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मिथिलाभाषा रामायणः अरण्यकाण्ड नवम अध्याय – कबन्ध बध

595 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित ‘मिथिलाभाषा रामायण’

अरण्यकाण्डः नवम अध्याय

कबन्ध बध

।दोबय छन्द।

रामचन्द्र वैदेही-विरही प्राप्त वनान्तर जखना ॥१॥
घोर कबन्ध बाहु योजन भरि राक्षस देखल तखना ॥२॥
पड़ला तकरा बाहुपाशमे सानुज देखल आँखी ॥३॥
की कर्त्तव्य कहू कहु लक्ष्मण प्रभु उठला ई भाखी ॥४॥
चरण-मौलि सौँ रहित लोथ अछि, वक्ष-स्थलमे आनन ॥५॥
आन उपाय रहल नहि सम्प्रति, खाय चहै अछि कानन ॥६॥
लक्ष्मण कहल खड्ग सँ हिनकर, बाहु दुहूटा काटी ॥७॥
यहन निशाचर शुनल कान नहि, की विश्वक परिपाटी ॥८॥
रामचन्द्र तनिकर दक्षिण भुज, लक्ष्मण काटल बाम ॥९॥
विस्मित दैत्य पुछल भुज-कर्त्तक, के दुहु जन गुणधाम ॥१०॥
पुरी अयोध्या दशरथनन्दन, राम लखन दुनू भ्राता ॥११॥
एतय विपिन सौँ प्राणवल्लभा, हरलक खल दुखदाता ॥१२॥
तनिकहि तकइत तकइत यहि वन, तुअ भुज-पञ्जर अयलहुँ ॥१३॥
प्राण-त्राण हेतु भुज काटल, सङ्कट सौँ बहरयलहुँ ॥१४॥
विकट-रूप तोँ के छह से कह, यहन देखल हम आज ॥१५॥
श्रवणहुँ नहि छल तोहर रूप ई, देखल कानन-राज ॥१६॥
हम गन्धर्व्व-राज शुनु हे प्रभु, यौवनदर्प्पित भेलहुँ ॥१७॥
अष्टावक्र देखल हम जखना, तखना हम हँसि देलहुँ ॥१८॥
शाप देल तैँ राक्षस भेलहुँ, तुष्ट कहल भय हयबः ॥१९॥
त्रेता रामचन्द्र-दर्शन सौँ, अपन रूप काँ पयबः ॥२०॥
इन्द्रक हम अपराधी भेलहुँ, कयलनि अशनि-प्रहारे ॥२१॥
माथ पयर सभ पेट समायल, बाहु रहल व्यवहारे ॥२२॥
हम अवध्य ब्रह्माक देल वर, मुइलहुँ नहि तत्काले ॥२३॥
जठर मध्य मुह हयतौ तोहरा, कहलनि इन्द्र दयाले ॥२४॥

भावार्थः

सीता सँ बिछुड़ि गेल राम जखन दोसर मे वन मे गेलाह, तखन ओ कबन्ध नामक एक भयावह राक्षस केँ देखलनि, जेकर बाँहि एक योजन (चारि कोस) लम्बा छलैक । दुनू भाइ देखलनि जे ओहि राक्षसक बाहुपाश मे फँसि गेल छी । तखन राम बजलाह – “हे लक्ष्मण, कहू-कहू । आबि कि कयल जाय ? एकर न पैर छैक, न सिर छैक । ई लोथ (संचारहीन) पड़ल अछि । एकर मुँह छाती मे छैक । आब आर कोनो उपाय नहि रहल । ई त समूचा जंगलहि केँ खाय जाय चाहैत अछि ।” लक्ष्मण कहलखिन – “तलवार सँ एकर दुनू बाँहि काटि दिय’ । एहेन राक्षस तँ कतहु सुननहिये नहि रही । दुनियाक अजग-गजब चाइल अछि ।” राम ओकर दाहिना बाँहि काटि देलनि आ लक्ष्मण ओकर बायाँ बाँहि काटलनि । तखन राक्षस चकित भ’ कय पुछलक – “हमर बाँहि काटयवला अपने दुनू गोटे के छी ?” राम उत्तर देलनि – “अयोध्याक राजा दशरक पुत्र, हम राम आ लक्ष्मण दुनू भाइ छी । एतय एहि वन मे एक दुखदायी बदमाश हमर प्राणप्यारी केँ हरण कय लेलक अछि । वैह प्राणप्यारी केँ तकैत-तकैत एहि वन मे आबिकय तोहर बाहुपाश मे पड़ि गेलहुँ । हम अपन प्राण बचेबाक लेल तोहर बाँहि काटलहुँ । एहि तरहें हम एहि संकट सँ उबरलहुँ । एहेन विकट आकृतिवला तूँ के थिकेँ ? एहेन त हम आइये देखलहुँ अछि । तोहर ई रूप सुननहियो नहि रही, से आइ एहि वन मे देखि लेलहुँ ।” कबन्ध उत्तर देलक – “हे प्रभु, सुनू । हम गन्धर्वराज छी । हम एक समय जवानीक मस्ती मे रही । हम जखन अष्टावक्र ऋषि केँ देखलहुँ त हँसि देलहुँ । ओ हमरा श्राप दय देलनि । हम राक्षस भ’ गेलहुँ । फेर अनुनय-विनय सँ हम हुनका प्रसन्न कयलहुँ आर ओ कहलनि – ‘तूँ ठीक भ’ जेबह । त्रेतायुग मे जखन रामचन्द्रक दर्शन हेतह, तखन तोरा फेर सँ अपन गन्धर्वरूप प्राप्त भ’ जेतय ।’ फेर हम इन्द्रक अपराध कयलहुँ । ओ हमरा पर वज्र सँ प्रहार कयलनि । जाहि सँ हमर सिर आ पैर पेट मे चलि गेल, काजक लेल बाँहि टा रहि गेल । ब्रह्मा वर देने रहथि जे हमरा कियो मारि नहि सकत, ताहि लेल हम तुरत मरबो नहि केलहुँ । दयालु इन्द्र कहलनि – ‘तोरा पेटे मे मुँह भ’ जेतह ।’ ॥१-२४॥

।चौपाइ।

भल भेल भल कटि गेल बाँहि । रामचन्द्र प्रभु देल निबाहि ॥२५॥
मोर मुह काठैँ भरि दिअ आब । तहिमे अनलक सङ्गति पाब ॥२६॥
जरि जायब हम पायब रूप । पूर्व्व जेहन छल हे विभु-भूप ॥२७॥
लक्ष्मण तेहन कयल तत्काल । भेल पुरुष एक कान्ति विशाल ॥२८॥
सर्व्वाभरण-विभूषित देह । मनसिज सन सुन्दर छवि-गेह ॥२९॥
नत साष्टाङ्ग भक्ति-मति-धाम । रामचन्द्र काँ कयल प्रणाम ॥३०॥
स्तुति कत कयल हाथ दुहु जोड़ि । परमेश्वर देल बन्धन तोड़ि ॥३१॥
धनुर्ब्बाणधर श्याम शरीर । जटिल सुवल्कल भूषण वीर ॥३२॥
जेहन देखि पड़ अविरल ध्यान । तेहन सतत रह लोभ न आन ॥३३॥
प्रभु शवरी सिद्धा यहिठाम । कहइक छोटि जाति ई नाम ॥३४॥
भक्तिस्वरूपा से बड़ बूढ़ि । प्रभु-सेवा मे अति आरूढ़ि ॥३५॥
रामचन्द्र कहलनि अहँ जाउ । मुनिजन-गम्य धाम काँ पाउ ॥३६॥
शुनि प्रभु-वचन चलल गन्धर्व्व । तनिकर पूर्ण मनोरथ सर्व्व ॥३७॥

भावार्थः

नीक भेल, खुब नीक भेल जे हमर बाँहि कटि गेल । प्रभु रामचन्द्र हमरा पार लगा देलनि । आब अपने हमर मुँह मे काठ (लकड़ी) भरि दिय आ ओहि मे आगि लगा देल जाउ । हम जरि जायब । हे परमेश्वर रामा राम, ओकर बाद फेर गन्धर्वक ओ स्वरूप पाबि जायब जे पहिने छल ।” लक्ष्मण तुरत एहिना कयलनि । जरि गेला पर ओ आगि सँ एकटा दीप्तिमान् विशाल पुरुष निकलल । ओकर अंग-अंग गहना (आभूषण) सँ सजल छलैक । ओ कामदेव-सन सुन्दर लागय लागल । परम् भक्त आ ज्ञानवान् ओ गन्धर्व रामचन्द्र केँ दण्डवत् प्रणाम कयलकनि । दुनू हाथ जोड़िकय बहुते रास स्तुति कयलकनि – “हे परमेश्वर, अहाँ हमरा भव-बन्धन सँ मुक्त कय देलहुँ । हाथ मे धनुष-बाण लेने, जटा धारण कएने, सुन्दर वल्कल पहिरने, श्यामवर्ण शरीरवला अहाँ एखन जाहि वीररूप मे देखाय दय रहल छी, ओहने रूप केर ध्यान निरन्तर बनल रहय, यैह हमर कामना अछि । हमरा आर कोनो लोभ नहि अछि । हे प्रभु, एकटा सिद्ध शबरी ओतय रहैत अछि । कहबाक लेल त शबरी नीच जातिक अछि । मुदा ओ परम् वृद्धा, बड पैघ भक्त आ ईश्वरक आराधना मे हमेशा लागल रहैत अछि ।” तखन राम कहलनि – अहाँ जाउ आ ओ पद पाउ जेतय ऋषि-मुनि सब पहुँचैत छथि ।” रामक बात सुनिकय गन्धर्व चलि गेल । ओकर सबटा कामना पूरा भ’ गेलैक ॥२५-३७॥

।सोरठा।

चढ़ि रथ भानु समान, राम राम रटयित रसन ॥३८॥
धन्य धन्य भगवान, जे तारल खल अधम काँ ॥३९॥

भावार्थः

सूर्यक समान चमकैत रथ पर चढ़िकय जिह्वा सँ राम-राम रटिते ओ चलि गेल । भगवान् राम धन्य छथि, जे (कबन्ध जेहेन) दुष्ट आ नीच प्राणी केँ सेहो उबारि देलनि ॥३८-३९॥

। इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे नवमोऽध्यायः ।

। मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक नवम अध्याय समाप्त भेल ।

हरिः हरः!!

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