स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड
सातम अध्याय
रावण द्वारा सीताक हरण
।चौपाइ।
राम बुझल दशवदन-प्रपञ्च । वैदेहीकेँ कहलनि शञ्च ॥१॥
अहँ एक माया-देह बनाउ । कुटी-मध्य कल कौशल जाउ ॥२॥
एक वर्ष रहु अग्नि समाय । पुन आयब लेब सङ्ग लगाय ॥३॥
रावण-बधक निकट अछि काल । होयत माया-चरित विशाल ॥४॥
प्रभु-माया माया विस्तारि । मायामयि बनि गेली नारि ॥५॥
हेम-हरिण शुनलहुँ नहि कान । की रचना-कारक भगवान ॥६॥
माता हँसि कहलनि प्रभु आज । मृग एक आयल अपन समाज ॥७॥
हेमक हरिण रक्ष तन विन्दु । पकड़ल जाय अवनि-गत इन्दु ॥८॥
पालब आश्रम राखब बाँधि । देब भक्ष जल लेल से काँधि ॥९॥
धनुष बाण लय चलला हाथ । लक्ष्मण काँ कहलनि रघुनाथ ॥१०॥
वैदेही-रक्षा अहाँ करब । नहि आश्रम बाहर सञ्चरब ॥११॥
अति मायावी राक्षस घोर । दण्डक वनमे बसइछ चोर ॥१२॥
भावार्थः
राम बुझि गेलाह जे ई रावणक चाइल छी । ओ धीरे सँ सीता केँ कहलनि, “अहाँ मायाक शरीर बना लियह आ चुपेचुप कुटीक भीतर चलि जाउ । एक साल धरि आगिक बीच समायल रहब । ओकर बाद हम आयब आ अहाँ केँ अपना संग कय लेब । रावणक बध करबाक समय आबि गेल अछि । आब माया-चरित्रक लम्बा लीला करय पड़त ।” प्रभु अपन शक्ति सँ माया केँ पसारलनि आ सीता मायामय नारी बनि गेलिह । मायाक सीता हँसिकय कहलिह – “हे स्वामी, सोनाक हिरन होइत छैक, ई बात तँ कहियो कानहु सँ नहि सुनलहुँ । ताहि पर रत्नक चित्ती छैक । धरती पर खसल एहि चाँद केँ पकड़ल जाय । एकरा हम पोसब, आश्रम मे बान्हिकय राखब; खाना खुआयब, पानि पिआयब, कन्हा पर उठायब ।” राम ई सुनिकय हाथ मे धनुष-बाण लय विदाह भेलाह आ जाइत समय लक्ष्मण सँ कहलनि – “हे लक्ष्मण, अहाँ वैदेहीक रक्षा करब । आश्रम सँ बाहर नहि निकलब । राक्षस सब भारी मायावी होइत अछि आ दण्डक वन मे चोर सब रहैत अछि ।” ॥१-१२॥
।छन्द हरिपद – गीत काफी।
कनक मृग कतहु शुनल नहि कान ॥१३॥
थिक मारीच कपटसौँ आयल शुनु भ्राता भगवान ॥१४॥
राम कहल तनिकहु हम मारब हयता जौँ मारीच ॥१५॥
होयत हरिण हरषि हम आनब बाँधब आँगन बीच ॥१६॥
सीता-रक्षा मध्य दक्ष रहु ई कहि चलला राम ॥१७॥
माया-मृगपर माधीश्वर जनिकाँ रूप न नाम ॥१८॥
भक्त-काज लीला विस्तारथि पूर्णकाम परमेश ॥१९॥
मृगसौँ ओ वनिता सौँ तनिका अछि नहि काजक लेश ॥२०॥
क्षण क्षण निकट दूर मृग दौड़य तखन चलाओल तीर ॥२१॥
थिक राक्षस निश्चय मन मानल रामचन्द्र रघुबीर ॥२२॥
भावार्थः
ई सुनिकय लक्ष्मण बजलाह – “हे पूज्य भ्राता, सुनू । सोनाक हिरन तँ कतहु सुनबो नहि कयलहुँ । ई बुझाइत अछि, मारीच कपट वेष धारण कय केँ आयल अछि ।” राम कहलखिन – “अगर ई मारीच होयत तँ ओकरो हम मारब । आर, यदि सच्चे हिरन होयत त प्रसन्नतापूर्वक ओकर पकड़िकय आनब आ आश्रम मे बान्हिकय राखब । अहाँ सीताक रक्षा मे होशियारी सँ रहब ।” एतेक कहिकय राम चलि गेलाह । मायाक ईश्वर राम, जे नाम आ रूप सँ परे छथि, ओहि माया-मृगक पाछाँ चललाह । ईश्वर स्वयं निष्काम होइतो भक्त सभक काज सँ अपन लीला पसारैत छथि । हुनका नहि तँ रंचो मात्र ओहि हरिण सँ कोनो प्रयोजन छन्हि आ न ओहि नारी सँ । हिरन कखनहुँ लगहि बुझाइछ त कखनहुँ दूर भ’ जाइछ । तखन राम तीर चला देलनि । कियैक तँ ओ सोचलनि जे ई निश्चित राक्षसे टा छी ॥१३-२२॥
।गीत।
कपट-मृग खसल मही मे घूमि ॥२३॥
रामचन्द्र-शर तनिकाँ लागल पल विलम्ब कहि जूमि ॥२४॥
हा हम मुइलहुँ लक्ष्मण दौड़ू कहि कहि मरती बेरि ॥२५॥
से मारीच अपन तन धयलक जनन मरण नहि फेरि ॥२६॥
राम नाम उच्चारण हो जौँ जनकाँ मरण काल ॥२७॥
प्रभु-सायुज्य-प्राप्ति हो तनिकाँ कि कहब भाग्य विशाल ॥२८॥
तनिकहि देखइत तनिकहि शरसौँ देल से प्राण गमाय ॥२९॥
असुरदेह सौँ तेज-पुञ्च चढ़ि प्रभु-तन गेल समाय ॥३०॥
अमर सकल विस्मय मन मानल मुनि-हिंसक छल चोर ॥३१॥
रामाकार वृत्ति भेल तनिकाँ मुक्ति सुयश भेल शोर ॥३२॥
भावार्थः
ओ सोनाक हिरन चक्कर काटिकय धरती पर खसि पड़ल । पलहि भरि मे ओ रामक तीर ओहि मृग केँ लागि गेलैक । “हाय ! हम मरि गेलहुँ । हे लक्ष्मण, दौड़ू !” एना कहिकय मारीच मरैत समय अपन वास्तविक राक्षस रूप धारण कयलक । फेर ओ आगूक जन्म आ मरण केर चक्र सँ मुक्त भ’ गेल । यदि कियो मरैत समय राम-नाम केर उच्चारण करय तँ ओकरा प्रभु रामक सायुज्य प्राप्त होइत छैक । ओ मारीच बड भाग्यवान् छल । कियैक तँ ओकरा रामहि केँ देखैत रामहि केर तीर सँ अपन प्राण छोड़लक । ओकर ओहि राक्षस रूपी मृतक शरीर सँ एकटा तेज-पुंज निकलल आ रामचन्द्र जीक शरीर मे लीन भ’ गेल । सब देवता लोकनि केँ ई देखि बहुत विस्मय भेलनि, कियैक तँ जे मारीच मुनि लोकनि पर हिन्सा करयवला चोर छल ओकरे रामक सायुज्य आ मोक्ष भेटि गेलैक । ओकर ख्याति पसैर गेलैक ॥२३-३२॥
।सोरठा।
चिन्तातुर-मन राम, कयल हमर अनुकरण खल ॥३३॥
शुनि सीता तहि ठाम, की करती हमरा बिना ॥३४॥
भावार्थः
रामक मोन मे चिन्ता भेलनि – ‘अरे, ई दुष्ट तँ हमरहि आवाजक नकल कयलक । ओतय कुटी मे हमर परोक्ष बैसल सीता कि करती, के कहय ।’ ॥३३-३४॥
।हरिपद छन्द, गीत काफी।
जनकजा शुनलनि अपनहि कान ॥३५॥
हा लक्ष्मण दौड़ू हम मुइलहुँ रहल उपाय न आन ॥३६॥
अयि देवर असुरादित भ्राता छथि शुरु आतुर हाक ॥३७॥
जाउ विलम्ब पलो भरि करु जनु पड़य चहै अछि डाक ॥३८॥
लक्ष्मण कहल वृथा चिन्ता मन असुर मुइल बलवान ॥३९॥
तीनि-लोक-नाशक बल जनिकाँ के अछि राम समान ॥४०॥
दीन वचन रघुनन्दन कहता हो नहि चित्त प्रतीति ॥४१॥
परमेश्वर दारा वैदेही जनु करु मन भय-भीति ॥४२॥
भावार्थः
सीता कोनो दोसर उपाय नहि देखि लक्ष्मण सँ कहलनि – ‘हे हमर दियर, अहाँक भाइ केँ राक्षस घायल कय देलक हँ । हुनकर करुण पुकार सुनू । जाउ, पलहु भरि देरी जुनि करू । अनर्थ भ’ रहल अछि ।’ लक्ष्मण कहलखिन – “अहाँ मोन मे नाहक चिन्ता करैत छी । ओ बलवान् राक्षस मारल गेल । जिनका तीन लोक केँ नाश करबाक शक्ति छन्हि, एहेन रामक समान दोसर के अछि ? मोन मे विश्वास नहि होइत अछि जे रघुनन्दन राम एहि तरहें आर्त स्वर सँ चिकरताह । हे सीता, अहाँ परमेश्वर रामक पत्नी भ’ कय एना घबराउ नहि ।” ॥३५-४२॥
।गीत मलार।
सकल कपट हम जानल मनमे ॥४३॥
स्त्रीहर्त्ता अहँकैँ रघुनन्दन नहि जनइत छल छथि हा सपनमे ॥४४॥
भेल मनोरथ लाभ अहाँकाँ भरत शिखाय पठाओल वनमे ॥४५॥
भरत अहाँक अधीनि होयब नहि बरु हम प्राण त्यागि देब छनमे ॥४६॥
हा गुणनिधि विधि बड़ दुख देलहुँ मृतक मारि यशलाभ कि जनमे ॥४७॥
झरि झरि पात खसय तरुलति सौँ सकरुण सीता कोप-रोदनमे ॥४८॥
जाय मिलब हम सौदामिनि सनि रामचन्द्र नवसुन्दर घनमे ॥४९॥
जनक जनक मिथिला-महि नैहर ज्ञानभूमि सभ लोक सुजनमे ॥५०॥
भावार्थः
ई सुनिकय सीता कहलखिन – ‘अहाँक मोन मे जे कपट (पाप) अछि ओ सब हम जानि गेलहुँ । राम सपनहुँ मे ई नहि जनैत छलथि जे अहाँ हुनकर स्त्री केँ हड़पयवला छी । भरत ई सब सिखा-पढ़ाकय अहाँ केँ वन मे पठेलनि । आइ अहाँक ओ मनोरथ पूरा भ’ गेल । भरत आ अहाँक अधीन मे रहय सँ पहिनहिं हम अपन प्राण त्यागि देब । हे गुणवान् विधाता, अहाँ सब हमरा बहुते सतेलहुँ । मरले केँ मारय सँ आब अहाँक संसार मे कि यश होयत !” सीताक एहि तरहक करुण क्रन्दन सुनिकय शोकवश गाछ आ लत्ती सभक पात खसय लागल । सीता कहलनि – “हम रामचन्द्र रूपी सोहाओन नव मेघ मे विद्युत (बिजली) जेकाँ समा जायब । हमर जनक जेहेन पिता छथि, मिथिला जेहेन ज्ञानभूमि नैहर अछि आ सब सम्बन्धी भलमानुस (नीक लोक) मे गनाइत छथि ।” ॥४३-५०॥
।चौपाइ।
शुनि लक्ष्मण मूनल दुहु कान । बड़ अनर्थ दुख देल भगवान ॥५१॥
धिक धिक कोपमूर्त्ति काँ आज । वितथ वचन बजयित नहि लाज ॥५२॥
आगत विपति सुमति-गति भङ्ग । समय विनाशक बुझि पड़ रङ्ग ॥५३॥
ई कहि वनदेवी सौँ कहल । वचन-बाण वैदेहिक सहल ॥५४॥
हम कहइत छी दुहु कर जोड़ि । सीताकाँ जाइत छी छोड़ि ॥५५॥
सोपि देल अछि अपनैँक हाथ । हम चललहुँ जत छथि रघुनाथ ॥५६॥
धनुष-रेख-बाहर जनि जाउ । वञ्चक-वचन न किछु पतिआउ ॥५७॥
भावार्थः
ई सुनिते लक्ष्मण अपन दुनू कान मुंदि लेलनि । बजलाह – “भारी अनर्थ भेल । विधाता हमरा बड दुःख देलनि । आइ धिक्कार अछि । कोप सँ भरल सीता केँ कि झूठ बात बाजय मे लाज नहि एलनि ! जखन विपत्ति अबैत अछि तखन नीको मति काज नहि दैत अछि । लगैत अछि जे विनाशक समय आबि गेल अछि ।” एतेक कहिकय फेर लक्ष्मण वनदेवी सँ कहलनि – “देखू, हम सीताक तीर-जेहेन तीख वचन बर्दाश्त कय लेलहुँ । हम दुनू हाथ जोड़िकय कहैत छी, अहाँ सुनू । हम सीता केँ असगर छोड़िकय जा रहल छी ।” फेर ओ सीता सँ कहलनि – “हम धनुष सँ लकीर खींचि दैत छी, अहाँ ओहि लकीर सँ बाहर नहि जायब । आर ठक सभक बात पर विश्वास नहि करब ।” ॥५१-५७॥
।सवैया छन्द।
आश्रम-शून्य जानिकेँ रावण, अयला दण्डी वेष बनाय ॥५८॥
शिखी उपानहि दिव्य कमण्डलु, पहिरल गेरुआ वस्त्र रंगाय ॥५९॥
भिक्षुक जानि भक्ति सौँ जानकि, कयलनि विनय-प्रणति कय बार ॥६०॥
कन्द मूल फल भोजन देलनि, स्वागत पुछल अतिथि-व्यवहार ॥६१॥
भोजन कयल जाय सुखसौँ मुनि, अबितहिँ छथि हमरा प्राणेश ॥६२॥
तनिकहु अपने आशिष देबनि, निकटहि छथि नहि देश विदेश ॥६३॥
तनिकासौँ प्रिय आदर होयत, ज्ञान-कथादिक विविध विचार ॥६४॥
शमस्वभाव अपने काँ कि कहब, नारायणमय सभ संसार ॥६५॥
भावार्थः
आश्रम सून्न भ’ गेल, ई जानिकय रावण संन्यासी वेष बनाकय ओतय आबि गेल । सिर पर जटा, पैर मे खड़ाउँ, हाथ मे सुन्दर कमण्डल लेने गेरुआ रंग मे राँगल वस्त्र पहिरने छल । जानकी ओकरा भिखारी-संन्यासी बुझिकय भक्तिभाव सँ बेर-बेर विनयपूर्वक प्रणाम कयलनि । कन्द-मूल-फल खाय लेल देलनि, अयबाक समाचार पुछलनि, आर अतिथि बनौलनि । सीता कहलनि – “हे मुनि, सुखपूर्वक भोजन करू । हमर पति आबिये रहल हेताह । अयला पर हुनको आशीर्वाद देबनि । लगहि मे गेल छथि, कतहु देश-विदेश नहि गेल छथि । ओ अपने केँ प्रेम सँ आदर करताह आ अहाँ सँ नाना प्रकार ज्ञानक बातचीत सेहो करताह । अहाँ तँ शान्ति-मार्गी छी, अहाँ सँ बेसी कि कहू । अहाँ लेल त भैर दुनिया नारायणमय अछि ।”॥५८-६५॥
।दोबय छन्द।
के अहँ थिकहुँ कमल-दल-लोचनि, थिकथि कहू के भर्त्ता ॥६६॥
कानन की कारण सौँ अयलहुँ, कानन आबि कि कर्त्ता ॥६७॥
बड़ बड़ घोर निशाचर सञ्चर, पद पद आपद धयले ॥६८॥
अपन देश कारण की त्यागल, सुमुखि उचित नहि कयले ॥६९॥
सीता कहल अयोध्याधिप नृप, छल छथि दशरथ-नामा ॥७०॥
तनिकर तनय सर्व्ववर-लक्ष्मण-लक्षित पति गुण-धामा ॥७१॥
राम नाम ओ तनि लघु भ्राता, लक्ष्मण सन के आने ॥७२॥
पिता-वचन सौँ दण्डक अयला, चौदह वर्ष प्रमाणे ॥७३॥
हम पौलस्त्य अमर-अरि रावण, अहँक नाम शुनि अयलहुँ ॥७४॥
राज्यपाट सँ रहित राम छथि, तनिक सङ्ग की धयलहुँ ॥७५॥
रथ पर चढू चलू अहँ जानकि, क्षणमे लङ्का जायब ॥७६॥
लङ्का विभव कहब की अहँकाँ, रानी मान्य कहायब ॥७७॥
शुनल वचन सीता भीता सनि, कहल दुष्ट रे मरबै ॥७८॥
रघुनन्दन-शर-अनल-राशि मे, शलभ जकाँ पड़ि जरबै ॥७९॥
शश वश करथि सिंह-गृहिणी काँ, तेहन तोर मन आशा ॥८०॥
रामक निकट ठाढ़ खल रहबह, देखत लोक तमाशा ॥८१॥
भावार्थः
रावण बाजल – “हे कमलक पंखुड़ी जेहेन आँखिवाली, अहाँ के छी ? आर अहाँ पति के छथि ? कोन कारण सँ वन मे आयल छी ? अहाँक पति वन मे आबिकय कि करताह ? एहि वन मे बड़का-बड़का भयानक राक्षस सब घुमैत रहैत अछि । एतय तँ डेग-डेग पर खतरा अछि । कोन कारण सँ अहाँ अपन देश केँ छोड़लहुँ ? हे सुन्दरी, ई अहाँ ठीक नहि कयलहुँ ।” सीता कहलखिन – “अयोध्याक अधिपति दशरथ नामक राजा छथि । हुनक पुत्र हमर पति छथि । ओ सब शुभ लक्षण सँ समन्वित आ बहुत गुणवान् छथि । हुनकर नाम राम छन्हि । हुनकर छोट भाइक नाम लक्ष्मण छन्हि । हुनकर बराबरी करयवला कियो नहि अछि । ओ पिताक आज्ञा सँ चौदह वर्षक लेल वन मे आयल छथि ।” तखन रावण अपन परिचय कहलक – “हम पुलस्ति-वंशक असुर रावण छी । अहाँक नाम सुनिकय एतय आयल छी । राम केर जखन राजपाट नहि रहलनि, तखन अहाँ हुनकर संग कियैक पकड़ने छी ? हे जानकी, अहाँ चलू, हमर रथ पर सवार होउ । क्षणहि भरि मे लंका पहुँचि जायब । लंकाक जे ठाट अछि से हम अहाँ सँ कि कहू ! ओतय अहाँ सम्मानक संग रानी कहायब ।” सीता ई बात सुनिकय डरा गेलिह आ कहली – “अरे दुष्ट, तोरा सिर पर मृत्यु आबि गेल छौक । रामक तीर केर आगिक लपट मे तूँ कीट-पतंग जेकाँ जरमें । तोहर मनोरथ ओहने छौक जेना खरहा सिंहनी केँ अपना वश मे करय चाहैत हो । जखन तूँ रामक सामने पड़में त लोक तमाशा देखत ।” ॥६६-८१॥
।चौपाइ।
रावण तखन उठल खिसिआय । अपन भयङ्कर रूप देखाय ॥८२॥
दश मुख विश भुज अति विस्तार । प्रलय-काल-घन सन छवि-भार ॥८३॥
वनदेवीगण गेलि पड़ाय । बहुत त्रास ओ खाय न जाय ॥८४॥
नखसौँ धरणि विदारण कयल । सीताधार मही रथ धयल ॥८५॥
निज कल्याण-कल्पतरु काट । रथ लय उड़ल अकाशक बाट ॥८६॥
हा रघुनन्दन सीता भाष । अहँ बिनु प्राण हमर के राख ॥८७॥
हा लक्ष्मण कहि कहि कत कानि । अवनि निहारथि भय मन मानि ॥८८॥
सीता-क्रन्दन शुनि खगराज । कहल अनर्थ भेल विधि आज ॥८९॥
पर्व्वत सौँ दौड़ल तिष-लोल । रह खल ठाढ़ कयल से घोल ॥९०॥
लोकनाथ-गृहिणी काँ हरल । जयबह कतय दृष्टि जे पड़ल ॥९१॥
आश्रम छथि नहि एको भाय । तस्कर सीता हरलय जाय ॥९२॥
पुरोड़ाश श्वानक जनु भक्ष । उड़य पिपील गगन लय पक्ष ॥९३॥
लोल चलाओल से घुरिघूरि । दशवदनक स्यन्दन देल चूरि ॥९४॥
चरणहि सौँ मारल सभ घोड़ । चाप चुरल बल कयल न थोड़ ॥९५॥
सीता काँ रावण देल छाड़ि । दौड़ल खल तरुआरि उखाड़ि ॥९६॥
पक्षहीन रावण-कृत-गृद्ध । हुक हुक प्राण करथु की वृद्ध ॥९७॥
सीता काँ दोसर रथ आनि । उड़ल चढ़ाय राम-भय मानि ॥९८॥
हा रघुनन्दन मूनल आँखि । प्रभुता अपन देल कत राखि ॥९९॥
जगन्नाथ हमरा प्राणेश । से हम जायब राक्षस-देश ॥१००॥
हा लक्ष्मण किछु अहँक न दोष । भल कहइत हम कयलहुँ रोष ॥१०१॥
तीर चलाउ अहाँ रघुनाथ । पड़लहुँ आबि कसाइक हाथ ॥१०२॥
दशकन्धर खल हरलय जाय । मारू खलकेँ बाण चढ़ाय ॥१०३॥
अलङ्करण किछु अपन उतारि । बाँधल खण्ड उत्तरी फारि ॥१०४॥
सीता कनइत देल खसाय । चिन्ह सन्देश राम-तट जाय ॥१०५॥
छल पर्व्वत पर वानर पाँच । बालि-बन्धु-कृत मन अति आँच ॥१०६॥
से सुग्रीव देल रखबाय । ओ रथ उच्च गमन-पथ जाय ॥१०७॥
उतरल सागर लङ्का वास । मनमे त्रास उपर मुख हास ॥१०८॥
भावार्थः
एतेक सुनिते रावण आइगबबूला भ’ गेल । ओ अपन डराओन रूप धारण कय लेलक । ओकर दस गोट मुख रहैक आ बड़का-बड़का बीस टा बाँहि रहैक । ओकर रंग प्रलयकालक मेघ-जेकाँ विकराल लगैत छलैक । डर सँ वनदेवी सब भागि गेलिह । ओ सब बहुते आतंकित छलिह जे कहीं ओ राक्षस हुनका सब केँ खा नहि जाय । रावण अपन नह सँ धरती केँ चीर देलक । धरतीक गर्भ मे रथ राखल छलैक । ओ मानू अपन कल्याणक कल्पवृक्ष केँ अपनहि हाथ सँ काटि देलक । सीता केँ रथ पर चढ़ाकय आकाशक बाट धय निकलि पड़ल ॥८२-८६॥
रावण केर जटायु संग युद्ध
सीता रथ पर विलाप करय लगलिह – “हा रघुनन्दन ! अहाँ बिना हमर प्राण-रक्षा के करत !” फेर ओ लक्ष्मणक नाम चिकरि-चिकरिकय कनैत आ त्रस्त भ’ धरती दिश देखय लगलिह । सीताक विलाप सुनिकय पक्षिराज जटायु कहलनि – “हा विधाता ! आइ गजब भ’ गेल ।” ओ तीख लोलवला पंछी पर्वत सँ दौड़ि पड़लाह आ ललकारलनि – “अरे दुष्ट ! ठहर त कनी ! तूँ त्रिभुवनपति रामचन्द्र केर पत्नीक हरण कयलें अछि । आब जेबें कतय ? हमर नजरि तोरा पर पड़ि चुकल अछि । आश्रम मे एको भाइ नहि छथि । तेँ त तूँ चोर जेकाँ सीता केँ चोराकय भागल जा रहल छेँ । अरे यज्ञक हविष्य कुत्ता खायत ? पाँखि भेला पर चुट्टी सब आकाश मे उड़य लगैत अछि ।” बेर-बेर झपट्टा मारि-मारिकय ओ चोंच सँ प्रहार कयलनि आ रावणक रथ केँ चूर-चूर कय देलनि । फेर अपन चाँगुर सँ रथक सबटा घोड़ा केँ मारि देलनि । तखन रावण सीता केँ छोड़िकय म्यान सँ तलवार निकालिकय दौड़ल । तलवार सँ रावण गृध्रराजक पाँखि काटि देलक । हुनकर प्राण निकलय लगलनि । बेचारा बूढ़ गिध कि करथि ! तखन रावण दोसर रथ आनि लेलक आ सीता केँ ओहि पर चढ़ाकय उड़ि गेल । ओकरा रामक डर जे रहैक ! सीता विलाप करय लगलिह – “हा राम ! अहाँ नहि जानि कियैक आँखि फेरि लेलहुँ । अहाँ अपन पराक्रम कतय राखि देलहुँ ! हमर पति समूचा संसारक स्वामी छथि । वैह हम राक्षस सभक देश जायब ? हा लक्ष्मण ! अहाँक कोनो दोष नहि अछि । अहाँ नीक बात कहलहुँ, मुदा हम बेकारे तमसा गेलहुँ । हे रघुनाथ, अहाँ तीर चलाउ । हम कसाइ केर हाथ पड़ि गेल छी । हमरा दुष्ट रावण हरण कय केँ लय जा रहल अछि । धनुष पर बाण चढ़ाकय एहि दुष्ट केँ मारू ।” ॥८७-१०३॥
फेर सीता अपन किछु गहना सब उतारलनि, अपन ओढनी केँ फाड़िकय ओकर एक टुकड़ा मे ओ बान्हि देलिह; आ कनैते ओकरा नीचाँ खसा देलिह जाहि सँ ओ पहिचानी (निशानी) के रूप मे राम लग पहुँचि जाइन्ह । ओतय पहाड़ पर पाँच टा बानर बैसल छल । भ्राता बालिक करनी सँ ओकरा सभक मोन मे सन्ताप भरल छलैक । ओहि मे सँ एकटा बानर सुग्रीव ओहि गठरी केँ रखबा देलाह । ओम्हर ओहि रावणक रथ ऊंच आकाश-मार्ग सँ निकलि गेलैक । समुद्र केँ पार कय लंका पहुँचि गेलैक । रावणक मोन मे तँ डर छलैक, मुदा उपर-उपर मुँह पर मुस्कुराहट छलैक ॥१०४-१०८॥
।दोबय छन्द।
जाय अशोकवाटिका रावण, राक्षसि लोकक पहरा ॥१०९॥
सीता काँ सभ तकइत रहिहै, आबथि ओ नहि बहरा ॥११०॥
मान्यबुद्धि मन मानि दशानन, गेल छोड़ि अनठाम ॥१११॥
कृशतनु शुष्कवदनि कह सीता, हा रघुनन्दन राम ॥११२॥
भावार्थः
तखन रावण अशोक वाटिका गेल, ओतय सीता केँ राक्षसी सभक पहरा मे राखि देलक आ ओकरा सब केँ कहलक – “तूँ सब सीताक रखबारी करैत रहिहें । ओ कखनहुँ बाहर नहि निकलि पाबय ।” फेर ओ मान्यबुद्धि मन मानिकय सीता केँ ओतहि छोड़ि स्वयं आनठाम चलि गेल । सीताक शरीर दुब्बर भ’ गेलनि आ मुँह सुखा गेलनि । ओ ‘हा रघुनन्दन ! हा राम !’ चिकरि-चिकरिकय विलखैत रहलिह ॥१०९-११२॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे सप्तमोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक सातम अध्याय समाप्त।
हरिः हरः!

1 Comment
Bhav bihbal bihbal bho gelao paidh k. Ki kahal jay prabhu k rachal rachna aa fer ohi rachnak chkra m hunka fer ohi san tran pabai lel ehi tarhak rachna k chakra.
Mata Janki k birah gatha jekhan Raban dwara haral gelain paidh mon drabit bho gel (Romanchit). Bridh Jatayu apna bhair poora kosis karait ghayal bho khais parlah. Ravan dwara hunka Ashok Vatika m rashi sab k nigrani m choir gel.😢
जाय अशोकवाटिका रावण, राक्षसि लोकक पहरा ॥१०९॥
सीता काँ सभ तकइत रहिहै, आबथि ओ नहि बहरा ॥११०॥
मान्यबुद्धि मन मानि दशानन, गेल छोड़ि अनठाम ॥१११॥
कृशतनु शुष्कवदनि कह सीता, हा रघुनन्दन राम ॥११२॥
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