स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण
किष्किन्धाकाण्ड – पाँचम अध्याय
रामजीक किष्किन्धा मे चतुर्मास एवं विरह-वर्णन
।चौपाइ।
एक समय तहि गिरिमणि-सानु । विरही राम चरण-गिरि भानु ॥१॥
असह विरह लक्ष्मण काँ कहल । सीता हरलक राक्षस रहल ॥२॥
छथि वा नहि जिबयित के जान । हृदय हमर थिक कुलिश समान ॥३॥
छथि जिबयित केओ कहि जाय । तखन करब हम उचित उपाय ॥४॥
हठ सौँ हम हुनकाँ छिनि लेब । सुधा-पयोनिधि मथि जनु देब ॥५॥
अरि बल पुत्र सकल देब मारि । हरलक जे सीता सति नारि ॥६॥
महामत्त-गज घन-विस्तार । विरहिनि बधय भ्रमय संसार ॥७॥
चपला-कसा सुरेश्वर मार । अम्बरमे घन शब्द उचार ॥८॥
बड़ जलभार वलाका सङ्ग । अग अग अटकथि बाहिक रङ्ग ॥९॥
निद्रा केशव-तन लपटाथि । सरित सकल सुख सागर जाथि ॥१०॥
विशद वलाका गगन समाथि । विरही जन मन मन अकुलाथि ॥११॥
चिन्ता-खेद विरहि-मन व्याप। शिखरि शिखरि शिखि ऋषभ अलाप ॥१२॥
बर्द्धित रस नहि रहल संभार । चललि नदी नदिपति अभिसार ॥१३॥
गगन न देखिय घन परिपूर । तारा तारापति नहि सूर ॥१४॥
पङ्कज मुद्रित खग नोड़स्थ । विकसित मालति दिनपति अस्त ॥१५॥
दिन रजनिक मन हो अनुमान । कोक अशोक शोकसौँ भान ॥१६॥
नृप नृपकाँ घन कलह घटाय । वर्षा सेना देल अटकाय ॥१७॥
भेक अनेक वचन उच्चार । जनु पटु वटु रटु श्रुतिस्वर-सार ॥१८॥
धन सुख सुग्रीवहि कैँ प्राप्त । दार-सहित अरि शूर समाप्त ॥१९॥
भावार्थः
एक बेर सबसँ ऊँच पर्वत पर उदित सूर्यक समान प्रतापी विरह-व्याकुल राम ओहि पर्वतक चोटी पर बैसि रहलाह । आ ओ अपन असह्य विरह-वेदना लक्ष्मण सँ सुनबय लगलाह – “आह, सीता केँ राक्षस हइर लेलकनि अछि । के जनैत अछि जे ओ जिबैत हेतिह आ कि नहि । हमर हृदय वज्र-समान कठोर अछि । यदि कियो कहि दियए जे ओ जिबैत छथि, त हम हुनका वापस अनबाक उचित प्रयास करी । हम हरणकर्ता सँ बलपूर्वक हुनका छीनि लेब, मानू समुद्र केँ मथिकय अमृत निकालि लेब । जे सीता-जेहेन सती नारीक हरण कयलक ओकरा ओकर सम्पूर्ण सेना एवं पुत्रादिक-सहित मारि देब । देखू, ई छितरायल मेघ महामत्त हाथी जेकाँ विरही (बिछुड़ल लोक) केँ बध करबाक लेल संसार मे मंडरा रहल अछि । देवता सभक राजा इन्द्र एहि मतवाला हाथी केँ बिजलीक चाबुक सँ पिटैत छथि, जाहि सँ ओ आकाश मे चिंघाड़ि रहल अछि । वलाका (बगुला) केर पाँतिरूपी डोरी सँ बान्हल जलक गठरी बोझने कुली सब जेकाँ मेघ पर्वत-पर्वत पर अटकैत अछि । निद्रा भगवान विष्णुक शरीर सँ लिटपि गेल अछि – अर्थात् हरिशयनी एकादशी आबि गेल अछि । नदी सब आनन्दपूर्वक समुद्र सँ मिलबाक लेल निकलि पड़ल । बगुलाक पाँति सब मेघ संग लिपटि रहल अछि । विरही लोक ई सब देखि-देखिकय मोन मे व्याकुल भ’ रहल अछि । विरही सभक मोन मे चिन्ता आ व्यथा व्याप्त छैक । पर्वत-पर्वत पर श्रेष्ठ मयूर शब्द कय रहल अछि । नदी सब मे रस (पानि आ कामोद्वेग) बढ़ि गेल अछि आर ओ सब ओकरा सम्हारि (दबा) नहि सकैछ, अतः ओहो अपन पति समुद्र सँ मिलन लेल ओहि दिश निकलि पड़ल अछि । आकाश देखाय नहि दैछ, सर्वत्र मेघे टा भरल अछि । न तारा देखाय दैछ, न तारापति चन्द्रमा आ न सूर्य । कमल मुंदा गेल । चिड़ै-चुनमुनी अपन-अपन खोंता मे चलि गेल । मालती फुला गेल । सूर्य अस्त भ’ गेल । दिन अछि या राति एकर अनुमान यैह देखिकय सम्भव होइछ जे चकवा चिड़ै विरह-अबस्था मे अछि या मिलन-अबस्था मे । मेघ सब राजा-राजाक बीचक संघर्ष घटा देलक, कियैक तँ वर्षाक कारण सबटा सेना सब रुकल पड़ल अछि । बेंग सब टर्र-टर्र आवाज कय रहल अछि, मानू ब्रह्मचारी बटुक सब वेदक ऋचा रटि रहल होइथ । मेघ सँ सुग्रीव सुखी भेल अछि, कियैक तँ ओकरा पत्नी भेटि गेलैक अछि आर ओकर वीर दुश्मन बालिक सेहो अन्त भ’ गेल छैक ।” ॥१-१९॥
।हंसगति छन्दः।
।जाज।
हमर बिना वैदेहि विषम दुख सहती ॥२०॥
राक्षस-घरमे जाय हाय की रहती ॥२१॥
प्राणेश्वरी कहाय हाय की कहती ॥२२॥
शय शय संशय आब दुर्दशा महती ॥२३॥
भावार्थः
पुनः राम कहय लगलाह – “आह ! हमर विरह मे सीता केँ बहुत वेदना होइत हेतनि । ओ राक्षसक घर मे जाय केँ केना रहैत हेतिह । हुनका हम प्राणेश्वरी कहैत छलहुँ, से आब ओ कि सोचैत हेतिह ? आब हमर मोन मे सौ-सौ आशंका भ’ रहल अछि । बड पैघ दुर्दशा मे पड़ि गेल छी ॥२०-२३॥
।रोला।
।लावण्या।
सीता-चरण-सरोज-परश-शीतलता तोरा ॥२४॥
रे शशि बनु जनु भानु दहन करु जनु तनु मोरा ॥२५॥
हरि हरि हरि हरु हृदय-ताप तुय हृदय कठोरा ॥२६॥
वैदेही-मुख पूर्णचन्द्र मोर नयन चकोरा ॥२७॥
भावार्थः
हे चाँद ! अहाँ मे जे शीतलता अछि ओ सीताक चरण-कमल केर स्पर्श सँ प्राप्त भेल अछि । (अर्थात् अहाँ ओतबे शीतल छी जतेक सीताक चरण ।) अहाँ हमरा लेल सूरज जुनि बनू; हमर शरीर केँ जुनि जराउ । ओह-ओह! अहाँ हमर सन्ताप केँ दूर करू । लगैत अछि जे अहाँक हृदय कठोर अछि (तेँ हमरा जरबैत छी) । हे पूर्णचन्द्र, अहाँ सीताक मुख समान छी, ताहि लेल तँ हमर आँखि अहाँ लेल चकोर बनल अछि ॥२४-२७॥
।बाला छन्द।
राखि नहि भेल की अपन नारी ॥२८॥
वंश मे लक्ष्म हा पड़ल भारी ॥२९॥
राक्षसागारमे जनक-बाला ॥३०॥
हाय रे आँखि की जलदमाला ॥३१॥
भावार्थः
ओह, हमरा अपन स्त्री केँ सेहो बचाकय राखल नहि भेल । कुल मे भारी कलंक लागि गेल । राजा जनकक पुत्री आइ राक्षसक घर मे छथि । हाय रे, हमर आँखि त मेघक माला बनि गेल अछि ॥२८-३१॥
।तरल-नयन छन्द।
हमरहि पड़ल विपति-तति, कत छथि जनक-कुमरि सति ॥३२॥
अविरल नयन बहय जल, पल भरि पड़य न मन कल ॥३३॥
शशि नहि थिकथि विषम फणि, उडु-तति थिक तनि फण-मणि ॥३४॥
लह लह रसन किरण-गण, अतिशय मलिन गरल धन ॥३५॥
डसयित विरहि गलित तन, अछि बचि रहल धवल फन ॥३६॥
फणपति कुलक धवल छथि, विषधर गणक प्रबल छथि ॥३७॥
छथि कत रमणि जौँ शुनितहुँ, शमनहु हनि तनि अनितहुँ ॥३८॥
भावार्थः
हमरहि उपर सबटा विपत्ति आबि गेल अछि । जनकपुत्री सीता कयत छथि ? आँखि सँ लगातार नोर बहि रहल अछि । मोन मे एकहु क्षण चैन नहि अछि । आकाश मे ई चाँद नहि छथि, ई त उज्जर मनिहार साँप छथि । ई तारा नहि, ओहि साँपक मणि सब थिक । ओहि साँपक किरण रूपी जीभ लह-लह कय रहल अछि । ओहि साँप मे जहर भरल अछि जे गहींर कारी दागक रूप मे देखाय पड़ैछ । विरही सब केँ डसैत-डसैत ओकर शरीर त पाप सँ गलि गेल छैक, मात्र उजरा फन बचल छैक । ई साँप बड़ा निर्मल कुलक अछि आ विषधर मे बहुते तेज अछि । जँ खबरि रहितय जे प्रिया सीता ओतय छथि तँ हम यमहु केँ मारिकय हुनका लय अनितहुँ ॥३२-३८॥
।चौपाइ।
हम हृतदार भोग्य नहि राज । सीता बिनु जीवन की काज ॥३९॥
कतय बलाहक कतय बलाक । हर्ष मयूरक गति चपलाक ॥४०॥
इन्द्र छोड़ाओल पृथिवि पियास । जीवन-दायक जनिकर दास ॥४१॥
घन वारण प्रस्रवण मयूर । सभहिक नाद गेल चल दूर ॥४२॥
वन वन सम्प्रति काश फुलाय । घन ऋतु क्रम क्रम गेल बुढ़ाय ॥४३॥
मूक मयूर हंस-खन शूनि । गलित-पक्ष-अरि-परिभव गूनि ॥४४॥
भावार्थः
हमर स्त्री चलि गेलिह, हमर राज चलि गेल । आब सीताक बिना हमर जीवन कोन काज के ? कतय मेघ आ ओकरा सँ कतेक दूर बलाका (बगुलाक पाँति) ? कतहु दूर बादल मे बिजली मे चमकला सँ मयूरक मोन हर्षित भ’ गेल अछि । इन्द्र, जाहि जीवनदाताक वश मे पानि अछि, पृथ्वीक प्यास केँ दूर कय देलनि । शरत बितला सँ मेघ, झरना आ मयूर सभक आवाज दूर चलि गेल अछि । आब वन-वन मे कास फुला गेल अछि । वर्षा ऋतु धीरे-धीरे बूढ़ भ’ गेल । हंस सभक आवाज सुनिकय मयूर चुप भ’ गेल । शत्रु सब सँ पराभव पाबिकय मयूर सभक पाँखि झरि गेलैक ॥३९-४४॥
।दोहा।
शरद-सरित सुन्दर पुलिन, थोड़ थोड़ दरशाब ॥४५॥
नव-सङ्गम-लज्जावतिक, जवनक उपमा पाब ॥४६॥
भावार्थः
शरदक नदी अपन सुन्दर तट कनी-कनी प्रकट करैत अछि, ठीक जेना कोनो लजकोटर नययौवना नायिका राति मे अपन जाँघ केँ प्रकट करैत छथि ॥४५-४६॥
।चौपाइ।
तारा भूषण विधु मुख थीक । तिमिर तनिक अलकावलि नीक ॥४७॥
सन्ध्यारुण पट कुसुमक रङ्ग । हो परतक्ष न संशय अङ्ग ॥४८॥
देखि पड़ अम्बर-दर्पण माँझ । राति कि सीता-छाया साँझ ॥४९॥
गगन न थिकथि उदधि मन मान । तारा-तति नव फेन समान ॥५०॥
शशि न कुण्डलित थिकथि फणीश । अङ्क न शयित विष्णु जगदीश ॥५१॥
भावार्थः
तारा सब सीताक भूषण छथि, चाँद हुनक मुँह छन्हि, अन्हार हुनकर केश छन्हि आ साँझक छायल लाली कुसुम रंगक हुनकर साड़ी छन्हि । एहि तरहें शरदक आकाशरूपी दर्पण मे राति या साँझ केँ सीताक स्पष्ट छाया देखाय दय रहल अछि । ई आकाश नहि, ई त समुद्र जेकाँ लगैत अछि । तारा सब नहि, ओ समुद्र मे बिखरल फेन थिक । ई चाँद नहि, ई त चक्कर मारिकय बैसल शेषनाग छथि । ई कारी दाग नहि, ई त ओहिपर विराजमान भगवान विष्णु छथि ॥४७-५१॥
सुग्रीव पर लक्ष्मणक कुपित होयब
पावस विगत शरद अवतार । नहि चर हमर कतहु सञ्चार ॥५२॥
की थिति सीता छथि कोन देश । के हित आनत तनिक सन्देश ॥५३॥
कपिपति कृपा कयल परित्याग । पाछिल दिन मन पड़ि के जाग ॥५४॥
कामी राज्य-मदैँ की सूझ । आनक सुख दुख कतहु कि बूझ ॥५५॥
आब होइछ मन बालिक शोच । मारल तनिका हिनके रोच ॥५६॥
आमिष भक्षण मदिरा पान । कतय ततय रह सदसत ज्ञान ॥५७॥
अधिक निन्दवश रति-अवसान । जगलहु जलपथि आनक आन ॥५८॥
ओ कपटी छथि मारय योग्य । बालिक बधसौँ ई आरोग्य ॥५९॥
बुझला जाइछ तेहन कुठाठ । धयल चरण जनु बाली-बाट ॥६०॥
से शुनि लक्ष्मण मन अति कोप । अनुमति हो करि कपि-पति-लोप ॥६१॥
हमरा हो जौँ आज्ञा नाथ । सुग्रीवक थिति हमरा हाथ ॥६२॥
ई कहि लेल धनुष कर बाण । प्रभु-रुचि पाबथि करथि प्रयाण ॥६३॥
भावार्थः
वर्षा ऋतु बीत गेल आ शरत ऋतु आबि गेल । मुदा सीता केँ तकबाक (खोजबाक) लेल हमर ‘चर’ (भेदिया) कतहु नहि पठायल जा सकल अछि । सीता कोन स्थिति मे, कोन देश मे छथि – ई सन्देश हमरा के हित व्यक्ति आनिकय देत ? वानरराज सुग्रीव सेहो कृपा करब छोड़ि देलनि । पैछला दिन सब मोन राखि केँ सदिखन के जागरूक रहि पबैत अछि ? जे कामी अछि आर राज्यक मद मे चूर अछि, ओकरा कि सुझेतैक ? दोसरक सुख या दुःख केर भान ओकरा कि भ’ पेतैक ? आब बालिक लेल मोन मे पछताबा होइत अछि । ओकरा तँ एहि सुग्रीवहि केर खातिर मारने रही । जे मांस खाय आ मदिरा पिबय – ओकरा नीक-बेजा कर्मक ज्ञान केना रहि पेतैक ? रतिक अन्त मे प्रबल नीन्द अबैत हेतैक आ बेसीखन सुतले रहैत होयत । जगला पर सेहो अनाप-शनाप बकैती करैत होयत । सुग्रीव कपटी निकलल । ओकरा मारनाइये उचित होयत । मुदा बालिक वध सँ त ओ निष्कंटक भ’ गेल । एहेन कुरंग लगैत अछि मानू सुग्रीव सेहो बालियेक रस्ता पर पैर राखि देलक ।” ॥५२-६०॥
एतेक सुनिते लक्ष्मणक मोन मे भारी क्रोध जागि गेलनि । ओ बजलाह – “हे राम, यदि अपनेक अनुमति हो त हम वानरराज सुग्रीव केर अन्त कय दी ! हे प्रभु, हमरा केवल आज्ञा चाही । सुग्रीवक अस्तित्व हमरहि हाथ मे अछि ।” एतेक कहिकय लक्ष्मण धनुष आ बाण हाथ मे लय केँ तैयार भ’ गेलाह जे रामक अनुमति पबिते प्रयाण कय जेताह ॥६१-६३॥
।तोटक छन्द।
शुनु लक्ष्मण सत्वर जाउ अहाँ ॥६४॥
भयभीत करू कपिनाथ तहाँ ॥६५॥
परित्यागि बालि-कुचालि जना ॥६६॥
नहि मारब मित्र करैछी मना ॥६७॥
भावार्थः
राम कहलनि – “हे लक्ष्मण, अहाँ जल्दी जाउ । ओतय जाकय वानरराज सुग्रीव केँ डराउ-धमकाउ जाहि सँ ओ बालि जेकाँ खराब रस्ता नहि पकड़य । लेकिन हम मना करैत छी, ओकरा जान सँ नहि मारब, कियैक तँ ओ हमर मित्र छी ।” ॥६४-६७॥
।चौपाइ।
स्फुरित अधर लोचन अति लाल । चलल रौद्र रस जेहन विशाल ॥६८॥
ई प्रभु माया अपन पसार । निर्गुण सगुण सुगुण अवतार ॥६९॥
नगरक निकट धनुष-टङ्कार । कयलनि लक्ष्मण कोप अपार ॥७०॥
से शुनि प्राकृत कीश सगर्व्व । पाथर तरु कर दौड़ल सर्व्व ॥७१॥
लक्ष्मण देखल वानर रङ्ग । बाढ़य लागल कोप अभङ्ग ॥७२॥
अङ्गद दौड़ला करयित घोल । कहि अबाच्य रोकल कपि-गोल ॥७३॥
वानर-बल हठि दूर पड़ाह । कोपक विकट निकट नहि जाह ॥७४॥
अङ्गद आबि प्रार्थना कयल । लक्ष्मण-चरण शरण कहि धयल ॥७५॥
अङ्गद काँ लेल हृदय लगाय । कहलनि कहू पितीकेँ जाय ॥७६॥
रघुनाथक आज्ञा अनुसार । हे युवराज करब व्यवहार ॥७७॥
एतय पठाओल रौद्रक मूर्ति । कयल व्यवस्था कयल न पूर्ति ॥७८॥
शुनि से सत्वर अङ्गद जाय । समय पितीकेँ कहल बुझाय ॥७९॥
पुरी-द्वार लक्ष्मण छथि ठाढ़ । उचित क्रोध हुनका मन बाढ़ ॥८०॥
शुनितहि कपिपति बहुत डराय । हनूमान काँ कहल बजाय ॥८१॥
हनूमान संगेँ युवराज । लक्ष्मण करिय कोप कृश आज ॥८२॥
शञ्च शञ्च निज भवनहिँ लाउ । कोप रहितसौँ भेट कराउ ॥८३॥
ताराकाँ कहलनि कपिराज । अहँउ जाउ सौमित्रि-समाज ॥८४॥
कोमल वचनेँ करु परितोष । मिलब हमहु जखना नहि रोष ॥८५॥
तारा पहुचलि मध्यम कक्ष । यहि पथ अओता हयब समक्ष ॥८६॥
अङ्गद विनय-युक्त हनुमान । कयल प्रणाम कहल कल्याण ॥८७॥
हे सौमित्रि अपन थिक गेह । चलल जाय मन निस्सन्देह ॥८८॥
देखब राजदार कपिराज । अपनैँ सौँ के जनि कर लाज ॥८९॥
तखन जेहन आज्ञा से करब । अपनहुँ दीर्घ दोष परिहरब ॥९०॥
लक्ष्मण कर धय कह हनुमान । चलु अन्तष्पुर बुद्धि-निधान ॥९१॥
क्रम क्रम गेला मध्यम कक्ष । तारा चन्द्रानना समक्ष ॥९२॥
मद-अरुणित दृग भूषण-राजि । नमस्कार कयलनि हसि बाजि ॥९३॥
रक्षा करिय अपन जन जानि । कपिपतिसौँ नहि हो हित-हानि ॥९४॥
अपनहि कयल विषय आरोप । भृत्य भक्त कपिवर पर कोप ॥९५॥
दुर्दश छला दशा भल पाबि । भोग-विवश इच्छित सुख भावि ॥९६॥
छथि उद्योगहि मध्य कपीश । अन्तर्य्यामी प्रभु जगदीश ॥९७॥
बहुतो दूत पठावल दूरि । बहुत शीघ्र अबयित अछि घूरि ॥९८॥
जौँ दशकन्धर-कृत अन्याय । विद्यमान बल बालिक भाय ॥९९॥
तारा-विनय-वचन शुनि कान । अन्तष्पुर पुनि कयल प्रयाण ॥१००॥
भावार्थः
लक्ष्मणजीक ठोर पटपटाय लगलनि, आँखि लाल भ’ गेलनि, मानू प्रबल रौद्र-रस चलि पड़ल हो । लेकिन वास्तव मे ई रामजी, जे निर्गुण रहितो सगुण भ’ आदर्श पुरुषक रूप मे अवतीर्ण छथि, अपन माया पसारलनि । लक्ष्मण किष्किन्धापुरी लग अयलाह आ परम क्रोधित भ’ धनुष पर टंकार देलनि । ओकर आवाज सुनिकय मामूली वानर अभिमानक संग हाथ मे पत्थर आ गाछ लय-लय केँ दौड़ल । जखन लक्ष्मण वानर सभक ई रंग-ढंग देखलनि त हुनकर अटल कोप आरो बढ़य लगलनि । अंगद चिकरैत दौड़लाह आ फटकारिकय समस्त वानर दल केँ मना कययलनि । ‘अरे वानरगण, तुरन्त एतय सँ दूर भागि जाउ । लक्ष्मणजीक विकट क्रोधक सोझाँ जुनि जाउ ।’ फेर अंगद लक्ष्मणजी लग अयलाह आ क्षमा-प्रार्थना कय केँ ई कहैत हुनकर पैर पकड़ि लेलनि (गहलनि) जे ‘यैह चरण हमर अवलम्ब अछि ‘ । तखन लक्ष्मण अंगद केँ छाती सँ लगा लेलनि आ कहलनि – “जाउ आ पित्ती (काका) सँ कहू । हे युवराज ! राम जेना कहलनि अछि ओहिना हमरा करबाक अछि । राम परम क्रोधित भ’ हमरा सुग्रीव सँ ई कहबाक लेल एतय पठौलनि अछि कि सुग्रीव जे वचन देने रहथि से पूरा नहि कयलनि ।” से सुनिकय अंगद झटपट जाकय अपना पित्ती केँ बुझाकय संवाद सुना देलनि – “नगरक फाटक पर लक्ष्मण ठाढ़ छथि आ हुनकर मोन मे उचिते क्रोध छन्हि ।” सुनितहि सुग्रीव बहुत भयभीत भ’ गेलाह आ हनुमानजी केँ बजाकय कहलनि – “हे हनुमान, अहाँ युवराज अंगद संग जाय आ लक्ष्मणजीक क्रोध केँ शान्त कयल जाउ । शान्तिपूर्वक हुनका अपन राजभवन मे बजाकय आनू आ क्रोधरहित अबस्था मे हुनका सँ हमर भेंटघांट कराउ ।” फेर सुग्रीव अपन पत्नी तारा सँ कहलनि – “अहाँ सेहो लक्ष्मण लग जाउ । कोमल वचन कहि-कहिकय हुनका प्रसन्न करू । जखन हुनकर क्रोध उतैर जेतनि तखन हमहुँ हुनका सँ भेटब ।” तारा बीचवला दरबाजा पर पहुँचि गेलिह आ एहि मार्ग सँ ओ अओताह, एतय अबिते हम हुनकर सामने पड़ि जायब । अंगद आ विनीत हनुमानजी लक्ष्मणजी केँ प्रणाम कयलनि आ कल्याणपूर्वक कहलनि – “हे लक्ष्मणजी ! ई अहाँक अपन घर छी, बेहिचक अन्दर चलू । अहाँ रानी तारा आ राजा सुग्रीव सँ भेटू । अहाँ सँ कोन स्त्री लाज करतिह ? तखन अहाँ जे आज्ञा देब हम सब ओकर पालन करब आ अहाँ सेहो हमरा सभक भारी अपराध केँ माफ कय देब ।” हनुमानजी लक्ष्मणजीक हाथ पकड़िकय कहलनि – “हे बुद्धि निधान ! राजभवनक भीतर चलू ।” धीरे-धीरे ओ सब बीचवला दरबाजा धरि पहुँचलाह जेतय चन्द्रमुखी तारा मुस्कुराइत नमस्कार कयलिह आ बजलिह – “हमरा सब केँ अपन लोक बुझिकय सभक रक्षा करू हे नाथ । राजा सुग्रीव अहाँक नीक करय सँ कोनो चूक (गलती) नहि करताह । अपनहिं सब तँ हुनका भोग करबाक अवसर देलियनि । फेर अपने कियैक वानरराज पर तमसाइत छी, ओ त अहाँक भक्त सेवक छथि ? दुर्दशा मे पड़ल छलाह, अपनहिंक मदति सँ नीक दशा मे अयलाह अछि आ इष्ट सुख-सामग्री पाबिकय भोग मे लीन भ’ गेलाह । कपिराज अपनेक वास्ते हरेक कोशिश मे लागल छथि । हे प्रभु, अहाँ तँ सभक हृदयक बात जननिहार ईश्वर थिकहुँ । राजा सुग्रीव बहुते रास दूत सब केँ दूर-दूर धरि (सीताक खोज लेल) पठौलनि अछि । ओ सब जल्दिये वापस घुरयवला छथि । यदि ई अन्याय (सीता हरण) रावण कयलक अछि त कोनो चिन्ता नहि, बालिक भाइ केँ ओकर बल बुझले छन्हि ।” ताराक नम्रतापूर्वक वचन सुनिकय लक्ष्मण अन्तःपुर मे प्रवेश कयलनि ॥६८-१००॥
।सोरठा।
रुमा-अङ्क निश्शङ्क, मदावस्थ मातङ्ग सम ॥१०१॥
बैसल मणिपर्य्यङ्क, देखल लक्ष्मणकेँ ततय ॥१०२॥
सत्वर उठल डराय, लज्जित मद-घूर्णित नयन ॥१०३॥
रामानुज खिसिआय, कहल बहुत निन्दित कथा ॥१०४॥
रे वानर दुर्व्वृत्त, विस्मृत श्रीरघुनाथ किय ॥१०५॥
भावी यहन निमित्त, बालि सदृश मरणेच्छ की ॥१०६॥
प्रभुतादिक मद पाब, धन-मद गुण-तारुण्य-मद ॥१०७॥
मद मद महिला आब, विधिहुक बुत नहि से बुझथि ॥१०८॥
समय कहल हनुमान, लक्ष्मण-योग्य न वचन थिक ॥१०९॥
कपिपति भक्ति समान, अपनहुँ नहि रघुनाथ मे ॥११०॥
करथि प्रभुक हित काज, वानरेश रघुनाथ-प्रिय ॥१११॥
वानर सैन्य समाज, आबि गेल देखू अहाँ ॥११२॥
सकल सैन्य लय संग, सीतान्वेषण मे निरत ॥११३॥
करता शत्रुक भङ्ग, नहि विलम्ब सन्नद्ध बल ॥११४॥
निज अनुचित मन मानि, लज्जित रामानुज तहाँ ॥११५॥
अर्घ्यादिक सन्मानि, कपि-राजा मिललाह तहाँ ॥११६॥
हम श्रीरामक दास, ओ रक्षा कयलनि हमर ॥११७॥
तनिकहु अनकर आश, हम सहाय नामक ध्रुव ॥११८॥
क्षमा करब अपराध, कहल प्रणय सौँ कटु वचन ॥११९॥
अँह प्रिय गुणक अगाध, लक्ष्मण ततक्षण कहल पुन ॥१२०॥
सीता-विरही राम, एकाकी कानन बसथि ॥१२१॥
हम न करब विश्राम, सेव्य निकट सेवक सुखी ॥१२२॥
भावार्थः
ओम्हर हाथीक समान मदमत्त भ’ रुमाक अंक (कोरा) मे मणिमय पलंग पर चैन सँ पड़ल सुग्रीव लक्ष्मणजी केँ ओहिठाम देखलनि । नशा सँ घूमैत आँखिवला सुग्रीव देखिते लज्जित आ भयभीत भ’ गेलाह । तखन लक्ष्मण क्रोधित भ’ बहुते रास बात-कथा सुनौलनि । “अरे दुराचारी वानर, तूँ श्री रघुनाथ केँ केना बिसरि गेलेँ ? लक्षण लगैत छौक जे तोंहुँ बालि जेकाँ मरय चाहैत छेँ । जे प्रभुता आदि पाबिकय मद पबैत अछि, धनक मत पबैत अछि, गुणक मद पबेत अछि, जवानीक मद पबैत अछि, मदिराक मद पबैत अछि आ महिलाक मद पबैत अछि, ओकरा ब्रह्मा सेहो नहि बुझा सकैत छथि ।” ऐन अवसर पर हनुमानजी बजलाह – “एहेन कहनाय अहाँ लेल शोभा नहि दैत अछि । राम मे जेहेन भक्ति सुग्रीवक छन्हि तेहेन अहुँ केँ नहि अछि । रामक प्रिय वानरराज सुग्रीव हुनक हित वास्ते सचेष्ट छथि । ई देखू, वानर सभक सेना आबिये गेल अछि । आब समूचा सेनाक संग लय केँ सीताक खोज मे लागल सुग्रीव शत्रुक संहार करताह । प्रयाणक लेल सेना तैयार अछि । आब एहि मे विलम्ब नहि छैक ।” तखन रामक अनुज लक्ष्मण केँ पता लगलनि जे ओ अनुचित कयलनि, तेँ लज्जित भ’ गेलाह । सुग्रीव कहलखिन – “हम रामक दास छी । ओ हमर रक्षा कयलनि अछि । अरे, हुनका दोसरक मदतिक कोन जरूरत पड़तनि ! तैयो नामक लेल मात्र हम हुनकर सहायक छी ।” तुरत लक्ष्मण उत्तर देलथिन, “हमर अपराध क्षमा करी, हम प्रेमवश कटु वचन कहलहुँ । अहाँ हमरा वास्ते गुणवान प्रेमी छी । सीताक विरह सँ व्याकुल राम असगरे वन मे छथि । हम एतय रुकब नहि । सच्चा सेवक केँ अपन प्रभुक लगे रहय टा मे सुख भेटैत छैक ।” ॥१०१-१२२॥
।चौपाइ।
भल विचार चलला कपिराज । रथ चढ़ि लक्ष्मण सह प्रभु-काज ॥१२३॥
नीलाङ्गद हनुमान प्रधान । सेना सङ्गहि कयल प्रयाण ॥१२४॥
बाजन नाना तरहक बाज । राज-चिन्ह छत्रादि विराज ॥१२५॥
प्रभुक निकट सब सज्जित जाय । मुदित राम देखल समुदाय ॥१२६॥
भावार्थः
“नीक विचार अछि ।” एना कहिकय सुग्रीव लक्ष्मण-सहित रथ पर चढ़िकय रामक काज सँ चलि पड़लाह । ओम्हर नील, अंगद, हनुमान आदि सेनापति सब अपन-अपन सेनाक संग प्रयाण कयलनि । तरह-तरह केर बाजा सब बाजय लागल । सेना पताका, छत्र आदि राजचिह्न सँ सुसज्जित छल । सब बनि-ठनिकय प्रभु रामक समीप पहुँचलाह । राम प्रसन्न भ’ कय सैन्य-मंडली केँ देखलनि ॥१२३-१२६॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक पाँचम अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

1 Comment
Bahut neek prasang aajuk lagal. Laxman jee k gussa Bhatri premak chhalain je prabhu Sugrib k ete madad kelkhin aa o hunka prarti ete udasin dekha rahal chhaith.
Prabhu k agyan pabi Laxman jee Sugrib san karan jano chail parlah t Hanuman jee hunka san jekhan bhent bhelain t o Bahut tamasel baat sab kahalkhin. Hnuman jee Laxman jee k kahalkhin je ehan baat ahan k sobha nai do rahal aichh.
Laxman jee lajit mahdoos kelah aa kohlain je eh hom pratri prem m kahi delao. Hamra maaf kari. Fer Sugrib khakhin Prabhu Ram k kathi k jarurat o sabkuchh ko sakait chhathin. Muda tahiyo hom sab hunkar aadesh main dekhu sena sang cholai bala chhi. Takhan Laxman, Sugrib, Hanuman aa Nal sang rath san bidah bho rahal chhalh. Gaja Baja sab baij rahal chhal.
🙏🙏
1 Trackback or Pingback