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मिथिलाभाषा रामायणः किष्किन्धाकाण्ड चारिम अध्याय – सीताक खोज लेल दूत पठेबाक प्रसंग

1013 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कवि चन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण

किष्किन्धाकाण्डः चारिम अध्याय

सुग्रीव द्वारा सीताक खोज-खबरि लेल दूत पठायब

।रूपक चौपाइ।

योगारूढ समाधि विराम । सय्यँमशील निरन्तर राम ॥१॥
लक्ष्मण पूछल पूजा-रीति । कहल राम बुझि अनुज सप्रीति ॥२॥
वेद तन्त्र पूजाक प्रकार । संक्षिप्ताक्षर विधि विस्तार ॥३॥
पुन प्राकृत बनि विरही राम । विलप कलप लय सीता नाम ॥४॥
सगरि रजनि निद्रा नहि आब । मानस-वनक वियोगक-दाव ॥५॥
किष्किन्धा मन्त्री हनुमान । ओतय कहल सुग्रीवक कान ॥६॥
राम अहाँक कयल उपकार । पाओल सम्पति सुख प्रिय दार ॥७॥
अहँ कृतघ्न बिसरल वृत्तान्त । होयत की कल्याण नितान्त ॥८॥
भुवन-विदित बाली हे वीर । से मरि गेला एकहि तीर ॥९॥
राज्य अकण्टक तारा पाय । दिन अज्ञात राति बिति जाय ॥१०॥
से पर्व्वत पर अहँ घर सूति । व्यर्थ करी जनु तेसर जूति ॥११॥
ओ तकयित नित मित्रक बाट । अहँ कि सुचित घर ठोकि कपाट ॥१२॥
कामातुर वानर अज्ञान । त्यागू राज्य-विषय अभिमान ॥१३॥
कुपथ गमन सौँ मुइला बालि । अहँउ धयल भल प्रबल कुचालि ॥१४॥
ई शुनि भय-विह्वल कपिराज । वचन कहल मनमे भेल लाज ॥१५॥
दश हजार चर वानर जाय । आनय वानर भालु बजाय ॥१६॥
सातहु द्वीपक वानर विकट । पनरह दिन मे आबथु निकट ॥१७॥
जे करताह व्यवस्था-हानि । तनिकाँ हम मारब अरि जानि ॥१८॥
कहि सुग्रीव गेला घर घूरि । मारुत-सुत देल आज्ञा पूरि ॥१९॥
अतुलित-गुण बल दश दिश गेल । कयल विलम्ब न त्रासक लेल ॥२०॥

भावार्थः

राम निरन्तर संयम मे रहैत योगी रूप मे समाधि लगौने रहैत छलाह । एक दिन लक्ष्मण हुनका सँ पूजा करबाक विधि पुछलन्हि । राम अपन प्रिय अनुज बुझि हुनका वैदिक आ तान्त्रिक पूजाक विधि थोड़बेक शब्द (संछेप) मे सविस्तार बतौलनि । फेर वियोगी राम सामान्य मनुष्यक भाँति सीताक नाम लय-लय केँ बिलखय लगलाह । भरि राति जागिकय बितबैत छथि । हुनकर मनरूपी वन मे विरहरूपी आइग लागल छल । ओम्हर किष्किन्धा मे मंत्री हनुमान राजा सुग्रीवक कान मे कहलनि – “हे राजा, राम अहाँक सहायता कयलनि, जिनका चलते अहाँ सम्पत्ति, सुख आ प्रिय पत्नी पयलहुँ । अहाँ कृतघ्न जेकाँ हुनकर खबरि लेनाय बिसरि गेल छी । एहि सँ परिणाम मे अहाँक अकल्याण भ’ सकैत अछि । बालि, जे जगत मे विख्यात वीर रहथि, रामक एक्कहि बाण सँ मारल गेलाह । अहाँ निष्कंटक राज्य तथा तारा-जेहेन पत्नी पाबिकय एहिना दिन आ राति बितबैत जा रहल छी । ओम्हर राम पहाड़ी पर रहि रहल छथि, अहाँ एम्हर महल मे सुति रहल छी । नाहक मे तेसरे जूति जुनि करी । ओ प्रतिदिन अपन मित्रक बाट जोहि रहल छथि, मुदा अहाँ दरबाजा बन्द कएने घर मे सुतल रही, कि ई उचित होयत ? अहाँ वानर छी, काम मे आसक्त आ ज्ञानहीन भ’ गेलहुँ अछि । राज्यक अभिमान छोड़ू । बे-रास्ता चललाक कारण बालि मारल गेलाह । अहाँ सेहो वैह खराब चाइल मे लागि गेलहुँ ।” ॥१-१४॥

ई सुनिकय वानरक राजा सुग्रीव डरा गेलाह; मोन मे लाज आबि गेलनि आ बजलाह – “वानर आ भालु सब केँ बजाकय आनू । दूत बनिकय दस हजार वानर जाय । जतेक वीर वानर सब अछि ओ सब सातों द्वीप मे सीता केँ ताकि (खोजि) कय पन्द्रह दिन मे हमरा पास घुमि आबय । एहि आदेश केँ जे उल्लंघन करत, तेकरा हम अपन दुश्मन बुझिकय मारि देबैक ।” ॥१५-१८॥

एतेक कहिकय सुग्रीव अपन महल मे चलि गेलाह आ हनुमानजी हुनकर आज्ञाक पालन कयलनि । बेजोड़ गुण वला जवान सब दसो दिशा मे दौड़ि पड़ल । डरक मारे कनिकबो विलम्ब नहि कयलक ॥१९-२०॥

।इति  श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थोऽध्यायः।

।मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक चारिम अध्याय समाप्त भेल।

हरिः हरः!!

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