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मिथिलाभाषा रामायण – लङ्काकाण्ड दोसर अध्यायः रावण केर हितैषी सब संग विचार-विमर्श, विभीषणक चेतावनी

1391 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

लङ्काकाण्ड – दोसर अध्याय

रावण केर हितैषी सब संग विचार-विमर्श, विभीषणक चेतावनी

।चौपाइ।

रावण मन मन कर अनुमान । लङ्का डाहि गेल हनुमान ॥१॥
बड़ आश्चर्य कहू की आन । अक्षयकुमार लेलक प्राण ॥२॥
सभा कयल निज लोक हकारि । रावण-वचन देथि के टारि ॥३॥
तखन सभ्य सौँ रावण कहल । गुप्त न हमर कतहु कृति रहल ॥४॥
की कर्त्तव्य भेल बड़ घोल । बजबहि पड़य गरा पर ढोल ॥५॥
हम राजा छी केवल नाम । सभकाँ सुख धन सम्पति धाम ॥६॥
एक-मत रहू कहू जे नीक । समर-कार्य्य कर्त्तव्ये थीक ॥७॥
नर वानर सौँ मानब हारि । एहि सौँ बाढ़ि दोसर की गारि ॥८॥
सामक समय रहल नहि आब । भावी आगाँ आगाँ धाब ॥९॥
कहु कहु निज मति जे भल रीति । श्रवण करक भल जनकाँ नीति ॥१०॥
राक्षस बहुत कहल कल जोड़ि । देल जाय चिन्ता चित छोड़ि ॥११॥
सुरपति-विजयी सुत घननाद । अनका जय मध कोन विवाद ॥१२॥
पुष्पक लेल कुबेरक छीनि । की सम्पति नहि अपन अधीनि ॥१३॥
वरुण बेचारे मानल हारि । आज्ञा केओ सकथि नहि टारि ॥१४॥
मय भय सौँ देल कन्या आनि । भययुत की अपनैँ मन हानि ॥१५॥
वानर आबि कयल उतपात । रण-वीरत्व देखु रहु कात ॥१६॥
नर-वानर सौँ पृथिवी हीन । कय देब लागत थोड़े दीन ॥१७॥
आज्ञा प्रभु सौँ पाओत जैह । कार्य्य-सिद्धि कय आनत सैह ॥१८॥

भावार्थः

रावण मन मे सोचैत अछि जे वानर लंका जरा गेल । बड आश्चर्यक बात अछि, आर कि कहल जाय, अक्षयकुमार केर सेहो अन्त कय देलक । फेर ओ अपन हितैषी सभक एकटा सभा बैसौलक । रावण केर वचन केँ के टारि सकैत छल ? तखन रावण सभासद सब सँ कहलक – “हम जे किछु कयलहुँ से किनको सँ छुपल नहि रहल । आब कि कर्तव्य अछि ? एहि विषय मे बहुते चर्चा भेल । आब किछु न किछु करहे टा पड़त, कियैक तँ कहावत छैक, जखन ढोल गला मे पड़ैत छैक तँ बजाबहे टा पड़ैत छैक । हम त मात्र नामक राजा छी । ई सुख-सम्पत्ति, ई धन-धाम अपने सभक छी, हम त मात्र नामक राजा छी । अहाँ सब मेल रँ रही आर जे नीक रास्ता हो से बताबी । आब लड़ाइ त करहे के अछि । मनुष्य आ वानर सँ हारि मानि लेनाय, एहि सँ बढ़िकय दोसर कोन गारि होयत ? आब साम (सहमति-समझौता) केर अवसर नहि रहल । जे भवितव्य होइछ से आगें-आगें दौड़ैत चलैछ । अपन-अपन मति सँ (समझ) मे जे नीक रास्ता हो से कहय जाउ । नीतिशास्त्र कहैत अछि जे भला लोक सभक विचार केँ सुनल करू ।” ॥१-१०॥

बहुते रास राक्षस सब हाथ जोड़िकय कहलक – “हे रावण, मोन मे चिन्ता जुनि करू । जखन इन्द्र तक केँ जीतयवला मेघनाद-जेहेन अपनेक पुत्र छथि, तखन दोसर केँ जीतय मे कोन सन्देह अछि ? अपने कुबेर सँ पुष्पक विमान छिनि लेने रही । कोन सम्पत्ति अहाँक अधीन मे नहि अछि ! अहाँ सँ बेचारा वरुण सेहो हारि मानि गेल । अहाँक आज्ञा केँ कियो टारि नहि सकैत अछि । मय नामक राक्षस डर सँ अहाँ केँ अपन बेटी आनिकय दय देलनि । फेर अहाँ डर सँ मोन छोट कियैक करैत छी ? वानर सब उत्पात कयलक अछि । ताहि लेल अहाँ काते रहैत रण मे हमरा सभक वीरता केँ देखी । हम सब पृथ्वी केँ मनुष्य आ वानर सँ हीन (रहित) कय देब । एहि मे हमरा सब केँ थोड़बे दिनक समय लागत । जेकरा अपनेक आज्ञा होयत, वैह ई काज पूरा कय देत ।” ॥११-१८॥

।दोहा।

बुद्धि-विहीन कुमन्त्रणा, कुम्भकर्ण शुनि कान ॥१९॥
कहल दशानन सौँ उचित, नयकोविद निज ज्ञान ॥२०॥

भावार्थः

बुद्धिविहीन कुमन्त्रणा (मूर्खतापूर्ण देल खराब सलाह) सुनिकय नीति-कुशल कुम्भकर्ण अपना विवेक (समझ) मुताबिक रावण सँ कहलकनि – ॥१९-२०॥

।रूपमाला छन्द।

चित्त दय दशकण्ठ प्रभु शुनु, कयल अहँ नहि नीक ॥२१॥
कर्म्म सीता-हरण-रूपक, आत्म-नाशक थीक ॥२२॥
रामचन्द्र अनन्त ईश्वर, काल-शासन बाण ॥२३॥
धनुष सौँ छुटि जखन लागत, बचत अहँक कि प्राण ॥२४॥
लेल अछि अवतार लक्ष्मी, राक्षसान्तक काज ॥२५॥
काल-काली राम-सीता, प्राप्त अहँक समाज ॥२६॥
कयल यद्यपि बहुत अनुचित, स्वस्थ-मन रहु भूप ॥२७॥
कहब करब सुमन्त्र जेहन, भक्ति-भाव अनूप ॥२८॥

भावार्थः

“हे रावण ध्यान दय केँ हमर बात सुनू । अहाँ नीक काज नहि कयलहुँ अछि । अहाँ जे सीताक हरण कयलहुँ, ओ मानू स्वयं अपन नाश कयलहुँ । रामचन्द्र अन्तहीन ईश्वर छथि । जखन काल (यम) केर आज्ञाक समान हुनकर बाण धनुष सँ छूटत तखन कि अहाँक प्राण बचि पायत ? लक्ष्मीजी राक्षस सभक संहार हेतु सीताक रूप मे अवतार लेलनि अछि । राम कालस्वरूप भ’ कय आ सीता कालीस्वरूपा भ’ कय अहाँ लग प्रस्तुत भेलि अछि । यद्यपि अहाँ बहुते रास अनुचित काज सब कयलहुँ अछि, तथापि अहाँ निश्चिन्त रहू । हमरा अहाँक प्रति अनुपम भक्तिभावना अछि । अहाँ जे किछु नीक विचार देब, ताहि मुताबिक हम चलब ।” ॥२१-२८॥

।रोला छन्द।

शुनि सकोप कह मेघनाद की नीति विचारब ॥२९॥
प्रभु-आज्ञा काँ पाबि राम लक्ष्मण काँ मारब ॥३०॥
सुग्रीवादिक सकल प्रबल मर्क्कट संहारब ॥३१॥
मेघनाद हम पुत्र पिता-आज्ञा नहि टारब ॥३२॥

भावार्थः

ई सुनिकय मेघनाद क्रोधपूर्वक बाजल – “एहि मे कि नीतिक विचार करब ? जखनहि प्रभुक आज्ञा भेटि जाय, राम आ लक्ष्मण केँ मारि देबैक । सुग्रीव आदि सब बलवान वानर केर संहार कय देबैक । हम अहाँक पुत्र मेघनाद छी, अहाँक आज्ञा कखनहुँ नहि टारब ।” ॥२९-३२॥

।घनाक्षरी।

कहल विभीषण विचार-सार बार बार ॥३३॥
करु न विरोध बन्धु राम भगवान सौँ ॥३४॥
दशमाथ-नगर अनाथ जकाँ जारि गेल ॥३५॥
कत गोट अपमान भेल हनुमान सौँ ॥३६॥
एक गोट छोट भाय कहल कयल जाय ॥३७॥
खलक कहल न शुनल जाय कान सौँ ॥३८॥
बाली बलशालीक कुचालि पाबि आबि पुर ॥३९॥
दिव्य गति देल मारि उर एक बान सौँ ॥४०॥

भावार्थः

तखन विभीषण आग्रहपूर्वक अपन ठोस विचार कहलनि – “भगवान राम सँ विरोध जुनि करू । हनुमान अहाँक नगरी लंका केँ जरा गेलाह । ओ कतेक पैघ अपमान कयलनि । छोट भाइक एकटा बात सुनि लेल जाउ । दुष्ट सभक कहल बात पर कान जुनि देल जाउ । राम बलवान बालि केँ कुकर्मरत पाबि ओकरहि नगर मे पैसिकय ओकरा छाती मे बाण मारलनि आर ताहि सँ ओ स्वर्गवासी बनि गेल ॥३३-४०॥

।अनुष्टुप् देश छन्द।

धरित्री-पुत्रिका देवी, त्वया नीतात्र लङ्कायाम् ॥४१॥
हरेर्म्माया जगन्माता, हनूमत्प्राप्ततङ्कायाम् ॥४२॥
त्वया सा जानकी देया, न हेया सन्मतिर्ब्बन्धो ॥४३॥
अजेया वानरी सेना, समायाता तटे सिन्धोः ॥४४॥
महेशः किङ्करो यस्य, विभोः श्रीरामचन्द्रस्य ॥४५॥
प्रयासस्त्वाल्लये कस्स्याद्दयार्द्रञ्चेन्मनो न स्यात् ॥४६॥

भावार्थः

धरतीक बेटी सीता केँ, जे भगवान विष्णुक मायाशक्ति छथि, जगत केर जननी छथि, हुनका अहाँ हरण कय केँ एतय लंका मे लय अनलियनि हँ आर ताहि लंका केँ हनुमान आतंकित कय देलनि अछि । से जानकी अहाँ राम केँ लौटा दियौन । हे भाइ, अहाँ सुधि-बुधि जुनि हेराउ । ई वानरी सेना अजेय अछि, हारयवला नहि अछि, से सेना समुद्रक किनार धरि पहुँचि चुकल अछि । जाहि रामचन्द्रजीक शिवजी स्वयं सेवक छथि, अहाँक अन्त करय मे हुनका कोन मेहनति करय पड़तनि, जँ हुनकर मोन मे दया नहि आबनि ।” ॥४१-४६॥

।चौपाइ।

काल-विवश रावण हतज्ञान । धर्म्मकथा नहि धारण कान ॥४७॥
उलटे भाइक ऊपर कोप । असमय धर्म्म-ज्ञान हो लोप ॥४८॥
औषध सन्निपाति नहि खाय । अनट सनट रटि यमघर जाय ॥४९॥
क्रोध दशानन पुन बजलाह । मुनि भ्राता घर हमर छलाह ॥५०॥
थिक कुल-दूषण सोदर भाय । अनुचित कयल जे कहल बजाय ॥५१॥
बड़ कातर जिव थर थर काप । जनु अन्धार घर सापहि साप ॥५२॥
अरि-उत्कर्ष हमर लग बाज । धिक घोरि पिउलक सभटा लाज ॥५३॥
हमरे लालित पालित पुष्ट । बुझल विभीषण मानस दुष्ट ॥५४॥
हमर नगर सौँ हो खल कात । प्राण हरब मारब हम लात ॥५५॥
छल भल दया सहोदर जानि । कुक्कुर-न्याय चढ़ल अछि छानि ॥५६॥
शुनल विभीषण मन बड़ आनि । लङ्का त्यागि चलल नभ फानि ॥५७॥
मन्त्री चारि चतुर जन सङ्ग । बड़का भाइक बिगड़ल रङ्ग ॥५८॥
गगन गदाकर धर्म्म पुकार । सर्व्व-विनाश बढ़ल व्यवहार ॥५९॥
काली काल लेल अवतार । हरण होयत अवनिक ओत भार ॥६०॥
तनि प्रेरित अहँकाँ नहि ज्ञान । निकट काल होइछ अनुमान ॥६१॥
नर वानर कर दनुजक नाश । दशमुख त्यागू जीवन-आश ॥६२॥
व्यापक ब्रह्म शुनै छी जैह । विधि-प्रार्थित अवतरला सैह ॥६३॥
विस्मित-मन रावण बजलाह । सोदर-सर्प्प सदन अधलाह ॥६४॥
समय सन्धि नहि बौँसल आब । भीरु विभीषण नाम स्वभाव ॥६५॥
कहल विभीषण भावी भङ्ग । जनि साहस खस अनल पतङ्ग ॥६६॥
अद्यावधि हठ बल अभिमान । बिसरल नहि होयता हनुमान ॥६७॥
रहितहुँ सहि घर कहितहुँ नीति । पुन पुर नाचय नटी कुरीति ॥६८॥

भावार्थः

काल केर दबायल रावण केर सुधि-बुधि जाइत रहलनि । ओ उचित सलाह पर ध्यान नहि देलनि । उल्टा अपन भाइ उपर क्रोधित भ’ उठलाह । जखन खराब समय अबैत छैक तखन उचित-अनुचितक ज्ञान लुप्त भ’ जाइत छैक । सन्निपातक रोगी दबाइ नहि खाइछ, बल्कि अंट-संट बकैते मृत्यु केँ प्राप्त करैत अछि । फेर तामश मे आबिकय रावण बाजल – “मुनि रूप भाइ हमरहि घर मे छल । ई सहोदर भाइ विभीषण हमर वंश केँ बदनाम करयवला अछि । गलती भेल जे एतय विचार-विमर्श करबाक वास्ते एकरो बजेलहुँ । ई अत्यन्त कमजोर हृदयक लोक अछि, थर थर काँपि रहल अछि । कहावत छैक जे डरपोक केँ अन्हार घर मे साँपहि साँप नजरि पड़ैत छैक । हमर सोझेँ मे ई शत्रुक बड़ाइ करैत अछि । छिः, ई लाज उठाकय पीबि गेल अछि । हमरहि पालन-पोषण पाबिकय ई तगड़ा बनल अछि । आब बुझय मे आयल जे ई मोन सँ दुष्ट अछि । अरे दुर्जन, तूँ हमर नगर सँ बाहर चलि जो । लाते-लात मारिकय जान लय लेबौक । सहोदर भाइ बुझिकय हम बड दया करैत रहलहुँ । ई त कुक्कुर जेकाँ हमरहि माथ पर सवार भ’ गेल अछि ।” ॥४७-५६॥

ई बात सुनिकय विभीषणक मन मे भारी आइन लगलनि । ओ लंका केँ छोड़ि फाँगिकय (छलाँग मारिकय) आकाश मे उड़ि चललाह । समझदार मंत्री सब हुनकहि संग चलि देलक । जेठ भाइ रावणक रंग बदलि गेल । विभीषण हाथ मे गदा लेने आकाश मे धर्म केँ शोर करय लगलाह – चिकरिकय सदुपदेश दियय लगलाह – “सब केँ विनाश करयवला चाइल चलल जा रहल अछि । काली आ काल अवतार लय लेलनि अछि । आब धरतीक भार दूर होयत । हे रावण, अहाँक एहि तरहें नासमझ भेनाय हुनकहि प्रेरणाक फल थिक । लगैत अछि काल नजदीक आबि गेल अछि । नर आ वानर राक्षस सब केँ नाश करत । हे रावण, आब जीवनक आशा छोड़ू । जे व्यापक ब्रह्म कहाइत छथि, विधाताक प्रार्थना सँ वैह अवतार लेलनि अछि ।” ॥५७-६३॥

चकित भ’ कय रावण बाजल – “सहोदर भाइ आ साँप केर घर मे रहनाय नीक बात नहि होइछ । समय पर मेल नहि भेल त आब कि होयत ? नामहि केर अनुरूप विभीषण डरपोक अछि ।” विभीषण कहलनि – “आगाँ बड खराब हाल होयबला अछि । जेना साहस कय केँ ‘कीट-पतङ्ग’ (परवाना) आइग मे जरि जाइत अछि (किछु तेहने हाल होयबला अछि) । एखनहुँ धरि अहाँ बल केर अभिमान सँ जिद्द पकड़ने छी । एखन हनुमानजी अहाँ केँ बिसरायल नहि हेताह । बर्दाश्तो कय केँ हम घर मे रहितहुँ आ उचित सलाह दैत रहितहुँ, मुदा एहि नगर मे तँ फेरो कुरीतिक नंगा नाच भ’ रहल अछि ॥५८-६८॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे लंकाकाण्डक दोसर अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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