Search

मिथिलाभाषा रामायणः किष्किन्धाकाण्ड प्रथम अध्याय – रामजीक पम्पासर पहुँचब

975 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण – किष्किन्धाकाण्ड

अथ प्रथमोऽध्यायः 

रामजीक पम्पासर पहुँचब 

।पृथ्वीछन्दः।

भ्रमन्निविड़काननम्बहुलभोगिपञ्चानन ॥१॥
सतीजनशिरोमणिञ्जनकजां हि पृथ्वीजनिम् ॥२॥
स्मरन्नतुलविक्रमः श्रितकनिष्ठबन्धूत्तमो ॥३॥
ददातु कुशलं सदा जगति दत्तमायाभ्रमः ॥४॥
सुग्रीवबान्धवभयोत्तितघोरदुःख-॥५॥
पाथाधिशोषणमहाबलकुम्भयानिः ॥६॥
श्रीमद्रघूत्तमविलोकनदुःखशेषः ॥७॥
पायात्स मारुतसुतो धृतविप्रवेषः ॥८॥

भावार्थः

साँप आ सिंह सब सँ भरल घनघोर जंगल मे घुमैत-घुमैत, सतीशिरोमणि भूमिसुता जानकीक स्मरण मे लीन, छोट भाइ केँ संग मे लेने, अनुपम पराक्रमी, मायाक भ्रम पसारनिहार भगवान रामचन्द्र हमरा सभक कल्याण करथि ॥१-४॥ विप्रक रूप धारण कएने पवनसुत हनुमान हमरा सभक पालन करथि, जे सुग्रीव केर मित्र रामचन्द्रक भयजन्य, घोर दुःखरूपी समुद्र केँ सोखय मे महाबली अगस्त्यक समान छथि, आर जिनकर सब दुःख रामचन्द्रक दर्शन करिते दूर भ’ जाइत छन्हि ॥५-८॥

।चौपाइ।

लक्ष्मण-सहित राम रणधीर । गेला पम्पा-सरवर-तीर ॥९॥
मन विस्मययुत भेल तहिठाम । सानुज प्रभु कयलनि विश्राम ॥१०॥
एक कोश परिपूरित वारि । हंसप्रभृति खग बस जलचारि ॥११॥
नित्यकृत्य कर कृत-जलपान । पुन उठि दुहुजन कयल प्रयाण ॥१२॥
ऋष्यमूक पर्व्वत लग गेल । कपि सुग्रीव से देखयित भेल ॥१३॥
गिरि-शिखरस्थ बहुत भय पाय । के ई थिकथि बुझल नहि जाय ॥१४॥
वल्कल वसन जटा गिरि राज । तकयित तरुवन की अछि काज ॥१५॥
धनुष बाण कर वीर महान । की वृत्तान्त न हो अनुमान ॥१६॥
मन्त्री चारि विचारिय मन्त्र । अबयित छथि दुओ वीर स्वतंत्र ॥१७॥
की जनुवैरि पठाओल बालि । जयता हमर जीव की घालि ॥१८॥
जाउ निकट वटु बनि हनुमान । साधु असाधु करू मन ज्ञान ॥१९॥
जौँ अनिष्ट बुझलासौँ आब । युगुतिहि तेहन जनायब भाव ॥२०॥
गमहि पठायब राखब प्राण । से शुनि ततय गेला हनुमान ॥२१॥
ब्राह्मण वेष सुलेख बनाय । विनय सदय गुणमय सन्न्याय ॥२२॥
ईश्वर-लक्षण-लक्षित वेष । माया-मानुष रूप विशेष ॥२३॥
पुछल अमल के पुरुष पुराण । अहँ कहु विश्वबीज भगवान ॥२४॥
भूमि-भार-हारक अवतार । दुहु जन उहसँ परम उदार ॥२५॥
जगन्नाथ क्षत्रिय तन धयल । भ्रमयित वन आनन्दित कयल ॥२६॥
अपनैँ नारायण नहि आन । हमरा यहन होइछ अनुमान ॥२७॥
प्रतिपालक प्रभु धर्म्मक सेतु । एत आगमन क बुझल न हेतु ॥२८॥
से शुनि प्रभु लक्ष्मण सौँ कहल । तखनुक उचित समय जे रहल ॥२९॥
ई वटु पटु पण्डित बुधि बेश । सुवचन-रचन अशुद्ध न लेश ॥३०॥
ई कहिकैँ तनिका दिश ताक । शुनु वटु उत्तर दैछि अहाँक ॥३१॥
दशरथ नृपक पुत्र हम राम । अनुज हमर ई लक्ष्मण नाम ॥३२॥
अयलहुँ दण्डक कहलनि तात । सङ्ग सती सीता विख्यात ॥३३॥
तनिकाँ छलसौँ हरलक चोर । प्राणाधिक प्रेयसि से मोर ॥३४॥
हुनका तकइत अयलहुँ आज । के अहँ ककर कहू की काज ॥३५॥
से शुनि विहित वचन कह फेरि । श्याम गौर मुख-नीरज हेरि ॥३६॥
ई गिरि पर छथि से कपिराज । चारि मन्त्रिवर तनिक समाज ॥३७॥
बालिक भाय नाम सुग्रीव । देह दूइ एके जनु जीव ॥३८॥
काम कालगति कहल न जाय । सोदर कयल अकथ अन्याय ॥३९॥
जेठ भाय लेल सम्पति नारि । विकल पड़ल छथि बालिसौँ हारि ॥४०॥
ऋष्यमूक गिरि शापक भीति । एतय न तैँ कय शकथि अनीति ॥४१॥
पवनक तनय नाम हनुमान । हम सुग्रीवक मन्त्रि प्रधान ॥४२॥
तनिक सङ्ग प्रभु मैत्री करिय । मित्र मित्र मिलि आपद तरिय ॥४३॥
प्रभु हम सत्वर चललहुँ ततय । रुचि हो तौँ चलि ओ छथि जतय ॥४४॥
कहल राम हम मैत्री करब । तनिकर कष्ट विकट झट हरब ॥४५॥
अकपट प्रकट रूप सभ कहल । सुग्रीवक वृत्तान्त जे रहल ॥४६॥
हमरा काँध चढ़िअ दुहु भाय । कपिपति निकट देब पहुचाय ॥४७॥
प्रभु सौँ जेहन कहल हनुमान । सानुज तेहन कयल भगवान ॥४८॥
पर्व्वत-शिखर उपर श्रीराम । जाय कयल तरुतर विसराम ॥४९॥

भावार्थः

रणधीर राम लक्ष्मणक संग पम्पासरक तट पर गेलथि । पहुँचिते देरी मोन प्रसन्न भ’ गेलनि आ अनुज-सहित ओतय विश्राम कयलनि । एक कोस धरि पानि पसरल छल । ओहि मे हंस आदि जलचर पक्षी सब भरल छल । भोरे उठिकय दुनू भाइ नित्यकर्म कय केँ जलपान कयलनि, फेर उठिकय घुमय लेल चलि पड़लाह । जखन दुनू ऋष्यमूक पर्वत लग अयलाह त कपिराज सुग्रीव हुनका देखलनि । ओ पहाड़क चोटी पर बैसल भयभीत भ’ सोचय लगलाह – ‘अरे, ई दुनू गोटे के थिकाह ? किछु बुझय मे नहि अबैछ । दुनू गोटे गाछक छाला पहिरने छथि, माथ पर जटा शोभित छन्हि आ जंगल मे किछु ताकि रहल छथि । नहि जानि कि काज छन्हि ? दुनू महान वीर लगैत छथि कियैक तँ दुनू गोटेक हाथ मे तीर आ धनुष छन्हि । बात कि छैक, किछु बुझय मे नहि अबैछ । चारू मंत्री लोकनि केँ बजाकय नीतिविषयक विचार कयल जाय । ई दुनू स्वतंत्र वीर एम्हरहि आबि रहल छथि । कि बालि दुश्मन सब केँ पठेलक अछि ? कि ई सब हमर प्राण लय लेल आयल छथि ?’ एना सोचिकय सुग्रीव हनुमानजी सँ कहलनि – “हे हनुमान, अहाँ बटुक (ब्राह्मणकुमार) केर रूप धारण कय हुनका दुनू लग जाउ आ ई पता करू कि हिनकर नेत नीक छन्हि या खराब । यदि कोनो अनिष्टक शंका हो तँ युक्तिये सँ अपन भाव प्रकट करब । अपन जान बचायब आ शान्तिपूर्वक हुनका पठा देब ।” एतेक सुनिकय हनुमान ओतय चलि पड़लाह । ओ ब्राह्मण (बटुक) केर आकर्षक बाना बनौने रहथि तथा विनम्र, दया, विवेक आदि गुण सब सँ युक्त रहथि । जाकय हनुमान हुनका दुनू गोटे सँ पुछलनि – “अपने दुनू के थिकहुँ ? हमरा त लगैत अछि जे अपने विश्वक बीज-स्वरूप, निर्मल आदिपुरुष भगवान थिकहुँ । अहाँक बेष मे ईश्वरक लक्षण देखाय पड़ैत अछि । शायद अपने मायावश मनुष्यक रूप बना रखने छी । अपने धरतीक भार केँ दूर करबाक वास्ते अवतार लेलहुँ अछि । हे संसारक स्वामी, अपने बहुत उदार छी । अपने क्षत्रिय केर रूप धय केँ वन मे भ्रमण करैत हमरा बहुत आनन्दित कयलहुँ । हमरा त एहेन अनुमान लगैत अछि जे अहाँ कियो आर नहि, साक्षात् नारायण छी । हे प्रभु, अपने धर्म केर सेतुक रक्षा करयवला छी । हमरा ई नहि बुझय मे आयल जे अहाँ एतय कोन काज सँ अयलहुँ ?” ई सुनिकय राम लक्ष्मण सँ कहलनि, जेना ताहि समय उचित छल । “ई बच्चा पक्का पंडित अछि । एकर बुद्धि नीक छैक । सुन्दर वचन बजैत अछि । गलती कतहु नहि होइत छैक ।” ई कहिकय राम हुनका दिश देखिकय कहलनि – “हे बटुक, सुनू । अहाँ केँ हम जवाब दैत छी । हम राजा दशरथक बेटा छी । ई लक्ष्मण हमर छोट भाइ छथि । पिताक आज्ञा सँ दंडकवन अयलहुँ । संग मे हमर साध्वी पत्नी सीता सेहो छलिह । हुनका एकटा चोर ठकिकय हरण कय लेलक । ओ हमरा प्राणहु सँ बढ़िकय प्रिय छलिह । हुनकहि ताकैत हम आइ एतय अयलहुँ अछि । अहाँ के थिकहुँ, केकर आदमी छी आ कि काज अछि ?” ई सुनिकय तथा राम आ लक्ष्मण केर क्रमशः साँवर आ गोर चेहरा केँ देखिकय हनुमान उचित वचन बजलाह – “एहि पर्वत पर एकटा कपिराज अपन चारि मंत्रीक संग रहैत छथि । ओ बालि केर भाइ थिकाह । हुनक नाम सुग्रीव थिकन्हि । दुनू भाइ मे बड मित्रता रहनि, मानू दुइ शरीर एक प्राण होइथ । काम-वासनाक लीला कहल नहि जा सकैछ । सहोदर भाइ एहेन अन्याय कयलनि जे कहल नहि जा सकैछ । जेठ भाइ हिनकर राज्य आ पत्नीक हरण कय लेलखिन्ह । ओ बालि सँ हारिकय विकल पड़ल छथि । ई ऋष्यमूक पर्वत थिक, एतय आबय मे बालि केँ श्रापक डर छैक, ताहि लेल ओ एतय आबिकय अन्याय नहि कय रहल अछि । हम वायुक पुत्र हनुमान छी आर राजा सुग्रीवक प्रधानमंत्री छी । हे प्रभु, अपने हुनका संग मैत्री करू आ दुनू मित्र मिलिकय पत्नी-हरण-रूपी विपत्तिक प्रतिकार करू । हे प्रभु, हम तुरत अपना प्रभु लग चललहुँ, जँ अपनेक सेहो इच्छा हुए तँ हुनका सँ भेटय वास्ते चलू ।” राम कहलनि – “हम जरूर हुनका सँ दोस्ती करब आ हुनकर कष्ट केँ तुरत दूर करब ।” एतेक सुनिकय हनुमान अपन वास्तविक रूप मे प्रकट भेलाह आ सुग्रीवक सारा वृत्तान्त कहि सुनेलनि । फेर बजलाह – “अपने दुनू भाइ हमर कान्ह (कन्धा) पर चढ़ि जाउ, हम कपिराज सुग्रीव लग पहुँचा देब ।” हनुमान राम सँ जेना कहलनि, भाइ-सहित भगवान राम ओहिना कयलनि ॥९-४९॥

।दोहा।

मुदित मनोरथ-सिद्धि सन, अति हर्षित मन आज ॥५०॥
महावीर कहु कहु कुशल, पुछल चकित कपिराज ॥५१॥

भावार्थः

वापस आयल हनुमान सँ कपिराज सुग्रीव विस्मय-सहित पुछलनि – “हे महावीर, आइ लगैत अछि जे काज बनला सँ अहाँक मोन अत्यन्त हर्षित अछि । कहू, कि हाल अछि ?” ॥५०-५१॥

।चौपाइ।

हाथ जोड़ि कहलनि हनुमान । छथि अनुकूल विष्णु भगवान ॥५२॥
आधिक अवधि अन्त दिन आज । से प्रभु अयला अहँक समाज ॥५३॥
करु करु मंत्री कपिपति जाय । आनल हम निज काँध चढ़ाय ॥५४॥
साक्षी अनल बनल रहु मित्र । सकल अमानुष राम-चरित्र ॥५५॥
संक्षेपहि कहलनि हनुमान । सानुज राम थिकथि भगवान ॥५६॥
निर्भय चलू मित्रता करिय । बालिक गर्व्व सर्व अहँ हरिय ॥५७॥
मन अति हर्षित तय कपीश । गेला जतय राम जगदीश ॥५८॥
तरु-वर-शाखा लय कँहु हाथ । देल ताहि बैसला रघुनाथ ॥५९॥
कुशल सकल बुझि बैसला दान्त । लक्ष्मण कहल सकल वृत्तान्त ॥६०॥
शुनि सुग्रीव रामकेँ कहल । सब विधि करब सकल हम टहल ॥६१॥
बैदेही जैँ विधि जे देश । अति सत्वर बुझि कहब सन्देश ॥६२॥
सतत सहाय महा रण काज । अपनैँ सौँ सपनहुँ नहि व्याज ॥६३॥

भावार्थः

तखन हनुमान हाथ जोड़िकय कहलनि – “भगवान विष्णु अनुकूल छथि । आइ दुःखक घड़ीक अन्तिम दिन छी । ओ दुनू महानुभाव अपनहि लग आयल छथि । हम दुनू गोटे केँ अपन कन्हा पर चढ़ाकय अनलहुँ अछि । अग्नि केँ साक्षी मानिकय अहाँ हुनका संग मित्र बनल रहू । रामक सबटा चरित्र अलौकिक छन्हि ।” ॥५२-५५॥

हनुमान संक्षेपहि मे कहलनि – “छोट भाइ लक्ष्मण-सहित राम साक्षात् भगवान थिकाह । बेधड़क चलू, हुनका संग मैत्री करू आ हुनकर सहायता सँ बालिक सबटा घमंड केँ चूर करू ।” ॥५६-५७॥

ई सुनितहि कपिराज सुग्रीव परम हर्षक संग ओतय पहुँचलाह जेतय भगवान राम विराजमान रहथि । राम एकटा सुन्दर गाछक ठाढ़ि हाथ मे लय केँ सुग्रीव केँ बैसबाक लेल देलनि । सुग्रीव कुशल पुछिकय शान्तचित्त सँ बैसि रहलाह । तखन लक्ष्मण सारा वृत्तान्त सुनौलनि । सुग्रीव से सुनिकय राम सँ कहलनि – “हम सब तरहें अपनेक सेवा करब । जानकी जाहि कोनो स्थान मे जेनाहू हेतिह, तेकर पता लगाकय अहाँ केँ बतायब । घोर लड़ाइ केर काजहु मे हम सदिखन सहयोगी बनल रहब । अहाँ सँ सपनहुँ मे कोनो व्याज (अपेक्षा) नहि करब ॥५८-६३॥

।शार्दूलविक्रीड़ित छन्द।

रे रे चोर कठोर छोड़ हमरा कानैत भीता छली ॥६४॥
हा आकाशक पन्थ राक्षस बली से दुष्ट-नीता छली ॥६५॥
हा नै जानल गेल दुष्ट धरितौँ श्रीविश्वमाता छली ॥६६॥
मन्त्री सङ्ग यथार्थ देखल रमा सौन्दर्य्य सीता छली ॥६७॥

भावार्थः

हम मंत्री सभक संग सचमुच मे देखने रही जे एकटा बलवान राक्षस एक महिला केँ हरण कयकेँ आकाश-मार्ग सँ जा रहल छल । ओ (महिला) त्रस्त भ’ जोर-जोर सँ चिकरि रहल छलिह – ‘अरे, अरे कठोर चोर ! छोड़, हमरा छोड़ि दे !’ मुदा अफसोस ! हम जानि नहि सकलहुँ जे ओ जगज्जननी लक्ष्मी-समान सुन्दरी सीता छलिह । यदि जानि पबितहुँ तँ ताही समय ओकरा पकड़ि लितहुँ ॥६४-६७॥

।वसन्ततिलकाछन्द।

हा रामचन्द्र रघुनाथ अनन्त बेरी ॥६८॥
कानैत बाजक अधानि जना बटेरी ॥६९॥
दिव्योत्तरो पट विभूषण फेकि देल ॥७०॥
से कन्दरा-मध सुयत्न सौँ राखि लेल ॥७१॥

भावार्थः

बाजक गिरफ्त मे पड़ल बटेर जेकाँ सीता बेर-बेर चिकरैत छलिह – ‘हा रामचन्द्र ! हा रघुनाथ !’ ओ अपन दिव्य ओढ़नी (दोपटा) आ गहना फेंकि देलिह । हम से गुफा मे हिफाजत सँ राखि लेने छी ।” ॥६८-७१॥

।चौपाइ।

से शुनितहिँ माँगल रघुवीर । लयला अपनहि कपिपति चीर ॥७२॥
प्रभु चिन्हितहि लेल हृदय मे राखि । हा हा जानकि जानकि भाखि ॥७३॥
कयल विलाप कहय के पार । करुणामय करुणा विस्तार ॥७४॥
से द्वितीय पट पाओल आज । दुःख कहै छी परिहरि लाज ॥७५॥
जुआ एकान्त धरथि जे काँति । कण्ठपाश क्रीड़ारस राति ॥७६॥
क्रीड़ा-श्रम हर व्यजन रतान्त । शय्या प्रणयक कलह नितान्त ॥७७॥
लक्ष्मण कहल धैर्य्य धरु नाथ । उत्पत्ति स्थिति लय प्रभु हाथ ॥७८॥
वानरेन्द्र बलवान सहाय । सुख दुख भोग देहकाँ पाय ॥७९॥
भेटतिहि सीता थोड़हि काल । अरिगण मरता गर्व्व विशाल ॥८०॥
प्रभु-विलाप शुनि कहल कपीश । मन करु थिरतर प्रभु जगदीश ॥८१॥
हम मारब दशकन्धर जाय । सीता आनब अवसर पाय ॥८२॥
अग्नि साक्षि मारुत सुत-आन । युगल सख्य भेल जीव समान ॥८३॥
कपट-रहित मिलि मिलि एकठाम । बैसला कपिवर रघुवर राम ॥८४॥
करब मित्र हम यत्न बहूत । महि सभठाम पठाओब दूत ॥८५॥
रघुवर पुछलनि कहु कहु मित्र । देव देल की विपति चरित्र ॥८६॥
कहयित छी हम बन्धु-कुचालि । हमरा जेठ भाइ छथि बालि ॥८७॥
एक समय उपगत उतपात । मयसुत मायावी विख्यात ॥८८॥
किष्किन्धा आयल अधराति । ललकारल निर्भय खल जाति ॥८९॥
शुनल बालि रावण-अरि कान । कोप-विवश चलला बलवान ॥९०॥
मारल एक मुका तहँ गाढ़ । राक्षस विकल रहल नहि ठाढ़ ॥९१॥
बालिक बल बुझि खल भय पाय । भूधर-विवर समायल जाय ॥९२॥
विवरहुमे ओ कयल प्रवेश । हमरा देलनि यहन निदेश ॥९३॥
अँह यहिठाम रहू भरि पक्ष । रण-रिपु-मारण मे हम दक्ष ॥९४॥
अवधिक अधिक दिवस बिति जाय । तौँ जानब रण हारल भाय ॥९५॥
स्नेह-विवश रहलहुँ भरिमास । विवरैँ रुधिर बहल भेल त्रास ॥९६॥
शिलाखण्ड सौँ मूनल द्वार । गमहि गेलहुँ पुर भय विस्तार ॥९७॥
मन्त्री-गण मिलि से मति धयल । कपि राजा हमरा एत कयल ॥९८॥
किछु दिन बितला अयला गाम । के कह के शुन के कर साम ॥९९॥
विकट विकट निकटहिँ पढ़ि गारि । मारल बिनु बुझलहि बड़ मारि ॥१००॥
से सर्व्वस्व नारि लेल छीनि । हम भय रहलहुँ कौड़िक तीनि ॥१०१॥
के रक्षा कर के दे बास । सभकाँ मनमे बालिक त्रास ॥१०२॥
केवल यहि गिरिपर नहि आब । मुनि मातङ्ग क शाप प्रभाव ॥१०३॥

भावार्थः

एतेक सुनितहि राम चीर मँगलनि आ सुग्रीव स्वयं तुरन्त ओ आनिकय दय देलनि । तेकरा चिन्हिते देरी राम से छाती सँ लगा लेलनि आ बिलखिकय विलाप करय लगलाह – ‘हा जानकी !’ ओ तेना विलाप कयलनि तेकर वर्णन के कय सकैत अछि ? करुणामय केर करुणाक सीमा के कहि सकैत अछि ? राम कहलनि – ‘ओ ओढ़नी फेर आइ भेटल । वेदनावश हम सबटा लेहाज छोड़िकय कहैत छी । सीता असगर मे जुआ खेलाइत समय एकरा बाजी मे रखैत छलिह; राति मे केलि केर समय यैह कंठपाश होइत छल । केलिक अन्त मे ओ थकान केँ दूर करबाक लेल पंखा बनि जाइत छल । प्रणय-कलह मे ई बिछाउना बनि जाइत छल ।” ॥७२-७७॥

लक्ष्मण बजलाह – “हे प्रभु, धैर्य धारण करू । उत्पत्ति, स्थिति आ प्रलय – तीनू अहींक हाथ मे अछि । कपिराज बलवीर सुग्रीव सहायक छथि । शरीर भेटला पर सुख आ दुःख केर भोग तँ सब केँ करहे टा पड़ैत छैक । जल्दिये सीता भेटि जयतिह आ घमंडी दुश्मन केर अन्त होयत ।”  ॥७८-८०॥

प्रभु रामचन्द्रक बिलखब सुनिकय कपिराज सुग्रीव बजलाह – “हे प्रभु जगदीश्वर, ढाढ़स बान्हु । मौका भेटितहि हम दशानन रावण केँ मारब आ सीता केँ लय आनब ।” ॥८१-८२॥

पवनसुत हनुमानजी साक्षीक रूप मे अग्नि लय अनलाह आ अग्निक सामने दुनू गोटे मे एक-दोसरक प्राणक समान दोस्ती भ’ गेलनि । तखन राम आ सुग्रीव दुनू निश्छल हृदय सँ हिलि-मिल कय एकटा स्थान पर बैसि गेलाह । फेर सुग्रीव बजलाह – “हे मित्र, हम पूरा कोशिश करब । दुनिया भरि मे सब ठाम दूत पठायब ।” तखन राम पुछलखिन – ‘हे मित्र, कहू त, विधाता ई केहेन विपत्ति अहुँ केँ देलनि अछि ।” सुग्रीव कहलखिन – “हम अपन भाइक खराब चाइल सुनबैत छी । बालि हमर बड़ भाइ छी । एक समय एकटा उत्पात उठल । मय नामक राक्षसक विख्यात बेटा मायावी आधा राति मे किष्किन्धा आयल । ओ निर्भय दुष्ट ललकारा मारलक । रावणक शत्रु बालि ओकर ओहि ललकारा केँ सुनलक । बलवान् बालि क्रोधित भ’ कय चलि पड़ल । ओ ओतहि ओहि राक्षस केँ कसिकय एक मुक्का मारलक । ओ राक्षस विकल भ’ खसि पड़ल । बालिक बल केँ देखिकय ओ दुष्ट डरा गेल आ धरतीक खोह (गुफा) मे जा पैसल । बालि ओकरा खोहो मे पैसिकय पाछाँ कयलक । ओ खोह मे पैसैत समय हमरा ई कहि गेल जे – “तूँ एक पखवारा (पक्ष) धरि हमर प्रतीक्षा मे एतहि रहिहें । हम लड़ाइ मे शत्रु केँ मारय मे कुशल छी । जँ पखवारा भरिक अवधि बीति जाउ तखन तूँ ई बुझिहें जे तोहर भाइ लड़ाइ मे हारि गेलौक ।” हम महीना भरि स्नेहवश ओकर प्रतीक्षा करैत रहलहुँ । खोह सँ लहूक धारा बहय लागल । से देखिकय हम डरा गेलहुँ । तखन हम पाथरक एकटा टुकड़ा लय ओहि खोहक मुँह केँ बन्द कय देलहुँ तथा संत्रस्त भ’ कय ओतय सँ चुपचाप निकलि गेलहुँ । फेर बालिक मंत्री लोकनि सँ मिलिकय विचार-विमर्श कयलहुँ आर एतय हमरा वानरक राज्य केर राजा बना देल गेल । थोड़ेक दिन बाद बालि घर घुरि आयल । न किछु कहलक आ न किछु सुनलक – फेर शान्तिक बात के करैत अछि । सामनहिये मे तीख-तीख गाइर सुनबय लागल आ बिना बुझने-सुझने हमरा बड मारि मारलक । ओ हमर सबटा सम्पत्ति आ स्त्री सेहो छिनि लेलक । हम डरक मारे ओकरा सोझाँ ‘कौड़ीक तीन’ बराबर तुच्छ रहि गेलहुँ । हमर रक्षा के करत ? के शरण देत ? सभक मन तँ बालि केर डरक मारि सँ त्रस्त छैक । केवल ई पर्वत एहेन अछि जेतय बालि मातंग मुनिक श्रापक प्रभाव सँ पैर नहि राखि सकैत अछि । ताहि लेल हमरा एतय शरण भेटल अछि ।” ॥८३-१०३॥

।सोरठा।

बालिक बुझि अन्याय, सुग्रीव क बुझि साधुता ॥१०४॥
अछि लघु सहज उपाय, श्रीरघुनन्दन कहल तहँ ॥१०५॥

भावार्थः

फेर बालिक अन्याय आ सुग्रीवक शुद्धता जानिकय राम कहलनि – “एकर बहुत आसान समाधान अछि हमरा लग ॥१०४‍-१०५॥

।चौपाइ।

अति अनुचित कर अहाँ काँ भाय । कत दिन निबहत ई अन्याय ॥१०६॥
खलबल बालि वीर हम मारि । अहँ कपिपति भोगब सुख नारि ॥१०७॥
कह सुग्रीव बालि-रण-रङ्ग । रावण जनि तट कीट पतङ्ग ॥१०८॥
जनि भुजबल अनुभव शुनु राम । त्रिभुवन के कर जन सङ्ग्राम ॥१०९॥
दुन्दुभि नामक राक्षस घोर । महामहिष उनमत अति जोर ॥११०॥
रात्रि-समर-प्रिय वचन कठोर । दुर्ब्बल बालि वधिक हम तोर ॥१११॥
किष्किन्धा आयल भेल मारि । बालिक कतहु समर नहि हारि ॥११२॥
सत्वर जाय भाय खल धयल । हे प्रभु अकथ पराक्रम कयल ॥११३॥
सिंह पकरि हरि धरणि पछारि । तनिक लेल तहँ मौलि उखारि ॥११४॥
चरणैँ दावि तनिक लेल काय । फेकल तनिकर माथ घुमाय ॥११५॥
योजन पर भय खसल से जाय । मातङ्गाश्रम बुझल न भाय ॥११६॥

भावार्थः

अहाँक भाइ बहुत अनुचित काज कयलनि । ई अन्याय कखन धरि चलि सकैत अछि ? हम एहि दुष्टक सेनाक संग वीर बालि केँ मारि देब आ अहाँ वानर सभक राजा भ’ कय राज्य-सुख आ पत्नी दुनूक भोग करब ।” ॥१०६-१०७॥

सुग्रीव कहलनि – “हे राम, बालिक रण-रंग (युद्ध-कौशल) कि कहल जाय ! जेकरा सामने रावणो कीड़ा-मकोड़ा बराबर अछि । आर रावणहु जेकर बाहुबलक मजा चखि चुकल अछि । ओकरा (बालिक) संगे तीनू लोक मे के लड़ाइ ठानि सकैत अछि ? दुन्दुभी नामक एकटा भयानक राक्षस परम बलवान, विशाल महिषक शक्ल केर छल । ओकरा राति मे लड़ाइ ठननाय नीक लगैत छलैक । ओ कठोर स्वर मे ललकारलक – ‘अरे डरपोक बालि, हम तोहर खून पिबयवला छी ।’ एहि तरहें ललकारा दैत ओ किष्किन्धा आयल । भारी लड़ाइ भेल । लड़ाइ मे कतहु बालि हारयवला नहि अछि । हमर भाइ बालि जाकय ओहि दुष्ट केँ पकड़ि लेलक । हे प्रभु राम, ओ अवर्णनीय पराक्रम कयलक । ओहि महिषरूपी राक्षस केँ सींग पकड़िकय घसीटय लागल, धरती पर पछाड़ि देलक आ दुनू सींग उखाड़ि लेलक । फेर ओकर शरीर केँ पैर सँ चापलक आर माथा पकड़िकय मचोड़िकय फेंकि देलक । ओ राक्षस एक योजन दूर मातंग मुनिक आश्रम मे जाकय खसल । हमर भाइ केँ ई बुझय मे नहि अयलैक ॥१०८-११६॥

।सोरठा।

जानल मुनि मातङ्ग, बालि कुचालिक कर्म्म थिक ॥११७॥
देलनि शाप अभङ्ग, मुनि आश्रम दुर्वृत्ति कर ॥११८॥

भावार्थः

मुनि मातंग केँ पता चललनि जे ई बदमाशी बालिक थिक । तखन मुनि अपन आश्रम मे एहि तरहक बदमाशी करयवला केँ अटल श्राप दय देलनि ॥११७-११८॥

।चौपाइ।

रुधिर महिष-शिर देखल जाय । कहल बालि केँ मुनि खिसिआय ॥११९॥
जौँ यहि गिरिपर अयबह पूनि । रहतौ माथ न जनबह मूनि ॥१२०॥
यहि गिरिपर तैँ निर्भय वास । बहरयलैँ बालिक बड़ त्रास ॥१२१॥
कयल प्रतिज्ञा अहँ रघुनाथ । बालिक वध नहि कालहु हाथ ॥१२२॥
दुन्दभि-अस्थि देखायोल जाय । हिनका मारल हमरा भाय ॥१२३॥
प्रभु हसि चरण-अङ्गुष्ठ लगाय । फेकल खसल दश योजन जाय ॥१२४॥
बल आश्चर्य बुझल सुग्रीव । ई सामान्य थिकथि नहि जीव ॥१२५॥
तखन देखायोल सातो तार । रामक बाण बेधि भेल पार ॥१२६॥
कपिपति हर्षित शम-मति भाष । हे प्रभु मन नहि किछु अभिलाष ॥१२७॥
केवल भक्ति भजन नित करब । भव-समुद्र सुखसौँ सन्तरब ॥१२८॥
हे प्रभु कहइत हो मन लाज । नहि विभूति वनिता-सुख काज ॥१२९॥
कतय ज्ञान-सुख कत सुख-राज । सुत वित बन्धन सकल समाज ॥१३०॥
कपिवर रघुवर-पद अनुरागि । विषय-वासना देलनि त्यागि ॥१३१॥
मन विराग सुख दुःख समान । कपिपति पायोल उत्तम ज्ञान ॥१३२॥

भावार्थः

लहू सँ लथपथ ओहि महिषक मुन्ड केँ जा कय देखलनि । फेर बालि उपर खिसियाकर बजलाह – ‘जँ दोबारा एहि पर्वत (गिरि) पर अयबह तँ तोरो मुण्ड देह सँ अलग भ’ जयतह, ई मुनिक कहल बात ध्यान मे रखिहह ।’ यैह कारण हम एहि गिरि पर निर्भय भ’ वास कय रहल छी । बाहर गेलापर बालिक बहुत त्रास (भय) रहैत अछि । अपने तँ प्रतिज्ञा कय लेलहुँ हे रघुनाथ, मुदा बालिक वध कालहु केर हाथ सँ सम्भव नहि अछि ।” फेर सुग्रीव दुन्दुभि-अस्थि सभक ढेर (अम्बार) देखबैत कहलनि जे ई सब हमरहि भाइ बालिक हाथ मारल लोकक हड्डीक ढेरी थिक । प्रभु रामचन्द्र हँसिकय ओहि ढेरी मे अपन पैरक औंठा भिड़ा देलनि कि ओ दस योजन दूर जाकय खसल । हुनकर आश्चर्यकारी बल देखि सुग्रीव केँ ई अनुभव भ’ गेलैक जे ई कियो साधारण जीव नहि थिकथि । फेर सात टा तारक गाछ केँ देखि राम अपन एक बाण चलाकय सातों तार केँ बेधैत पार कय देलनि । कपिपति सुग्रीव ई देखिकय हर्षित भ’ गेलाह । हुनकर मति शान्त भ’ गेलनि । मुंह सँ किछु वाणी नहि निकलि रहल छन्हि । ओ कहैत छथि – “हे प्रभु, आब हमर मोन मे कोनो अभिलाषा नहि बचल । हम केवल भक्ति आ भजन टा करब । एहि भव-समुद्र केँ एहि तरहें सुखपूर्वक पार लगायब । हे प्रभु, कहैत लाज लगैत अछि, आब केहनो सम्पत्ति (विभूति) आ स्त्री (वनिता) वा कोनो सुखक काज नहि रहि गेल । कतय ज्ञानक सुख आ कतय राज्यक सुख ! ई सुत (सन्तति) आ वित (सम्पत्ति) सबटा सामाजिक बन्धन वला थिक ।” कपिवर सुग्रीव केँ रघुवर रामक चरण मे जे अनुराग बढ़ि गेलनि, ताहि सँ विषय-वासना सबटा परित्याग कय देलनि । मन मे वैराग्यताक कारण सुख दुःख सबटा समान भ’ गेलनि । कपिपति केँ उत्तम ज्ञानक प्राप्ति भ’ गेलनि ॥११९-१३२॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे किष्किन्धाकाण्डे प्रथमोऽध्यायः।

॥श्री मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण केर किष्किन्धाकाण्डक प्रथम अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

Related Articles