स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण
किष्किन्धाकाण्ड – दोसर अध्याय
बालि-सुग्रीव युद्ध एवं बालि वध
।चौपाइ।
कहलनि रघुवर शुनु कपिनाथ । बालिक वध अछि हमरा हाथ ॥१॥
माया-मय थिक ई संसार । अति अगम्य विधि ज्ञान-विचार ॥२॥
ठामहि ठाम बालि जौँ रहत । हमर अकीर्ति विश्व भरि कहत ॥३॥
रघुपति जौँ सुग्रीवक मित्र । विदित न वसुधा वीर-चरित्र ॥४॥
रामक बाली काँ नहि त्रास । वृथा प्रतिज्ञा सुयश हरास ॥५॥
हसता वानर-निकर समाज । ज्ञान कृपाकर कातर काज ॥६॥
करु करु युद्ध बालि सौँ आज । निर्भय भय चलु भाय समाज ॥७॥
बालिक मरण करण एक बाण । अहँका अनायास कल्याण ॥८॥
भावार्थः
राम कहलनि – हे कपीश, सुनल जाउ । बालिक वध हमरा हाथ सँ होयबला अछि । ई संसार केवल माया थिक । ज्ञानक विवेचन बहुतहि कठिन अछि । यदि बालि जेहेन (दुष्चरित्र) एहिना जिबैत रहत तँ एहि सँ हमर बदनामी पूरे दुनिया मे पसरत । जखन रघुपति (हम) सुग्रीवक (अहाँक) मित्र भ’ गेलहुँ त सुग्रीव-जेहेन वीर एहि धरती पर के अछि ? राम केँ बालिक डर नहि अछि । यदि हम झूठ प्रतिज्ञा करब त दुनिया मे हमर प्रतिष्ठा खसि पड़त । वानर सभक समाज मे हमर उपहास होयत । ज्ञानक (सैद्धान्तिक) आधार पर शत्रुक प्रति कृपा कयनाय कायर (डरपोक) लोकक काज छी । तेँ अहाँ आइ ज्ञानक फेर मे नहि पड़िकय बालि सँ लड़ाइ करू आ निर्भय भ’ कय भाइक सामना करू । हमर एक्कहि टा बाण सँ बालिक अन्त भ’ जायत आ अहाँ केँ आसानी सँ त्राण भेटि जायत ।” ॥१-८॥
।सोरठा।
कपिपति विनत विचार, ज्ञान कतय बलवान विधि ॥९॥
अकथनीय संसार, भावि न भेलैँ बिनु रहय ॥१०॥
भावार्थः
ई सुनिकय सुग्रीव विनम्र भ’ विचार करय लगलाह । ज्ञान प्राप्त कयनाय दूर अछि । विधाता बलवान होइत छथि । संसार मे कि होयत, ई कहल नहि जा सकैत अछि । होनी भ’ कय रहत ॥९-१०॥
।चौपाइ।
निर्भय सौँ रघुपति बल पाय । किष्किन्धा उपवन मे जाय ॥११॥
कयलनि ततय शब्द बड़ घोर । शुनितहि दौड़ल बालि कठोर ॥१२॥
बालिक हृदय मुष्टिका हनल । बन्धु-विरुद्ध वैरिता बनल ॥१३॥
चलल परस्पर मुष्टामुष्टि । विधि विपरीत विपर्य्यय सृष्टि ॥१४॥
युगल बन्धु से रूप समान । रघुपति तेँ न चलायल बाण ॥१५॥
सहि नहि शकला मुष्टिक मारि । पुन सुग्रीव पड़यला हारि ॥१६॥
भभकि भभकि शोणित हो वान्ति । भेल विवर्ण सकल तन कान्ति ॥१७॥
बालि विजयि गेल अपना धाम । कपिपति कहल विपति शुनु राम ॥१८॥
बन्धु न बालि काल जनु थीक । ततय पठायलि गेलहुँ अहीँक ॥१९॥
वृथा करायोल दुस्सह घात । यहि सौँ अयश लोक विख्यात ॥२०॥
अपनहि शर मारू रघुनाथ । करु न समर्प्पण कालक हाथ ॥२१॥
सुग्रीवक देल देह हसोथि । अशनि-कठोर जोर जैँ होथि ॥२२॥
एक वार सत्वर अहँ जाउ । निष्कण्टक भय निर्भय आउ ॥२३॥
शपथ बालिकाँ निश्चय मारि । अहँक सकल सङ्कट देब टारि ॥२४॥
लक्ष्मण-प्रभु आज्ञा काँ पाय । फुलमाला देल गल पहिराय ॥२५॥
लक्ष्मण अति आदर सौँ फेरि । जाउ जाउ कहलनि कय बेरि ॥२६॥
पुन सुग्रीव जाय तहि ठाम । आबह कहल करह संग्राम ॥२७॥
से शुनि मन मन बालि विचार । की कनिष्ठ हमरा ललकार ॥२८॥
धयल हाथ तारा तहि ठाम । उचित न चललहुँ हठ संग्राम ॥२९॥
मृत छल छथि अयला घुरि फेरि । अभ्यन्तर अति बल यहि बेरि ॥३०॥
कहल बालि उत्तर अति रुष्ट । की पुन आयल सत्वर पुष्ट ॥३१॥
तनिक सहाय समर के शूर । क्षण रण हमर मनोरथ पूर ॥३२॥
धर अरि हमर समर निश्शङ्क । घर घुसि की शिर लेब कलङ्क ॥३३॥
अल्प कालमे अरि रण जीति । तखन करब गृह-सम्पति प्रीति॥३४॥
तहँ तारा कह शुनु प्राणेश । अवसर मानक हित उपदेश ॥३५॥
अङ्गद गेला खेलाय सिकार । निश्चय शुनलनि हुनक विचार ॥३६॥
दशरथ वचन मानि दुइ बन्धु । वन भ्रमइत छथि छथि बल-सिन्धु ॥३७॥
कौशलेश-सुत अयला गाम । तनिक शुनल हम बड़ गोट नाम ॥३८॥
कालहु काँ विजयक सामर्थ्य । रण कारण जायब थिक व्यर्थ ॥३९॥
के जानय प्रभु अन्तष्करण । दण्डक वन वैदेही-हरण ॥४०॥
तनि अन्वेषण मानस लीन । माया-मानव विरहित दीन ॥४१॥
अचल सख्य सुग्रीवक सङ्ग । ओ समर्थ सङ्कल्प अभङ्ग ॥४२॥
बजला बालि मारि देव राज । जे कहलनि से करता काज ॥४३॥
भीरु बन्धु पुर निकट न आव । आव प्रबल रण राम प्रभाव ॥४४॥
प्रेमहि बन्धु बौँसि घर लाउ । अवसर चुकलेँ जनु पछताउ ॥४५॥
अपन अनुज केँ करु युवराज । शीघ्र जाउ सीतेश-समाज ॥४६॥
भावार्थः
रामक अवलम्ब (आधार) पाबिकय सुग्रीव तुरत किष्किन्धाक उपवन मे गेलाह आ ओतय घनघोर गर्जना कयलनि । सुनितहि निष्ठुर बालि दौड़िते आयल । सुग्रीव बालिक छाती पर एक मुक्का जमा देलनि । भाइ-भाइ मे लड़ाइ ठनि गेल । आपस मे मुक्का पर मुक्का चलय लागल । यदि विधाता बाम रहैत छथि त दुनिया उल्टा भ’ जाइत छैक । लड़ाइ मे दुनू भाइ बराबर-बराबर रहथि, ताहि लेल राम बाण नहि चलौलनि । मुदा सुग्रीव बालिक मुक्काक चोट बर्दाश्त नहि कय सकलाह आ हारिकय भागि गेलाह । मुँह सँ बेर-बेर शोणित बहय लगलनि । समूचा शरीरक रंग उतरि गेलनि । बालि जीतिकय अपन घर चलि गेल । तखन सुग्रीव राम सँ कहलनि – “हे राम, सुनल जाउ । ई बालि हमर भाइ नहि, ई त मानू हमरा लेल काल थिक । अपनहिँक पठेला सँ हम ओतय गेलहुँ । ई दुःसह प्रहार अपनहिँक कारण हमरा भेटल । एहि सँ दुनिया मे हमर भारी अप्रतिष्ठा पसरत । अपने अपनहिँ बाण सँ हमर प्राण लय लियह, मुदा एहि काल केर हाथ मे जुनि सौंपू ।” ॥११-२१॥
राम सुग्रीवक शरीर पर अपन हाथ सँ हँसोथि देलनि, जाहि सँ ओ बज्र समान कठोर भ’ जाय । फेर ओ कहलनि – “एक बेर जल्दिये अहाँ आरो जाउ आ बिना कोनो भय केँ निष्कंटक भ’ कय आउ । शपथपूर्वक कहैत छी, हम बालि केँ मारिकय अहाँ केँ संकट सँ अवश्य उबारि देब ।” तखन लक्ष्मण रामक आज्ञा पाबिकय फूल केर एक गोट माला सुग्रीवक गला मे पहिरा देलनि । फेर परम आदरक संग बेर-बेर कहलनि – “जाउ-जाउ !” तखन सुग्रीव फेर ओहि जगह पर गेलाह आ ललकार देलाह – “आब आबिकय लड़े हमरा संग !” ई सुनिकय बालि मोन मे सोचलनि, कि छोट भाइ हमरा ललकारि रहल अछि ? फेर लड़बाक लेल चलि पड़लाह । ओतहि तारा बालिक हाथ पकड़ि लेलिह आ कहलिह – “हे नाथ, अहाँ अचानक लड़बाक लेल चललहुँ, ई उचित नहि कयलहुँ । ओ तँ मरि गेल रहथि आ आब फेर सँ घुरिकय आयल छथि । एहि सँ बुझाइत अछि जे हुनका एकर कोनो अलौकिक शक्ति समा गेल छन्हि ।” ई सुनिकय बालि तामश सँ भरि गेलाह आ बजलाह – ‘कि फेर ओ ताकतवर भ’ कय घुरि आयल अछि ? लड़ाइ मे ओकरा संग दयवला वीर के अछि ? ओकरा संग तँ क्षणहि-भरि मे हमर युद्ध-कामना पूरा होयत । शत्रु निःशंक भ’ लड़ाइ करबाक लेल हमर घर मे पैसि आयल अछि, तखन यदि हम डर सँ घर मे पैसि जायब त माथा पर कलंकक टीका लागि जायत । देखू, कनिकबे काल मे लड़ाइ मे शत्रु केँ जीति लैत छी तेकर बादे फेर सँ घर आ धन-सम्पत्तिक चिन्ता करब ।” ॥२२-३४॥
फेर तारा कहलिह – “हे प्राणपति, सुनल जाउ । संकट केर समय हितैषी सभक सलाह मानि लेबाक चाही । अंगद शिकार करय गेल छलथि, ओतय ओ हुनकर पकिया बात (संकल्प) सुनलनि । राजा दशरथ क आज्ञा मानिकय राम आ लक्ष्मण दुनू भाइ वन मे घुमि रहल छथि । दुनू मानू शक्तिक समुद्र छथि । राजा दशरथक पुत्र राम अपन गाम मे आयल छथि । हम हुनकर बहुत पैघ नाम सुनने छी । हुनका मे एतेक ताकत छन्हि जे कालहु केँ जीति लेथि । लड़ाइ वास्ते हुनकर सोझाँ गेनाय बेकार अछि । प्रभु रामक मोन मे कि बात छन्हि, से के जानि सकैत अछि ? ओ दंडकवन अयलाह जेतय रामक पत्नी सीताक हरण भ’ गेल । हुनकहि खोज मे हुनकर मन लागल छन्हि । एना लगैत अछि जे मायावश ओ मानवरूप धारण कय दीन-विरही बनल छथि । सुग्रीवक संग हुनकर अटूट मैत्री भ’ गेलनि अछि । ओ शक्ति सब सँ सम्पन्न छथि आ हुनकर संकल्प विफल नहि भ’ सकैछ । ओ बाजि चुकल छथि जे बालि केँ मारिकय सुग्रीव केँ राज देताह । ओ जे बजलाह से कय केँ देखौताह । जे अहाँक डरपोक भाइ अहाँक नगरक आसो-पास मे नहि भटकैत छल, वैह आब रामक प्रभाव मे लड़बाक लेल समर्थ भ’ गेल अछि । प्रेमभाव सँ अपन भाइ केँ मनाकय घर लय आनू । समय पर चूकिकय पछताउ जुनि । अपन छोट भाइ केँ युवराज बनाउ । झटपट सीतापति राम लग जाउ ।” ॥३५-४६॥
।मिथिलासंगीतानुसारेण योगियाछन्दः।
तारा चरण धयल नाथक ॥४७॥
कलपि कलपि कानथि कहथि, सिन्दूर राखू माँथक ॥४८॥
बान्धव फूटल वैरी लुटल, छूटल सुखक आशा ॥४९॥
होयता अङ्गद कुमर टूगर, नगर विपति वासा ॥५०॥
यहन पाहुन भाग्यहि पाबिय, लाबिय गरिम गेहे ॥५१॥
अनुज-सहित विपति-रहित, रहब सुचित नेहे ॥५२॥
त्रासहि भरल लङ्का परल, वैरी से विश-वाहू ॥५३॥
रावण मुदित उदित होयत, दशहु वदन राहू ॥५४॥
भावार्थः
तारा अपन पति बालिक पैर पकड़ि लेलिह । बिलखि-बिलखिकय कनैत छथि आ कहैत छथि – “हमर सींथक सिन्दूर बचाउ । भाइ मे फूट भेल; दुश्मन सब केँ खुब फबल (नीक लागल) आ सुखक आशा हेराइत चलि गेल । कुमार अंगद बेसहारा भ’ जेताह आ नगर मे विपत्तिक बसेरा भ’ जायत । एहेन अतिथि भाग्यहि टा सँ भेटैत छथि । हुनका आदरपूर्वक लय आनू । अपन भाइक संग स्नेहपूर्वक निरापद रूप सँ घर मे रहू । बीस बाँहिवला अहाँक दुश्मन रावण डरक मारे लंका मे पड़ल अछि । अहाँ केँ विपत्ति मे पाबिकय ओ रावण प्रसन्न भ’ उठत आ अहाँक लेल मानू दसो मुँह राहुक समान उदित भ’ कय उठत ।” ॥४७-५४॥
।दोहा।
हे तारे तारेश-मुखि, स्त्रीस्वभाव की त्रास ॥५५॥
हृदय लगाय लगाय कह, बाली समय-विलास ॥५६॥
भावार्थः
ई सुनिकय युद्ध-प्रिय बालि तारा केँ बेर-बेर गला सँ लगाकय बुझेलनि – “हे चन्द्रमुखी तारा, अहाँ महिला छी तेँ नाहक मे डराइत छी ।” ॥५५-५६॥
।रोला छन्द।
।लावण्या।
कहल कलावति कुशल, करुण-कृश-कोमल -काये ॥५७॥
नारायणसौँ नेह-निवह, निबहय से न्याये ॥५८॥
भावी भेले चाह, अभय घर भयकर भाये ॥५९॥
प्रबल दैववश बिबुध, अबुध नहि बुद्धि सहाये ॥६०॥
सोदर सौँ सदभाव, आब करितौँ युवराजे ॥६१॥
रघुवर-डरसौँ सन्धि, सिद्धि हसि कहत समाजे ॥६२॥
समदर्शी श्रीराम, धाम अनितहुँ नहि हानी ॥६३॥
विद्यमान विद्वेषि, बन्धु-वध करितौँ फानी ॥६४॥
सकल लोक मे सूर, सुयश की करब मलाने ॥६५॥
प्रेयसि धसि सङ्ग्राम, राम-रण अर्पव प्राणे ॥६६॥
अङ्गद अङ्गज हमर, समय हरि-अरि करि दारुण ॥६७॥
विधिक विधेय बलिष्ठ, विश्वबुध के कर वारण ॥६८॥
फरक नयन मोर वाम, वाम विधि के करत काजे ॥६९॥
तारे महि-विस्तार-भार-हारक रघुराजे ॥७०॥
बध जौँ हमर विधि देथि, बन्धु सुग्रीवक बूतैँ ॥७१॥
बान्धिय तौँ मातङ्ग, कमल-नालक कृश सूतैँ ॥७२॥
भावार्थः
तखन दुबर-पातर आ कोमल शरीरवाली कलावती तारा उत्तर देलिह – “नारायण-रूपी राम सँ मित्रता बनल रहय, यैह उचित होयत । होनी भ’ कय रहत । भाइ सुग्रीव राम सँ अभय (वरदान) पाबिकय खतरा उत्पन्न करयवला भ’ गेल छथि । भाग्य जखन विपरीत भ’ जाइत अछि तखन विद्वान् सेहो मूर्ख भ’ जाइत छथि आ बुद्धि काज नहि दैत छन्हि ।” (बालि कहैत छथि -) “सहोदर भाइ सुग्रीव सँ मेल करितथि आ फेर हुनका युवराज बनबितथि । मुदा एहि बात पर समाज मे हँसी होयत जे हम राम सँ डराकय भाइ सँ मेल कयलहुँ । राम समदर्शी छथि, हुनका अपना ओतय आनू एहि मे त कोनो हानि नहि छैक । मुदा अपन भाइ जे शत्रु भ’ कय ठाढ़ अछि, पहिने ओकरा वध कय लेबय चाहैत छी । हम भरि दुनिया मे शूर मानल जाइत छी । एहि सुयश केँ हम मलिन कोना होबय देब ? हे प्रिये, हम साहसपूर्वक रामक संग लड़ाइ मे कूदि जायब आ युद्ध मे अपन प्राण दय देब । हमर बेटा अंगद शत्रुरूपी हाथी केँ मारय मे खूंखार बाघ अछि । विधाताक विधान अटल होइत छैक; दुनिया मे ओकरा के टारि सकैत अछि ? हमर बायाँ आँखि फड़कि रहल अछि । भाग्य विपरीत बुझा रहल अछि । नहि जानि कि करत ? हे तारा, रघुनाथ राम भरि दुनियाक भार केँ हरण करयवला छथि । यदि विधाता हमरा भाइ सुग्रीवक हाथे मृत्यु दियौता त बुझब कमल केर पातर रेशा सँ हाथी बान्हि देल गेल ।” ॥५७-७२॥
।चौपाइ।
सुग्रीवक वध मानस धयल । बलसौँ बालि गमन रण कयल ॥७३॥
अबइत तनिकाँ देखि कपीश । फनला निर्भय भायिक दीश ॥७४॥
बालिक उपर दु मुष्टि प्रहार । मारि परस्पर एक न हार ॥७५॥
युगल बन्धु बल रण घनघोर । मारा-मारि सुमुख नहि मोर ॥७६॥
प्रभु तरु ओत धनुष आ बाण । अशनि समान कयल सन्धान ॥७७॥
बालिक वक्ष प्रवेशल बाण । से खसला महि मे अज्ञान ॥७८॥
चेतल छूटल मूर्छा गाढ़ । देखल आगु राम प्रभु ठाढ़ ॥७९॥
जटा मकुट शोभा विस्तार । कमल-नयन सुन्दर सुकुमार ॥८०॥
धनुष वाम कर दक्षिण तीर । नव दुर्व्वादल रुचिर शरीर ॥८१॥
कपिवर लक्ष्मण पार्श्व समाज । शोभा-घर रघुवर छविराज ॥८२॥
बालि कहल शुनु विभु अवतार । हम न कदापि कयल अपकार ॥८३॥
वृक्षखण्डसौँ की चुपचाप । मारल जानल सुयश प्रताप ॥८४॥
मनुक वंश क्षत्रिय दायाद । तस्कर-सम सभ गत-मर्याद ॥८५॥
लड़ि नहि शकलहुँ समर समक्ष । समदर्शी सुग्रीवक पक्ष ॥८६॥
से की कयल अहँक उपकार । हम की कयल शत्रु-व्यवहार ॥८७॥
दण्डक वनसौँ हे भगवान । सीता-हरण शुनल हम कान ॥८८॥
की कर हमर भीरु ई भाय । जनिकर हेतु एहन अन्याय ॥८९॥
अबइत दशमुख बाँधल आज । पबितहुँ प्रभु मनवांछित काज ॥९०॥
हमरो बल किछु देखितहुँ राम । प्राण चलल नहि पल संग्राम ॥९१॥
शोच प्राण ई जाइछ छूटि । लबयित देखल न लङ्का लूटि ॥९२॥
वानर मारि गेल सद्धर्म्म । मांस अभक्ष्य कयल की कर्म्म ॥९३॥
कहल बहुत प्राणक अवसान । चरण निरीक्षण सौँ भेल ज्ञान ॥९४॥
किछु नहि मन मध हर्ष विषाद । राम कहल शुनु गतमर्याद ॥९५॥
बहिनि कन्यका अनुजक नारि । पुत्र-वधू नहि लेथि विचारि ॥९६॥
कामातुर कर रति अन्याय । अततायी जानक समुदाय ॥९७॥
से प्राणी जानब चण्डाल । विषम विषयि इन्द्रिय प्रतिपाल ॥९८॥
बलसौँ देल हम तोहरा मारि । तोँ भोगह निज अनुजक नारि ॥९९॥
परमेश्वर साक्षी सर्वज्ञ । बालि न बुझलह वानर अज्ञ ॥१००॥
भावार्थः
सुग्रीवक वध करब मोन मे ठानिकय बालि हठात् लड़ाइ लेल चलि पड़लाह । सुग्रीव हुनका अबैत देखि निःशंक भ’ भाइ उपर कूदि पड़लाह । ओ भाइ बालिक उपर दुइ मुक्का जमा देलनि । फेर आपस मे मारि शुरू भ’ गेल । कियो हारयवला नहि । दुनू भाइ बहुते बलवान रहथि । घनघोर लड़ाइ चलल । परस्पर प्रहार होबय लागल । कियो मुँह मोड़यवला नहि छल । तखन प्रभु राम गाछक दोग (ओट) सँ वज्रक समान अपन बाण धनुष पर चढ़ाकय चला देलनि । बाण निकलिकय बालिक छाती मे लागि गेल । बालि बेहोश भ’ धरती पर खसि पड़लाह । मूर्च्छा खत्म भेला पर चेतना अयलनि । देखलनि जे प्रभु राम सोझाँ मे ठाढ़ छथि । जटा आ मुकुट अपूर्व शोभा पाबि रहल छल । आँखि कमल-जेहेन छल । ओ सुन्दर आ सुकुमार देखाय दैत छलथि । बायाँ हाथ मे धनुष आ दायाँ हाथ मे बाण रहनि । शरीरक रंग नव दुइब जेहेन मनोरम श्यामल छल । सुग्रीव आ लक्ष्मण बगल मे ठाढ़ रहथि । रामक छवि शोभाक खान जेहेन लगैत छल । बालि कहलनि – “हे विष्णुक अवतार राम, हम तँ अहाँक कोनो अहित नहि कयलहुँ । तखन अहाँ नुकाकय गाछक दोग सँ हमरा कियैक मारलहुँ ? अहाँक सुयश आ प्रताप हमरा बुझल अछि । अहाँक जन्म मनुक वंश मे आर क्षत्रिय समाज मे भेल अछि । तैयो अहाँ मर्यादा केँ छोड़िकय (त्यागिकय) चोर जेकाँ एहेन काज कयलहुँ । अहाँ युद्ध मे हमरा सँ सोझाँ-सोझी लड़ि नहि सकलहुँ । समदर्शी भ’ कय अहाँ सुग्रीवक पक्षपात कयलहुँ । ओ अहाँक कोन भलाइ कयलक आ हम कोन दुश्मनी कयलहुँ ? हे भगवान् राम, हम सुनलहुँ जे दंडकवन सँ अहाँक पत्नी सीताक हरण भेल अछि । हमर ई डरपोक भाइ (सुग्रीव) एहि मे अहाँक कि मदति कय सकत, जेकरा वास्ते अहाँ एहेन अन्याय कयलहुँ ? आइ रावण बान्हिकय अहाँ लग आनल जइतय । हे प्रभु, अहाँक चाह पूरा भ’ जइतय । हे राम, किछु हमरो बल तँ देखितहुँ । लड़ाइ शुरू होइते अहाँक बाण सँ हमर प्राण चलि गेल । हमरा दुःख अछि जे हमर जान जा रहल अछि । अहाँ लंका केँ लूटिकय अनैत हमरा नहि देखि सकलहुँ । हम वानर केँ मारिकय अहाँ केँ भारी अधर्म भेल । वानरक त मांउसो नहि खायल जाइछ, फेर अहाँ एहेन काज कियैक कयलहुँ ?” ॥७३-९३॥
एहि तरहें प्राण छोड़ैत समय बालि बहुते-रास बात कहलनि । फेर रामक चरणक दर्शन पाबिकय हुनका ज्ञान भेटि गेलनि । तखन त न मन मे हर्ष रहलनि, आ न विषाद । राम कहलखिन – “हे बालि, तूँ मर्यादाक त्याग कयलह । बहिन, बेटी, छोट भाइक पत्नी आ पुतोहु – हिनका सब केँ विचारवान् लोक ग्रहण नहि करैत छथि । जे कामातुर भ’ अन्यायपूर्वक हिनका सभक संग रमण करैत अछि, से आततायी मानल जाइत अछि । एहेन प्राणी केँ चण्डाल बुझबाक चाही । विषय सब सँ इन्द्रिय केँ बचाकय रखनाय बहुत कठिन होइत छैक । हम जानि-बुझिकय तोरा मारलहुँ अछि कियैक तँ तूँ अपन छोट भाइक स्त्री केँ राखि लेलह । भगवान सब किछु जनैत छथि आ सब कर्मक साक्षी होइत छथि । हे बालि, तूँ अज्ञानी वानर थिकह, तोरा अपन कुकर्म बुझय मे नहि अबैत छह ।” ॥९४-१००॥
।छन्द रोला।
।लावण्या।
बालि कहल हम कहल बहल, अनुचित अज्ञाने ॥१०१॥
क्षमा करिय क्षिति-भार-हरण-कारक भगवाने ॥१०२॥
तीर्थ-मूल-कर-तीर-विद्ध ई त्याग शरीरे ॥१०३॥
निरखि निरखि नव-नीरदाभ अभयद रघुवीरे ॥१०४॥
हम चललहुँ प्रभु-धाम तनय अङ्गद हित मानब ॥१०५॥
हमर तुल्य बल बुद्धि दनुज-गहनानल जानब ॥१०६॥
हृदय उपर धरु हाथ तीर बाहर करु उरसौँ ॥१०७॥
चिरञ्जीव सुग्रीव जीव जाइछ सुखपुर सौँ ॥१०८॥
तथा कयल रघुनाथ हाथ शीतल देल छाती ॥१०९॥
जयजय धुनि कर गन सगण सुरपति सुर-पाँती ॥११०॥
बालिसौँ बनि विबुधेश-रूप चलला विभु-धामे ॥१११॥
मुनि दुर्ल्लभ-गति-देनिहार सीतापति रामे ॥११२॥
भावार्थः
बालि कहलनि – “हे राम, हम अज्ञानवश बहुते-रास अनुचित बात कहि देलहुँ । हे धरतीक भार केँ दूर करनिहार ईश्वर, हमरा क्षमा कयल जाउ । ओ हाथ सब पुण्यतीर्थ सभक मूल अछि जाहि सँ छूटल बाण सँ घायल एहि शरीर केँ छोड़िकय आ नव मेघ-समान श्यामवर्ण अभयदाता रामचन्द्रक छवि बेर-बेर देखिकय हम परमधाम चललहुँ । अहाँ कृपा कय केँ अंगद केँ अपन हित बुझब । ओ अंगद बल आ बुद्धि मे हमर बराबर अछि आ ओ राक्षस-रूपी वन वास्ते मानू आइग अछि । हमर हृदय पर हाथ राखू आ छाती मे भोंकायल तीर केँ निकालि दियह । सुग्रीव चिरंजीवी हो ! हमर प्राण भोगाश्रय शरीर सँ निकलि रहल अछि ।” राम ओहिना कयलनि । छाती पर शीतल हाथ रखलनि । आकाश मे इन्द्र-सहित सदल-बल-देवगण जय-जय ध्वनि करय लगलाह । बालि देवरूप भ’ कय स्वर्ग-धाम सिधारि गेलाह । सीता-पति राम, एहेन गति दियए मे समर्थ छथि जे मुनि सभक लेल सेहो दुर्लभ अछि ॥१०१-११२॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयोऽध्यायः।
।श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे किष्किन्धाकाण्डक दोसर अध्याय समाप्त भेल।
हरिः हरः!!

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Ego kaavat chhai n ki jekhan kekrao morai k ber (Naasak ber) hoit chhai t budhhi biprit bho jait chhai. Jahan hunkar patni bahut bujhelkhin tahiyo (Bali k) hunka samajh nai elain. Bali kahlkhin je jao ham bhai sang dosti ko anav t ohi san hamar samaj m badd badnami hoyat je Ram k dar san eh dosti kelah. Tahan gelah aa Sugrib (Dunu Bhai) loro laglah. T prabhu Ram dwara hunka baan san mair del gel. O sab dekh bali Ram san kahla eh t aha thik nai kelao. Aha k Sugrib san ki labh hoyat? Hom ki kelao tahan prabhu kahlain je aha t badd badka galat kaaj kelao aha apan chhot bhai k patni k haraip k raikh lelao auro kate tarhak kaaj kelao. T hunka ehi baat sabhak bhan bhelain aa o kaho laglah ki je hamsan eh apradh bho gel. Aha hamara sarir m je baan lagal aichh okra nikail diyo jahi san ehi pida san mukta bho jayav. Prabhu k o sital haath rakhite sab pida door hoit o swarga sidhair gelah. Bhagbaan k eh lila dekh (Bhagbaan, Sant muni) harsit bho gelah. Tahi lel kahal jait chhai je kono bikat samay m aano k baat suin aa ohi par bichar karbaak chahi.
हे तारे तारेश-मुखि, स्त्रीस्वभाव की त्रास ॥५५॥
हृदय लगाय लगाय कह, बाली समय – विलास ॥५६॥
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