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मिथिलाभाषा रामायण – सुन्दरकाण्ड तेसर अध्याय – हनुमानजी एवं सीताजीक संवाद

1397 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण

सुन्दरकाण्ड – तेसर अध्याय

हनुमानजी एवं सीताजीक संवाद

।चौपाइ।

सीता शुनथि शुनय नहि आन । शञ्च शञ्च कह तहँ हनुमान ॥१॥
राजा दशरथ काँ सुत चारि । जेठ राम काँ सीता नारि ॥२॥
शिव-धनु तोड़ल मिथिला जाय । जनक देल कन्या से न्याय ॥३॥
परशुराम अयला कय कोप । तनिकर भय गेल गर्व्वक लोप ॥४॥
भूमि-भार-संहारक काज । विघ्न कयल बड़ देव-समाज ॥५॥
बारह वर्ष राम वनवास । केकयि परवश कयल प्रयास ॥६॥
हरल शारदा केकयि-ज्ञान । ककरो कहल कि रानी मान ॥७॥
वर न्यासित दशरथ सौँ लेल । दशरथ प्राण-रहित भय गेल ॥८॥
लक्ष्मण सीता संगैँ राम । पंचवटी मे कैलनि धाम ॥९॥
भिक्षुक बनि रावण सञ्चरल । शून्याश्रम सौँ सीता हरल ॥१०॥
दश-भालक संग लड़ल जटाउ । दृष्ट कथा हम कते शुनाउ ॥११॥
कानन-कथा सकल से कहल । विरही विकल राम दुख सहल ॥१२॥
किष्किन्धा मे यहन चरित्र । बालि घालि सुग्रीव सुमित्र ॥१३॥
सुग्रीवक हम मन्त्रि प्रधान । नाम हमर कह जन हनुमान ॥१४॥
वानर दूत फिरय सभ देश । सीतान्वेषण मुख्य निदेश ॥१५॥
तहि मे हमहुँ पयोनिधि फानि । अयलहुँ लङ्का जानकि जानि ॥१६॥
वृद्ध गृद्ध कहलनि सम्पाति । घुरि फिरि देखल लङ्का राति ॥१७॥
दबकल दबकल यहि तरु कात । देखल शुनल गञ्जन उतपात ॥१८॥
हम कृतार्थ भेलहुँ अछि आज । हमहि कयल रघुनन्दन-काज ॥१९॥
जनक-नन्दिनी देखल आँखि । अयलहुँ सङ्गी पारहि राखि ॥२०॥

भावार्थः

सीता सुनैत छथि आ कियो नहि सुनैछ, एहि तरहें हनुमानजी धीरे-धीरे कहय लगलाह – “राजा दशरथक चारि टा बेटा छन्हि । बड़काक नाम राम थिकन्हि, जिनक स्त्री सीता छथि । राम मिथिला जा कय शिवजीक धनुष केँ तोड़लन्हि । जनक हुनका न्यायपूर्व अपन कन्या देलनि । परशुराम क्रोधित भ’ कय अयलाह, मुदा हुनकहु घमंड चूर भ’ गेलनि । धरतीक भार केँ दूर करबाक उद्देश्य सँ देवता लोकनि भारी विघ्न कयलनि अर्थात् राज्याभिषेक कय राम केँ युवराज बनेबाक राजा दशरथक आदेश मे बाधा उत्पन्न कयलनि । दोसरक उकसेला सँ कैकेयि ई प्रयास कयलनि जे राम केँ १२ वर्षक वनवास होइन्ह । शारदा देवी कैकेयि केर ज्ञान हरण कय लेलनि । कि रानी केकरहु बात सुनैत छथि ? थाती राखल वरदान ओ राजा दशरथ सँ माँगि लेलिह । दशरथक प्राण चलि गेलनि । सीता आ लक्ष्मणक संग राम पंचवटी आश्रम बनौलनि । ओतय भिखारी बनिकय रावण आयल । ओ सून्न आश्रम सँ सीता केँ हरण कय लेलक । रावणक संग जटायु युद्ध कयलनि । देखल गेल कथा हम कतेक सुनाउ ।” ॥१-११॥

फेर हनुमानजी सबटा कथा सुनाकय कहय लगलाह – “विरह सँ राम बहुते दुःख सहलनि । किष्किन्धा मे ई सब काण्ड भेल । राम बालि केँ मारिकय सुग्रीव केँ मित्र बनौलनि । हम सुग्रीवक प्रधानमंत्री छी । लोक हमरा हनुमान कहैछ । बहुते रास वानर सब खास कय केँ सीताक खोज (अन्वेषण) करबाक आदेश भेल अछि आ ओ सब दूत बनिकय देश-देश मे घूमि रहल अछि । वैह दूत मे सँ हम एक छी । जानकी लंका मे छथि, ई खबर पाबिकय हम समुद्र नाँघिकय अयलहुँ अछि । बूढ़ गृध्र सम्पाति ई रास्ता बतौलनि । राति मे घूमि-घूमिकय हम लंका देखलहुँ । एहि गाछक बगल मे दुबकिकय हम सारा उत्पात देखलहुँ आ सारा गंजन सेहो सुनलहुँ । आइ हम कृतकृत्य भ’ गेलहुँ । रामक काज हमहीं सिद्ध कय पेलहुँ । जनकक पुत्री अर्थात् अपनेक दर्शन भेटल । हम अपन संगी-साथी सब केँ ओही पार छोड़िकय आयल छी ॥१२-२०॥

।षट्पद छन्दः।

नहि अछि आज्ञा तेहन, जेहन हम कौतुक करितहुँ ॥२१॥
लङ्कापुरी उखाड़ि प्रभुक, पद लग लय धरितहुँ ॥२२॥
दशमुख सौँ कय बेरि अपन दुहु पयर धरबितहुँ ॥२३॥
लाँगड़ि मे लपटाय बाँधि सभ लोक फिरबितहुँ ॥२४॥
जननि थोड़ दिन विपति अछि, सकुल सदल रावण मरत ॥२५॥
गृद्ध काकगण मगन मन, लङ्कापुर डेरा करत ॥२६॥

भावार्थः

हमरा आज्ञें नहि अछि अन्यथा हम किछु करामात देखबितहुँ । लंकापुरी केँ उखाड़िकय प्रभु रामचन्द्रक चरणक आगू राखि दितहुँ । रावण सँ भिड़न्त कय केँ अपन दुनू पैर पकड़बबितहुँ । लाँगड़ि मे लपेटि बाँधिकय सब लोक (संसार) मे एकरा (रावण केँ) फिरबितहुँ । हे माता, आब विपत्तिक दिन कनिकबे बचि गेल अछि । कुल, परिवार आ सेना-सहित रावणक मृत्यु होयत । गिध आ कौआ सब खुशी भ’ कय लंका मे बसेरा करत ।” ॥२१-२६॥

।चौपाइ।

धयलैँ छली अशोकक डारि । शुनल सकल मन रहलि विचारि ॥२७॥
कहयित के अछि कथा चिन्हार । देखितहुँ लोचन बह जल धार ॥२८॥
दुःख अपार निन्द नहि आब । गगन वचन हित हमर शुनाब ॥२९॥
मरइत राखि लेल जे प्राण । वचन शुनाओल अमृत समान ॥३०॥
दया करथु से दर्शन देथु । सुकृति-समाज सहज यश लेथु ॥३१॥
शञ्च शञ्च से कयल प्रणाम । हृदय राखि रघुनन्दन राम ॥३२॥
सीता-वचन शुनल हनुमान । प्रकट भेल कलविङ्क-प्रमाण ॥३३॥
पीत वर्ण मुख अतिशय लाल । बद्धाञ्जलि मन हर्ष विशाल ॥३४॥
आगाँ आबि प्रणत कपि रहल । देखइत सीता मनमे कहल ॥३५॥
वानर-रूप धयल दशकण्ठ । हमरा मोहय कारण चण्ठ ॥३६॥
रहलि अधोमुखि विकलि अवाक । रावण-भ्रम सँ कतहु न ताक ॥३७॥
मानिय हमरा जननि न आन । हम रघुपतिक दास हनुमान ॥३८॥
पवनक तनय विनययुत जानि । सज्जन थिकथि हृदय अनुमानि ॥३९॥

भावार्थः

सीता अशोकक डार्हि पकड़ि ठाढ़ छलिह । ओ सब बात सुनलिह आ सोचय लगलिह – “ई परिचित कथा के सुना रहल अछि ? आँखि सँ ओकरा देखितहुँ, मुदा आँखि सँ त अगबे नोरक धार बहि रहल अछि । दुःख एतबा अपार अछि जे निन्द तक नहि अबैत अछि । ई तँ आकाश सँ हमर हितक वाणी सुना रहल अछि । ई तँ अमृत-समान वचन सुनाकय मरितो-मरितो हमर प्राण बचा लेलक । एहेन वचन सुनेनिहार दया करथि आ दर्शन देथि, पुण्यवान लोकनिक समाज मे ओ समुचित यश पाबथि ।” फेर सीताजी अपन हृदय मे श्री रघुनन्दन राम केँ राखिकय ओहि सुन्दर वचन सुनेनिहार (हनुमानजी) केँ शञ्च-शञ्च (मनहि-मन) प्रणाम कयलिह ॥२७-३२॥

हनुमानजी सीताजीक वचन सुनलनि आ कलविङ्क पंछी (बगरा, गोरैया, चटक) जेहेन छोट रूप मे हुनकर सोझाँ प्रकट भ’ गेलाह । हुनकर पीतवर्ण (पियर रंग) केर शरीर मे मुखमंडल अतिशय लाल रंग केर रहनि । हाथ जोड़ने रहथि । मन मे भारी हर्ष भरल रहनि । हनुमानजी सोझाँ आबि प्रणत (प्रणाम करैत सिर झुकाकय) ठाढ़ भ’ गेलाह । हुनका देखिते सीताजी मन मे सोचय लगलिह – “हमरा मोहित करबाक वास्ते चण्ठ रावण वानरक रूप धारण कयलक अछि ।” एना सोचिकय सीता घबरायल-सन मुँह झुकेने चुपचाप ठाढ़ रहलिह । रावणक भ्रम मे कतहु ताकियो नहि रहल छलिह । तखन हनुमान कहलनि – ‘हे माता, हमरा आन नहि बुझब । हम रामक दास हनुमान छी ।” फेर सीता पवनसुत हनुमान केँ विनीत देखिकय ई अनुमान कयलिह जे ई सज्जन छथि, आ तखन कहलिह – ॥३२-३९॥

।दोहा।

शाखामृग निश्चय अहाँ, हमरा मन विश्वास ॥४०॥
नर-वानर-संघटन-विधि, कारण करू प्रकाश ॥४१॥

अहाँ वानर छी से विश्वास त हमरा भ’ गेल, मुदा ई कहू जे नर आ वानर बीच ई मेल कोन तरहें भेल ? ॥४०-४१॥

।चौपाइ।

दूर-स्थित कहलनि हनुमान । जननि कहब हम वचन प्रमाण ॥४२॥
लक्ष्मण-सहित राम घनश्याम । धनुर्बाण धर छवि अभिराम ॥४३॥
ऋष्य-मूक लग अयला जखन । दृष्टि पड़ल सुग्रीवक तखन ॥४४॥
हमरा ततय पठौलनि विकल । इष्ट अनिष्ट बुझू विधि सकल ॥४५॥
इष्ट मानि मन दूनू भाय । लय गेलहुँ हम काँध चढ़ाय ॥४६॥
अचल सख्य सुग्रीवक सङ्ग । थोड़बहि दिन मे सङ्कट भङ्ग ॥४७॥
रामक कर-शर बालिक मरण । भव-जलनिधि बाली सन्तरण ॥४८॥
से सुग्रीव पठाओल दूत । दशदिश वानर वीर बहूत ॥४९॥
चलयित कहलनि श्रीरघुनाथ । कार्य्य-सिद्धि कपि अहँइक हाथ ॥५०॥
सानुज हमर कुशल सम्भाषि । देव मुद्रिका आगाँ राखि ॥५१॥
रामक चर प्रभु-मुद्रा सङ्ग । रावण-गण मन कीट पतङ्ग ॥५२॥
यहि मे तनिक लिखल अछि नाम । देल चिन्हारय कारण राम ॥५३॥

भावार्थः

दूरे ठाढ़ हनुमानजी उत्तर देलनि – “हे माता, हम प्रामाणिक वचन (पक्का बात) कहैत छी । धनुष-बाण लेने मेघ समान श्याम-सुन्दर राम लक्ष्मण-सहित जखन ऋष्यमूक पर्वत लग अयलाह तखन सुग्रीवक दृष्टि हुनका पर पड़लनि । ओ विकल (घबरायल) भ’ कय हमरा हुनका लग पठौलनि जे हम नीक जेकाँ बुझि आबी जे ई इष्ट (हितकर) छथि या अनिष्ट (अहितकर) छथि । हम अपन मन मे दुनू भाइ केँ इष्ट (हित) मानिकय अपन कान्ध (कन्हा) चढ़ाकय लय गेलहुँ । हुनका सुग्रीवक संग अचल संग (गहींर मित्रता) भ’ गेलनि आ कनिकबे दिन मे सुग्रीवक भारी संकट दूर सेहो भ’ गेलनि । रामक हाथक बाण सँ बालिक मरण भेल आ ओ भव-सागर पार उतरि गेलाह । वैह सुग्रीव अनगिनत वानर सब केँ दूत बनाकय दसों दिशा मे पठौलनि अछि । विदा होइत समय रामजी हमरा सँ कहने रहथि – ‘हमर काज अहींक हाथ सँ सिद्ध होयत । सीता केँ सानुज (लक्ष्मण-सहित हमर) कुशल सुनेबनि आ ई मुद्रिका आगू राखि देबनि । हम रामक दूत छी आ प्रभुक देल निशानी (मुद्रा-अंगूठी) हमरे लग अछि । हम रावणक दल केँ कीड़ा-फतिंगा बुझैत छी । एहि मुद्रा मे रामक नाम लिखल अछि । से राम चिन्हारय (निशानी) रूप मे देलनि अछि ॥४२-५३॥

।षट्पद।

निर्धन करथि कुवेर, कुवेर करथि प्रभु निर्धन ॥५४॥
जे चाहथि से करथि, देव कौशल्या-नन्दन ॥५५॥
हम आयल छी सिन्धु फानि, देखल लङ्का-भट ॥५६॥
हमरहु ई सामर्थ्य, दशानन मारी चटपट ॥५७॥
लेल जाय प्रभु-मुद्रिका, मानी जनु किछु आन मन ॥५८॥
प्रणत ठाढ़ दय मुद्रिका, हाथ जोड़ि रहला तखन ॥५९॥

भावार्थः

चाहथि त कुबेर केँ निर्धन बना देथि आ निर्धन केँ कुबेर बना देथि । कौशल्याक पुत्र राम जे चाहथि से कय सकैत छथि । हम समुद्र फानिकय आयल छी । लंकाक सैनिक सब केँ देख लेलहुँ अछि । हमरहु मे एतेक ताकत अछि जे रावण केँ चटपट मारि दी । रामक देल ई मुद्रिका लेल जाउ आ मन मे कोनो तरहक शंका जुनि करू ।” एतेक कहिकय हनुमानजी हाथ जोड़ने आ माथ झुकौने ठाढ़ रहला ॥५४-५९॥

।चौपाइ।

चिन्हल मुद्रिका माथा धयल । कत विलाप कनइत तत कयल ॥६०॥
कियक कयल रघुवर-कर त्याग । हमरे सन की भेल अभाग ॥६१॥
रमा भवन वन हम अहँ बाट । सभ जनि स्नान कयल एक घाट ॥६२॥
के कर वनिता-जन विश्वास । कहु कहु मुद्रा वचन प्रकाश ॥६३॥
प्राण-दान कपि कयलहुँ आय । मरितहुँ एहिखन सङ्कट पाय ॥६४॥
प्रभुकाँ अहँक सदृश नहि आन । हमरहु भेल विदित अनुमान ॥६५॥
हमरा निकट पठाओल नाथ । देल मुद्रिका अहँइक हाथ ॥६६॥
गञ्जन दुःख देखल प्रत्यक्ष । कहबनि सानुज प्रभुक समक्ष ॥६७॥
दया करथु आबथु रघुनाथ । यम-घर पहुँच शीघ्र दशमाथ ॥६८॥
दुइ मास जखना बिति जयत । नहि जौँ अयोता राक्षस खयत ॥६९॥
कपिपति सहित सैन्य समुदाय । लय आबथु सङ्कट छुटि जाय ॥७०॥
यावत नहि रावण-संहार । तावत हमरा कारागार ॥७१॥
तेहन उपाय करब हनुमान । सत्वर रावण त्यागय प्राण ॥७२॥
मारुत-सुत कह शुनु जगदम्ब । हमरा जयबा धरिक विलम्ब ॥७३॥
ककरा रावण कयल न आट । हुनका यमघर गेलहिँ बाट ॥७४॥
सायुध अयोता लक्ष्मण राम । अहँ काँ लय जयता निज धाम ॥७५॥
पुछल जानकी कहु कहु कीश । कुशल करथु अहँ काँ जगदीश ॥७६॥भावार्थःमुद्रिका चिन्हिकय माथा लगा लेलिह । फेर कतेक विलाप करैत कानय लगलिह । “हे मुद्रिका, अहाँ रामक हाथ कियैक छोड़ि देलहुँ ? कि अहूँ केँ हमरे जेकाँ अभाग्य भ’ गेल ? रामक भवन मे, वन मे आ बाट मे, हम सब एक्के घाट पर स्नान कयल । आब नारी पर के विश्वास कय सकैत अछि ? हे मुद्रिका, अहाँ बाजू आ हमरा साफ-साफ कहू । हे कपि, अहाँ हमर जान बचा लेलहुँ । संकट सँ घबराकय हम एखनहिं मरि जइतहुँ । आब हमरो अनुमान विदित भ’ गेल जे रामक लेल अहाँ-जेकाँ कियो दोसर नहि छन्हि । राम अहाँ केँ हमरा लग पठौलनि आर अहींक हाथ मे ई मुद्रिका देलनि । अहाँ हमर गंजन आ दुःख अपन आँखि सँ देखि लेलहुँ । लक्ष्मण-सहित राम केँ ई सब जानकारी करा देबनि । आब राम दया कय केँ आबथि आ रावण जल्द यमपुर पहुँचय । दुइ मास बीत गेला पर यदि नहि अओता त राक्षस हमरा खा जायत । सुग्रीवक संग सेना लय केँ आबथि, जाहि सँ हमरा संकट सँ त्राण दियाबथि । जाबत धरि रावण मारल नहि जायत ताबत धरि हम कारागार मे रहब । हे हनुमान, अहाँ एहेन उपाय करू जाहि सँ जल्द रावण प्राण त्याग करय ।” हनुमानजी कहलनि – “हे माता, सुनू । हमरा घुरबा मात्र केर देरी अछि । रावण केकरा तबाह नहि कयलक । आब ओकरा यमपुर जेबाके टा छैक । हथियार सहित राम आ लक्ष्मण अओता आ अहाँ केँ वापस लय केँ जेता ।” फेर जानकी पुछलिह – “हे कपि, अहाँ कहू । ईश्वर अहाँ केँ सदिखन कुशल राखथि ॥६०-७६॥।चरणकुल दोहा।

लाँघि समुद्र सहित कपिसेना, सानुज करुणागेह ॥७७॥
अयोता कोन उपाय कहु कपि, हमरा मन सन्देह ॥७८॥

भावार्थः

परम दयालु राम वानरी सेना आ भाइ लक्ष्मणक संग कोन तरहें समुद्र पार कयकेँ आबि सकब, एहि बारे मे हमर मोन मे संशय होइत अछि ।” ॥७७-७८॥

।चौपाइ।

हमरा काँध चढ़ल दुहु बन्धु । अयोता लाँघि अगम्य कि सिन्धु ॥७९॥
सैन्य सहित कपि बालिक भाय । सभकेँ लओता गगन उड़ाय ॥८०॥
से कर रावण सगण विनाश । हुनका नहि रण कालक त्रास ॥८१॥
आज्ञा देल जाय हम जाउ । रावणारि केँ सत्वर लाउ ॥८२॥
देल मुद्रिका परिचय काज । प्रत्यय-पात्र हमहुँ तैँ आज ॥८३॥
परिचायक किछु भेटय तेहन । कहब शुनल देखल अछि जेहन ॥८४॥
चूड़ामणि देल सहित विचार । दीना दीनदयालुक दार ॥८५॥
कागत मसि नहि अछि यहि ठाम । कोटि कोटि कहि देब प्रणाम ॥८६॥
जिबइत छथि जानकि तहि देश । दशमुख विशभुज बस असुरेश ॥८७॥
चित्रकूट गिरि जखन निवास । गुप्त-कथा कहि देब प्रकाश ॥८८॥
शयित छला प्रभु हमरा अङ्क । सुख सुषुप्ति प्रिय काँ निश्शङ्क ॥८९॥
इन्द्रक बालक कालक फेर । काक बनल आयल ओहि बेर ॥९०॥
चरणाङ्गुष्ठ मे चञ्चु प्रहार । अबितहिँ कयलक रहित-विचार ॥९१॥
के दुख देलक अहँकाँ दुष्ट । जगला लगला पूछय रुष्ट ॥९२॥
अपनहुँ देखल तखनहुँ काक । उड़ि उड़ि आबय निर्भय ताक ॥९३॥
चहलक पुन हम मारब लोल । उठल निवारण कारण घोल ॥९४॥
तृणकाँ लय दिव्यास्त्र बनाय । तनिकाँ ऊपर देल चलाय ॥९५॥
देखलनि ज्वलित अबै अछि बाण । कि कहब उड़ला लै के प्राण ॥९६॥
इन्द्रादिक नहि रक्षा कयल । फिरि घुरि पुन प्रभु-शरणे धयल ॥९७॥
त्राहि त्राहि राखू एहि बेरि । करब उपद्रव हम नहि फेरि ॥९८॥
चरण न छोड़ गेल लपटाय । अस्त्र अमोघ वृथा नहि जाय ॥९९॥
इन्द्रक बालक कौआ जाह । एक आँखि कय देबहु कनाह ॥१००॥
काक-स्वरूप ज्ञात संसार । आकृति जेहन तेहन व्यवहार ॥१०१॥
से पौरुष से प्रभु रघुनाथ । अजगुत जिबितहिँ अछि दशमाथ ॥१०२॥
ई शुनि कहल तखन हनुमान । अयोता शीघ्र राम भगवान ॥१०३॥
लङ्का नगरी सकल उजारि । जयता घर घुरि रावण मारि ॥१०४॥

भावार्थः

हनुमानजी कहलनि – “दुनू भाइ हमर कन्धा पर सवार भ’ समुद्र नाँघिकय आबि जेता । हमरा लेल समुद्र अगम्य नहि अछि । बालिक भाइ सुग्रीव सेना-सहित सब केँ आकाश-मार्ग सँ उड़ाकय लय अओता । ओ सदल-बल रावणक नाश करता । युद्ध मे हुनका कालहु केर डर नहि होइत छन्हि । आज्ञा देल जाउ जे हम जल्दी जाय आ रावणक शत्रु राम केँ शीघ्र लय आनी । पहिचानक लेल राम हमरा मुद्रिका देलनि जे आइ हम अपनेक विश्वासपात्र भेलहुँ । एहिना कोनो पहिचानक वस्तु हमरा देल जाउ । हम राम केँ ई सब बतेबनि जेना हम एतय देखलहुँ आ सुनलहुँ अछि ।” ई सुनिकय दीनदयालु रामक दीन पत्नी मोन मे विचार कय केँ हनुमान केँ अपन टीका उतारिकय देलिह आ कहलिह – “एतय कागज आ रोसनाइ नहि अछि, तेँ मुंहजबानिये हमर कोटि-कोटि प्रणाम कहबनि । आर कहबनि जे जानकी ओहि देश मे जिबैत छथि जेतय दस मुंह आ बीस भुजा वला राक्षसराज रावण रहैत अछि । जखन हम सब चित्रकूट रहैत छलहुँ, ताहि समयक एकटा घटना हुनका याद करा देबनि । राम हमर अंक (कोरा) मे सुतल रहथि । ओ निःशंक भ’ सुखपूर्वक निद्रा मे लीन रहथि । काल केर फेर मे पड़िकय इन्द्रक बेटा जयन्त ताहि समय कौआक रूप धारण कय ओतय आयल । ओ बिना सोचने-विचारने हमर पैरक औंठा मे लोल मारलक । रामक निन्द टुटि गेलनि आ ओ क्रोधित भ’ पूछय लगलाह – “कोन दुष्ट अहाँ केँ ई कष्ट देलक ?” हम स्वयं सेहो देखलहुँ, ओ कौआ तखनहुँ निडर भ’ कय देखिते बेर-बेर उड़ि-उड़िकय अबैत छल । ओ दोबारा लोल मारय चाहलक । रोकलो पर ओ हुड़दंग मचबय लागल । तखन राम एकटा तिनका (तृण – घास) उठौलनि आ ओकरे दिव्य अस्त्र बनाकय ओहि कौआ पर छोड़ि देलनि । कौआ देखलक जे ज्वालामयी बाण आबि रहल अछि, कि कहू, देखिते देरी प्राण बचबय लेल ओ भागल । इन्द्र आदि देवता सेहो ओहि बाण सँ ओहि कौआक रक्षा नहि कय सकलाह । फेर ओ घुमिकय रामक शरण मे आबि खसल । कहलक – “त्राहिमाम ! एहि बेर हमरा बचा दिअ । फेर हम कहियो एहेन उपद्रव नहि करब ।” ओ रामक पैर सँ लिपटि गेल आ छोड़ैत नहि छल । मुदा रामक अस्त्र तँ बेकार जायवला नहि छल । राम कहलनि – “हे इन्द्रक पुत्र काक, तूँ जो । तूँ एकटा आँखि सँ कनाह भ’ जेमें । तूँ कौआक रूप मे संसार मे प्रख्यात भ’ जेमें । तोहर जेहने खराब सुरत छौक, तेहने खराब आचरणो हेतौक । पौरुष वैह अछि, राम वैह छथि, मुदा आश्चर्यक बात अछि जे रावण एखन धरि जिबिते अछि ।” ई सुनिकय हनुमानजी कहलनि – “भगवान राम शीघ्रहि अओता । सारा लंकापुरी केँ उजाड़िकय आ रावण केँ मारिकय घर लौटता ।” ॥७९-१०४॥

।दोहा।

कहल जानकी अहिँक सन, कपिदल सूक्ष्म-शरीर ॥१०५॥
युद्ध असम्भव असुर सौँ, नहि होइछ मन थीर ॥१०६॥

भावार्थः

जानकी कहलनि – “वानरक सेना मे त सब वानर अहीं जेकाँ अत्यन्त छोट-छोट आकारक होयत । राक्षस सभक संग ओकरा लोकनिक युद्ध असम्भव बुझि पड़ैत अछि । यैह चलते हमरा मोन मे विश्वास नहि होइत अछि ।” ॥१०५-१०६॥

।कुण्डलिया।

शुनइत सीता-वचन कपि, पूर्व्व-रूप बनि गेल ॥१०७॥
कनक-शैल-संकाश-तन, मन अति हर्षित भेल ॥१०८॥
मन अति हर्षित भेल, कहल सभ गुण अहँ आगर ॥१०९॥
मेरु सदृश अहँ मथित, करब रावण-बल-सागर ॥११०॥
देखति राक्षस लोक, एखन धरि नहि अछि जनइत ॥१११॥
कुशल प्रभुक तट जाउ, कहब जे छल छी शुनइत ॥११२॥

भावार्थः

सीताजीक ई बात सुनितहि हनुमानजी फेर अपन पिछला रूप धारण कय लेलनि । हुनकर शरीर सोनाक पर्वत समान भ’ गेलनि । ई देखिकय सीता हर्षित भ’ गेलिह । हुनकर मोन हर्षित भ’ गेलनि आ ओ कहली – “अहाँ सब गुणक खजाना छी । रावणक सेना रूपी समुद्र केँ मेरु जेकाँ मथि देब । राक्षस सब, जे एखन धरि अहाँक अयबाक बात नहि बुझलक अछि, ओहो सब (अहाँक अद्भुत बल केँ) देख लेत । अहाँ कुशलपूर्वक प्रभु राम लग जाउ आ जे किछु सुनलहुँ अछि, हुनका सुनाउ ।” ॥१०७-११२॥

हनुमानजीक बगीचा मे जा कय फल खेनाय आ गाछ तोड़नाय आ मेघनाद द्वारा बाँधल गेनाय

।कवित रूपक घनक्षरी।

बड़ हम भूषल चलल नहि जाइ अछि ॥११३॥
आज्ञा देल जाय जाय फल किछु खा लेब ॥११४॥
‘चन्द्र’ भन रामचन्द्र-चरण-भरोस मन ॥११५॥
अपनैँक पदधूरि माथ मे लगाय लेब ॥११६॥
चलल प्रबल पवमान हनुमान वीर ॥११७॥
मनमे कहल फल खाय केँ अघाय लेब ॥११८॥
प्रभुक विमुख दश-मुखक सन्मुख जाय ॥११९॥
शूरता देखाय नाम अपन बजाय लेब ॥१२०॥
तड़पि तड़पि तत तरु तड़ तड़ तोड़ि ॥१२१॥
रोक के अशोक-वर-वाटिका उजाड़ि देल ॥१२२॥
रहल न चैत्य तरु महल ढहल कत ॥१२३॥
सीताक निवास शिंशपाक तरु छाड़ि देल ॥१२४॥
पकड़ पकड़ कपि जाय न पड़ाय कहूँ ॥१२५॥
कहल तनिकाँ मारि पृथिवी मे पाड़ि देल ॥१२६॥
लङ्कापुर जाय जहाँ सङ्गी न सहाय ॥१२७॥
तहाँ मारुत-नन्दन रौद्र वीरता उघाड़ि देल ॥१२८॥

भावार्थः

हनुमानजी कहलनि – “हे माता, हम बड भुखल छी । भूख सँ आब चलल नहि जाइत अछि । आज्ञा हो त बगिया मे जाकय किछु फल खा ली । चन्द्र कवि कहैत छथि, मोन मे रामक चरणक भरोसा अछि । अहाँक चरणक धूलि माथ मे लगा लेब ।” एतेक कहिकय प्रबल वायुक समान वीर हनुमान चलि पड़लाह आ मोन मे सोचलनि जे “जी भरिकय फल खायब । रामक शत्रु रावणक सम्मुख जाकय शूरता देखाय अपन नाम कय लेब ।” एतबा सोचिकय हनुमानजी फाँग लगा-लगा तड़ातड़ गाछ सब तोड़य लगलाह । के रोकि सकैत छल ! ओ सुन्दर अशोक वाटिका केँ उजाड़ि देलनि । एतय एकहु टा चैत्य (जिबैत) गाछ नहि बचल । अनगिनत महल सब ढहि गेल । केवल ओ शीशम केर गाछ छोड़ि देल गेल जेतय सीता टिकल छलिह । जे रक्षक ‘पकड़ ! वानर केँ पकड़ ! कतहु भागि नहि जाय ।’ एहि तरहें कहिते आयल, ओकरा मारि-मारिकय धरती पर लेटा देलनि । कोनो संगी या मददगारक बिना लंकापुरी जाय केँ पवनसुत हनुमान अपन भयानक वीरता देखा देलनि ॥११३-१२८॥

।चौपाइ।

विकटा-गण मन गेलि डराय । कल कौशल सीता लग जाय ॥१२९॥
कहु कहु जानकि कपि निर्भीक । बुझला जाइछ थिकथि अहीँक ॥१३०॥
बजइत छलहुँ कलपि किछु शञ्च । चुप चुप कयल कि अहाँ प्रपञ्च ॥१३१॥
हमरा त्रास अहाँ निस्त्रास । मन मे जनु दृढ़ भय गेल आश ॥१३२॥
कनइत छलहुँ भेलहुँ अछि चूप । देखि पड़ आनन हर्षक रूप ॥१३३॥
जानकि कहू करी जनु लाथ । कहिया अओता पति रघुनाथ ॥१३४॥
सभ जनि शुनु विपतलि की बाज । थिक प्रपञ्च किछु राक्षस-राज ॥१३५॥
अपनहिँ सभहिँ कहू की थीक । राक्षस माया-ज्ञान अधीक ॥१३६॥
राक्षसि-दशा कहल की जाय । गमहि गमहि सभ गेलि पड़ाय ॥१३७॥

भावार्थः

विकटा आदि राक्षसी सब डरा गेल आ धीरे सँ सीता लग जाकय पूछय लागल – “जानकी, कहू त ई बन्दर जे बड़ा निडर बुझाइत अछि, अहींक छी की ? अहाँ त बिलखि-बिलखि कय धीरे-धीरे बजैत छलहुँ । चुपेचाप कोनो चाइल त नहि रचि देलहुँ अछि ? हम सब त डरा गेल छी, मुदा अहाँक डर हेरा गेल अछि । लगैत अछि अहाँक मोन मे पक्का कोनो आशा जागि गेल अछि । अहाँ कनैत रहैत छलहुँ, आब चुप भ’ गेल छी । अहाँक चेहरा पर हर्षक आभास देखाय दैत अछि । हे जानकी, कहू, हमरा सब सँ नुकाउ जुनि । अहाँक पति राम कहिया आबयवला छथि ?” सीताजी उत्तर देलनि – ‘सब गोटे सुनू । विपत्ति मे फँसल लोक हम कि बाजू ? ई राक्षसराज रावणक किछु प्रपंच बुझि पड़ैत अछि । अहीं सब बता सकैत छी जे कि बात छैक ? राक्षसे लोकनि केँ मायाजाल केर ज्ञान बेसी रहैत छन्हि ।” राक्षसी सभक जे हालत भेलनि से कि कहू ? धीरे-धीरे ओ सब परा जाय गेलिह ॥१२९-१३७॥

।दोहा।

सीता कारागार मे, यामिक दनुजी जानि ॥१३८॥
दशमुख पुछलनि कह कुशल, भयभीता अनुमानि ॥१३९॥

भावार्थः

सीता कैद मे छथि आ राक्षसी सब पहरा करयवाली छथि । से जानिकय रावण हुनका सब केँ डरायल जेकाँ देखि पुछलनि – ॥१३८-१३९॥

।दोबय छन्द।

त्रास देखाय करू वश सीता, कहल भेल की अयलहुँ ॥१४०॥
सीताकाँ एकसरि की त्यागल, एको जनि उचित न कयलहुँ ॥१४१॥
दशमुख-वचन शुनल से कहलनि, सेवा कयल अघयलहुँ ॥१४२॥
मर्क्कट एहन विकट नहि देखल, लय लय प्राण पड़यलहुँ ॥१४३॥
रक्षक मध्य एको जन नहि छथि, तनिके वार्त्ता लयलहुँ ॥१४४॥
सकल अशोक वाटिका उजड़ल, सीता निकट नुकयलहुँ ॥१४५॥
राजकीय पन्थैँ के सञ्चर, उबटे पथ धय अयलहुँ ॥१४६॥
सीता त्रास देखाबय गेलहुँ, अपनहिँ त्रासित भेलहुँ ॥१४७॥

भावार्थः

“हम त कहने रहियौ जे डरा-धमकाकय सीता केँ राजी कर । फेर कि भेलौक जे एतय अयलें हँ ? सीता केँ अकेले छोड़ि देलहिन, कियो ओतय नहि रहलें, ई अनुचित कयलें ।” रावणक बात सुनि ओ सब कहलक – “हम सब सेवा करैत-करैत आजिज भ’ गेलहुँ । एहेन डरावना बन्दर हम सब कहियो नहि देखलहुँ । हम सब जान बचाकय भागि आयल छी । रक्षक सब मे एकहु टा ओतय नहि रहल । ओकरे सभक हाल कहय हम सब एतय आयल छी । समूचा अशोक वाटिका उजड़ि गेल । हम सब सीता लग जाकय नुका गेलहुँ । राजमार्ग सँ चलबाक साहस के करत ? तेँ हम सब बेरस्ते आयल छी । हम सब सीता केँ त्रस्त करय चललहुँ आ स्वयं त्रस्त भ’ गेल छी ॥१४०-१४७॥

।पादाकुल दोहा वा।

सीता मन आनन्दित देखल, पुछलैँ कयलनि लाथ ॥१४८॥
हुनकर रङ्ग तेहन सन देखल, लङ्का-जय जनु हाथ ॥१४९॥
निर्भय कपि की सहजहिँ जायत, भिड़ता से मरताह ॥१५०॥
कालरूप कपि सङ्गर भेलैँ, नहि घर केओ घुरताह ॥१५१॥

भावार्थः

सीताक मोन बहुत प्रसन्न देखलहुँ । पुछला पर ओ बहाना कय देलिह । हुनकर रंग एहेन देखाय देलक मानू लंका विजय हुनकहि हाथ मे हो । ई निडर वानर एहिना नहि हँटत । जे ओकरा सँ भिड़त से मरत । ई वानर त बुझू काल बनिकय आयल अछि । लड़ाइ भेला पर जिन्दा कियो नहि घर घुरत ॥१४८-१५१॥

।घनाक्षरी।

जानकी निकट हम जायब कि घूरि पुन ॥१५२॥
कनक-भूधर सन वानर विशाल से ॥१५३॥
काँच ओ पाकल फल एको न बचल हाय ॥१५४॥
खाय सभ गेल कत गोट मुह गाल से ॥१५५॥
आयल कहाँ सौँ कहाँ छल हम देखल न ॥१५६॥
बाल दिनकर सन बड़ मुह लाल से ॥१५७॥
देखू दशभाल की अशोक-वन हाल भेल ॥१५८॥
मरि गेल रक्षक बेहट्ट कपि काल से ॥१५९॥

भावार्थः

आब हम सब फेर घुमिकय जानकी लग नहि जायब । ओ वानर त सोनाक पहाड़-जेकाँ विशाल अछि । काँच आ कि पाकल, एकहु टा फल नहि बचल । ओ सबटा फल खा गेल । कतेक पैघ ओकर मुँह आ गाल छल ! ओ कतय सँ आयल आ कतय नुकायल छल, हम सब किछु नहि देखलहुँ । ओकर मुँह उदयकाल केर सूर्य समान लाल छल । हे रावण, देखू, अशोक वाटिकाक कि हाल भ’ गेल अछि ? रखवार मरि गेल आ ओ बन्दर काल-जेकाँ अडिग अछि ।” ॥१५२-१५९॥

।दोबय छन्दः।

शुनितहिँ शीघ्र पठाओल सेना, बहुत विकट भट गेला ॥१६०॥
लोहदण्ड-धर जहँ उदण्ड कपि, तनिकर सन्मुख भेला ॥१६१॥
सिंहनाद कय सभकाँ मारल, नहि रण मे कपि हारल ॥१६२॥
अर्द्ध-मरण सम भेल कतो जन, रावण निकट पुकारल ॥१६३॥
महाकार वानर-तन धयलनि, लङ्का-नाशक कारण ॥१६४॥
क्षणमे विपिन अशोक उजाड़ल, फल-चय कयलनि पारण ॥१६५॥
साहस लङ्का निर्भय आयल, के करताह निवारण ॥१६६॥
लङ्कापति अपनहुँ चलि देखू, की थिक करु निर्धारण ॥१६७॥

भावार्थः

सुनितहि रावण तुरत सेना पठेलक । बहुते रास बड़का-बड़का योद्धा सब गेल । ओ योद्धा सब ओतय पहुँचल जेतय लोहाक डंटा लेने उद्दंड हनुमान रहथि । ओ सब हुनकर सोझाँ आयल । सिंह समान दहाड़िकय हनुमान सब केँ मारि देलनि । ओ हारयवला नहि रहथि । कतेको अर्द्धमृत-सन भ’कय भागि रावण लग जाकय चिकरय लागल – “महाकार मानू लंका केँ नाश करबाक लेल वानरक रूप धारण कय लेला अछि । ओ क्षणहि भरि मे अशोक वाटिका केँ उजाड़ि देलक, फल सब चट कय गेल । साहसक संग बिना कोनो डर केँ ओ लंका आबि गेल अछि, ओकरा के रोकि सकैत अछि ? हे लंकापति रावण, अहाँ अपने चलिकय देखू आ गौर करू कि ई के छी ?” ॥१६०-१६७॥

।रूपमाला।

गेल छल सङ्ग्राम किङ्कर, निहत शुनि दशभाल ॥१६८॥
कोप सौँ सत्वर पठाओल, पाँच सेना-पाल ॥१६९॥
स्तम्भ लौहक हाथ लयकैँ, तनिक तेहन हाल ॥१७०॥
कयल मारुत-तनय विजयी, समरमे तत्काल ॥१७१॥
तखन मन्त्रिक सात बालक, युद्ध-उद्यत भेल ॥१७२॥
क्रोध सौँ रावण पठाओल, गेल ईर्ष्या लेल ॥१७३॥
सकल जनकेँ मारि मारुत-तनय पुन तहि ठाम ॥१७४॥
स्तम्भ लौहक अस्त्र एकटा, जितल भल संग्राम ॥१७५॥

भावार्थः

लड़ाइ मे जे सैनिक पठायल गेल रहय ओ सब मारल गेल, ई सुनिकय रावण क्रोधित भ’ उठल आ तुरत पाँच सेनापति केँ पठौलक । ई सेनापति सब लौह-दण्ड हाथ मे लय-लय केँ मैदान मे उतरल । हनुमान लोहाक डंटा सँ ओकरो सभक वैह हाल कयलनि आर ओ लड़ाइ तुरन्ते जीत गेलाह । तखन मंत्री लोकनिक सात बेटा लड़ाईक मैदान मे आयल । क्रोधित भ’ रावण ओकरा सब केँ पठौलनि आर ओ सब ईर्ष्याक संग मैदान मे उतरल । हनुमान एक मात्र अस्त्र लोहाक डंटा सँ ओतय सब केँ मारि देलनि आ लड़ाइ जिति गेलाह ॥१६८-१७५॥

।चौपाइ।

अगुआ चलला अक्षयकुमार । कयल बहुत सेना सहिआर ॥१७६॥
ततय बाट तकितहिँ हनुमान । के पुन अओता जयतनि प्राण ॥१७७॥
अबइत देखल अक्षयकुमार । मनमन मानल हर्ष अपार ॥१७८॥
मुदगर कर लय उड़ल अकाश । सत्वर हिनकर करब विनाश ॥१७९॥
मुदगर लय कर लगले घूरि । रावण-सुतक माथ देल चूरि ॥१८०॥
रणमे माँचल हाहाकार । मुइला मुइला अक्षयकुमार ॥१८१॥
कन्नारोहट उठ बड़ घोल । लड़त कहाँ के भभरल गोल ॥१८२॥
सेना लड़ि लेलक भरिपोष । के सह मारुत-नन्दन-रोष ॥१८३॥
वार्ता विदित भेल दरबार । नहि छथि जिबइत अक्षयकुमार ॥१८४॥
शुनि रावणमन पैशल शोक । बाहर हल भल बुझय न लोक ॥१८५॥
छल छथि अतिबल प्रबल प्रताप । रावण सन जनिकाँ छथि बाप ॥१८६॥
मेघनाद सन जनिकाँ भाय । वानर-हाथ मरण अन्याय ॥१८७॥
लङ्कापति-मन कोप अपार । मेघनाद सौँ कयल विचार ॥१८८॥
कय बेरि बजला भेल अन्धेरि । हम अपनहिँ जायब एहि बेरि ॥१८९॥
अक्षयकुमारक अरि जहिठाम । ततय जाय जीतब सङ्ग्राम ॥१९०॥
मारब अथवा बाँधब जाय । अहँइक लग हम देब पहुँचाय ॥१९१॥
मेघनाद कहलनि शुनु तात । वानर कयलक अछि उतपात ॥१९२॥
शोक-वचन जनु बाजल जाय । हम जिबइतछी अक्षयक भाइ ॥१९३॥
आनब अपनैक निकट बझाय । हमर पराक्रम देखल जाय ॥१९४॥

भावार्थः

तखन अक्षयकुमार (स्वयं राक्षसराज रावणक बेटा) भारी सेना सजाकय चलल । ओम्हर हनुमान बाट ताकि रहल छलथि जे आब के अबैत अछि आ प्राण गमबैत अछि ? अक्षयकुमार केँ अबैत देखि हनुमान मनहि-मन खूब प्रसन्न भेलाह । ओ हाथ मे मुग्दर लय आकाश मे उड़ि गेलाह जाहि सँ तुरन्त एकर अन्त कय देथि । मुग्दर हाथ मे लेने तुरन्त आकाश सँ उतरलाह आ रावणक पुत्र अक्षयकुमार केर माथा केँ चकनाचूर कय देलनि । रणभूमि मे हाहाकार मचि गेल जे अक्षयकुमार मारल गेल । सर्वत्र करुण क्रन्दनक आवाज पसैर गेल । के कतय लड़ैत अछि ? सेनाक दल मे भगदड़ मचि गेल । सेना अपन ताकत भरि लड़िकय हारि गेल । हनुमानक तामश के बरदाश्त कय सकैत छल ? एहि बातक खबरि रावणक दरबार मे पहुँचल जे अक्षयकुमार जिन्दा नहि रहल । सुनितहि रावणक मोन मे शोक समा गेल मुदा बाहर सँ ओ गम्भीर बनल रहल, जाहि सँ लोक ओकर शोक केँ नहि बुझि सकय । अक्षयकुमार परम बलवान आ प्रबल पराक्रमी छल । जेकरा रावण-जेहेन पिता हो आ मेघनाद-जेहेन भाइ हो ओकर मृत्यु वानरक हाथे हो ई बड़ा गड़बड़ भेल । लंकेश्वर रावण केर मोन मे भारी क्रोध आबि गेलैक । ओ मेघनाद सँ विचार-विमर्श कयलक । रावण कतेको बेर बाजल – “घोर अन्हेर भ’ गेल । एहि बेर हम अपनहिं जायब । जेतय अक्षयकुमारक शत्रु अछि ओतय जाकय युद्ध मे विजय प्राप्त करब । या त मारि देबैक या बाँधिकय तोरे लग पहुँचा देब ।” ई सुनिकय मेघनाद कहलक – “हे पिताजी सुनू । वानर बड उतपात (उपद्रव) कयलक अछि । शोकवश अहाँ एना जुनि बाजू । अक्षयकुमारक भाइ मेघनाद हम जिबिते छी । हम ओहि वानर केँ बाँधिकय अहाँ लग आनब । अहाँ हमर पराक्रम देखू ।” ॥१७६-१९४॥

।चरणाकुल दोहा।

ई कहि रथ चढ़ि राक्षस भट लय, मेघनाद चललाह ॥१९५॥
मारुत-नन्दन शत्रु-निकन्दन, कपिवर जतय छलाह ॥१९६॥

भावार्थः

एतेक कहिकय मेघनाद रथ पर सवार भ’ राक्षस योद्धा सब केँ संग लय केँ ओतय चलि पड़ल जेतय शत्रु केँ संहार करयवला पवनसुत हनुमानजी छलथि ॥१९५-१९६॥

।चौपाइ।

की रावण रावण-सन आन । अबइछ होइछ मन अनुमान ॥१९७॥
गरजल गरुड़ जकाँ नभ जाय । स्तम्भ महागोट हाथ उठाय ॥१९८॥
घुमइत गगन छला हनुमान । रावण-पुत्र चलौलक बाण ॥१९९॥
आठ हृदयमे माथा पाँच । युगल चरण मे छयो नाराच ॥२००॥
पुच्छ मध्य मारल एक बाण । मारि कयल धुनि सिंह-समान ॥२०१॥
कोप-विवश मारुत-सुत घूरि । रथ घोड़ा सारथि देल चूरि ॥२०२॥
दोसर रथ चढ़ि आयल फेरि । कहल तोहर दुर्गति यहि बेरि ॥२०३॥
नहि जीतव मन बूझल जखन । ब्रह्मास्त्रैँ कपि बाँधल तखन ॥२०४॥
ब्रह्मास्त्रक कपि राखल मान । अपनहि बझला मन किछु आन ॥२०५॥
बाँधल बाँधल भय गेल सोर । यहन विश्व नहि घाती चोर ॥२०६॥
बाँधल अछि लय चलु दरबार । करब तेहन जे दशक विचार ॥२०७॥
जीवन्मुक्त थिकथि हनुमान । कि करत तनिका बन्धन आन ॥२०८॥
राम-चरण-पङ्कज मन धयल । मारुत-सुत बड़ लीला कयल ॥२०९॥

भावार्थः

ओम्हर हनुमानजी मेघनाद केँ अबैत देखि सोचय लगलाह – एकरा अबैत देखि लगैत अछि जे या त ई स्वयं रावण या रावणहि समान कियो आर छी । फेर हाथ मे एकटा बहुत बड़का खम्भा उठौलनि आ गरुड़ जेकाँ आकाश मे उड़ि गेलाह आ गर्जन कयलनि । हनुमान आकाश सँ नीचाँ दिश घुरिये रहल छलथि कि रावणक पुत्र मेघनाद बाण चलौलक । आठ गोट बाण हुनकर हृदय मे लगलनि, पाँच टा माथा मे आ छः-छः टा दुनू पैर मे । एकटा बाण हुनकर पूँछ मे लगलनि । एहि प्रकारे बाण मारिकय मेघनाद सिंहगर्जन कयलक । हनुमानजी तामश करैत आकाश सँ घुरलाह आ मेघनादक रथ, घोड़ा आ सारथी केँ चूर-चूर कय देलनि । फेर मेघनाद दोसर रथ पर चढ़िकय आयल आ बाजल – “एहि बेर तोहर दुर्दशा हेतौक ।” जखन मेघनाद केँ ई बुझा गेलैक जे लड़ाइ मे जिति नहि सकब, तखन ओ ब्रह्मास्त्र चलाकय हनुमानजी केँ बाँधि देलक । हनुमानजी ब्रह्मास्त्रक मान रखलनि आ मोन मे किछु आर बात सोचिकय अपने-आप ओहि मे बँधा गेलाह । शोर मचि गेल – बन्हलहुँ ! बन्हलहुँ ! मेघनाद बाजल – “एहेन विनाशकारी चोर त दुनिया भैर मे नहि छल । एकरा बान्हि लेलहुँ अछि । लय चलू रावणक दरबार मे । ओतय दस लोकक जेहेन विचार होयत तेना कयल जायत ।” हनुमान तँ जीवनमुक्त छथि, हुनका आर कियो कि बाँधि सकत ? तखन हनुमान मन मे रामक चरण-कमल केर ध्यान कयलनि आ अजब लीला कयलनि ॥१९७-२०९॥

।इति श्री चन्द्रकवि विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे सुन्दरकाण्डे तृतीयोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे सुन्दरकाण्डक तेसर अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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