स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण
किष्किन्धाकाण्ड – नवम अध्याय
हनुमानजी केँ लंका विदाह करब
।चौपाइ।
सम्पातिक सभ जनमल पाँखि । सभ जन वानर देखल आँखि ॥१॥
ओ खग मुदित गगन-पथ गेल । वानर सभ मन हर्षित भेल ॥२॥
दुर्ग्ग जलधि सन्तरण विचार । अछि अगम्य के जायत पार ॥३॥
अङ्गद कहल अहाँ सभ गोट । प्रबल शूर सभ सुयश न छोट ॥४॥
राज-काज मन दय के करत । ई जलनिधि कहु कहु के तरत ॥५॥
रघुपति कपिपति पालक हयत । निर्भय लङ्का-पुर जे जयत ॥६॥
शुनल सर्व्व जन रहल अवाक । सबक परस्पर मुह सभ ताक ॥७॥
उचित न यहि अवसर चुपचाप । कहक अपन बल करक प्रताप ॥८॥
वानर सकल अपन बल कहल । अभ्यन्तर किछु गड़बड़ रहल ॥९॥
तखन कहल अङ्गद युवराज । लङ्का जाय करब प्रभु-काज ॥१०॥
शतयोजन जलनिधिकाँ फानि । जायब मनमे होइछ हानि ॥११॥
किछु गड़बड़ सन घुरती बेरि । आयब शीघ्र कि लागत देरि ॥१२॥
जाम्बवान बजला बड़ वृद्ध । नहि युवराज दूत परसिद्ध ॥१३॥
हम अति वृद्ध करब की जाय । हम मँगितहुँ नहि एक सहाय ॥१४॥
बलि-वञ्चन वामन-अवतार । भेल तखन हम छलहुँ कुमार ॥१५॥
बढ़इत देल प्रदक्षिण सात । अगणित योजन प्रबह बसात ॥१६॥
कि करब काज जरासौँ ग्रस्त । करितहुँ नहि ककरो मन व्यस्त ॥१७॥
अङ्गद शोच करू जनु चित्त । से छथि सङ्गहिँ कार्य्य निमित्त ॥१८॥
कहलनि तखन शुनू हनुमान । यहन काज के करता आन ॥१९॥
हरता रघुवर धरणी-भार । तनिक सहाय अहँक अवतार ॥२०॥
जहि लय उतपति से दिन आज । की विलम्ब सत्वर करु काज ॥२१॥
जन्ममात्र दिनकर फल जानि । गगन गेलहुँ शत योजन फानि ॥२२॥
खसलहुँ भूमि अतुल बल-वीर । व्यथा-लेश नहि भेल शरीर ॥२३॥
उठु उठु करु रघुनन्दन-काज । हमरा सभहिक राखू लाज ॥२४॥
शुनि हर्षित वर्द्धित हनुमान । नाद कयल घन सिंह समान ॥२५॥
सकल सृष्टि फाड़क भ्रम कयल । पर्व्वत सन तन वामन धयल ॥२६॥
भावार्थः
सम्पातिक सबटा पाँखि उगि गेलनि, से सब कपि अपना आँखि सँ देखलनि । पक्षी सम्पाति आकाश-मार्ग सँ उड़िकय चलि गेलाह । कपि सभक मन हर्षित भेलनि । आब दुर्गम समुद्र केँ पार करबाक प्रश्न आयल । ई त अगम्य अछि, एकरा के पार करत । अंगद कहलनि – “अपने सब बड़का-बड़का शूर थिकहुँ । अपने लोकनिक बहुते नाम अछि । राजाक ई काज मन सँ के करय लेल तैयार छी ? एहि समुद्र केँ के पार कय सकैत अछि ? जे निर्भय भ’ लंकापुरी जायत ओ राम आ सुग्रीव दुनू केर रक्षा करयवला होयत ।” सब गोटे सुनलनि आ सुनिकय चुप रहि गेलथि । सब गोटे सभक मुंह ताकय लगलाह । ई देखि अंगद कहलनि – “एहेन अवसर पर चुप्पी सधनाय उचित नहि होयत । सब अपन-अपन बल बताउ जे के कतेक करामात देख सकैत छी ?” सब वानर लोकनि अपन-अपन बल बतौलनि, मुदा बीच मे किछु गड़बड़ी रहि गेल । तखन युवराज अंगद स्वयं कहलनि – “हम लंका जाकय राजा सुग्रीवक काज करब । सौ योजनक समुद्र केँ पार कय जायब, मुदा मोन मे किछु शंका होइत अछि । घुरि आबय मे किछु गड़बड़ लगैत अछि । के कहय, तुरत लौटि सकब या किछु समय लागि जाय ।” ॥१-१२॥
तखन परम वृद्ध जाम्बवान् बजलाह – “युवराज स्वयं दूत बनिकय जाइथ ई परिपाटी नहि अछि । हम त आब बहुते बूढ़ भ’ गेलहुँ, आब करू की ! हम कोनो मददगारो नहि मँगैत छी । वामन अवतारक समय जखन बलि केँ ठकल गेल छलन्हि, ताहि समय हम किशोर रही । ताहि समय हम प्रबह वायुक बीच अनगिनत योजन धरि बढ़ैत-बढ़ैत सात चक्कर लगौने रही । आइ कि करू, बुढ़ापा सँ मजबूर छी । हम केकरहु मोन मे चिन्ता नहि होबय दितहुँ । हे अंगद, अहाँ मोन मे चिन्ता जुनि करू । ई काज जे कय सकैत छथि ओ अपनेक संगहि मे छथि ।” तखन ओ हनुमान सँ कहलनि – “हे हनुमान, सुनू । अहाँ केँ छोड़ि दोसर के अछि जे एहेन काज कय सकैत अछि ? राम धरतीक भार हरता । एहि मे हुनकर सहायता करबाक लेल अहाँक अवतार भेल अछि । जिनका लेल अहाँ जन्म लेलहुँ अछि ओ दिन आइ आबि गेल अछि । आब देरी कियैक, जल्दी ओ काज पूरा कयल जाउ । जन्म होइते अहाँ सूरज केँ पाकल फल बुझिकय आकाश मे सौ योजन कूदि गेल रही । हे अतुलनीय बलवाला वीर, अहाँ ओतय सँ धरती पर खसलहुँ तैयो अहाँक शरीर मे कनिकबो पीड़ा नहि भेल । अहाँ उठू आ रामक काज करू । हमरा सब गोटेक इज्जत बचाउ ।” ॥१३-२४॥
ई सुनिकय हनुमानजी हर्षित भेलाह आ बढ़िकय विशाल बनि गेलाह । ओ सिंह जेकाँ गर्जना कयलनि । एना लागल जेना ओ सारा सृष्टि केँ फाड़ि देने होइथ । छोट-सन अपन शरीर केँ पर्वत-समान बना लेलनि । आर कहलनि – ॥२५-२६॥
।कड़खा छन्दः।
जानकी-जानि-पद हृदय मे ध्यान करि ॥२७॥
सुरभिपद-तुल्य जल-राशिकेँ फानबे ॥२८॥
रोकि शकताह के बाट हम वायुसुत ॥२९॥
प्रवह सौँ अधिक जव-दर्प मन मानबे ॥३०॥
प्रभुक सन्देश कहि स्वामिनी देखि केँ ॥३१॥
शत्रु दशमौलिकेँ बाँधि हम आनबे ॥३२॥
जारि लङ्कापुरी मारि वैरीन्द्र-दल ॥३३॥
सकल जन तखन बल हमर किछु जानबे ॥३४॥
भावार्थः
हृदय मे जानकीपति राम केर ध्यान कय केँ हम समुद्र केँ गाय केर खुर बराबर बुझिकय नाँघि जायब । हमरा रस्ता मे के रोकि सकत ? हम वायुक पुत्र छी । हम अपन मन मे प्रबह वायुओ सँ बेसी बल होयबाक दर्प राखब । हम स्वामिनी सीता केँ खोजिकय प्रभु रामक सन्देश हुनका लग पहुँचायब आ शत्रु रावण केँ बान्हिकय लय आनब । जखन हम लंकापुरी जायब आर शत्रुक दल केँ पछाड़ब, तखन सब लोक हमर बलक किछु आभास पाओत ॥२७-३४॥
।घनाक्षरी।
देखादेखी मध्य हम वारिनिधि फानि फेरि ॥३५॥
सदल सकुल दशवदन केँ मारिकेँ ॥३६॥
समर समक्ष प्रतिपक्ष लक्ष कोन अछि ॥३७॥
पवन प्रतक्ष बल लङ्कापुर जारिकेँ ॥३८॥
“चन्द्र” भन रामचन्द्र परसन हेतु आगाँ ॥३९॥
भूधर-सहित लङ्का धरब उखारिकेँ ॥४०॥
जाम्बवान युवराज कहु की करब काज ॥४१॥
आनि देब बिनु श्रम जनक-कुमारिकेँ ॥४२॥
भावार्थः
देखिते-देखिते (अल्प-प्रयासहि सँ) हम समुद्र फानि जायब आ सेना तथा समस्त कुल सहित दशवदन रावण केँ मारि देब । लड़ाइ मे हमरा सोझाँ लाख शत्रु-सेना कि थिक ? वायु-जेहेन प्रत्यक्ष हम वेग अछि आर हम आगि लगाकय लंकापुरी केँ जरा देब । ‘चन्द्र’ कवि कहैत छथि, रामचन्द्र केँ प्रसन्न करबाक लेल हम पर्वत-सहित लंका केँ उखाड़िकय उठा लेब आ हुनकर सोझाँ मे राखि देब । हे जाम्बवानजी, हे अंगद, कहू कि काज अछि ? हम बिना मेहनत केँ सीता केँ आनि देब ॥३५-४२॥
।चौपाइ।
जाम्बवान अङ्गद मन हर्ष । कि कहब वीरक मन उत्कर्ष ॥४३॥
अँहइ पुरब रघुपति-मन-आश । हमरा सभकाँ दृढ़ विश्वास ॥४४॥
जिबइत सीता छथि देखि लेब । से रघुनन्दन काँ कहि देब ॥४५॥
राम-सहित रण पौरुष करब । समुचित जेहन तेहन अनुसरब ॥४६॥
सतत करथु अहँकाँ कल्याण । व्योम-विहार पिता पवमान ॥४७॥
आशिर्व्वचन कहल पढ़ि मन्त्र । उड़ि चलला हनुमान स्वतन्त्र ॥४८॥
भावार्थः
ई सुनिकय जाम्बवान आ अंगदक मन हर्षित भ’ उठलनि आ बजलाह – “अहाँक वीरताक बड़ाई कि कहू ! हमरा सब केँ पक्का विश्वास भ’ गेल जे अहीँ रामजीक मोनक आशा पूरा करब । सीता जिबैत छथि, ई देख लेब आ ई समाद राम केँ सुना देबनि । राम केँ संग लय केँ रण मे वीरता देखायब । फेर जना उचित होयत तेना करब । आकाश मे विचरण करयवला अहाँक पिता वायु अहाँक सदा कल्याण करथि ।” जाम्बवान आ अंगद मंत्र पढ़ि-पढ़िकय हनुमान केँ आशीर्वाद देलनि आ हनुमान स्वच्छन्द रूप सँ उड़ि चललाह ॥४३-४८॥
।सोरठा।
स्वर्ण-वर्ण मुख लाल, महाफणीन्द्रकार भुज ॥४९॥
महानगेन्द्र विशाल, प्राप्त महेन्द्राचल उपर ॥५०॥
हुनकर मुँह सोना-समान लाल रहनि । हुनकर बाँहि विशाल शेषनाग-सन लम्बा रहनि । हुनकर शरीर पर्वतराज हिमलाय-समान विशाल रहनि । एहेन हनुमान उड़िकय महेन्द्र पर्वत पर पहुँचलाह ॥ ४९-५०॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे नवमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक नवम अध्याय समाप्त भेल।
।कवि प्रार्थना।
।मझोटी।
श्रीमत्करुणावतारमिन्दुखण्डभालम् ।
वन्दे घनसारगौरमाश्रितैणबालम् ॥
परशुवराभीतिकरं व्यालराजमालम् ।
सर्व्वदा प्रसन्नमुखं कालकालकालम् ॥
व्याघ्रचर्मवाससं समस्तविश्वसारम् ।
निर्ज्जरनिवहैः स्तुतं दृशा विनष्टमारम् ॥
पञ्चाननमादिदेवमाधिहं त्रिनयनम् ।
प्रलये जगतां ध्रुवं दयालुतासदनम् ॥
।इति किष्किन्धाकाण्ड।
।किष्किन्धाकाण्ड समाप्त।
आगू – सुन्दरकाण्ड
हरिः हरः!!

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