि ओकर नित्य हानि होइत रहैत छैक । रामक अनादर केर ई फल-परिणाम छी । आब लंकापुरी कतहु कुशल रहि सकैत अछि ?” तखनहिं सँ हुनकर मन मे आतंक बढ़ि गेल अछि जखन सँ कानक गहना अकारण खसि पड़ल । सती-साध्वी केर रीति सँ मन्दोदरी रावण सँ कहलनि – “जाहिठाम अनीति (अन्याय) रहत ओतय मर्यादा (प्रतिष्ठा) कतय ! अहाँक हितक हानि होइत देखि हमरो दुःख अछि । कहावत अछि, वर्षा समाप्त भ’ गेलापर खेतहु मे पानि बाँधिकय रखबाक चाही, अर्थात् जे बीति गेल से बीति गेल, आब आगूक चिन्ता कयल जाउ । राम अप्रसन्न भ’ जाइथ तँ सुखक समुद्रो सुखा जायत तथा लोक आन्हर आ बहिर कहत । अपने बिना कोनो भय केँ अपन सहोदय भायक अपमान कयलहुँ, जखन कि घर मे झगड़ा भेनाय नाशक रास्ता थिक । अहाँक कोप अत्यन्त प्रचण्ड अछि । नीति कहैत अछि जे एहेन लोक दण्ड पबिते टा छथि ॥५६-६३॥

।सवैया छन्द।

कहइत नीति लात सौँ मारल नेह न राखल सोदर भाय ॥६४॥
गेला विभीषण विश्वकर्म्म-सुत नलसौँ राम समुद्र बन्धाय ॥६५॥
हनूमान वानर से आयल लङ्का मे गेल आगि लगाय ॥६६॥
प्राणनाथ निश्शङ्क वृथा छी बाढ़ल जाइछ विपति सवाय ॥६७॥

भावार्थः

ओ नीति कहलनि त अपने हुनका लात सँ मारल, सहोदर भाय सँ स्नेह नहि राखल । विभीषण चलि गेलाह । विश्वकर्माक पुत्र नल सँ राम समुद्र बँधबौलनि । हनुमान वानर अयलाह आ लंका मे आगि लगा गेलाह । हे प्राणनाथ, अहाँ निश्चिन्त कोना छी ? विपत्ति रोज बढ़िते जा रहल अछि ॥६४-६७॥

।रावण-वचन।

की करताह आबि लङ्का मे जनिकाँ वानर भालु सहाय ॥६८॥
प्रेयसि शुनु चिन्ता मन जनु करु कुम्भकर्ण सन हमरा भाय ॥६९॥
जगइत छथि एको नहि बचता सभ कपिदलकेँ जैथिनि खाय ॥७०॥
जिबइत पकड़ब दुनू भाइ काँ तखन तमाशा देखब जाय ॥७१॥

भावार्थः

रावण कहलक – “जिनकर केवल वानर आ भालू सहायक छन्हि से लंका मे आबिकय करबे कि करता ? हे प्रिये, अहाँ मोन मे चिन्ता जुनि करू । हमर कुम्भकर्ण समान भाइ अछि । ओकरा जागय दियौक । एकहु टा नहि बचत । ओ सब वानर केँ खा जायत । राम आ लक्ष्मण दुनू भाइ केँ जिबिते पकड़ि अनबनि, तखन तमाशा देखब ।” ॥६८-७१॥

।मन्दोदरी-वचन।

देखल तमाशा लङ्का जरइत अक्षय बेरि नहि भेलहुँ सहाय ॥७२॥
आ परमेश्वर थिकथि निरञ्जन माया-मानुष देह बनाय ॥७३॥
अनुज न तनुज न अपन सुतनु नहि सेना रक्षा करति कि हाय ॥७४॥
लौकिक उपलक्षणक भेल क्षण टिटही टेकल पर्व्वत जाय ॥७५॥

भावार्थः

मन्दोदरी कहलखिन, “जखन लंका जरि रहल छल तखन तमाशा देखिये लेलहुँ । जखन अक्षयकुमारक बेर आयल, अपनहुँ सहाय नहि भ’ सकलहुँ । राम निर्गुण परमेश्वर थिकथि जे माया सँ मानुष देह बनौलनि अछि । नहिये भाइ, न बेटा, न पत्नी, नहिये सेना – कियो अहाँ केँ नहि बचा सकत । एहेन समय मे लोक सब जे कहावत कहैछ से याद आबि रहल अछि जे टिटही जा कय पर्वत केँ टेकैत अछि ॥७२-७५॥

।सोरठा।

करइछ सभ कृति काल, कहल बहुत मन्दोदरी ॥७६॥
मानल नहि दशभाल, चिन्तहिँ बिताल विभावरी ॥७७॥

भावार्थः

एहि तरहें मन्दोदरी बहुते बुझबैत छथि, मुदा सब किछु काल स्वयं करैछ, तेँ रावण हुनकर कोनो बात नहि सुनलक । चिन्ते मे ओ राति बीति गेल ॥७६-७७॥

अंगद केँ दूत बनाकय रावण लग पठायब आ बातचीत करब 

।जयकरी छन्द।

इत प्रातहि जागल रघुवीर । जय जय ध्वनि कर कपि रणधीर ॥७८॥
आज्ञा देल जाय रघुनाथ । आनिय बाँधि वैरि दशमाथ ॥७९॥
सानुज राम विभीषण नाम । सह सुग्रीव सभा एकठाम ॥८०॥
भेल विचार करक की आज । अयलहुँ चढ़ि दशकण्ठ-समाज ॥८१॥
कहल प्रसन्न प्रथम श्रीराम । थिक कर्त्तव्य प्रथम विधि साम ॥८२॥
दूत एक रावण तट जाय । रावण काँ कह नीति बुझाय ॥८३॥
जौँ मानथि से मन मे हारि । तौँ की हेतु भयङ्कर मारि ॥८४॥
सभ अनुमति सभ कह तट जाय । टहल करब प्रभु रहब सहाय ॥८५॥
कपि-कुल बहुत चित्त उत्साह । जायब हमहिँ नाथ कहताह ॥८६॥
ककरो मन नहि ततय मलान । प्रभु प्रताप विजयक अभिमान ॥८७॥

भावार्थः

एम्हर प्राते-भोरे रामजी जगलाह । समस्त रणधीर कपि लोकनि जय-जयकार केर नारा लगौलनि । सब कियो कहैत छथि जे हे रघुनाथ, बस आज्ञा देल जाउ जे हम सब रण मे कूच करी आ दशमाथ केँ बाँधिकय लय आनी । राम, लक्ष्मण, विभीषण आ सुग्रीव चारू सभा लगाकय एक ठाम बैसि गेलाह । ई विचार होबय लागल जे आब कि कयल जाय, दशकण्ठ रावणक समाज तक चढाइ त कय देलहुँ, आब आगूक विचार करय जाउ । ताहि पर प्रसन्नचित्त रामजी कहलनि – “पहिल कर्तव्य (कार्य) साम (मेल) केर उपाय करब अछि । रावण लग एकटा दूत पठायल जाय । ओ रावण केँ बुझायत जे कि न्यायोचित अछि । यदि ओ मन सँ हारि मानि लियए त फेर भयंकर युद्ध (मारि) करबाक कोनो जरूरत नहि ।” एहि बात सँ सब गोटे सहमत भ’ गेलाह । सब कहय लगलाह – “हम रावण लग जायब आ एहि काज मे अपनेक सहायक बनब ।” कपि सभक मोन मे बहुते उत्साह रहैक । सब गोटे सोचैत छल – “प्रभुक आज्ञा होयत, हम जायब ।” ओतय केकरहु मोन उदास नहि छलैक । रामक प्रताप सँ हृदय मे विजयी हेबाक अभिमान रहैक ॥७८-८७॥

।सोरठा।

तखन कहल रघुराज, लङ्का जयबा योग्य छथि ॥८८॥
बालि तनय युवराज, रिपु-भङ्गद अङ्गद बली ॥८९॥

बद्धाञ्जलि युवराज, उत्साही शुनितहिँ कहल ॥९०॥
स्वयंसिद्ध प्रभु काज, टहल कहल कर्त्तव्य विधि ॥९१॥

पुन कहलनि रघुराज, परम चतुर युवराज अहँ ॥९२॥
जे भल जानब काज, सिद्धि करब अरि जोति रण ॥९३॥

कयल मुदित प्रस्थान, कयल प्रदक्षिण राम पद ॥९४॥
सानुकूल भगवान, तारासुत विस्तार बल ॥९५॥

देखल राक्षस-लोक, पुन पुर अबइछ एक कपि ॥९६॥
केओ रोक नहि टोक, चौँकि पड़ायल विकल-मन ॥९७॥

भावार्थः

तखन रामजी कहलनि – “शत्रुक सेना मे भगदड़  मचबयवला बालिपुत्र युवराज अंगद मात्र लंका जेबा योग्य छथि ।” सुनितहि उत्साह सँ भरल युवराज अंगद हाथ जोड़िकय कहलनि – “अपनेक काज तँ स्वयंसिद्ध होइत अछि । फेर हमरा जे से काज करबाक भार देलहुँ ओ केवल व्यवहारार्थ अछि ।” फेर राम कहलनि – “हे युवराज अंगद, अहाँ बहुत होशियार छी । लड़ाइ मे शत्रु केँ पछाड़िकय जेना नीक बुझब तेना करब ।” आज्ञा पाबिकय अतुल बलवान तारासुत अंगद रामजीक चरणक प्रदक्षिणा कय केँ खुशी सँ प्रस्थान कयलनि । भगवान राम हुनका उपर प्रसन्न रहथि । राक्षस सब देखलक जे एकटा वानर फेर नगर मे आबि रहल अछि । हुनका कियो कतहु रोक-टोक नहि कयलक । सब कियो देखिते देरी चौंकिकय व्याकुल-विकल भ’ भागि गेल ॥८८-९७॥

।मन्दाक्रान्ता छन्द।

की रे की रे कह कि झट दै मूह कीयै सुखैलौ ॥९८॥
वीरे वीरे बहुत जन छी त्रास की हेतु भेलौ ॥९९॥
हाँ हौ हाँ हौ विपति बड़ छौ काल लङ्का समैलौ ॥१००॥
लङ्काध्वंसी कपिक सदृशे दोसरो फेरि ऐलौ ॥१०१॥

भावार्थः

भागैत देखिकय आर गोटे पुछलक – “अरे, कि बात छैक ? जल्दी कहे त । चेहरा कियैक सुखा गेल छौक ? हम सब बहुते रास बहादुर सब जुटल छी । फेर एहि तरहें आतंकित कियैक छँ ?” ओ उत्तर देलकैक – “हाँ रौ, हाँ हौ, भारी आफद आबि गेलह । लंका मे काल पैसि गेलह । लंका केँ उजाड़यवला ओहि वानर जेकाँ दोसर वानर फेरो अन्दर आबि गेलह ।” ॥९८-१०१॥

।जयकारी छन्द।

लङ्का-नगर कोलाहल ढेर । पुर-दाहक कपि आयल फेर ॥१०२॥
के कर भानस खायत भात । हृदय काँइ जनु पीपर-पात ॥१०३॥
घरघर सभजनि कह हिय हारि । भल नहि भावि भयङ्कर मारि ॥१०४॥
एकओ गोटय जनु बाहर जाह । अछि संप्राप्त समय अधलाह ॥१०५॥
रावण काँ कह सभ जन जाय । कृत सभ तनिके करथु उपाय ॥१०६॥
प्रलय करत दौड़त कपि सर्व्व । व्यर्थ करथि घर रावण गर्व्व ॥१०७॥
की घर छथि रावण बहराथु । अपनहिँ राम-शरण मे जाथु ॥१०८॥
घर रहलैँ न सिद्धि हो काज । झपटल बगड़ा ऊपर बाज ॥१०९॥
करथु सन्धि जौँ जन-भल चाह । विग्रह सौँ नहि अछि निर्व्वाह ॥११०॥
धर्म्ममूर्त्ति रावण-छोट-भाय । तनिकहु राम लेल अपनाय ॥१११॥
रावण निकट कहल जन जाय । रावण देखल आँखि उठाय ॥११२॥

भावार्थः

लंकापुरी मे भारी शोर मचि गेल जे लंका केँ जराबयवला बन्दर फेर आबि गेल । के भानस करत आ के भात भात खायत, सभक कलेजा पिपरक पत्ता जेकाँ काँपय लगलैक । घर-घर मे जनानी लोकनि हिया हारिकय कहय लगलिह – “आब भलाइ नहि अछि । भयङ्कर लड़ाइ होयबला अछि । एको गोटे बाहर नहि जाउ । बड खराब समय अबयबला अछि ।” रावण केँ सब कियो कहय जाइत अछि – ई सबटा त रावणहि केर कयल छी । वैह आब कोनो उपाय निकालथि आ सभक त्राण (रक्षा) करथि । रावण अपना घर मे बेकार घमन्ड करैत छथि । रावण घर मे कियैक घुसल छथि ? ओ बाहर आबथि । स्वयं रामक शरण मे जाइथ । आब घर मे घुसल रहला सँ काज नहि चलत । आब तँ बगड़ा उपर बाज झपट्टा मारि रहल अछि । जँ रावण सभक कल्याण चाहैत छथि तँ शीघ्र सन्धि कय लेथि । लड़ाइ सँ कल्याण नहि होयत । रावणक छोट भाइ विभीषण धर्मक मूर्ति (परम धार्मिक व्यक्ति) छलथि हुनको राम अपना लेलनि । प्रजाजन सब जाकय रावण सँ ई सब बात कहलनि । रावण हुनका सब पर आँखि गुरारिकय तकलक ॥१०२-११२॥

।शार्दूलविक्रीड़ित।

लङ्का मे कपि एक आयल बली, निश्शङ्कता की कहू ॥११३॥
की ओ फेरि अनर्थ जारत पुरी, से वृत्त बूझू अहूँ ॥११४॥
निद्राहार-विहार-शून्य नगरी, हा कष्ट की की सहू ॥११५॥
आबैयै कि सभा कहै किछु कथा, लङ्केश सज्जे रहू ॥११६॥

भावार्थः

लोक सब कहलक – “एकटा बलवान कपि लंकापुरी मे आयल अछि । ओ बड़ा निर्भीक-निःशंक अछि । कि ओ फेरो लंकापुरी जरेबाक अनर्थ करत, ई खबैर अहुँ केँ रखबाक चाही । नगरक लोक केर सुतनाय, खेनाय-पिनाय आ चलनाय-फिरनाय सब हरा गेल अछि, हा! और कतेक कि-कि कष्ट सहय जाय ! ओ आबि रहल अछि आर दरबार मे आबिकय किछु बात कहत । तेँ, हे रावण! अपने तैयार रहू ।” ॥११३-११६॥

।चौपाइ।

स्मितमुख कहलनि रावण नीक । लय आनह कपि के ओ थीक ॥११७॥
एक कहयित दश दौड़ल धाय । अङ्गद काँ लय चलल बजाय ॥११८॥
हरिणाधिप गजराज-समाज । जेहन निशङ्क तेहन युवराज ॥११९॥
कह से कह कत चलल लेआय । रावण अछि कत दैह देखाय ॥१२०॥
शशि-रविकुल वर-वनिता-रत्न । छल हरि अनलक चोर प्रयत्न ॥१२१॥
कालानल सन रघुपति-वाण । जे जरता गय शलभ समान ॥१२२॥
देखि सभासद सभ भेल ठाढ़ । दशमुख-हृदय कोप बड़ बाढ़ ॥१२३॥
देखल परस्पर से सभ रूप । सभा सकल जन कत छन चूप ॥१२४॥
रावण पुछलनि परिचय नाम । ककर दूत की अछि मन काम ॥१२५॥
देव-शत्रु-पुर मे की काज । त्रास-रहित कहु करु जनु व्याज ॥१२६॥

भावार्थः

विहुँसैत मुँहें रावण कहलक – “बड़ नीक बात, ओहि वानर केँ अन्दर लेने आबह । देखी जे ई के छी ?” रावण एक गोटे सँ कहलक त दस गोटे दौड़ि पड़ल आ अंगद केँ बजाकय दरबार मे लय गेल । युवराज अंगद ओहिना निःशंक रहथि, जेना हाथीक सोझाँ मे सिंह । अंगद कहलनि – “बताउ, हमरा कतय लेने जा रहल छी ? हमरा देखाउ, ओ रावण कतय अछि, जे चन्द्रवंश आ सूर्यवंश दुनूक श्रेष्ठ नारी सीताक चोरी सँ हरणकय आनि लेलक अछि, आ जे प्रलयकालक आगिक समान रामक बाण सँ फतिंगा जेकाँ जरिकय मरयवला अछि ?” अंगद केँ देखिते दरबारक सब लोक ठाढ़ भ’ गेल । रावण क्रोधित भ’ उठल । दरबारक सब लोक एक-दोसरक चेहरा देखय लागल । किछु काल धरि सब गोटे गुम आ चुप्पे रहल । तखन रावण परिचय पुछलक – “अहाँ किनकर दूत छी आर अहाँक कि कामना अछि ? देवता सभक शत्रु (राक्षस) सभक पुरी मे अहाँ केँ कि काज अछि ? निर्भय भ’ कय कहू, लजाउ जुनि ।” ॥११७-१२६॥

।वसन्ततालिका।

श्री रामचन्द्र-परमेशक दूत जानू ॥१२७॥
लङ्का-निशाचर समस्तक काल मानू ॥१२८॥
बाली बली सकल जानल शौर्य्य से टा ॥१२९॥
उद्दण्ड अङ्गद तनीक थिकौँह बेटा ॥१३०॥

भावार्थः

अंगद कहलनि – “हमरा परमेश्वर रामचन्द्रजीक दूत जानू । लंकाक समस्त निशाचर सभक काल मानू । जाहि बालिक शौर्य (वीरता) सकल जगत जनैछ, तिनक उद्दण्ड बेटा अंगद थिकहुँ हम ॥१२७-१३०॥

।जयकरी छन्द।

एतय पठाओल जय प्रभु राम । उचित प्रथम भूपति काँ साम ॥१३१॥
विधि-प्रपौत्र शिव-द्विगुण सुभाल । अनुचित पथ चढ़लहुँ एहि काल ॥१३२॥
जगदम्बा वन सौँ हरि आनि । मोह-विवश नहि जानल हानि ॥१३३॥
सीता काँ माता मन मानि । करू समर्प्पण रामक पानि ॥१३४॥
कपि-दल आयल सागर-पार । रिपुदल-तूलराशि-अङ्गार ॥१३५॥
पिती हमर छथि रामक सङ्ग । तनिक चरण मे प्रीति अभङ्ग ॥१३६॥
जानि बूझि मन जनु अनठाउ । रामचरण मे माँथ लगाउ ॥१३७॥
नव लङ्केश्वर अहँ काँ भाय । सुख सौँ छथि प्रभु-दास कहाय ॥१३८॥
हम देखल प्रभु-वाण-प्रताप । बाण प्राण-हृत हमरा बाप ॥१३९॥
काल न जीति सकथि सङ्ग्राम । जानू परमेश्वर छथि राम ॥१४०॥
वचन हमर हित धरब न कान । तौँ भावी जानू अछि आन ॥१४१॥
हमर जनक काँ विश्व चिन्हार । के कर समर शूर-व्यवहार ॥१४२॥
स्मितमुख रावण बजलाह आह । बड़ गुण-शालि बालि मुइलाह ॥१४३॥
वानर मे नहि रहले शूर । छल छथि समर-कला-परिपूर ॥१४४॥
बिलटल घर तनिकेँ तोँ पूत । अयला बनल तपस्वी-दूत ॥१४५॥
ओ अछि कतय एतय जे आय । लङ्का मे गेल आगि लगाय ॥१४६॥
मारल गेल न दूत-विचार । नीति सौँ भरल हमर व्यवहार ॥१४७॥
यम कुबेर लड़ि लड़ि पछताथि । के नहि हमरा डरैँ नुकाथि ॥१४८॥
वनिता-विरही गत-उत्साह । मानुष असुख समुख लड़ताह ॥१४९॥
देखलनि लङ्का घुरि घर जाथु । चारू खूट माँगि केँ खाथु ॥१५०॥
हमरा जिबइत हमर कनिष्ठ । लङ्केश्वर बनलाह बलिष्ठ ॥१५१॥
ई अन्याय बालि काँ भाय । रामक से छथि मुख्य सहाय ॥१५२॥
किष्किन्धा भेल वीर-परोक्ष । सुग्रीवे छथि प्रबल महोक्ष ॥१५३॥
देखलहि लङ्का मन भेल त्रास । त्यागल सभ जन जीवन-आश ॥१५४॥
दूत बनल अङ्गद लयलाह । राजपुत्र-बल पाओल थाह ॥१५५॥
मन मे बाढ़ल समुचित धन्धि । अभिप्राय की होयै सन्धि ॥१५६॥
बालिक तनय कतहु नहि चूक । हसि हसि कहलनि फूजल ऊक ॥१५७॥
वानर मे करु काल-प्रतीति । लज्जारहित सकथि जग जीति ॥१५८॥
घर समटल अछि अहँइक आज । प्रेत-समान कर्म्म नहि लाज ॥१५९॥
लङ्का कपि आयल एक गोट । सुग्रीवक से अनुचर छोट ॥१६०॥
राक्षस-जन सौँ बाँधल जानि । वनचर अनुचर गञ्जन मानि ॥१६१॥
शाखामृग वन रहल नुकाय । विनु आज्ञा कयलक अन्याय ॥१६२॥
निजजन-गञ्जन समुचित पाय । देवतारि-पुर अनल लगाय ॥१६३॥
छोड़ि-देलक अछि सेव्य-समाज । बहुत गलानि मानि मन आज ॥१६४॥
निज घर शूर समटु मन रोष । बलक थाह पाओल भरि रोष ॥१६५॥
शङ्कर किङ्कर कर पद-ध्यान । रामक तुलना के कर आन ॥१६६॥
लङ्केश्वर अहँ काँ लघु भाय । सुपथ चलनि उत्तम पद जाय ॥१६७॥
लङ्का उलटक तन-सामर्थ्य । प्रलय करब ई यश बुझि व्यर्थ ॥१६८॥
सन्धि समर विधि देखल नयन । महितल विकल करब अहँ शयन ॥१६९॥

भावार्थः

प्रभु रामजी हमरा पठौलनि अछि । राजा केँ पहिने साम (समझौता) केर सहारा लेनाय उचित अछि । अहाँ ब्रह्माजीक प्रपौत्र छी आर पंचमुख शिव सँ दोब्बर मस्तक वला (यानि दसमुख) छी, तैयो हाल अहाँ अनुचित बाट पर चलल छी । अहाँ मोह मे पड़िकय जगज्जननी सीता केँ वन सँ हरण कय अनलहुँ । एकर कि कुपरिणाम होयत ई अहाँ नहि सोचलहुँ ? अहाँ सीता केँ माता बुझि रामजीक हाथ सौंपि दियौन । शत्रुक सेना केँ रुइया समान जरा दयवला अग्निरूपी कपि-सेना समुद्र पार कय चुकल अछि । हमर चाचा सुग्रीव रामजीक संग छथि । हुनका रामजीक चरण मे अटूट भक्ति छन्हि । जानि-बुझिकय एहि बातक उपेक्षा नहि करू । जाकय रामक चरण मे माथा टेकू । अहाँक भाइ विभीषण लंकाक नव राजा भेला अछि आर ओ रामक दास बनिकय सुखपूर्वक ओतय रहैत छथि । हम रामक बाणक शक्ति देखलहुँ अछि । वैह बाण हमर पिताक प्राण-हरण कयलक अछि । राम केँ लड़ाइ मे कालहु नहि जीति सकैत अछि । ई जानि लिय’ कि राम मानव नहि, परमेश्वर थिकाह । यदि हमर नेक सलाह केँ अहाँ नहि सुनब त जानि लिय जे किछु आरे भावी अछि । हमर पिता केँ समूचा दुनिया जनैत अछि । हुनका सँ लड़ाइ मे मुकाबला के सकैत छल ?” ॥१३०-१४२॥

रावण मुस्कुराइत बाजल – “अहा ! बालि मरि गेलाह ? ओ बड़ा गुणवान छलथि । आब वानर मे कियो शूर नहि बचल । ओ लड़ाईक कला मे पारंगत छलथि । हुनकर घर बर्बाद भ’ गेलनि । तूँ हुनकहि बेटा भ’ कय एहि तपस्वी रामक दूत बनि आयल छह ? ओ कतय रहल जे आबिकय लंका मे आगि लगा गेल छल ? दूत बुझिकय हम ओकरा मारलहुँ नहि । हमर काज नीति मुताबिक होइत अछि । यम आ कुबेर हमरा सँ लड़ि-लड़िकय पछताइत अछि । हमर डर सँ के नहि नुकाइत अछि ?  जे स्त्रीक विरह सँ खिन्न आ उत्साहहीन भ’ गेल छथि, एहेन मानव राम राक्षस सब सँ कि लड़ि सकताह ? एतय अयलाह तँ लंका केँ देखलनि, यैह बहुत पैघ लाभ भेलनि, आब घर घुरि जाइथ । चारू दिशा मे भीख मांगिकय पेट पोसथि । हमरा जिबिते हमर छोट भाइ लंकाक राजा बनि बैसल ! ई अन्यायी बालिक भाइ सुग्रीव रामक मुख्य सहायक अछि । आब किष्किन्धा मे कियो वीर नहि रहल । तेँ सुग्रीवे महारथी कहाइत अछि । लंका केँ देखिते सब डरा गेल आ जिबय के आशा छोड़ि देलक । तेँ त अंगद दूत बनिकय आयल अछि । एहि सँ क्षत्रिय सभक ताकत केर पर्दाफास भ’ गेल । तेँ त ई विचार भेल अछि जे सन्धिये कयनाय उचित होयत; मुदा सन्धि खाली इच्छा टा कयला सँ होयबला नहि अछि ।” ॥१४३-१५६॥

बालिक पुत्र अंगद कतहु चूकयवला नहि छथि । ओ खूजल ऊक जेकाँ हँसि-हँसिकय कहलनि – “वानर केँ काल बुझू । एकटा लाज छोड़ि देला सँ सर्वत्र जीत भ’ जाइत अछि । कि अहाँक अपन घर दुरुस्त अछि ? अहाँ प्रेत जेकाँ काज करैत छी, तैयो लाज नहि अबैछ । लंका मे जे एकटा कपि आयल छल, ओ त सुग्रीवक छोट-सन सेवक छल । राक्षस सब सँ बाँधल गेल; ई जानिकय ओहि वनचारी सेवक केँ बड फटकार भेटलैक । एहि सँ ओ लजाकय वन मे नुका गेल अछि । ओ आज्ञाक बिना गड़बड़ काज कयलक । राक्षस सभक नगरी मे आगि लगेलक, ताहि चलते ओकरा अपन लोक सब बड़ बात-कथा (फटकारलक) कहलक । ओकरा मन मे बहुते ग्लानि भेलैक आर ओ अपन प्रभुक पास गेनाइये छोड़ि देने अछि । अरे अपना घर मे शूर कहेनिहार रावण ! मन सँ तामस हंटाउ । अहाँक ताकतक हद खूब नीक सँ पता चलि गेल । भगवान शिव सेहो जिनकर उपासक बनि हुनकर चरणक ध्यान करैत छथि, ओहि रामक बराबरी आर के कय सकैत अछि ? हे लंकापति रावण, अहाँक छोट भाइ विभीषण नीक रस्ता केँ पकड़िकय ऊँच पद केँ प्राप्त कय लेलनि अछि । शरीर मे लंका केँ उलटि देबाक शक्ति अछि, प्रलय मचा सकैत छी, एहेन अभिमान कयनाय बेकार अछि । आब सन्धि कय लियह, एहि मे सामरिक चतुरता देखाय पड़ैत अछि । अन्यथा अहाँ विकल भ’ धरती पर सुति रहब ॥१५७-१६९॥

।शार्दूलविक्रीड़ित।

एके गोट समुद्र लाँघि अयला, लङ्कापुरी डाहि केँ ॥१७०॥
से की वानर-देह जानल अहाँ, गेला किला ढाहि केँ ॥१७१॥
जे अज्ञात कुबुद्धि युद्ध भिड़ला, निष्प्राण से से तहाँ ॥१७२॥
सीतान्वेषक दूत कर्म्म बुझले, छी छिः अहाँ ओ कहाँ ॥१७३॥

भावार्थः

एक्के टा कपि तँ समुद्र पार लंका अयला आ लंका मे आगि लगा गेला, ओकर गढ़ केँ ध्वस्त कय जरा गेला । कि हुनका अहाँ वानर-देह (मामूली वानर) बुझि लेलहुँ ? जे-जे नासमझी सँ या दुर्बुद्धिवश लड़य आयल ओ सब मारल गेल । सीता केँ खोजय आयल दूतक करनी तँ अहाँ देखिये लेलहुँ । कि वैह अहाँ छी ? धिक्कार अछि अहाँ केँ ।” ॥१७०-१७३॥

।सवैया छन्द।

।रावण-वचन।

अगव-खण्डन जलनिधि-बन्धन ॥१७४॥
ब्याध बनल छल मारल बालि ॥१७५॥
छल सड़ले ओ जड़ मातल मृग ॥१७६॥
शुन रे बालिक पुत्र कुचालि ॥१७७॥
हमर बीश भुज सतत रहित-रुज ॥१७८॥
अनायास कैलास उठाब ॥१७९॥
तोँ युवराज काज कर दूतक ॥१८०॥
धिक मन मे नहि लज्जा आब ॥१८१॥

भावार्थः

रावण कहलक – “मानल जे राम शिव-धनुष केँ तोड़लनि, मुदा ओ त सड़ल छल । मानल जे ओ समुद्र केँ बँधबौलनि, मुदा ओ त जड़ पदार्थ छल । ओ व्याध (शिकारी) बनिकय छल सँ बालि केँ मारलनि, ओ त मदमत्त जंगली जानवर छल, एहि मे कोन बड़ाई अछि ? अरे बालिक कुचालि पुत्र सुन ! हमर ई बीस भुजा जाहि मे कहियो कनियोटाक जख्म (घाउ) नहि भेल अछि, बिना श्रम केँ कैलाश पर्वत उठबय मे समर्थ अछि । तों युवराज भ’ कय दूतक काज कय रहल छेँ, धिक्कार छौक तोरा, मोन मे कनिको लाज नहि लगैत छौक ? ॥१७४-१८१॥

।अङ्गद-वचन।

काँख दबाय लेल तोहरा जे ॥१८२॥
सातो जलधिक तट तट जाय ॥१८३॥
सन्ध्यार्चन जे कयल महाबल ॥१८४॥
विद्यमान तनि सोदर भाय ॥१८५॥
एक तीर मारल रघुनन्दन ॥१८६॥
बालिक रहि न सकल तन प्रान ॥१८७॥
शुन दशभाल गाल मारह की ॥१८८॥
काल-विवश नहि तोहरा ज्ञान ॥१८९॥

भावार्थः

अंगद जवाब दैत कहलनि – “जे महाबली अहाँ केँ काँख मे दबाकय सातो समुद्रक तट पर जा-जाकय सन्ध्या-बन्धन (अर्चना) कयलनि, ताहि महाबली बालिक सहोदर भाइ एखनहुँ मौजूद छथि । राम एक्कहि गोट बाण चलौलनि जे महाबलि बालिक प्राण तक उड़ि गेलनि । हे रावण, सुनू । अहाँ कि गाल मारि रहल छी (गप दय रहल छी), काल-विवश भेल अहाँ केँ ज्ञान नहि रहि गेल अछि ।” ॥१८२-१८९॥

।रावण-वचन।

हमर पयर जाँतथि यमराजा, मन्द मन्द रवि किरण पसार ॥१९०॥
आठो लोकपाल भय-कम्पित, बद्धाञ्जलि भय वचन उचार ॥१९१॥
देववधू पन्नगी आदि काँ, गर्भ स्रवित हो देखि तरुआरि ॥१९२॥
के थिक राम कहाँ के लक्ष्मण, वचन रचन कर सभा विचारि ॥१९३॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “यमराज हमर पैर दबबैत छथि । सूर्य अपन किरण धीरे-धीरे पसारैत छथि, जाहि सँ हमरा धाह (तेज) नहि लागय । आठों दिगपाल हमरा डर सँ थर्राइत छथि आ हाथ जोड़िकय विनती करैत छथि । हमर तलवार केँ देखिकय देव, गन्धर्व, पन्नग आदिक स्त्रीक गर्भ खसि पड़ैत अछि । हमरा सामने ओ राम के अछि आर ओ लक्ष्मण कतय के अछि ? दरबार मे कनेक सोचि-विचारिकय बाजल करे ।” ॥१९०-१९३॥

।अङ्गद-वचन।

शुन दशकन्ध बन्ध्य-मति लोचन, अन्ध लेश नहि भूपति ज्ञान ॥१९४॥
रे हतप्राण त्राण के करतौ, मृग-विशेष व्यर्थहि जनु फान ॥१९५॥
श्रीरघुवर-कर-मुक्त विषम शर, खसत समर सभटा तोर भाल ॥१९६॥
बाल वृद्ध मिलि गृद्ध काक-कुल, क्रीड़ाकुल सञ्चरत शृगाल ॥१९७॥

भावार्थः

अंगद कहलनि – “हे दशमुख, सुनू । अहाँक बुद्धि बेकार भ’ गेल अछि । आँखि आन्हर भ’ गेल अछि । राजा केँ जे ज्ञान हेबाक चाही, ओ सब किछुओ अहाँ केँ नहि अछि । अरे हतप्राण रावण ! आब तोहर त्राण (रक्षा) के करतौक ? हमरा चौपाया जानवर बुझिकय बेसी जुनि फाँगे । रामक हाथ सँ छूटल तीर, युद्धभूमि (समर) मे तोहर सबटा भाल (सिर) केँ खसा देतौक । बच्चा-बूढ़ सभक मुंड सँ गिध, कौआ आ सियारक झुंड सब खेलायत एतय ।” ॥१९४-१९७॥

।सोरठा।

।रावण-वचन।

रे शाखामृग मूढ़, कि करब दूत अबध्य थिक ॥१९८॥
भूप-नीति बड़ गूढ़, अङ्ग-भङ्ग अङ्गद करब ॥१९९॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “अरे नादान वानर, कि करू ? मजबूर छी; कियैक तँ दूत अबध्य होइत अछि । राजनीति बड गूढ़ अछि । नहि त हम तोरा अंग-भंग कय दितहुँ ।” ॥१९८-१९९॥

।अङ्गद-वचन।

सुयश तकय नहि सोर, रे रे राक्षस अधम तोँ ॥२००॥
धिक धिक वनिता-चोर, शूर्प्पनखा-गति हम करब ॥२०१॥

भावार्थः

अंगद कहलनि – “रामक यश कतय नहि प्रसिद्ध अछि । अरे राक्षस, तूँ नीच छँ । स्त्री चोरबयवला तोरा धिक्कार छौक । हम तोहर वैह हाल करबौक जे शूर्पणखाक भेल छलैक ।” ॥२००-२०१॥

।रोला छन्द।

।रावण-वचन।

प्रतीहार रवि हमर, अमरपति मालाकारक ॥२०२॥
वरुण वायु गृह बाढ़, मार्ज्जनी भृत्य अगारक ॥२०३॥
दिनकर धर कर छत्र, पाककर्त्ता नित हुतबह ॥२०४॥
रक्षभक्ष्य की हमर, समर मे तुलना करबह ॥२०५॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “सूर्य हमर दरबान छथि; इन्द्र हमर माली छथि; वरुण आ वायु दुनू हमर घर बहारैत छथि आ हमर अंगना मे झाड़ू लगबैत छथि; सुर्य हमर छाता धरैत छथि आ अग्नि हमर भानसिया छथि । राक्षस सभक आहार बन्दर भ’ केँ तूँ हमरा सँ कि मुकाबला कय सकमें ?” ॥२०२-२०५॥

।षट्पद छन्द।
।अङ्गद-वचन।

रे रे कुमति कठोर मनुष-गणना रघुनन्दन ॥२०६॥
नदी कि गङ्गा होथि वृक्ष की छथि हरिचन्दन ॥२०७॥
की ऐरावत करटि इन्द्र-बाजी की छथि हय ॥२०८॥
स्त्री की रम्भा होथि मूढ़मति शुन रे निर्भय ॥२०९॥
की कृतयुग युग मे थिकथि धन्बी मनसिज के गणत ॥२१०॥
जनि प्रताप त्रिभुवन प्रकट हनूमान कपि के कहत ॥२११॥

भावार्थः

अंगद कहैत छथि – “अरे रे वज्र मूर्ख, कि तूँ राम केँ सामान्य मनुष्य मे गनैत छँ ? गंगा कि सामान्य नदी छथि ? चन्दन कि सामान्य काठ थिक ? कि ऐरावतक गणना साधारण हाथी सब मे होइत अछि ? कि इन्द्रक घोड़ा उच्चैःश्रवा साधारण घोड़ा थिक ? कि रम्भाक गणना साधारण स्त्री सब मे होइत अछि ? अरे निडर मूर्ख, सुने ! कि सत्ययुग सामान्य युग थिक ? कामदेव केँ कियो साधारण तीरन्दाज मानत ? जिनकर प्रताप तीनू भुवन मे प्रत्यक्ष (प्रकट) अछि ताहि हनुमानजी केँ कपि के कहत ?” ॥२०६-२११॥

।रोला छन्द।
।रावण-वचन।

कुल-कलङ्क-प्रद पुत्र कतहु जनु देथि विधाता ॥२१२॥
बरु जन सहथु विषाद रहथु बन्ध्या भय माता ॥२१३॥
धिक अङ्गद युवराज तपस्वी-दूत कहाबय ॥२१४॥
जे मारल छल बालि तनिक जय सतत मनाबय ॥२१५॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “कुल केँ कलंकित करयवला पुत्र विधाता केकरो नहि देथि । बरु लोक विषाद सहय, माता बन्ध्या (बाँझ) बनि जिबय ! धिक्कार अछि युवराज अंगद केँ जे तपस्वी-दूत बनिकय आयल अछि, जे (तपस्वी) एकर पिता बालि केँ मारलक, तेकरे जय-जयकार सतत मना रहल अछि ई ॥२१२-२१५॥

।सोरठा।
।अङ्गद-वचन।

उचित कयल रघुनाथ, जे वनपति देल दिव्य गति ॥२१६॥
बचत की तोहर माँथ, परवनिता-गण-चोर खल ॥२१७॥

भावार्थः

अंगद कहैछ – रघुनाथ एकदम उचित कयलनि जे वनपति (राजा बालि) केँ दिव्य गति प्रदान कयलनि । अरे परवनिता (पराया स्त्री) केँ चोरबयवला दुष्ट ! तोहर सिर (माथ) कि बचल रहतौक ? ॥२१६-२१७॥

।षट्पद छन्द।
।रावण-अङ्गद-वचन।

बाँधल किदहुँ समुद्र, अमर-अरि-घर नहि जानल ॥२१८॥
कत हम त्रिभुवनजयी, कतय मर्कट हठ ठानल ॥२१९॥
हसि कह बालि-कुमार, सत्य-संकल्प राम-घन ॥२२०॥
बरिसत कर नाराच, बचत तोहर नहि हित जन ॥२२१॥
एक विभीषण कुशल-मति, लङ्कापति बनले रहत ॥२२२॥
छिन्न भिन्न रावण सकुल, शोणित-मय सरिता बहत ॥२२३॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “समुद्र केँ तँ बाँधि लेलक, मुदा ई नहि जनलक जे राक्षस सभक घर कतय अछि । कतय हम तीनू लोक केँ जीतयवला आ कतय एहि वानर सभक हठ ।” बालिक पुत्र अंगद हँसिकय कहैछ – “रामक संकल्प सदा सत्य होइत अछि । हुनकर हाथ सँ छूटल बाण सभक वर्षा होयत आ ओहिमे तोहर कोनो हितबन्धु नहि बचत । लंका मे सही बुझनिहार एकमात्र लंकापति विभीषण बचल रहि जेता । रावण अपन कुलक लोक-सहित छिन्न-भिन्न भ’ जायत आ खूनक नदी बहय लागत ।” ॥२१८-२२३॥

।सबैया छन्द।
।रावण-वचन।

बाँधल बाँध जलधि मे वानर ॥२२४॥
नहि आश्चर्य्य विदित व्यवहार ॥२२५॥
पर्व्वत सन कर उच्च मृत्तिका ॥२२६॥
अति लघुतर हो कीट दीबार ॥२२७॥
लङ्का दग्ध कयल कपि चञ्चल ॥२२८॥
से जानक थिक अनल-स्वभाव ॥२२९॥
राम-प्रताप एखन धरि नहि किछु ॥२३०॥
हम देखल अछि होयत कि आब ॥२३१॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “वानर सब समुद्र मे बाँध बनौलक, से त कोनो आश्चर्यक बात नहि अछि । एहेन बात प्रायः देखल जाइत अछि । दीमक सब, जे कि अत्यन्त छोट कीड़ा होइत अछि, माटिक पहाड़-समान टीला बना दैत अछि । चंचल वानर लंका केँ जरौलक, एहि मे कोन बड़ाइ अछि ? जरेनाय त आगिक स्वभावे थिक । एखन धरि हम रामक प्रताप किछुओ नहि देखलहुँ अछि, आगाँ कि खाक देखब ?” ॥२२४-२३१॥

।शार्दूल-विक्रीड़ित छन्द।
।अङ्गद-वचन।

गेली सूर्प्पनखा नटी कपटिनी गोदा-तटी धर्क्कटी ॥२३२॥
श्रीरामानुज-तीक्ष्ण-खड्ग लगलैँ ख्याता मही नक्कटी ॥२३३॥
लै सेना खरदुषणादि लड़ला गेला कहाँ से कहू ॥२३४॥
सीतावल्लभ सौँ विरोध कयलैँ से ठाम जैबे अहूँ ॥२३५॥

भावार्थः

अंगद कहलनि – “नर्तकी-जेहेन मायाविनी धृष्टा शूर्पणखा गोदावरीक किनार पर आयल आ लक्ष्मणक तीख धारवला तलवार सँ नाक कटाकय ‘नक्कट्टी’ नाम सँ संसार मे प्रसिद्ध भेल । खर, दूषण आदि जे वीर सेना लय केँ लड़य आयल, ओ सब कतय गेल से त कहू ? सीता प्रति राम सँ रार कयला पर अपने सेहो ओतहि चलि जायब ।” ॥२३२-२३५॥

।सवैया छन्द।
।रावण-वचन।

अपनहि हाथ माँथ दश काटल ॥२३६॥
होम कयल नहि किछु मन त्रास ॥२३७॥
अति प्रसन्न गौरीश देल वर ॥२३८॥
नव नव शिर भेल मन भेल हास ॥२३९॥
बाँचल विधिक लेख निज भाल मे ॥२४०॥
मरण मनुष्य-हाथ सौँ पाब ॥२४१॥
सकल-लोक-जित बिश भुज हमरा ॥२४२॥
विधि अति वृद्ध ज्ञान नहि आब ॥२४३॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “हम अपनहिं हाथ सँ दसो माथ केँ कटलहुँ आ आहुति देलहुँ, एहि मे कनिको डर नहि भेल । परम प्रसन्न भ’ कय शिव वर देलनि, जाहि सँ फेरो नया-नया माथ जुड़ि गेल, मन प्रफूल्ल भ’ गेल । ललाट पर विधाताक लिखल स्वयं पढ़लहुँ जे हमर मृत्यु मनुष्यक हाथ सँ होयत । हम तीनू भुवन केँ जीति लेने छी, हमर बीस टा भुजा (हाथ) अछि, फेर हम मनुष्यक हाथ सँ केना मरब ? विधाता बहुत बूढ़ भ’ गेला, तेँ हुनका आब ज्ञान नहि रहलनि ।” ॥२३६-२४३॥

।अङ्गद-वचन।

पतिहीना दीना अबला कत, करय निराकुल अनल-प्रवेश ॥२४४॥
अथवा इन्द्रजाल-विज्ञानी, काटय अङ्ग दुःख नहि लेश ॥२४५॥
शुन रावण आब न मुख लज्जा, निज-मुख निज-गुण वर्णन कयल ॥२४६॥
अक्षयकुमार मारि पुर जारल, तनि कपिकाँ किय बाँधि न धयल ॥२४७॥

भावार्थः

अंगद कहलनि – कतेको स्त्री पतिहीन-दीन आ अबला सब निराकुल (निःशंक-निडर) भ’ कय आगि मे प्रवेश कय जरि मरैछ । अथवा कतेको इन्द्रजाल-विज्ञानी (जादूगर) अपनहि अंग केँ काटि लैछ मुदा दुःखक लेशो नहि होइत छैक । अरे रावण, सुन । अपने मुँह सँ अपन प्रशंसा करैत तोरा लाज नहि लगैत छौक ? जँ तोरा पास ताकत रहौक तँ जे अक्षयकुमार केँ मारिकय लंका केँ जरा गेल, ओहि कपि केँ बाँधिकय रखलें कियैक नहि ? ॥२४४-२४७॥

।दोहा।

कार्त्तवीर्य्य बलि बालि की, नहि त्रुभुवन सौँ भिन्न ॥२४८॥
तनि प्रताप अनुभव अहँक, मन होइछ नहि खिन्न ॥२४९॥

भावार्थः

राजा कार्तवीर्य, बलि आ बालि, कि ओ सब त्रिभुवनक बाहर सँ छथि ? हिनका लोकनिक प्रताप केँ स्मरण कयला सँ तोरा अपना मोन मे ग्लानि नहि होइत छौक ?” ॥२४८-२४९॥

।सोरठा।
।रावण-वचन।

के थिक मानव राम, के लक्ष्मण हनुमान के ॥२५०॥
करत कठिन सङ्ग्राम, हम रावण सुरपति-जयी ॥२५१॥

भावार्थः

रावण कहैछ – “मानव राम के होइत अछि, लक्ष्मण के होइत अछि आ हनुमान के होइत अछि जे हमरा सँ घनघोर लड़ाइ करत ? हम रावण छी, इन्द्रहु केँ जीतयवला रावण ॥२५०‍-२५१॥

।सोरठा।
।अङ्गद-वचन।

लक्ष्मण-कृत धनु रेख, लाँघि न सकला शून्य मे ॥२५२॥
हनूमान-बल देख, मान-रहित लङ्का कयल ॥२५३॥

भावार्थः

अंगद कहलनि, “लक्ष्मण जे धनुष सँ रेखा खींचि देलनि, सुनसानो (परोक्षहु) मे तूँ ओकरा पार नहि कय सकलें । तूँ हनुमानहु केर बल देखिये लेलें, जे लंकाक मान-मर्दन कयलनि ॥२५२-२५३॥

।रूपमाला।
।अङ्गद-वचन।

बालि-सुत रघुनाथ-चरणक दास अङ्गद नाम ॥२५४॥
मारि तोहरा आज दशमुख करब चौपट गाम ॥२५५॥
जनकजा मन्दोदरी काँ संग लेब लगाय ॥२५६॥
देब हम पहुँचाय प्रभु-तट विजय-वाद्य बजाय ॥२५७॥

भावार्थः

हम बालिक पुत्र आ रामक सेवक अंगद आइ तोरा मारिकय तोहर नगरहि केँ खत्म कय देब । फेर सीता आ मन्दोदरी दुनू केँ संग लगा लेब आ जीतक बाजा बजबिते प्रभु राम लग पहुँचा देब ।” ॥२५४-२५७॥

।षट्पद छन्द।
।रावण-वचन।

धर धर कपि वाचाल काल बनि हिनका मारब ॥२५८॥
के अछि त्रिभुवन शूर जतय हम रण मे हारब ॥२५९॥
सकल सैन्य सन्नद्ध मार मर्क्कट काँ धय धय ॥२६०॥
त्रास-रहित चल लड़य पराक्रम सङ्गर कय कय ॥२६१॥
धर तपसी दुहु भाय काँ, मार विभीषण अनुज खल ॥२६२॥
रावण आज्ञा देल हम, वार्ता दय दे सकल थल ॥२६३॥

भावार्थः

धर, धर एहि वाचाल कपि केँ, हम काल बनिकय एकरा मारब । एहि त्रिभुवन मे के वीर अछि जेकरा सँ हम रण मे हारब ? सब सेना तैयार भ’ कय एहि वानर केँ पकड़िकय मारय जो । देख त, कोन तरहें ई निडर भ’ पराक्रम करैत लड़बाक लेल उताहुल अछि । दुनू भाइ तपस्वी राम आ लक्ष्मण केँ कैद कय ले । दुष्ट छोट भाइ विभीषण केँ मारि दे । हम रावण ई हुकुम दैत छियौक । भरि संसार मे एहि बातक ऐलान कय दे ।” ॥२५८-२६३॥

।अङ्गद-वचन।

थिर रह रे दशभाल काल हम तोहर अयलहुँ ॥२६४॥
जयबह कतय पड़ाय चोर काँ चीन्हल धयलहुँ ॥२६५॥
पटकल महि भुजदण्ड चण्ड-धुनि दश दिश व्यापल ॥२६६॥
खसल दशानन-मुकुट मही ओ महिधर काँपल ॥२६७॥
चपल-कोप युवराज तहँ, बाज-जकाँ तहिपर टुटल ॥२६८॥
प्रभु-तट फेकल मुकुट से, चारू जनु नृप-गुण लुटल ॥२६९॥

भावार्थः

अंगद कहैत छथि, “रुक रे दशभाल, हम तोहर काल छी आयल । तूँ पड़ाकय कतय जेमें ? तूँ चिन्हल चोर केँ आइ ठामहि पर धयलहुँ अछि ।” एतेक कहिकय अंगद धरती पर अपन हाथ पटकि देलनि । भुजदण्डक पृथ्वी पर पटकला सँ प्रचंड ध्वनि दसो दिशा मे पसरि गेल । रावणक चारि गोट मुकुट धरती पर खसि पड़ल । पर्वत काँपि उठल आ धरती काँपि उठल । क्रोध सँ चंचल युवराज अंगद बाज पक्षी जेकाँ ओहि पर टूटि पड़लाह । फेर ओहि चारू मुकुट केँ उठाकय रामक पास फेंकि देलनि, मानू रावणक चारू राज-गुण केँ लूटि लेलनि ॥२६४-२६९॥

।दोहा।

उत कपिदल हलचल सकल, अरिपुर सौँ की चारि ॥२७०॥
अबइछ अछि ग्रहवेग सौँ, रविमण्डल-अनुकारि ॥२७१॥

भावार्थः

ओम्हर कपि सभक दल मे खलबली मचि गेल । अरे, शत्रुक नगरी सँ ई चारू कोन चीज ग्रह जेकाँ तेजी सँ आबि रहल अछि ? ई त सूर्यमंडल जेहेन लगैत अछि ॥२७०-२७१॥

।सोरठा।

हनूमान उड़ि धैल, रवि-उज्ज्वल मुकुटावली ॥२७२॥
सभक स्वस्थ मन कैल, उल्कापातक दिवस भ्रम ॥२७३॥
हसि कहलनि भगवान, अङ्गद-प्रेषित तर्क्क हो ॥२७४॥
करत एहन के आन, राक्षसेन्द्र-शिर-मुकुट हर ॥२७५॥

भावार्थः

हनुमानजी आकाश मे उड़िकय सूरज समान चमकयवला ओहि चारू मुकुट केँ पकड़ि लेलनि । सभक मोन प्रसन्न भ’ गेलैक । लगैत छलैक जे दिनहि मे उल्कापात भ’ रहल अछि । रामजी हँसिकय कहलनि – “लगैत अछि, अंगद फेकलक हँ । राक्षसराज रावणक माथक मुकुट केँ छीनि लेनाय, ई काज दोसर के कय सकैत अछि ?” ॥२७२-२७५॥

।चौपाइ।

बड़ कौतुक प्रभु मुकुट निहार । अङ्गद-धन्यवाद उच्चार ॥२७६॥
उत दशकन्धर मौन विचार । देखि बालि-सुत-बल-विस्तार ॥२७७॥
त्रस्त अस्त-बल जेहन बटेर । बलि-युवराज-बाज-बल हेर ॥२७८॥
जाइतछी कहलनि युवराज । अछि कर्त्तव्य आगु किछु काज ॥२७९॥
करता रघुनन्दन भगवान । रावण-मुण्डावलि बलिदान ॥२८०॥
कह रावण मर्क्कट काँ घेर । करत अनर्थ कि चलती बेर ॥२८१॥
कह अङ्गद हसि वचन प्रमान । अनल-पटल जानथि हनुमान ॥२८२॥
अङ्गद धरणी रोपल चरण । रावण-गण-मन-संशय-हरण ॥२८३॥
महि सौँ जे देत चरण उखारि । से विजयी हम मानब हारि ॥२८४॥
कय बल राक्षस सुभट उठाब । उठय न पद प्रभु-राम-प्रभाव ॥२८५॥
सभ कह मन मन अदभुत कीश । भेल विपक्ष बुझल जगदीश ॥२८६॥
रावण चरण धरय चललाह । अङ्गद देखितहिँ हसि उठलाह ॥२८७॥
कयलह रघुनन्दन सौँ बैर । ककर ककर नहि धरबह पैर ॥२८८॥
रावण लज्जित बैशला घूरि । अङ्गद लेल प्रतिज्ञा पूरि ॥२८९॥
अङ्गद चलल उठल दरबार । रावण गेला वनितागार ॥२९०॥
मन्दोदरी कहथि शुनु नाह । लङ्कावास कठिन निर्व्वाह ॥२९१॥
यद्यपि अहाँ कयल बड़ दोष । श्री रघुनन्दन काँ नहि रोष ॥२९२॥
दूत पठाओल बालि-कुमार । अहँक कयल नहि किछु अपकार ॥२९३॥
ठानल हठ नहि मानल नीति । धम्म विरोध पाप सौँ प्रीति ॥२९४॥
वानर एकसर नगरी जार । विधि जौँ बाम बाम संसार ॥२९५॥
अङ्गद-चरित देखल सभ नयन । सकल पराक्रम सम्प्रति शयन ॥२९६॥
कयल विसर्जन सचिव-प्रधान । हितकर वचन धरय के कान ॥२९७॥

भावार्थः

बहुते कौतुकता सँ प्रभु राम ओहि मुकुट केँ निहारैत छथि आ अंगद केँ बधाई दैत छथि । ओम्हर बालिक पुत्र अंगदक शक्ति केँ देखिकय रावण गुम भ’ कय सोच मे पड़ि गेल । अंगदरूपी बाज केर बल केँ देखि रावण निर्बल बटेर जेकाँ त्रस्त भ’ गेल । फेर अंगद रावण सँ कहलनि – “आब जाइत छी । आगू आर बहुते किछु करबाक अछि । भगवान राम रावणक मुण्ड सब बलिदान करताह ।” ॥२७६-२८०॥

रावण बाजि उठल – “घेर, घेर एहि वानर केँ । कहीं जाइतो काल ई कोनो अनर्थ नहि कय दियए ।” अंगद हँसिकय सच बात कहलखिन – “आगि लगेनाय तँ हनुमान टा जनैत छलथि ।” रावणक दलबल केर मोन मे कोनो संशय नहि रहलैक – ई सोचिकय अंगद धरती पर अपन पैर राखि देलनि आ कहलनि – “जे हमर पैर केँ धरती सँ उपर उठा देत ओकर जीत हेतैक, हम ओकरा सँ हारि मानि लेब ।” सुनितहि एक-एक टा राक्षस योद्धा सब पूरा ताकत लगाकय हुनकर पैर उठेबाक चेष्टा कयलक, मुदा रामक महिमा सँ कियो अंगदक पैर नहि उठा सकल । सब कियो मनहि-मन कहैत अछि – “ई त बड़ा अजीब वानर निकलल । लगैत अछि जे ईश्वर हमरा सभक प्रतिकूल भ’ गेल छथि ।” अन्त मे रावण स्वयं अंगदक पैर उठाबय लेल चलल । से देखिते देरी अंगद हँसि देलनि । कहलनि – “अरे, तूँ राम सँ वैर कयलें त आब केकर-केकर पैर नहि पकड़मे ।” रावण लजा गेल आ घुरिकय अपन सिंहासन पर बैसि रहल । अंगद फेर बाजी मारि लेलनि । अंगद सभा सँ बाहर चलि गेलाह । दरबार सेहो उठि गेल । रावण रनिवास दिश चलि गेल । ओतय मन्दोदरी कहलखिन – “हे नाथ, आब लंका मे रहनाय कठिन भ गेल । यद्यपि अपने भारी अपराध कयलहुँ अछि, तखनहुँ राम केँ क्रोध नहि छन्हि । ओ अहाँक कोनो बेजा नहि कयलनि अछि । ओ अंगद केँ दूत बनाकय पठौलनि । अहाँ जिद्द पर अड़ल छी । अहाँ नीति केर त्याग कयलहुँ; धर्मक विरूद्ध रहलहुँ आ पाप सँ सम्बन्ध जोड़ि लेलहुँ । अकेला वानर समूचा लंका केँ जरा गेल । अगर विधाता प्रतिकूल भ’ जाइत छथि त सौंसे दुनिया प्रतिकूल भ’ जाइछ । अहाँ अंगद केर सारा करामात अपन आँखि सँ देखलहुँ । सम्प्रति अहाँक सबटा पराक्रम लुप्त भ’ गेल अछि । अहाँ प्रधानमंत्री केँ निकालि बाहर कय देलहुँ । हितक बात पर के कान दैत अछि ॥२८१-२९७॥

।सबैया छन्द।

जनिक दूत वानर एक आयल, निर्भय सौँ लङ्का-पुर जारि ॥२९८॥
से हसि गेल कयल की तनिकर, ककरा ककरा सौँ करिं मारि ॥२९९॥
कालरात्रि सीता काँ आनल, ई की जानल प्राकृति नारि ॥३००॥
काल-विवश लङ्केश्वर निश्चय, भावी विषय शकय के टारि ॥३०१॥

भावार्थः

रामक दूत एकटा वानर आयल । ओ बिना कोनो डर केँ लंका केँ जराकय हँसिकय चलि गेल । ओकर अहाँ कि बिगाड़ि सकलहुँ ? कालरात्रिस्वरूपा सीता केँ अहाँ लय अनलहुँ अछि । कि हुनका अहाँ सामान्य नारी बुझि लेने छी ? हे रावण, अहाँ पर निश्चय काल आबि गेल अछि । जे भवितव्य होइत अछि, ओकरा के टालि सकैत अछि ? ॥२९८-३०१॥

।रूपक दण्डक।

शुनु प्राणेश सत्य मन मानू ॥३०२॥
जिबितहिँ छथि से बाली, बलशाली ॥३०३॥
सकल सभा काँ अङ्गद-बल-चय ॥३०४॥
अनुभव समर-प्रणाली, वागाली ॥३०५॥
जनिक विलोचन बसथि अनुक्षण ॥३०६॥
लहलह-रसना-बाली, कङ्काली ॥३०७॥
लङ्कावास निराश, भेल मन ॥३०८॥
सुख सौँ बसथु शृगाली, काकाली ॥३०९॥

भावार्थः

हे प्राणनाथ ! सच्चाइ बुझू, ओ बलवान बालि जिविते अछि (अपन पुत्र अंगद केर रूप मे) । सारा दरबार केँ पता चलि गेलैक जे अंगद केर केहेन ताकत छैक, केहेन रणकौशल छैक आ केहेन बोली-वचन छैक । ओकर आँखि मे लहलहाइत जीभवाली भगवती कंकाली सदा निवास करैत छथिन । लंका मे चैन सँ रहबाक आज्ञा आब नहि रहल, आब सियार आ कौआ एतय सुख सँ रहत ।” ॥३०२-३०९॥

अंगद केर लौटब, प्रभंजन वध, राम-रावण केर घमासान युद्ध

।चौपाइ।

उत अङ्गद-मन हर्ष अपार । पहुंचल कुशल प्रभुक दरबार ॥३१०॥
प्रभुक प्रदक्षिण कयल प्रणाम । अङ्गद राखल बालिक नाम ॥३११॥
राम पुछल कहु कहु युवराज । लङ्का जाय कयल की काज ॥३१२॥
अङ्गद कहल दशानन गर्व्व । प्रभुक प्रताप हरल हम सर्व्व ॥३१३॥
सन्धिक प्रिय नहि खल दशभाल । पयःपान निर्विष नहि व्याल ॥३१४॥
अबइछ रावण-सैन्य अपार । कयल जाय प्रभु समर-विचार ॥३१५॥
प्रभु प्रधान काँ देल निदेश । प्रातहिँ युद्ध करत लङ्केश ॥३१६॥
सावधान रहु कपि-दल राति । मायामय थिक राक्षस-जाति ॥३१७॥
सभ छल शयन प्रभुक बल पाय । जागल अङ्गद मात्र सहाय ॥३१८॥
नाम प्रभञ्जनि राक्षसि जाति । रावण-प्रेरित आइलि राति ॥३१९॥
से पापिनि काँ मुख्य विचार । सानुज रामक करब संहार ॥३२०॥
कल कौशल जौँ सिद्ध उपाय । मूलच्छेदैँ वृक्ष सुखाय ॥३२१॥
देखलनि अङ्गद तकर स्वरूप । ग्रह-दुर्दशा आइलि चुप-चूप ॥३२२॥
ललकारल नहि भेल पड़ाय । डाकिनि काँ नहि रहल उपाय ॥३२३॥
फनला अङ्गद धयलनि झोँट । लतिअओलैँ भेली लोटपोट ॥३२४॥
अति चीत्कार करय से लाग । शब्द शुनल कपि-दल भेल जाग ॥३२५॥
धर धर पकड़ पकड़ भेल सोर । जाय पड़ाय न राक्षस चोर ॥३२६॥
केओ भूधर केओ वृक्ष उखाड़ । मार मार लङ्कापुर-राड़ ॥३२७॥
परिपूरित भेल कतय न शब्द । प्रलयकाल जनि गर्जय अब्द ॥३२८॥
दशवदनक मुह गेल सुखाय । मुइलि प्रभञ्जनि गञ्जन खाय ॥३२९॥
कह मन रावण हमरे भाय । बाट घाट सभ देल देखाय ॥३३०॥
कपिदल मन किछु त्रास न पाब । पुर स्वाधीन जकाँ चल आब ॥३३१॥
हमरा बालि केँ बैरी भाय । पोसल पन्नग दूध पिआय ॥३३२॥
कपि चञ्चल-बल की करताह । अनल शलभ सन सब जरताह ॥३३३॥
गञ्जित मुइलि प्रभञ्जनि जाय । उचित न शत्रुक विजय उपाय ॥३३४॥
निज प्रधान काँ कहल सकोप । प्रथम करह वानर-बल लोप ॥३३५॥
शुनितहिँ चलल पटह देल चोट । कातर जीव न एको गोट ॥३३६॥
गोमुख भेरी बाज मृदङ्ग । पणवानक गोमुख भल रङ्ग ॥३३७॥
महिष ऊँट खर सिंह सवार । वाहन विविध प्रवह सञ्चार ॥३३८॥
शूल चाप तोमर तरुआरि । पाश यष्टि शक्तिक भल मारि ॥३३९॥
लङ्का सकल द्वार सौँ व्यूह । चलल बहुत उत्साही मूह ॥३४०॥
एतय राम-अनुशासन पाय । कपि-दल चलल न रण पछुआय ॥३४१॥
केओ गिरि-शृङ्ग-शिखर कर धयल । तरु उखाड़ि केँ आयुध कयल ॥३४२॥
दल सन्नद्ध सकल छल ठाढ़ । वीरोत्साह बहुत मन बाढ़ ॥३४३॥
करब दशानन-सुभट संहार । मन मन कपिदल करथि विचार ॥३४४॥
रोकल लङ्का चारू द्वारि । कपि-दल प्रबल मचल बड़ मारि ॥३४५॥
कोटि कोटि यूथप एक बेरि । लङ्का नगर सगर लेल घेरि ॥३४६॥
खन उड़ गगन मही घुरि आब । गर्ज तर्ज्ज कपि चपल-स्वभाव ॥३४७॥
अतिबल राम जयति जयवीर । तथा महाबल लक्ष्मण धीर ॥३४८॥
राघव-पालित जय कपिराज । सिद्ध मन्त्र रण वानर बाज ॥३४९॥

भावार्थः

ओम्हर अंगद केर मोन मे अपार हर्ष भरल छलन्हि । ओ कुशलपूर्वक प्रभुक दरबार पहुँचलाह । प्रभुक प्रदक्षिणा करैत प्रणाम कयलनि । अंगद वीर पिता बालिक नामक यश बरकरार रखलन्हि । श्री रामचन्द्रजी हुनका सँ पुछलनि, “कहु युवराज, लंका जाय केँ कि सब काज कयलहुँ ।” अंगद जवाब देलनि, “प्रभु, दशाननक सारा गर्व केँ अपने प्रभुक प्रताप सँ चूर कय देल । ई दुष्ट दशभाल सन्धिक पक्ष मे नहि अछि । दूध पिबय सँ साँपक विष नहि हेराइत छैक । रावणक अपार सेना आबि रहल अछि । आब लड़ाइक विचार कयल जाय ।” ॥३१०-३१५॥

राम सेनापति सब केँ हुक्म देलनि – “रावण भोर होइते लड़ाइ शुरू कय देत । हे कपि लोकनि, राति भरि अहाँ सब सावधान रहब । राक्षस मायावी जातिक होइत अछि ।” राम केर प्रतापक भरोसे सब सैनिक सुतल छलथि, केवल अंगद रक्षाक वास्ते जागल छलथि । ओहि राति रावणक पठायल प्रभंजनी नाम केर एकटा राक्षसी आयल । ओहि पापिनीक खास इच्छा राम आ लक्ष्मण केर वध करब छलैक । यदि चतुरतापूर्वक ई प्रयास सिद्ध भ’ जाय त मानू जड़िये कटि गेल, फेर गाछ त अपने आप सुखा जायत । अंगद ओहि राक्षसी केँ देख लेलनि; मानू चुपके सँ ग्रहक खराब दशा आबि गेल हो । फटकारलो पर ओ नहि भागल । ओहि डायन केँ कोनो रास्ता नहि भेटल । अंगद कूदिकय ओकर माथक केश धय लेलनि । लात सँ पीटय लगलाह । ओ धराशायी भ’ गेल । ‘पकड़-पकड़’ केर शोर मचि गेल जाहि सँ ओ चोर राक्षसी भागि नहि जाय । कियो पहाड़ उखाड़ैत अछि त कियो गाछ । सब चिकरैछ – “मार! मार! लंकाक बदमाश केँ मार! जेना प्रलयकालीन मेघ गरजैत अछि, तहिना तेज आवाज सर्वत्र व्याप्त भ’ गेल । रावणक चित्त उदास भ’ गेलैक । ओ सोचय लागल जे प्रभंजनी राक्षसी फटकारे खाकय मरि गेल । रावण मनहि-मन कहैत अछि, “हमर भाइ विभीषणे रस्ता बता देलक हँ । कपि सब केँ कनिकबो डर नहि होइत छैक । ओ सब बेधड़क नगर मे पैसैत आबि रहल अछि जेना स्वाधीन-स्वच्छन्द हो । हमरा आ बालि केँ सेहो अपनहि भाइ दुश्मन भ’ गेल । मानू हम सब साँप केँ दूध पियाकय पोसलहुँ । वानर त स्वभावतः चंचल होइत अछि, ओ सब कि तागत देखायत ? ओ सब ओहिना जरि जायत जेना आगि मे फतिंगा सब जरैत अछि । प्रभंजनी ओतय जाकय नाहक मे मारल गेल । शत्रु केँ जीतय केर ई ठीक उपाय नहि भेल ।” ॥३१६-३३४॥

एना सोचिकय रावण अपन प्रधान सेनापति सँ क्रोधपूर्वक कहलक – “पहिने वानरी सेनाक संहार कर ।” सुनितहि राक्षस सभक सेना चलि पड़ल । डंका पर चोट पड़ल । एकहु टा सैनिक कायर भ’ रुकय नहि । गोमुख, नगाड़ा, मृदंग, ढोल आदि खूब नीक सँ बाजय लागल । भैंसा, ऊँट, गधा, सिंह आदि विविध वाहन सब पर चढ़ि-चढ़िकय राक्षस-सैनिक वायुवेग सँ बढ़ल । बरछी, तीर-धनुष, भाला, तलवार, पाश, लाठी, साँग आदि अस्त्र सब सँ घमासान लड़ाइ भेल । लंकाक सब द्वारा सब सँ सेना चलि देलक । ओहि मे हरेक व्यक्ति परम उत्साही छल । एम्हर रामक आज्ञा पाबिकय वानर सभक सेना चलल जे युद्ध मे कखनहुँ नहि पछड़ैछ । कियो पहाड़क चोटी केँ हाथ मे लेलक, कियो गाछ उखाड़िकय ओकरे अपन अस्त्र बनौलक । सैनिक सभक सारा दल सज्जित भ’ तैयार छल । सभक मोन मे वीरोचित उत्साह लहरा रहल छलैक । कपि सब मोन मे सोचैछ – आइ राक्षसक बड़का-बड़का योद्धा सब केँ मारि खसायब । कपि सभक दल लंका केँ चारू द्वार केँ घेरि लेलक । घमासान लड़ाइ छिड़ गेलैक । एक-एक बेर मे लाखों दलपति सब समूचा लंकापुरी केँ घेरि लेलक । चंचल स्वभाववला कपि तुरत आकाश मे उड़ैत अछि, तुरत धरती पर लौटि अबैत अछि आ गर्जन-तर्जन करैत अछि । ओ सब लड़ाइ केर मैदान मे एहि सिद्ध मन्त्र सभक नारा लगबैत अछि – परम बलवान राम केर जय हो, रघुवीर केर जय हो, महाबली धीर लक्ष्मण केर जय हो, रामचन्द्र द्वारा संरक्षित कपिराज सुग्रीव केर जय हो ॥३३५-३४९॥

।षट्पद छन्द।

पवन-तनय युवराज, कुमुद नल नील महाबल ॥३५०॥
शरभ केसरी द्विविद, तार वानर भट भल भल ॥३५१॥
जाम्बवान दधिवक्त्र, मैन्द यूथप लङ्का काँ ॥३५२॥
रोकल सगरो नगर, फानि बाढ़ल तङ्का काँ ॥३५३॥
तरु पर्व्वत नख दन्त सौँ, राक्षस बल कयलनि विकल ॥३५४॥
युद्ध-हेतु सभद्वार सौँ, बहरायल क्रोधी सकल ॥३५५॥

भावार्थः

पवनसुत हनुमान जी, युवराज अंगद, कुमुद, नल आ नील समान महाबली; शरभ, केसरी, द्विविद, तार, आदि अनेको एक सँ बढ़िकय एक वीर वानर लोकनि; जाम्बवान, दधिवक्त्र, मैन्द आदि सेनापति लोकनि लंका केँ घेर लेलनि, ई सब फानि-फानि केँ नगरक सारा द्वारा केँ रोकि देलनि । गाछ, पर्वत, नख आ दन्त सौँ प्रहार कय-कय केँ राक्षस सभक बल केँ दलन कय विकल बना देलनि । ताहि पर राक्षस सब लंकाक द्वार सँ क्रोध कय-कय केँ युद्ध लेल बहरायल ॥३५०-३५५॥

।चौपाइ।

भिन्दिपाल पट्टिश तरुआरि । शूल हाथ राक्षस कर मारि ॥३५६॥
शोणित मांस पूर रण पङ्क । तदपि युगल दल बड़ निःशङ्क ॥३५७॥
काञ्चन-निभ हय गज रथ हाँकि । राक्षस-शूर कीश-दल ताकि ॥३५८॥
करय युद्ध हो दश दिश शोर । मत्त महाभट राक्षस घोर ॥३५९॥
कुपित कपीन्द्र दनुज-जय काज । राक्षस-चटक प्रकट कपि-वाज ॥३६०॥
देव-अंश-सम्भव सब कीश । विद्यमान रघुवर जगदीश ॥३६१॥
समर अमर कपि दनुज विनाश । अङ्कुर-ब्रीहि टिड़ी कर नाश ॥३६२॥
जय हो ततय जतय रह धर्म्म । दनुज-पराजय दशमुख-कर्म्म ॥३६३॥
चतुर्थांश सैन्यक भेल नाश । विचलित राक्षस-दल मन त्रास ॥३६४॥
मेघनाद भेल अन्तर्धान । ब्रह्म-दत्त वर मन अभिमान ॥३६५॥
गगन जाय अस्त्रक कर वृष्टि । नाना विधि अद्भुत रण-सृष्टि ॥३६६॥
वानर-सैन्यक चल नहि हाथ । विकल देखि दल श्रीरघुनाथ ॥३६७॥
क्षण भरि छला महाप्रभु चूप । क्रोध कयल धयलनि निज रूप ॥३६८॥
लक्ष्मण हमर अजय धनु देब । ब्रह्मास्त्रहिँ हम बदला लेब ॥३६९॥
तत्क्षण सभ काँ हम देब जारि । हमरा सौँ के करता मारि ॥३७०॥
शुनि घननाद गेल घुरि गेह । मन मानल समरक सन्देह ॥३७१॥
वानर-दल समर-क्षत-अङ्ग । ककरो छल नहि जीवक रङ्ग ॥३७२॥
रघुनन्दन कह शुनु हनुमान । एखन प्रयास करत के आन ॥३७३॥
क्षीर-महोदधि सत्वर जाउ । द्रुहिणाचल औषधि लय आउ ॥३७४॥
अपन सकल दल विकल जिआउ । वीर-सुयश त्रिभुवन मे पाउ ॥३७५॥
शुनि हनुमान पवन-जव जाय । आनल ओ गिरि सकल उठाय ॥३७६॥
औषधि-बल बाँचल सभ कीश । पालक स्वयन्देव जगदीश ॥३७७॥
जते सौँ आनल नग हनुमान । राखल ततहि कहल भगवान ॥३७८॥
वानर-दल कर भैरव नाद । छुटल समर-श्रम मरण-विषाद ॥३७९॥
मन विस्मित शुनि लङ्काधीश । कयलक कठिन काल-बल कीश ॥३८०॥
विधि राघव-अरि ध्रुव निर्म्माय । वर्त्तमान देल नगर पठाय ॥३८१॥
हटि नहि रहब करब सङ्ग्राम । दूरि करब नहि रावण-नाम ॥३८२॥
मन्त्रि बन्धु यूथप जे शूर । करथु सकल जन आलस दूर ॥३८३॥
करथु युद्ध सभ मन उत्साह । हम नहि कयल ककर निर्व्वाह ॥३८४॥
हमरा कष्ट समय अछि आज । त्रासेँ घर रहता किछु व्याज ॥३८५॥
अरि सम तनिकाँ हम देब मारि । अपनहिँ हाथ धरब तरुआरि ॥३८६॥
त्रासेँ चलल समर सभ शूर । रण-पण्डित बल-कला-सुपूर ॥३८७॥
अतिबल चलल नाम अतिकाय । तथा प्रहस्त प्रधान कहाय ॥३८८॥
नाम महोदर ओ महानाद । लड़य चलल रावण अहलाद ॥३८९॥
नाम निकुम्भ देव-अरि नाम । वानर सङ्ग कयल सङ्ग्राम ॥३९०॥
दवान्तक एक नाम कहाब । वीर नरान्तक नाम धराब ॥३९१॥
अगणित असुर कहब कत नाम । क्रुद्ध युद्ध कर जय मन-काम ॥३९२॥
वानर-दल मे गेल समाय । उद्यत युद्ध कहल नहि जाय ॥३९३॥
भिन्दीपाल भुशुण्डिक मारि । बाण परश्वध चल तरुआरि ॥३९४॥
नाना तरहक धयलक अस्त्र । पहिरि पहिरि रण लोहक वस्त्र ॥३९५॥
कपि-यूथप सङ्ग रण आघात । सहय तुरङ्ग तुरङ्गम-लात ॥३९६॥
पर्व्वताग्र तरुवर नख दन्त । एहि बल कपि कर राक्षस-अन्त ॥३९७॥
कत जन काँ दृढ़ मूका मार । नख सौँ तनिकर उदर बिदार ॥३९८॥
कत राक्षस काँ मारल राम । कत काँ कपि देल निर्ज्जर-धाम ॥३९९॥
कत राक्षस काँ अङ्गद मार । अगणित हति हनुमान प्रचार ॥४००॥
कत जन काँ लक्ष्मण कर नाश । समर जितल यूथप निस्त्रास ॥४०१॥
समर-जयी कपिराज-प्रताप । ठाढ़ महाप्रभु कर शरचाप ॥४०२॥

भावार्थः

भिन्दिपाल (ढेलबाँस), पट्टिशर (भाला), तलवार, बरछा आ शूल हात मे लय केँ राक्षस सब लड़य लागल । रक्त आ माँस सँ धरती थाल-थाल (कीचड़मय) भ’ गेल, तथापि दुनू दल निःशंक भ’ कय लड़ैत रहल । स्वर्ण-पर्वत केर समान हाथी सब, घोड़ा आ रथ सब पर सवार भ’ कय राक्षस योद्धा सब वानर सभक दल केँ ताकि-ताकिकय लड़य लागल । दसो दिशा मे कोलाहल मचि गेल । राक्षस सब केँ जितबाक लेल कपिराज सुग्रीव क्रूद्ध भ’ उठला आ राक्षस रूपी गोरैया पर बाजक समान टूटि पड़ला । सब वानर देवता लोकनिक अंशावतार रहथि आ राम संसारक ईश्वर रहथि । लड़ाइ मे देवावतार कपि लोकनि राक्षस सभक संहार कय रहल छलथि जेना टिड्डी दल फसल केर अंकुरा सभक संहार करैत अछि । जेतय धर्म रहैत अछि ओतहि जय होइत अछि । रावणक कुकर्म केर कारण राक्षस सभक मृत्यु भ’ रहल छैक । जखन राक्षस सभक चौथाइ सेनाक अन्त भ’ गेलैक तखन डर सँ ओकरा सब मे भगदड़ मचि गेलैक । फेर मेघनाद गायब भ’ गेल जेकरा ब्रह्मा सँ भेटल वर केर घमंड छलैक । ओ आसमान मे जाकय अस्त्र बरसाबय लागल । भाँति-भाँतिक अजीब युद्ध सब भेल । वानर सैनिक लोकनिक हाथ केर चलब बन्द भ’ गेल । सेना केँ एहि हालत मे देखि राम घबरा गेलाह । क्षण भरि त महाप्रभु चुप भ’ देखैत रहलाह, फेर क्रोधित भ’ अपन रूप धारण कयलनि । कहलनि – “हे लक्ष्मण, हमर ‘अजय’ नामक धनुष दिय’ जाहि सँ एहि ब्रह्मास्त्रक प्रतिकार कयल जाय । तुरन्त मे सब केँ जरा देबैक । हमरा सँ के युद्ध करत ?” ई सुनिकय मेघनाद लड़ाइ केर मैदान सँ घुरिकय घर चलि गेल । ओकरा लड़ाइ मे जीत सन्दिग्ध बुझा पड़लैक । वानर सैनिक सभक अंग लड़ैत-लड़ैत क्षत-विक्षत भ’ गेल छलैक । लगैत छल कियो जी नहि सकत । राम कहलनि – “हे हनुमान, सम्प्रति अहाँ केँ छोड़ि आर के काज देत ? अहाँ तुरन्त क्षीर-सागर जाउ आ द्रुहिणाचल सँ बूटी लय आउ । बीमार पड़ल अपन सम्पूर्ण दल केँ जियाउ आ तीनू लोक मे वीर होयबाक यश पाउ ।” ई सुनिकय हनुमान वायुवेग सँ ओतय गेलाह आ ओहि समूचा पर्वत केँ उठाकय लय अनलाह । ओहि बूटीक प्रभाव सँ सब वानर लोकनिक प्राणरक्षा भेलैक । स्वयं भगवान राम ओकरा सभक रक्षक रहथि । फेर रामक आज्ञा अनुसार हनुमान जाहिठाम सँ ओ पर्वत उठाकय अनने रहथि ओतहि लय जाकय राखि देलनि । कपिदल फेर भयाउन किलकार करय लागल । ओकरा सब केँ लड़ाइ सँ होयवला सारा तकलीफ दूर भ’ गेलैक । ई समाचार सुनिकय लंकापति रावण अचम्भा मे पड़ि गेल आर बाजल – ‘काल केर समान एहि वानरी सेना बड़ा भारी कठिनता उत्पन्न कय देलक अछि । मानू ब्रह्मा द्वारा राम रूपी दुश्मन बनाकय सम्प्रति लंका मे पठेलनि अछि । हम अपन रावण नाम बिना छोड़ने आ बिना हंटने युद्ध करब । हमर जे-जे मंत्री, बन्धु-बान्धव आ दलपति बहादुर सब अछि ओ सब आब आलस्य छोड़ि दियए । सब जोशक संग लड़ाइ करय । हम केकर पालन-पोषण नहि कयलहुँ अछि ? आइ हमरा समय पड़ल अछि ओ सब किछु बहाना बनाकय डर सँ घर मे पैसि गेल अछि । एहेन लोक सब केँ हम दुश्मन जेकाँ मारि देबैक । अपनहि हाथ सँ तलवार उठायब ।” एतेक सुनितहि रावणक सबटा सैनिक, जे बल आ कौशल दुनू सँ भरल रण-पंडित सब छल, डराकय रणभूमि दिश चलि पड़ल । ‘अतिकाय’ नाम केर परम बलवान् सैनिक चलल । सेनापति बनिकय ‘प्रहस्त’ चलल । ‘महोदर’ आ ‘महानाद’ नामक सैनिक रावणक हितार्थ लड़बाक लेल चलल । ‘निकुम्भ’ आ ‘देवारि’ नाम केर छल आर एक ‘नरान्तक’ नाम केर । एहि तरहें अनगिनत राक्षस सब छल, कतेक केर नाम गनाउ ? सब जोशक संग विजय केर कामना सँ युद्ध करय लागल । ओ सब बढ़ैत-बढ़ैत वानरक सेना मे पैसि गेल । एहेन लड़ाइ चलल जेकर वर्णन नहि कयल जा सकैत अछि । ढेलबाँस, तीर, तोप, तलवार आ बरछी सब चलय लागल । राक्षस सब लोहाक कवच पहिरि-पहिरिकय भाँति-भाँतिक अस्त्र चलौलक । वानरी सेनाक दलपति सभक संग मचल युद्ध मे एक घोड़ा दोसर घोड़ाक लथारि (चरण-प्रहार) खाय लागल । पहाड़क चोटी सब, बड़का-बड़का गाछ सब, दाँत आ नह – एहि शस्त्र सभक सहारे कपिदल राक्षस सभक संहार कयलक । कतेको केँ कसिकय मुक्का लगौलक आ नह (नाखून) सँ पेट फाड़ि देलक । कतेको राक्षस सब केँ राम मारलनि आ कतेको केँ कपि सब स्वर्ग पठौलनि । कतेको राक्षस सब केँ अंगद मारलनि । कतेको केँ हनुमान मारलनि । कतेको केर संहार लक्ष्मणजी कयलनि । लड़ाइ मे जीत भेल । दलपति सभक डर हेराइत चलि गेल । कपिराज सुग्रीव केर प्रताप सँ लड़ाइ मे विजयी भ’ कय राम हाथ मे तीर-धनुष लेने ठाढ़ रहथि ॥३५६-४०२॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला भाषा रामायण मे लंकाकाण्डक पाँचम अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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