स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
स्वाध्यायक क्रम मे कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण केर सुन्दरकाण्ड धरिक सम्पूर्ण पाठ पूर्ण भेल । ओ सब स्वयं टंकण करैत मैथिली जिन्दाबाद पर प्रकाशित कय चुकल छी । अलग-अलग अध्यायक जनतब मुताबिक अलग-अलग पृष्ठ मे ओकरा सब केँ समेटल । आब आइ लंकाकाण्ड प्रारम्भ भेल अछि ।
कविचन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण
अथ लङ्काकाण्ड
प्रथम अध्याय
राम केर सेनाक तैयार एवं लंका प्रस्थान
।श्लोक अनुष्टुप्।
मुकुन्दम्माधवं वन्दे समुद्रे सेतुकर्त्तारम् ॥१॥
शयानन्दर्भशय्यायां दशग्रीवस्य हन्तारम् ॥२॥
उमेशं सर्व्वदं वन्दे महाकालं गुणातीतम् ॥३॥
गरैः काकोदरैः प्रेतैः पिशाचाद्यैश्च निर्भीतम् ॥४॥
भावार्थः
समुद्र मे पुल बनेनिहार मुकुन्द-माधव केर हम वन्दना करैत छी, जे कुश केर शय्या पर सुतल छथि आ रावण केँ मारयवला छथि । हम समस्त कामना केँ पूरा करनिहार, गुण सब सँ भरल, महाकालस्वरूप पार्वतीपति शिव केर वन्दना करैत छी जे विष, सर्प, पिशाच आदि सँ निर्भीक छथि ॥१-४॥
।चौपाइ।
लङ्का-चरित कहल हनुमान । शुनि प्रसन्न-मन श्रीभगवान ॥५॥
दोसर यहन करत के आन । दुष्कर कर्म्म कयल हनुमान ॥६॥
शत योजन जलनिधि विस्तार । खग समान उड़ि गेलहुँ पार ॥७॥
बड़ प्रताप लङ्का मे कयल । रावण आबि पकड़ि नहि धयल ॥८॥
सभ जन रक्षक मारुत-पूत । दोसर यहन हयत के दूत ॥९॥
मन मे होइछ समुद्रक ध्यान । कोन गति उतरब थिर नहि प्रान ॥१०॥
कोन परि देखब सीता जाय । रिपुकाँ मारब समर चढ़ाय ॥११॥
शुनि सुग्रीव प्रभुक मुख-उक्ति । कहलनि साध्य हमर अछि युक्ति ॥१२॥
जलनिधि नक्र-झषाकुल तरब । लङ्का-गर्व्व सर्व्व हम हरब ॥१३॥
जिबइत नहि छाड़ब दशभाल । हे रघुपति हम अरिगण-काल ॥१४॥
चिन्ता जनु करु श्रीरघुनाथ । विजय मानि लिय अपनहि हाथ ॥१५॥
वानर भालु बहुत रण-शूर । तनिकाँ लङ्का अछि कत दूर ॥१६॥
तरब समुद्र तकर मति करिय । रावण मृतक यहन मन धरिय ॥१७॥
धरब धनुष सन्मुख के हयत । जौँ सन्मुख दुख यम-घर जयत ॥१८॥
प्रभु समर्थ हमरा विश्वास । श्रीरघुनन्दन विश्व-निवास ॥१९॥
आगि पानि मे जाय समाय । वानर रहत न रण पछुआय ॥२०॥
भावार्थः
हनुमानजी लंकाक वृत्तान्त सुनौलनि । सुनिकय भगवान राम प्रसन्नचित्त भेलथि । ओ हनुमानजी सँ कहलनि – “हे हनुमान, अहाँ जे दुष्कर कार्य कयलहुँ अछि, से दोसर के कय सकैत छल ? अहाँ सौ योजन मे पसरल समुद्र केँ पक्षी जेकाँ उड़िकय पार कय गेलहुँ । अहाँ लंका मे भारी पराक्रम देखेलहुँ । रावण अहाँ केँ पकड़िकय कैद नहि कय सकल । हे पवनसुत हनुमान, अहाँ सब लोकक रक्षक भेलहुँ । दोसर एहेन दूत के होयत ? मोन मे जखन समुद्रक ध्यान करैत छी त चित्त घबरा उठैत अछि, एकरा कोन तरहें पार करब ? केना सीता केँ देखब ? केना लड़ाइ ठानिकय शत्रु सब केँ मारब ?” सुग्रीव रामक मुख सँ ई सब बात सुनिकय कहलनि – “एकर उपाय हम कय सकैत छी । मगर, माछ आदि सँ भरल समुद्र केँ पार कय जायब । लंकाक सबटा घमंड मेटा देब । रावण केँ जीतने बिना नहि छोड़ब । हे राम, हम शत्रु सभक काल छी । हे रघुनाथ, अहाँ चिन्ता जुनि करू । मानि लियह जे विजय अपनहि हाथ मे अछि । बहुते रास वानर आ भालू लड़ाइ मे दक्ष अछि । ओकरा सब लेल लंका कतेक दूर छैक ? आब ई संकल्प करू जे हम सब समुद्र पार करब । मानि लिय’ जे रावण मरि गेल । अपने जखन धनुष धरब त के सोझाँ मे आओत ? यदि अयबो करत त यमपुरी पहुँचिकय दुःख झेलत । हे रघुनन्दन, विश्वव्यापी ईश्वर, अपने सब किछु करय मे समर्थ छी । पानि मे आगि लागि सकैत अछि, मुदा रण मे वानर पाछू नहि भ’ सकैत अछि ।” ॥५-२०॥
।सोरठा।
मन-हर्षित रघुवीर, जलधि तरब से विधि करब ॥२१॥
कह रह धनुष सुतीर, हनूमान-साहित्य रह ॥२२॥
कहु लङ्काक सरूप, मारुत-नन्दन केहन से ॥२३॥
रावण भारी भूप, तत प्रवेश दुस्साध्य विधि ॥२४॥
हाथ जोड़ि हनुमान, कहल जेहनि लङ्कापुरी ॥२५॥
सानुकूल भगवान, मारब रावण सहित-बल ॥२६॥
भावार्थः
ई सुनिकय राम प्रसन्न भ’ गेलाह । ओ कहलनि – “जेहेन अहाँ कहलहुँ तेहने करब । समुद्र पार करब । धनुष-बाण हाथ मे आ हनुमान साथ मे रहता । हे पवनसुत हनुमान, बताउ, लंका कोन रूप केर, केहेन अछि ? रावण त बड़ा पराक्रमी राजा अछि, तेँ ओकर लंका मे प्रवेश कयनाय आसान नहि होयत ।” हनुमान हाथ जोड़िकय लंकाक वर्णन सुनौलनि आ कहलनि – “अपनेक कृपा रहत, हम सेना सहित रावणक संहार करब ॥२१-२६॥
।चौपाइ।
गिरि त्रिकूट पर लङ्का केहनि । दोसर अमरपुरी हो जेहनि ॥२७॥
सकल कनकमय दृढ़ प्राकार । मणिमय खम्भ सकल घरद्वार ॥२८॥
परिखा शोभित निर्म्मल पानि । सुधा-मधुरताधिक पड़ जानि ॥२९॥
उपवन वापी बहुत तड़ाग । पुर शोभा अति सुन्दर लाग ॥३०॥
कय हजार शोभित गजवाह । पश्चिम द्वार न रिपु निर्वाह ॥३१॥
बहुत पदाति अश्व असबार । कय अर्व्वुद जन गणय न पार ॥३२॥
पूर्व्व द्वारमे तेहने सर्व्व । चिउटी ससर न तेहन पर्व्व ॥३३॥
बहुत रथी रह दक्षिण द्वार । मध्य कक्ष अतिशय विस्तार ॥३४॥
अगणित महामत्त गजराज । विविध यान रथि तनिक समाज ॥३५॥
बहुत शतघ्नी बड़ बड़ अस्त्र । सभकाँ पहिरन लोहक वस्त्र ॥३६॥
केवल प्रभुक प्रताप सहाय । चतुर्थांश बल मारल जाय ॥३७॥
लङ्का जारल बिपिन उजारि । अक्षयकुमार आदिकाँ मारि ॥३८॥
लघु वानरक हमर ई काज । परमेश्वर अपनै महराज ॥३९॥
प्रभु-कुदृष्टि मात्रहि जरि जयत । के अछि तेहन समर थिर हयत ॥४०॥
सत्वर कयल जाय प्रस्थान । अरि-जन-दहन राम भगवान ॥४१॥
भावार्थः
त्रिकूट पर्वत केर उपर सँ लंका एहेन लगैत अछि जेना दोसर स्वर्गपुरी हो । ओतय सब किछु सोनाक बनल अछि । ओकर चहारदीवारी बड मजगूत अछि । सबटा भवन आ द्वार (दरबाजा) केर खम्भा रत्न सब सँ बनल अछि । गढ़ केर चारू दिश खाई मे निर्मल जल अछि जे अमृतहु सँ अधिक मीठ लगैत अछि । बहुते रास उपवन अछि, वापी (कुंड) आ पोखरि सब अछि । नगरक शोभा बड रमणीय अछि । कतेको हजार हाथी वला सैनिक सब अछि । पश्चिम दरबाजा पर शत्रु प्रवेशक गुंजाइश नहि अछि । भारी संख्या मे पैदल सैनिक भरल अछि । ओकर संख्या अरबों होयत, के गानि सकैत अछि ? पूरब केर दरबाजा पर सेहो सब एहने अछि, ओतय चुट्टियो ससरिकय नहि जा सकैछ । दक्षिणक दरबाजा पर बहुते रास रथारूढ़ सैनिक सब तैनात अछि । बीचक हिस्सा काफी पसरल अछि । अनगिनत मत्त हाथी सब छैक, भाँति-भाँतिक रथ आ रथारोही लोकनिक दल सब अछि । बहुते रास तोप आ बड़का-बड़का अस्त्र छैक । सबटा लोहाक जिरहवख्तर (कवच) पहिरने अछि । मात्र अपनेक प्रताप सँ ओकर एक चौथाइ सेना केँ हम मारि देलहुँ । वाटिका केँ उजाड़िकय आ अक्षयकुमार केँ मारिकय लंका केँ जरा देलहुँ । हम छोट सन वानर भ’ कय जे एहे काज कयलहुँ से हे परमेश्वर, अहीँक महिमा छी । अहाँक क्रुद्ध दृष्टि टा पड़त त शत्रु सब जरि जायत । एहेन के अछि जे लड़ाइ मे डटल रहि सकत ? हे राम, अपने शत्रुक लेल मानू आइग छी । शीघ्र प्रस्थान कयल जाउ ।” ॥२७-४१॥
।सोरठा।
तखन कहल भगवान, शुनु कपीश सेना-निकर ॥४२॥
तत्क्षण कर प्रस्थान, उत्तम विजय-मूहूर्त्त अछि ॥४३॥
भावार्थः
तखन भगवान राम कहलनि – “हे सुग्रीव, सुनू । तुरत सेना प्रस्थान करय । ई विजय-यात्रा लेल उत्तम मुहूर्त थिक ॥४२-४३॥
।षट्पद।
हमहुँ चलब यहि काल, काल दशभालहिँ मारब ॥४४॥
मारब बड़ बड़ दनुज, भार भूमीक उतारब ॥४५॥
तारब हम मुनिलोक, विदेह-तनूजा आनब ॥४६॥
नव नव चरित पवित्र, अमरगण गाओत मानव ॥४७॥
दक्षिणाक्ष अधभाग मे, स्फुरण होइ अछि बड़ सगुन ॥४८॥
चलु चलु यूथप सज्जसौँ, नहि कर्त्तव्य विचार पुन ॥४९॥
भावार्थः
यैह समय हमहुँ चलब, कालस्वरूप दशभाल (रावण) केँ मारब । बड़का-बड़का राक्षस सब केँ मारब । भूमिक भार उतारब । मुनिजन लोकनिक त्राण करब । (राक्षस सभक अत्याचार सँ मुक्त कय देबनि ।) जानकी केँ लय आनब । ई सब हमर नव चरित्र केँ देवता आ मनुष्य लोकनि गओता । दाहिना आँखिक निचुलका हिस्सा फड़कि रहल अछि जे शुभ सकुन छी । हे सेनापति लोकनि, सब गोटे तैयार भ’ कय चलू । आब कर्तव्यक विचार सब छोड़ू । (मात्र युद्ध आ दुश्मन केर वध पर ध्यान धरू । ) ॥४४-४९॥
।विजया छन्दः।
इत मर्क्कटाधीश कय अर्व्व अक्षौहिणी ॥५०॥
क्षोणिधर क्षोणि-संक्षोभ सौँ काँप ॥५१॥
तँह दिग्गजोद्दण्ड महि शुण्डसम्पात कर ॥५२॥
चण्डरव दाँत महि कष्ट सौँ थाप ॥५३॥
गुरु पन्नगाधीश-फण फाट मन आँट भय ॥५४॥
कूर्म्मगणराट सह पीठ सन्ताप ॥५५॥
वर विजय प्रस्थान भगवान श्रीराम प्रभु ॥५६॥
कयल लङ्कापुरी हाथ शरचाप ॥५७॥
भावार्थः
एम्हर वानरराज सुग्रीव कतेको अरब अक्षौहिणी सेना लय केँ चललाह त धरती डगमगाय लागल आ ताहि सँ पहाड़ काँपय लागल । ओम्हर प्रचंड-दिग्गज लोक सब तिलमिलाकय धरती पर सूँड़ पटैक रहल अछि, घोर ध्वनि सँ चिकरि रहल अछि आउ बड़ा कष्ट सँ अपन दाँत सँ धरती केँ पकड़ने (धेने) अछि । ओम्हर अत्यन्त भार सँ शेषनागक फन फाटैत जा रहल छन्हि आ मन व्याकुल भ’ गेल छन्हि । महाकच्छप अपन पीठ पर धरतीक भार अत्यधिक पीड़ाक संग सहि रहल अछि (बर्दाश्त कय रहल अछि) । भगवान् राम लंकापुरी पर विजय प्राप्त करबाक लेल हाथ मे धनुष-बाण लय प्रयाण कय रहल छथि ॥५०-५७॥
।भुजङ्गप्रयात छन्दः।
चलू सर्व्वयूथेश लङ्केश मारू ॥५८॥
चतुदिक्षु सेनाक रक्षा सम्भारू ॥५९॥
लड़ाका बड़ा वीर दैत्येश भारी ॥६०॥
महावञ्चनाधार सर्व्वत्रचारी ॥६१॥
हनूमान-कन्धस्थ श्रीराम भेला ॥६२॥
तथा अङ्गद-स्कन्ध सौमित्रि गेला ॥६३॥
बिदा भेलि सेना युगान्ता घनाली ॥६४॥
सुपीतारुणा श्यामला वानराली ॥६५॥
कहै वीर पक्षीजकाँ जाइ लङ्का ॥६६॥
करी जाय शीघ्रे पुरीकेँ सतङ्का ॥६७॥
दशग्रीव की आबि के युद्ध कर्त्ता ॥६८॥
कहू कीश की नाशकेँ आबि धर्त्ता ॥६९॥
भावार्थः
आवाज होइत अछि – “चलू, सब सेनापति लोकनि, चलू । लंकापति रावण केँ मारू । चारू दिश सेनाक सुरक्षा करू । राक्षसराज रावण भारी लड़ाकू वीर अछि । ओ बड़ा भारी माया जानयवला अछि, ओकर सब ठाम पहुँच छैक (सर्वत्र गति छैक) ।” ॥५८-६१॥
राम हनुमानक कन्धा पर चढ़लाह तथा लक्ष्मण अंगद केर कन्धा पर सवार भेलाह । प्रलयकाल केर मेघमाला समान सेना चलल जाहि मे पियर, लाल आ कारी रंगक वानर सभक पंक्ति सब छल । वीर सैनक सब कहथि – “हम सब वीर पक्षी जेकाँ उड़िकय लंका चली आ शीघ्रे जाय केँ ओहि लंकापुरी केँ आतंकित करी । रावण कि आबिकय हमरा सब सँ युद्ध करत ? कहू ओ कीश (वानर) केँ नहि अपन नाश मात्र केँ धरत ।” ॥६२-६९॥
।रोलाछन्दः।
गज गवाक्ष ओ गवय मैन्द, द्विविदादि चलल नल ॥७०॥
नील सुषेण ओ जाम्बवान, सेनाधिप भल भल ॥७१॥
मर्क्कट कर किलकार, अर्क्क-आच्छादित धूरा ॥७२॥
श्रीरघुवीर-प्रताप, कीश रणकोविद पूरा ॥७३॥
भावार्थः
एहि सेना मे गज, गवाक्ष, गवय, मैन्द, द्विविद, नल, नील, सुषेण आ जाम्बवान योग्य सेनापति रहथि । कपिगण किलकार करैत छलथि । धूरा सँ सूरज झँपा गेलाह । रामक महिमा सँ कपिगण युद्ध मे बड प्रवीण रहथि ॥७०-७३॥
।सोरठा।
सैन्य मध्य श्रीराम, शोभित कपिपति सहित तहँ ॥७४॥
कतहु न हो विश्राम, अतिशय-रण-उत्साह मन ॥७५॥
भावार्थः
सेनाक बीच मे सुग्रीव-सहित राम विराजमान छथि । कतहु ढिलाइ नहि अछि, सभक मोन मे युद्ध करबाक उत्साह भरल छैक ॥७४-७५॥
।चौपैया छन्दः।
लाँघल सह्याचल, मलय सकल दल, फल मधु करइत भक्षण ॥७६॥
तरुवर बड़ भारी, लेल उखारी, वानर समर-विचक्षण ॥७७॥
लाँगड़ि महि पटकय, तरु तरु लटकय, भूधर पर चढ़ि फानय ॥७८॥
वानर-मय धरणी, चल नभ-सरणी, मन किछु त्रास न मानय ॥७९॥
भावार्थः
फल आर मधु चखिते कपिदल सह्याद्रि केँ तथा मलय (पहाड़) केँ नाँघिते निकलि पड़ल । युद्ध मे दक्ष कपि सब बड़का-बड़का गाछ सब केँ उखाड़िकय हाथ मे लय लैत छल; पूँछ केँ धरती पर पटकैत छल; गाछ सब पर लटकैत छल आ फाँगि-फाँगि केँ पहाड़ पर चढ़ि जाइत छल । लगैत छल कि सौंसे धरती पर वानरे-वानर अछि । ओ सब आकाश-मार्ग सँ चलैत आ मोन मे कोनो-कनिको डर नहि करैत छल ॥७६-७९॥
।कुण्डलिया।
किलकि-किलकि कौतुक करय, कपि-कुल अति वाचाल ॥८०॥
रघुनन्दन आगाँ कहय, के थिक खल दशभाल ॥८१॥
के थिक खल दशभाल, व्याल पर हम छी खगपति ॥८२॥
सत्वर सन्तरु उदधि पार, हम करब दनुज-गति ॥८३॥
दनुज-मत्त-मातङ्ग उपर, मर्क्कट-मृगपति मिल ॥८४॥
वानर अनल समान, दनुज-कुल कानन थिक किल ॥८५॥
भावार्थः
परम वाचाल कपिगण किलकारी मारि-मारिकय तमाशा करैत छल आर रामक सोझाँ कहय – “अरे ओ दुष्ट रावण के अछि ? ओ साँप अछि त हम गरुड़ छी । जल्दी समुद्र केँ पार करय जाउ । हमरा लोकनि राक्षस सभक दुर्दशा कय देबैक । राक्षस-रूपी मतवाला हाथी पर कपि-रूपी सिंह टूटि पड़त । राक्षस सब जंगल छी त हम कपिगण आइग छी ।” ॥८०-८५॥
।सोरठा।
प्रलय-घटा-आटोप, अटकलि सेना सिन्धु-तट ॥८६॥
वानर-मन बड़ कोप, की विलम्ब जल-निधि तरू ॥८७॥
कहल राम भगवान, की प्रयास सागर तरब ॥८८॥
नहि देखी जल-यान, थिक विचार कर्तव्य की ॥८९॥
कपि-पति आज्ञा पाबि, सन्निवेश सेना रहलि ॥९०॥
की भेल सत्वर आबि, अति-अगाध बाधा कयल ॥९१॥
कर प्रभु विविध विलाप, हा जानकि सति प्रेयसी ॥९२॥
सभ मन हो सन्ताप, प्रजा तथा राजा यथा ॥९३॥
भावार्थः
प्रलयकाल केर मेघ जेकाँ सेना सब समुद्रक किनार पर ठहरल । कपि सभक मोन मे बड़ा भारी क्रोध भरल छलैक । ओ सब कहय, “आब विलम्ब कथी के ? समुद्र पार कयल जाय ।” राम कहलनि – “हमरा लोकनि कोन युक्ति सँ समुद्र पार करब ? नाव त नहि देखाय पड़ि रहल अछि । आब ई विचारल जाय जे कि करी ?” सुग्रीवक आज्ञा पाबि सेना सब पड़ाव मे रुकि (ठहरि) गेल । सैनिक सब बाजय लागल, एतेक तेजी सँ आबिकय कि भेल ? भारी, गहींर समुद्र हमरा लोकनिक यात्रा मे बाधक बनि गेल । राम भाँति-भाँति केर भाव सँ विलाप करय लगलाह – “हा जानकी, हा सती सीता, हा प्रेयसी ।” सभक मोन दुःखी भ’ गेल । कहावत अछि – ‘यथा राजा तथा प्रजा’ ॥८६-९३॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे लङ्काकाण्डे प्रथमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे लंकाकाण्ड केर पहिल अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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