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मिथिलाभाषा रामायण – किष्किन्धाकाण्ड आठम अध्याय – सम्पाति केर आत्मकथा एवं आध्यात्मिक उपदेश

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स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण

किष्किन्धाकाण्ड – आठम अध्याय

सम्पाति केर आत्मकथा एवं आध्यात्मिक उपदेश

॥अथ अष्टमोऽध्यायः॥

।चौपाइ।

उड़लहुँ हम जटायु दुहु भाय । रवि-रथ रोकब सत्वर जाय ॥१॥
भ्राता युगल अतुल बल मानि । तरुण अवस्था गुणल न हानि ॥२॥
घुरला बन्धु असह्य विचारि । हम नहि मानल मनमे हारि ॥३॥
दिनकर निकट जरल दुहु पक्ष । दिनकर देव-देव परतक्ष ॥४॥
खसलहुँ विन्ध्यगिरिक पाषाण । तीनि दिवस धरि छल अज्ञान ॥५॥
खसलेँ लागल छल बड़ चोट । पक्ष-विहीन भेल मन छोट ॥६॥
बचत जीव शिव कोन प्रकार । विकल सतत मन शोच अपार ॥७॥
सदय महान चन्द्रमा नाम । दुर्ग्गति से मुनि देखल ठाम ॥८॥
ओ परिचित पुछलनि की भेल । पक्ष अहाँक कतय जरि गेल ॥९॥
अपन कहल छल जे अज्ञान । दुःख-मूल केवल अभिमान ॥१०॥
बहुत प्रकार देल सन्तोष । ज्ञान शिषाओल से भरिपोष ॥११॥

भावार्थः

सम्पाति फेर कहय लगलाह – “हम आ जटायु दुनू भाइ आकाश मे सूर्यक रथ रोकय लेल उड़ि चललहुँ । दुनू भाइ अपना केँ अतुल बलशाली मानि तरुण अबस्था मे एकर हानि नहि गानि सकलहुँ (जवानीक जोश मे खतराक भान नहि भ’ सकल ।) भैया (जटायु) सूर्यक तेज असह्य मानि कय घुरि गेलाह, मुदा हम मन सँ हारि नहि मानलहुँ । सूर्यक लग पहुँचिते हमर दुनू पाँखि जरि गेल । भगवान सूर्य प्रत्यक्ष देवता थिकाह । हम विन्ध्य पर्वतक पाथर (चट्टान) पर खसलहुँ । तीन दिन धरि बेहोश रहलहुँ । खसला सँ बड बेसी चोट लागल छल । पाँखि सँ विहीन भ’ गेलहुँ से सोचिकय मोन बहुते छोट भ’ गेल । हम भारी चिन्ता मे पड़ि गेलहुँ; हे शिव, आब कोन तरहें हमर जान बचत ? चन्द्रमा नामक एकटा मुनि, जे अत्यन्त दयालु रहथि, ओतय हमर एहि दुर्गति केँ देखलनि । ओ हमरा सँ परिचित छलथि । पुछलनि – ‘अहाँक पाँखि कतय जरि गेल ?’ हम अपन अपन अज्ञानताक बारे मे हुनका कहलहुँ । दुःखक मूल (कारण) हमर अभिमान छल । मुनि चन्द्रमा हमरा बहुते प्रकार सँ सन्तोष देलनि तथा भरि पोख ज्ञानक शिक्षा सेहो सिखौलनि ॥१-११॥

।षट्पद।

देह-मूल थिक दुःख, देह कर्म्महि सौँ उदभव ॥१२॥
अहं-बुद्धि सौँ कर्म्म, पुरुष देह-स्थित अनुभव ॥१३॥
अहङ्कार जड़ अति अनादि, माया परकासल ॥१४॥
चिच्छायासय्युँक्त तप्त, लोहक सन भासल ॥१५॥
तनिका सौँ ई देह काँ, भेल एकता देह हम ॥१६॥
यहन बुद्धि लय चेतना-सहित देहकाँ विविध भ्रम ॥१७॥

भावार्थः

सबटा दुःखक जैड़ ई शरीर छी । शरीर कर्मक फल केँ भोगबाक लेल होइत अछि । लोक अहंकार सँ कर्म मे प्रवृत्त होइत अछि । शरीर मे जे किछु होइत छैक ओकरे अनुभव पुरुष करैत अछि । अहंकार जैड़ छी, अनादि छी । ओहि सँ मायाक सृष्टि होइत अछि । चैतन्य-स्वरूप जीवतत्त्व सँ संयुक्त भ’ कय अहंकार तप्त लोह जेकाँ चमकैत अछि । ओहि मायाक प्रभाव सँ जीव आ शरीर केर एकताक भान होइत अछि । लोक बुझैछ जे हम जीव ई शरीरे छी । एहि भ्रम केँ पाबिकय देह मे चैतन्यक भ्रम होइत अछि ॥१२-१७॥

।सोरठा।

तनिक मूल संसार, साधक सुख दुख उभय सब ॥१८॥
आत्मा रहित-विकार, मिथ्यातादात्म्यैँ सदा ॥१९॥
हम शरीर कर नर्म्म, कर्म्मक कर्त्ता हमहि सभ ॥२०॥
जीव करथि सभ कर्म्म, तत्फल बाँधल से विवश ॥२१॥
पापपुणयुत भेल, भ्रमित होथि उद्ध्र्बाध नित ॥२२॥
यज्ञ कयल धन देल, सुख-भोक्ता हम स्वर्ग मे ॥२३॥
ई सङ्कल्पाध्यास, भोग कयल चिर स्वर्ग-सुख ॥२४॥
क्षीन-पुण्य सन्त्रास, मर्त्य-लोक मे पुन बसथि ॥२५॥
विधुमण्डल काँ पाबि, शीत सङ्ग ब्रीह्यादि मे ॥२६॥
तखन पुरुष तन आबि, रेतरूप स्त्री-योनि-गत ॥२७॥
योनि-रक्त-संयुक्त, वेष्टित भेल जरायु सौँ ॥२८॥
एक दिवस भेल भुक्त, कलल भेल आरूढ़ पुन ॥२९॥
भेल बुद्बुदाकार, पाँच रातिमे सैह पुन ॥३०॥
सात राति सञ्चार, धयल पेशिताकार काँ ॥३१॥
पनरह दिन बिति जाय, से पेशी शोणित-युता ॥३२॥
राति पचीश बिताय, पेशी सौँ अङ्कुर बनय ॥३३॥

भावार्थः

ई संसार ओहि माया सँ उत्पन्न भेल अछि आर ई संसार सुख व दुःख दुनू उत्पन्न करयवला अछि । आत्मा तँ सदा विकारहीन रहैत अछि । देह आ आत्मा मे अभेदक भ्रम रहैछ । जेना हमहीं शरीर छी, हमहीं सुख-भोग करैत छी, आर सारा कर्म हमहीं करैत छी । सारा कर्म जीव करैत अछि । ओ ओहि कर्मक फल सँ बन्हायल विवश रहैत अछि । ओ पाप आ पुण्यक बोझ अपना माथ पर लेने उपर-नीचाँ भटकैत रहैत अछि । हम यज्ञ कयलहुँ, हम धनक दान कयलहुँ, हम स्वर्ग मे सुख भोगब – एकरा संकल्पाध्यास कहैत छैक । एहि सँ किछु समय स्वर्ग-सुखक भोग त होइत छैक, मुदा एहेन जीव केर पुण्य समाप्त भ’ गेलाक त्रास बनल रहैत छैक आर भोगक अन्त मे पुण्य समाप्त भेला पर ओ मर्त्यलोक मे आबि खसैत अछि । जीव स्वर्ग सँ पहिने चन्द्रमंडल पर अबैत अछि । ओतय सँ ओस-कण केर संग अनाजक गाछ मे अबैत अछि । तखन अनाज खेला सँ पुरुषक शरीर मे प्रवेश करैत अछि आ फेर शुक्राणु बनिकय स्त्रीक योनि मे जाइत अछि । योनि मे रज सँ संयुक्त भ’ जरायु (गर्भक झिल्ली) मे वेष्टित (बन्धित) भ’ जाइत अछि, आर पाँच राति मे बुलबुला जेकाँ भ’ जाइत अछि । सात राति बाद मांस-पेशीक आकार धारण करैत अछि । पन्द्रह दिनक बाद ओहि पेशी मे रक्त भरि जाइत छैक । पचीस राति बितला पर पेशी अंकुराक रूप धारण करैत अछि ॥१८-३३॥

।चौपाइ।

ग्रिवा माथ काँध ओ पीठि । वंश उदर एक मासैँ सृष्टि ॥३४॥
पाणि चरण पाँजर कटि जानु । दुइ मासमे उतपति मानु ॥३५॥
अङ्ग-सन्धि बितला तिनि मास । चारि मास अंगुली-प्रकास ॥३६॥
नाक कान लोचन बनि जाय । मास पाँच काँ समय बिताय ॥३७॥
दन्त-पाँति नह गुह्याधार । पचमा मासेँ होय प्रचार ॥३८॥
नाक कान मे छिद्र प्रकास । बीति जाय जखना षट मास ॥३९॥

भावार्थः

एक मास पूरा भेला पर गरदनि, माथा, कन्धा, पीठ, रीढ़ आ पेट – ई सब अंग बनैत छैक । दुइ मास मे हाथ, पैर, पाँजर, डाँर्ह आ टाँग – ई सब अंग बनैत छैक । तीन मास बितला पर एकटा अंग सँ दोसर अंग जुड़ैत छैक । चारि मास मे आंगुर सब प्रकट भ’ जाइत छैक । पाँच मास बितला पर नाक, कान आ आँखि बनैत छैक । दाँतक पाँति (जबड़ा), नह आ मलत्यागक अंग पाँच मास मे प्रस्फुटित होइत छैक । जखन छः मास बीति जाइत छैक तखन नासिका-विवर (नाकक नली) तथा कर्ण-विवर (कानक नली) बनैत छैक ॥३४-३९॥

।पादाकुञ्जक दोहा।

नाभि उपस्थ लिङ्ग ओ पायुक उतपति मासैँ सात ॥४०॥
सकल अवयव रोम शिर मे कच अष्टमास विख्यात ॥४१॥
स्त्रीक जठर मे गर्भे बाढ़थि पाँच मास चैतन्य ॥४२॥
जीव पबै छथि ई अद्भुत गति कर्त्ता प्रभु से धन्य ॥४३॥

भावार्थः

सात मास बितला पर नाभि, जननेन्द्रिय एवं गुदा – एहि अंग सभक उत्पत्ति होइत छैक । आठ मास मे सबटा अंगोपांग (अंग-उपंग) भ’ जाइत छैक, रोइयाँ भ’ जाइत छैक आ माथ मे केश उगि जाइत छैक, ई बात प्रसिद्ध अछि । जीव पाँच मास मे सत्रीक पेटक बीच गर्भ मे बढ़ैत अछि । जीव एहि तरहें अद्भुत अबस्था सब पबैत अछि । एकर कर्ता ईश्वर धन्य छथि ॥४०-४३॥

।चौपाइ।

मातृ-भक्त अन्नादिक खाथि । बर्धित गर्भ विकल पछताथि ॥४४॥
पूर्व जन्म मन पड़लय ताप । देखल विविध माय ओ बाप ॥४५॥
विविध भक्ष्य नाना-स्तन-पान । कयल कतहु नहि पावल ज्ञान ॥४६॥
कति बेरि विधि-कृत धारण देह । प्रज्ञा हरल विषय-मध नेह ॥४७॥
मिलि कुटुम्ब मे भेलहुँ प्रचण्ड । गर्भवास मे कर्म्मक दण्ड ॥४८॥
कयल सकल हम अनुचित काज । विषयि कुटुम्बक सङ्ग समाज ॥४९॥
नाना योनि विविध व्यवहार । कयल न भल मन कतहु विचार ॥५०॥
अनुभव कत दुख योनि कुयन्त्र । करिय यहन हम सम्प्रति मन्त्र ॥५१॥
साङ्ख्य-योग सौँ करब न आन । जौँ करता बाहर भगवान ॥५२॥
गर्ब्भवास सौँ बाहर भेल । स्मरण-ज्ञान माया हरि लेल ॥५३॥
आत्मा सभ तन सौँ छथि आन । से जानथि जनिकाँ दृढ़ ज्ञान ॥५४॥
होथि चिदात्मा जौँ परिज्ञात । मोह-तिमिर हर भानु प्रभात ॥५५॥
मुख दुख ज्ञानी सम मति मान । देह-स्थिति प्रारब्ध प्रमाण ॥५६॥
देह थिकहुँ हम ई अध्यास । दुखदायक कर नर क विनाश ॥५७॥
कञ्चुक कञ्चुकि बुझ निज काय । कञ्चुक-रहित न ततय समाय ॥५८॥
रहू अहाँ प्रारब्ध विचार । मिथ्या मानू ई संसार ॥५९॥

भावार्थः

जीव गर्भ मे माताक खायल गेल अन्न सँ पोषण पबैत अछि । गर्भ मे बढ़ैते ओ पश्चाताप करैत रहैत अछि । जखन ओकरा पूर्वजन्मक बात याद अबैत छैक तखन बड़ा सन्ताप होइत छैक । कतेको माता सभक आ कतेको पिता सब केँ देखलक, कतेको तरहक भोजन पेलक, कतेको स्तन सब सँ दुग्ध-पान कयलक, मुदा कतहुओ ज्ञान नहि प्राप्त भेलैक । विधिवश कतेको बेर शरीर धारण कयलक । मुदा भोगक वस्तु सब मे आसक्तिक कारण ज्ञान लुप्त रहलैक । परिवारक लोक मे मिलिकय पागल-जेकाँ भ’ गेल । अपन कर्मक सजाय रूप मे बेर-बेर गर्भवास भेटैत रहलैक । ‘हम सबटा अनुचित कर्म कयलहुँ । विषय मे लिप्त परिवारक लोक संग रहलहुँ । अनेकों योनि सब मे तरह-तरह केर आचरण कयलहुँ । मोन मे वास्तविक कल्याणक बात कहियो नहि सोचलहुँ । जखन योनिक ध’र मे भारी कष्टक अनुभव होइत छल तखन हम एना संकल्प करैत रही जे यदि हमरा ईश्वर एहि गर्भ सँ बाहर कय देता त सांख्ययोगक अभ्यासक सिवा आर किछु नहि करब । मुदा, जेनाही गर्भ सँ बाहर निकलि जाइत छलहुँ कि माया मे पड़िकय सबटा स्मरणशक्ति हरा जाइत छल । यदि चैतन्य-स्वरूप आत्माक ज्ञान नीक सँ भ’ जाय त मोहरूपी अन्धकार ओहि तरहें दूर भ’ जाइत छैक जेना भोर मे सूरज केर उदय भेला पर अन्हरिया दूर भ’ जाइत छैक । ज्ञानवान् लोक केँ सुख आ दुःख दुनू मे समान अनुभव होइत छैक । शरीरक होयब प्रारब्ध (पूर्वकृत कर्म) केर प्रतिफल छैक । शरीरे हम छी, एहेन मिथ्या ज्ञान दुःखक कारण छी । यैह अज्ञान मनुष्यक विनाश करैत अछि । केंचुआवला साँप केचुआ केँ अपन शरीर बुझि लैत अछि; जखन केचुआ केँ निकालि दैत अछि, तखन ओहि केचुआ मे फेर नहि पैसैत अछि । अहाँ प्रारब्ध केँ बुझू आ एहि संसार केँ अवास्तविक मानू ।’ ॥४४-५९॥

।सवैया छन्द।

दण्डक-वन रावण-वध कारण, जनकनन्दिनी लक्ष्मण सङ्ग ॥६०॥
अयोता करता माया-मानुष, लीला-मारीचक तन भङ्ग ॥६१॥
रावण तस्कर बनि सीताकाँ, हरता तनि अन्वेषण काज ॥६२॥
सुग्रीवक प्रेषित वानर सभ, अयोता जखना अहँक समाज ॥६३॥
तनिका सभकाँ अहाँ कहब सब, सीता छथि लङ्का जेहि देश ॥६४॥
नव नव कोमल पक्ष अहाँकाँ, अनायास होएत गय बेश ॥६५॥
भेल सत्य जे कहल चन्द्रमा, देखू सभ जन जनमल पाँखि ॥६६॥
हम जाइत छी दश दिन बितलय, दशमुख-दुर्ग्गति देखब आँखि ॥६७॥

भावार्थः

चन्द्रमा ऋषि कहने छलथि – जखन रावण केँ वध करबाक लेल सीता आ लक्ष्मणक संग राम दंडकवन अओता, माया-मानव केर लीला करता आ मारीच केर वध करता, फेर रावण चोरी सँ सीताक हरण करत, हुनका ताकैत सुग्रीव द्वारा पठायल गेल कपिगण अहाँ लग अयताह, आर अहाँ हुनका सब केँ बतेबनि जे लंका मे सीता कतय छथि; तखन अहाँ केँ ओहिना नव-नव कोमल पाँखि फेर सँ भ’ जायत । ओहि ऋषि चन्द्रमाक कथन सत्य भेल । अहाँ सब गोटे देखू, हमर पाँखि फेर सँ जनैम गेल अछि । आब हम जाइत छी । दश दिन बितिते दशमुख रावणक दुर्गति हम अपन आँखि सँ देखब ॥६०-६७॥

।रूपमाला।

नाम जपि जपि जनिक जन, भव-जलधि उतरथि पार ॥६८॥
तनिक दूत अहाँ सबहिकाँ, सिन्धु कति विस्तार ॥६९॥
यत्न करु जलराशि सन्तरु, देखि सीता आउ ॥७०॥
कहल जे सन्देश प्रभु से, सकल सुचित शुनाउ ॥७१॥

भावार्थः

जिनकर नाम जपि-जपिकय लोक भवसागर पार करैत अछि, हुनकहि दूत अहाँ सभक लेल ई समुद्र कोन बड़का अछि । साहस करू, समुद्र केँ पार कय जाउ आ सीता केँ देखि आउ, आर प्रभु राम जे सन्देश सुनबय लेल कहलनि अछि से नीक जेकाँ सुना आउ ।” ॥६८-७१॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे अष्टमोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक आठम अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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