स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड
छठम अध्याय
रावणक मारीच लग गेनाय आ मारीचक माया-मृग रूप धारण कयनाय
।चौपाइ।
रथमे जोड़ घोड़ बड़ जोर । चलल दशानन चिन्तित भोर ॥१॥
जत मारीच समुद्रक पार । पहुँचलाह सत्वर अविचार ॥२॥
छल समाधि-गत ओ मारीच । से न जान जग ऊँच कि नीच ॥३॥
मुनि-सन कयल सकल व्यवहार । निर्ग्गुण ब्रह्म ध्यान विस्तार ॥४॥
छुटल समाधि देखल मारीच । रावण बैसल आँगन बीच ॥५॥
उठि मिलि कय पूजा उपचार । बैसला भेल कथा सञ्चार ॥६॥
अति चिन्ता मन कि थिक आज । एकसर अयलहुँ हमर समाज ॥७॥
काज हमर जे होयत हाथ । से कय देब करब नहि लाथ ॥८॥
न्याय कहब जे होय न पाप । बिनु बुझलैँ जिब थर थर काप ॥९॥
रावण कहल अहाँ हित भाय । कयलक शत्रु बहुत अन्याय ॥१०॥
पुरी अयोध्या दशरथ नाम । तनिकर जेठ तनय छथि राम ॥११॥
वनवासक आज्ञा देल बाप । वन आयल छथि सत्य-प्रताप ॥१२॥
वनिता-सहित सुहित सङ्ग भाय । पञ्चवटी वन कुटी बनाय ॥१३॥
खर दूषण त्रिशिरा बल गोल । सभकाँ मारल बसि मुनिटोल ॥१४॥
कहइक पड़ल वचन लज्जाक । सूर्प्पनखा काँ कान न नाक ॥१५॥
एहि सँ होयत की अपराध । समर-निहत भेल वीर विराध ॥१६॥
मुनि निर्भय कर जयजयकार । कुल-लज्जा सबहिक शिर भार ॥१७॥
तनिकर गृहिणी लेब चोराय । अहँ साधक बनि रहब सहाय ॥१८॥
माया-हेम-हरिण बनि जाउ । चञ्चल सञ्चरि रूप देखाउ ॥१९॥
आश्रम बाहर लक्ष्मण राम । साधब अपन काज ओहि ठाम ॥२०॥
भावार्थः
चिन्ता मे डूबल रावण भोरे होइते अतिबलवान घोड़ा केँ रथ मे जोतिकय ओतय चलि पड़ल जेतय समुद्रक किनार पर मारीच तप कय रहल छल । ओ बिना किछु सोचने-बुझने ओकरा लग पहुँचि गेल । से मारीच ताहि समय समाधि लगौने बैसल छल । ओकरा कि पता जे संसार ऊँच अछि कि नीच अछि । ओ तँ संसार सँ बेफिकिर छल । ओ मुनि समान सब व्यवहार कय रहल छल आ व्यापक निर्गुण ब्रह्म केर ध्यान मे डूबल छल । रावणक पहुँचला सँ ओकर समाधि टूटि गेलैक । ओ देखलक, बीच अंगना मे रावण बैसल अछि । ओ उठिकय रावण सँ भेंट कयलक । ओकर खुब आवभगत कयलक । फेर बैसिकय बातचीत करय लागल । ओ पुछलक – “आइ अहाँक मोन बड़ा चिन्तित देखि रहल छी । असगरे हमरा लग आयल छी । कि बात छैक ? हमर वश के जे कुनु काज होयत से हम जरूर कय देब । एहि मे कोनो बहाना नहि करब । जायज काज कहब जाहि सँ ओ करय मे कोनो पाप नहि हो । जा धरि कहब नहि, ता धरि ई हृदय धड़कैते रहत ।” ॥१-९॥
ई सुनिकय रावण कहलक – “तूँ हमर हितकर भाइ थिकह । दुश्मन लोक हमरा संग बड खराब बरताव कयलक अछि । अयोध्या नामक नगरी मे दशरथ नामक एक राजा अछि । ओकर बड़का बेटा ‘राम’ नाम के अछि । ओकरा बाप वनवासक आज्ञा दय देने छैक । तेँ ओ सत्य पराक्रमी दण्डकवन मे आबि गेल अछि । संग मे स्त्री छैक आ सुहित भाइ सेहो छैक । ओ पञ्चवटी मे कुटिया बनाकय रहैत अछि । ओ मुनि लोकनिक बस्ती मे रहैत खर-दूषण आ त्रिशिरा सब केँ सेना सहित मारि देलक हँ । एहेन बात कहय मे लाजो लगैत अछि, तैयो कहय पड़ि रहल अछि जे सूर्पनखाक नाक आ कान सेहो ओ काटि लेलक हँ । एहि सँ बढ़िकय अपराध कि होयत ? वीर विराध सेहो लड़ाइ मे मारल गेल । मुनि लोकनि निर्भय भ’ ओकर जय-जयकार कय रहल छथि । ई हमर कुलक लेल लज्जाक बात छी । एकर दायित्व हमरा सभक माथ पर अछि । हम बदला मे ओकर स्त्रीक हरण कय लेबैक । तूँ एहि मे साधक बनिकय हमर सहयोग करह । तूँ मायाक बल पर सोनाक हिरन बनि जाह आ अपन रूपक छटा देखबैत चञ्चल सञ्चार (कूद-फाँग) देखबह । राम आ लक्ष्मण तोहर पाछाँ आश्रम सँ बाहर निकलि जायत आ हम ओतहि अपन काज पूरा कय लेब ।” ॥१०-२०॥
।सोरठा।
के देलक उपदेश, सर्व्वनाशकर वचन सौँ ॥२१॥
शुनु शुनु नृप लङ्केश, अरि थिक से जन वध्य थिक ॥२२॥
भावार्थः
ई सुनिकय मारीच कहल – “एहेन सर्वनाशकर वचन केर उपदेश अहाँ केँ के देलक ? हे लंकाधीश ! सुनू, एहेन सलाह देनिहार अहाँक दुश्मन छी; जान सँ मारि देबा योग्य अछि ॥२१-२२॥
।चौपाइ।
रामक कि कहब सहज स्वभाव । थर थर तन जौँ मन पड़ि आब ॥२३॥
कौशिक लयला हिनका सङ्ग । हम देखल नेनहि मे रङ्ग ॥२४॥
फेकल से शर तेहन तानि । शर-वश खसलहुँ जलनिधि-पानि ॥२५॥
शत योजन पर अद्भुत बात । भय थरथर तन चलदल-पात ॥२६॥
स्मरण मात्र सौँ हम गत-गर्व्व । रामाकार देखि पड़ सर्व्व ॥२७॥
दण्डक वन गेलहुँ मन आनि । हरिण-स्वरूप बनल रिपु जानि ॥२८॥
तन विचित्र अति तीष विषाण । परशहि रह नहि प्राणि प्राण ॥२९॥
देखितहि तिनु जन काँ हम आँखि । मारय दौड़लहुँ मन किछु राखि ॥३०॥
कपट चिन्हल ईश्वर रघुवीर । हृदयमध्य मोरा मारल तीर ॥३१॥
मुह सौँ शोणित खसल भभाय । खसलहुँ उदधि मध्य हम आय ॥३२॥
सतत बनल भय रामक रहय । अयला अयला जनि केओ कहय ॥३३॥
सपनहुं मे हम देखी राम । जगितहुं ठाढ़ देखैछी ठाम ॥३४॥
रामाकार भेल मन-वृत्ति । बाहर वृत्तिक गमन निवृत्ति ॥३५॥
तनिसौँ आग्रह तजि घर जाउ । बलसौँ प्रबल न काल जगाउ ॥३६॥
तजि विरोध बनु रघुपति-दास । लङ्केश्वर तौँ छूटत त्रास ॥३७॥
मुनि-मुख शुनल विभुक अवतार । अन्तर बहुत विरञ्चि विचार ॥३८॥
दशमुख जैँ विधि मारल जाय । निक थिक से कर्त्तव्य उपाय ॥३९॥
मन नहि मानब मानब राम । नारायण अव्यय सुखधाम ॥४०॥
जाउ बूझि घर परिहरु मारि । गेलहुँ वर्षा बाँधिय-आरि ॥४१॥
भावार्थः
रामक सहज स्वाभाविक वीरता केर बखान हम कि करू ! हुनकर याद अबिते थर्रा उठैत छी । हुनका ऋषि विश्वामित्र अपना संग लय अनने छलाह । हम हुनकर करामात बच्चे मे देखि चुकल छी । ओ खींचिकय एहेन तीर मारलनि कि से लगिते हम समुद्रक पानि मे सौ योजन दूर जा कय खसलहुँ । डर सँ शरीर हवा मे चंचल पात सब जेकाँ काँपय लागल । ई याद करितो हमर सबटा घमंड चूर-चूर भ’ गेल । हमरा डर सँ यत्र-तत्र-सर्वत्र रामहि राम देखाय दियए लगलाह । मन मे शत्रुता ठानिकय हम हिरनक रूप धारण कय दण्डकवन गेलहुँ । हमर शरीर अनुपम छल आ हमर सींग एतेक तेज छल जे छुबितहि प्राणीक प्राण उड़ि जाइत छलैक । तीनू गोटे केँ आँखि सँ देखिते हम मोन मे किछु बात राखिकय हुनका सब केँ मारय लेल दौड़लहुँ । भगवान राम हमर कपट-रूप चिन्हि गेलाह आ हमरा हृदय मे एक तीर मारलनि । तीर लगिते हमर मुँह सँ धारा-प्रवाह खून बहय लागल आ हम समुद्र मे जा कय खसलहुँ । तहिया सँ हमरा हमेशा रामक त्रास बनल रहैत अछि । लगैत अछि जेना कियो कहि रहल हो, हे हैया राम अयलाह, हैवा राम अयलाह । सपनहुँ मे हम रामहि टा केँ देखैत छी आ जगिते देरी हुनके अपन सोझाँ मे ठाढ़ देखैत छी । हमर चित्तवृत्ति रामक भावना करैत-करैत राममय भ’ गेल अछि आ चित्त मे बाहरक आर कोनो भावना पैसिये नहि पबैत अछि । हुनका संग रार (हठपूर्वक दुश्मनी) छोड़िकय रामक दास बनि जाउ । हे लंकेश, एहि सँ अहाँ निर्भय भ’ कय रहब । हम मुनि सभक मुँह सँ सुनलहुँ अछि जे ईश्वर रामक रूप मे अवतार लेलनि अछि । ब्रह्मा मोन मे बहुते सोचलनि-विचारलनि जे कि कयल जाय । आर निश्चय कयलनि जे जाहि सँ रावण मारल जायत एहेन उपाय कयनाय ठीक होयत । ताहि लेल अहाँ मोन मे एहेन जुनि मानब जे राम मानव छथि । ओ साक्षात् नारायण छथि, अविनाशी छथि आ आनन्दक खजाना छथि । एना बुझिकय अहाँ वैरी छोड़िकय घर चलि जाउ । बरखा समाप्त भ’ गेलापर लोक मेड़ (आड़ि) बान्हिकय खेतक पानि बचबैत अछि ।” ॥२३-४१॥
।दोहा।
कहल जखन मारीच तहँ, रावण हित उपदेश ॥४२॥
उत्तर कहलनि से तकर, कहइत छह तोँह वेश ॥४३॥
भावार्थः
जखन मारीच द्वारा रावण केँ एहि प्रकारक हितकर सलाह देल गेलैक, तखन रावण जवाब देलक – “तूँ ठीक कहैत छह ॥४२-४३॥
।चौपाइ।
परमात्मता जौँ जन्मल राम । तनिकाँ हमर निधन मन-काम ॥४४॥
ब्रह्महु काँ मन मे निक लाग । कि करब आयल हमर अभाग ॥४५॥
संकल्पक तनिकाँ नहि हानि । सीता हरब मरब हठ ठानि ॥४६॥
रण-महि-मरण अमर-पद जाइ । राक्षसेन्द्र रण-विमुख नुकाइ ॥४७॥
रामक विजय होयत सङ्ग्राम । हमरो सुयश विदित सभ ठाम ॥४८॥
दुइ मे एक सत्य शुनु हयत । सीता-लाभ जीव की जयत ॥४९॥
मृग विचित्र बनु सत्वर तात । जौँ जो दुनु जन आश्रम कात ॥५०॥
ठकयित आश्रम दूर लै जाह । इच्छा तोहर तखन पड़ाह ॥५१॥
कहल हमर एतबा टा करह । आश्रम सदा सुखित-मन रहह ॥५२॥
जौँ नहि करबह भय सौँ काज । घुरि नहि जयबह अपन समाज ॥५३॥
देखह हाथ तीष तरुआरि । बड़ पाखण्ड देबहु हम मारि ॥५४॥
शुनि मन कर मारीच विलाप । रावण-कर-मरणैँ अति पाप ॥५५॥
रामक कर-मरणैँ श्रुति-युक्ति । साधन बिनु हम पायब मुक्ति ॥५६॥
कह मारीच शुनिय लङ्केश । कहल करब चलु चलु ओ देश ॥५७॥
रावण रथ मारीच चढ़ाय । रामाश्रम रथ गेल बढाय ॥५८॥
मायामृगक कनक-वर रङ्ग । रजत-विन्दु सौँ शोभित अङ्ग ॥५९॥
नील रत्न सन सुन्दर आँखि । चल-चञ्चल जनु उड़ बिनु पाँखि ॥६०॥
रत्नशृङ्ग मणिमय सभ खूर । चपला बदन चमक परिपूर ॥६१॥
आश्रम निकट टहल घुमि घुमि । गगन निहारि निहारय भूमि ॥६२॥
मायामृग कर तेहन उपाय । सीता-मन मोहित भय जाय ॥६३॥
क्षणमे निकट क्षणहिमे दूर । करथि दशानन-आज्ञा पूर ॥६४॥
भावार्थः
यदि वास्तव मे रामक रूप मे ईश्वर अवतार लेलनि अछि आर हुनकर लक्ष्य हमर मृत्यु अछि आर यैह ब्रह्मा केँ भावैत छन्हि त हम कि कय सकैत छी । हमर दुर्भाग्य आबि गेल अछि । ब्रह्मा जे संकल्प मोन मे कय लैत छथि ओहि मे अन्यथा नहि होइत छैक । तैयो हम सीता-हरण करब आ रार ठानिकय (शत्रुता मोल लयकय) मरि-मिटब । दुइ गोट रास्ता अछि, चाही त लड़ाइक मैदान मे मरिकय मोक्ष पाबी, या राक्षस सभक नेता रहितो लड़ाइक मैदान सँ भागिकय कतहु नुका जाय । यदि लड़ाइ मे रामहिक जीत भ’ जाइत छन्हि तैयो हमरहि सर्वत्र बड़ाइ होयत । आब दुइ मे सँ कोनो एक्के टा बात होयत, चाहे त सीता हाथ लगतीह या प्राण जायत । ताहि लेल हे भाइ, तूँ झटपट एकटा सुनहरा रंगक हरिन बनि जाह । अगर राम आ लक्ष्मण आश्रमक नजदीक होइथ त हुनका तूँ छलपूर्वक आश्रम सँ दूर लय जइहह । फेर अपन इच्छा अनुसार भागि जइहह । तूँ एतबा-टा हमर काज कय दह, फेर सुखपूर्वक अपन आश्रम मे रहह । अगर तूँ रामक डर सँ ई काज नहि कय देबह त फेर घुरिकय अपना लोक लग नहि जा पेबह । देखह, हमर हाथ मे ई तीख (धारदार) तलवार अछि । तूँ बेसी बकबक करबह त जान सँ मारि देबह ।” ॥४४-५४॥
ई सुनिकय मारीच मन मे सोचय लागल – “यदि रावणक हाथ सँ मारल जाइत छी तँ भारी पाप होयत । यदि रामक हाथ सँ मारल जाइत छी तँ जेना कि शास्त्र मे कहल गेल अछि बिना कोनो साधनाक हम मोक्ष पाबि जायब ।” एना सोचिकय मारीच कहलक – “हे लंकेश, सुनू । हम अहाँक आज्ञाक पालन करब । चलू ओहि ठाम ।” रावण मारीच केँ अपन रथ पर चढ़ा लेलक आ रथ केँ बढ़ाकय रामक आश्रम पर लय अनलक । मारीच मायाक हिरन बनि गेल । ओकर रंग सोनाक रहैक आ ओहि पर चाँदीक रंगक चित्ती (छींट) पड़ल छलैक । ओकर आँखि नीलम केर छलैक । ओ एतबे उछल-कूद करैत रहय जेना लगैत छल कि पाँखिक बिने उड़ि रहल हो । सींग रत्न सभक आ खुर मणिक छलैक । मुँह मे मानू बिजलीक चमक भरल छलैक । ओ घुमि-घुमिकय आश्रम लग विचरण करय । आसमान दिश ताकिकय तुरन्ते फेर धरती दिश ताकय । माया-मृग एहेन चाइल चलय, जाहि सँ सीताक मन मोहित भ’ जाइन्ह । क्षणहि मे लग आबि जाय आ क्षणहि मे दूर चलि जाय । एहि प्रकारे ओ रावणक आज्ञाक पाल करय लागल ॥५५-६४॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे षष्ठोऽध्यायः।
।मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक छठम अध्याय समाप्त।
हरिः हरः!!

2 Comments
Bahut neek san varnan kel gel chhai. Eh baat sahi nirnay lelaith onahiyon marle jayab jao nahi jeb t. O bad paap hoyat. Jao Prabhu k haath maral jeb t bhav sagar san paar bho jeb. Eh baat sochi k o ravan k aaswast ko delak.
कहल जखन मारीच तहँ, रावण हित उपदेश ॥४२॥
उत्तर कहलनि से तकर, कहइत छह तोँह वेश ॥४३॥
Bahut neek san varnan kel gel chhai.
Mariachi pahine updesh doke ravan k bujhalkain o kahlah tun thik kahait chhah. Okar bado Ravan k aadesh san hunka marichi k maya mrig bonaiye lel kahlah. Kiyek t o apan swavivek san nirnay leleh.
Eh baat sahi nirnay lelaith onahiyon marle jayab jao nahi jeb t. O bad paap hoyat. Jao Prabhu k haath maral jeb t bhav sagar san paar bho jeb. Eh baat sochi k o ravan k aaswast ko delak.
कहल जखन मारीच तहँ, रावण हित उपदेश ॥४२॥
उत्तर कहलनि से तकर, कहइत छह तोँह वेश ॥४३॥
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