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मिथिलाभाषा रामायणः अयोध्याकाण्ड छठम् अध्याय – गंगा पार करब

1585 भ्यूज

स्वाध्याय पाठ

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – छठम् अध्याय

गंगा पार करब 

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण नामान्तरेण च योगिया-मालव-छन्दः।

लक्ष्मण सौँ गुह कहल निषाद । राम-दशा देखि चित्त विषाद ॥१॥
देखिअ रामचन्द्र गति भाय । सुख-सुषुप्त कुश घास ओछाय ॥२॥
मणिपर्य्यङ्क भवन रमणीय । जेहन इन्द्र-सुखकर कमनीय ॥३॥
शुदिनि मन्थरा की अधलाहि । तकरे कहलेँ रानि बताहि ॥४॥
हाहा केकयि कयलनि पाप । देखतहिँ होअ चित्त सन्ताप ॥५॥
शुनि लक्ष्मण कहलनि शुनु मित्र । कर्म्म कठिन-गति बहुत विचित्र ॥६॥
सुख दुख कारण होथि न आन । दुख-दाता पर लघु-मति जान ॥७॥
हम ई करब व्यर्थ अभिमान । कर्म्म-सूत्र-ग्रन्थित नहि ज्ञान ॥८॥
शत्रु मित्र दारा सुत भाय । सभटा कर्म्मे देथ मिलाय ॥९॥
बड़ बड़ मुनि जन बैसला हारि । शक्य न कर्म्म शुभाशुभ टारि ॥१०॥
पूर्व्वार्ज्जित सुख दुख जे आब । भोग करी मन सहज स्वभाव ॥११॥
करब भोग रहबे बिनु भोग । सभ होइछ कर्म्महिँ संयोग ॥१२॥
कर्म्म कि मानत फलचय देत । केओ सुरपुर बस केओ वन प्रेत ॥१३॥
व्यर्थ करिअ मन हर्ष विषाद । लाभ शुभाशुभ कर्म्म-प्रसाद ॥१४॥
सकल सुरासुर विधिक विधान । वश छथि सभकाँ गति नहि आन ॥१५॥
पाप पुण्य सौँ भेल शरीर । सुख दुख होअ रहय नहि थीर ॥१६॥
सुख दुख उपमा कहल कि जाय । जेहने जल कादब लपटाय ॥१७॥
मायामय थिक मनसौँ मानि । इष्टानिष्ट मध्य नहि हानि ॥१८॥
कहितहिँ शुनितहिँ भय गेल भोर । राम कयल लक्ष्मण काँ सोर ॥१९॥
कृतनितकृत्य वृत्त भय आउ । दृढ़ नव सुललित नाव मँगाउ ॥२०॥
दृढ़ नौका अपनहि गुह टेबि । लयला सत्वर अपनहि खेबि ॥२१॥
चढ़ल जाय किछु विलम्ब न आब । हे रघुनन्दन निकटहि नाब ॥२२॥
थिर भय बैसक कहल पठाय । सीता काँ प्रभु नाव चढाय ॥२३॥
मित्र हाथ धय चढ़ला राम । नाबक उपर कयल विश्राम ॥२४॥
लक्ष्मण आयुध सभ धय देल । फानि नाव पर अपनहुँ गेल ॥२५॥
लय रथ सचिव घूरि घर जाउ । पिता वृद्ध काँ बहुत बुझाउ ॥२६॥
कहब प्रणाम माय काँ जाय । विद्यमान सुख देब जनाय ॥२७॥
कहब प्रणाम ततय शत मोर । कहइत सीता नयन सनोर ॥२८॥
लक्ष्मण कोपहिँ निन्दा कयल । नीति धर्म्म अद्यावधि धयल॥२९॥
शोकहिँ तुरग न चल एक डेग । पवनहुँ सौँ जनिकाँ अति वेग ॥३०॥
गुह-परिजन कर धर करुआर । हे प्रभु नाव आब बिच धार ॥३१॥
शुनि जानकि सुरसरिक प्रणाम । कयलओ अंगिरल पुर मन-काम ॥३२॥
हे सुरसरि वन-दुख निस्तार । घुरब करब पूजा विस्तार ॥३३॥
मदिरा मांस विविध उपचार । करब यथाविधि वारम्वार ॥३४॥
झटितिहि पर-तट लागल नाव ।  सभ जन क्रमक्रम उतरिअ आब ॥३५॥
गुह कह चलइत हम वन जयब । सङ्गहि सङ्ग एतय पुन अयब ॥३६॥
जौँ नहि लय जायब रघुवीर । अपनहि मरब बेधि हिअ तीर ॥३७॥
कहल राम शुनु मित्र निषाद । परिहरु परिहरु विषम विषाद ॥३८॥
आयब चौदह वर्ष बिताय । लक्ष्मण सन हमरा अहँ भाय ॥३९॥
मिलि मिलि देल बहुत आश्वास । सभ जन फिरला मन-विश्वास ॥४०॥
ततय मेध्य मृग एकटा मारि । अग्नि पकाओल भूष विचारि ॥४१॥
होम कयल तिनु जन किछु खाए । तरुवर-तर सुख सुतला जाय ॥४२॥
सकल रजनि गेल सुखसौँ बीति । कहइत शुनइत धर्म्म सुनीति ॥४३॥
भारद्वाजाश्रम लग जाय । पटु वटुकाँ कहि देल पठाय ॥४४॥
सीता लक्ष्मण राम समाज । बाहर छथि आयल छथि आज ॥४५॥
एहन कहब वटु मुनि-तट जाय । ओ मुनिकाँ सभ कहल बुझाय ॥४६॥
रमणी-सह सानुज रघुवीर । सुन्दर एहन न देखल शरीर ॥४७॥
वार्त्ता एहन शुनल मुनि जखन । अति आनन्द मगन मन तखन ॥४८॥
अर्घ पाद्य सभ लेलहि हाथ । गेलाह शीघ्र जतय रघुनाथ ॥४९॥
समुचित पूजा मुनि पुन कयल । आदरसौँ निज आश्रम लयल ॥५०॥
तप जे कयल प्राप्त फल आज । अपने अयलहुँ राम समाज ॥५१॥
माया मानुष धयल शरीर । चिन्हइतछी अहँ काँ रघुवीर ॥५२॥
विधि अनुमति लेल अहँ अवतार । चललहुँ हरण होयत महि भार ॥५३॥
कहइतछी हम नाथ यथार्थ । आज भेलहुँ हम बहुत कृतार्थ ॥५४॥
श्रीरघुनन्दन लक्ष्मण-सहित । अभिवादन कयलनि छल-रहित ॥५५॥
अपने मुनि हम क्षत्रिय जाति । अनुग्राह्य हमही सभ भांति ॥५६॥
हमछी धन्य अहाँ भगवान । ई कहइत रजनी अवसान ॥५७॥
प्रात समय रघुनन्दन जागि । मुनि-सुत-संग तिनू जन लागि ॥५८॥
मुनि-सुत काँ से परिचित बाट । पार उतरता यमुना-घाट ॥५९॥
काठक कौशल बेड़ बनाय । सुख सौँ पार देल पहुँचाय ॥६०॥

भावार्थः

निषादराज गुह केर मोन मे रामक हालत देखिकय बड भारी विषाद भेलनि । ओ लक्ष्मण सँ कहलाह – “हे भ्राता, रामजीक हात त देखू । ओ कुश आ घास बिछाकय सुतल छथि; हिनक ई कुश-शय्या ओहिना लगैत अछि जेना इन्द्रहु केँ आरामदेह लागयवला सुन्दर भवन मे मणिक बनल पलंग हो । कतेक खराब छथि मन्थरा, जिनकर कान फुकला सँ रानी पागल जेकाँ भ’ गेलिह । हाय, कैकेयि ई पाप कयलनि अछि । देखिते देरी मोन मे पीड़ा होमय लगैत अछि ।” ई सुनिकय लक्ष्मण जी कहला – “हे मित्र, सुनू । कर्म (भाग्य) बड विचित्र आ कठिनाइ सँ बुझय मे आबयवला होइछ । सुख आ दुःख केर कारण कोनो आर नहि होइछ । जे ओछ विचारक होइछ वैह दोसर केँ दुःखदाता बुझि बैसैत अछि । हम एना कयलहुँ, ई अहम् भावना व्यर्थ अछि । जे आदमी कर्मक जाल मे फँसल रहैछ ओकरा सही ज्ञान नहि होइत छैक । कर्मे शत्रु, मित्र, पत्नी, पुत्र, भाइ आदि सब सँ मिलबैत अछि । बड़का-बड़का मुनि सब हारि बैसलाह; हुनका सब मे सँ कियो नहि कर्मक नीक कि बेजा भोग केँ टालि सकलाह । पूर्व मे कयल गेल कर्म सभक फलस्वरूप जेहो सुख या दुःख आबि जाय ओकरा सहज भाव सँ भोगि लेबाक चाही । भोग करैत रहब आ बिना भोग केर रहब – ई दुनू कर्मे-वश मे होइत अछि । कर्म मानत नहि, ओ त फल चखइये कय रहत । कर्मक फलस्वरूप कियो स्वर्ग पबैत अछि त कियो प्रेत-योनि मे भटकैत अछि । मोन मे हर्ष या विषाद करब व्यर्थ अछि, कियैक तँ शुभ या अशुभ फल केर लाभ कर्महि अनुसार होइत छैक । जतेक देव आ दानव छथि ओ सब विधि (भाग्य) केर विधानक वश मे छथि; हुनका सब केँ आर कोनो उपाय नहि छन्हि । ई शरीर पाप आ पुण्य सँ उत्पन्न होइत अछि, अतः एहि मे सुख आ दुःख होइत रहत; न सुख स्थिर रहत, न दुःख । सुख आ दुःख केर तुलना केकरा सँ करू; ई दुनू ओहिना मिलल अछि जेना पानि आ थाल । ई संसार माया थिक, एना मोन मे मानिकय, न सुख मे हानि बुझू, न दुःख मे ।” ॥१-१८॥

एहि तरहें कहैत-सुनैत राति बीति गेल आ भोर भ’ गेल । राम लक्ष्मण केँ सोर पाड़लनि आर कहलनि – “आब नित्यकृत्य स्नानादि कय केँ तैयार भ’ जाउ आ एक गोट मजगुत, नव आ नीक नाव मंगाउ ।” सुनितहि गुह एकटा मजगुत नाव चुनिकय अपनहि सँ खेबिकय आनि लेलनि आ कहलनि – “हे रघुनन्दन, नाव लग मे लगा देल गेल अछि । देर कथी के, आब एहि पर चढ़ल जाय ।” तखन राम पहिने सीता केँ नाव पर चढ़ौलनि आ कहलनि जे स्थिर भ’ कय बैसू । फेर राम स्वयं मित्र गुह केर हाथ धय नाव पर चढ़लाह आ ओतय आराम सँ बैसि गेलाह । लक्ष्मण सेहो सबटा हथियार सब नाव पर रखलनि आ अपने सेहो नाव पर कूदिकय चढ़ि गेलाह । राम मंत्री सँ कहलनि – “हे मंत्री, रथ लय केँ अहाँ घर वापस जाउ । वृद्ध पिताजी केँ बढियाँ सँ बुझेबनि । फेर माँ लग जाकय हुनका हमर प्रणाम कहबनि आ सूचित कय देबनि जे हम सब एतय सुख सँ छी ।” फेर सीता कहलखिन – “हुनका हमर सौ-सौ बेर प्रणाम कहबनि ।” आर एतेक कहितहि सीताक आँखि मे नोर भरि गेलनि । लक्ष्मण क्रोधवश किछु निन्दाक बात बजलाह, मुदा ओ एखन तक न्याय व धर्म सँ विचलित नहि भेला । जे हवो सँ तेज चलयवला छल ओ घोड़ा सब शोकवश एको डेग चलय मे समर्थ नहि छल ॥१९-३०॥

एम्हर गुहक आदमी सब हाथ सँ करुआरि चला रहल छल । ओ सब कहलक – ‘हे राम, आब नाव बीच धार मे पहुँचि गेल अछि ।’ ई सुनिकय सीता गंगा केँ प्रणाम कयलिह आ कबुला कयलिह जे “हे गंगे, जँ हमर मोनक कामना पूरा होयत, यदि वन केर दुःख सँ उबरि पायब, त घुरय बेर सविस्तार पूजा करब । भाँति-भाँतिक मद्य-माँस (हविष्य) सब सँ विधिपूर्वक बेर-बेर अर्चना करब ।” जल्दिये नाव किनार लागि गेल । आब सब कियो एक-एक कय उतरैत रहलाह । चलबाक समय गुह कहलनि – “हम सेहो अपनहिं लोकनिक संग वन मे जायब आ अपने सब जहिया घुरब तहिया घुरि आयब । हे रघुवीर! जँ अपने हमरा संग नहि लय जायब त हम अपन हृदय मे स्वयं तीर मारिक प्राणत्याग कय देब ।” राम कहलखिन – “हे मित्र गुहराज ! हमर बात सुनू । मोन मे दुःख जुनि करब । हम चौदह बरस बिताकय एतय घुरब । अहाँ त हमर लक्ष्मण जेहेन भाइ छी ।” एहि प्रकारे राम बेर-बेर गला लगाकय बहुते आश्वासन देलखिन्ह । रामक वचन पर मोन मे विश्वास कय केँ गुह आदि सब लोक घुरि गेलाह । एतय भूख लगला पर एकटा मेध्य (यज्ञक लेल उपयुक्त) मृग केँ मारिकय आगि मे पकायल गेल । फेर मांस सँ हवन कयलनि आ थोड़ेक रास शेष मांस तीनू गोटे खयलनि । फेर सुखपूर्वक जाकय सुति रहलाह । भरि राति धर्म आ नीति केर बात करैत आराम सँ कटि गेल ॥३१-४३॥

भरद्वाज केर आश्रम मे गेनाय 

फेर ओ सब भरद्वाजक आश्रम लग पहुँचलथि । ओतय एक गोट चतुर ब्राह्मण कुमार केर मार्फत अपन आगमनक सूचना पठौलनि । “हे बटुक! भरद्वाज मुनि लग जाकय कहियौन जे लक्ष्मण आ सीताक संग राम आयल छथि आ बाहर मे ठाढ़ छथि ।” बटुक मुनि केँ सारा हाल कहलनि । पत्नी सीता आ छोट भाइ लक्ष्मणक संग राम ठाढ़ रहथि । एहेन सुन्दर शरीर त कतहु नहि देखलहुँ ! मुनि जखन ई समाचार सुनलनि तखन हुनकर मोन मे परम आनन्द समा गेलनि, ओ आनन्दमग्न भ’ गेलाह । फेर मुनि अर्घ्य (पिबयवला जल) आ पाद्य (पैर पखारयवला जल) हाथ मे लय केँ झट ओतहि गेलाह जेतय राम रहथि । मुनि उचित विधान अनुसार हुनकर पूजा कयलनि आ आदरक संग अपन आश्रम मे लय गेलाह । आर कहलाह – “हम जे तपस्या कयल तेकर फल आइ भेटि गेल, कियैक तँ हे राम! अहाँ सपरिजन एतय पधारलहुँ अछि । अपने माया-मनुष्यक शरीर धारण कयलहुँ अछि । हे रघुवीर, हम अहाँ केँ चिन्हैत छी । अहाँ ब्रह्माक अनुरोध सँ अवतार लय केँ चलल छी । आब अहीँ सँ धरतीक भार दूर होयत । हे प्रभु, हम सच कहैत छी, आइ हम बहुत-बहुत कृतार्थ भ’ गेलहुँ ।” ॥४४-५४॥

तखन लक्ष्मण-सहित श्रीराम सहज भाव सँ मुनि केँ अभिवादन कयलनि आ कहलनि – “अपने मुनि ब्राह्मण छी, आर हम क्षत्रिय छी । हरेक ढंग सँ अपनेक दर्शनहि सँ हम अनुगृहीत भेलहुँ अछि । हम सब धन्य भेलहुँ । अपने हमरा लेल भगवान् छी ।” एहि तरहें बात करैत राति बीति गेल । भोर भेला पर राम जगलाह । तीनू गोटे मुनि-कुमार केँ संग लगा लेलनि, कियैक तँ मुनि-कुमार केँ रस्ता बुझल छलन्हि फेर यमुनाक किनार पहुँचिकय नदी टपलाह । कौशलपूर्वक लकड़ीक बेड़ा बनायल गेल आ ऋषिकुमार हुनका आराम सँ यमुना टपा देलनि ॥५५-६०॥

चित्रकूट पहुँचनाय आ वाल्मीकि संग भेंट कयनाय 

।हरिपद छन्द।

।हरिपदं मिथिलासंगीतानुसारेण प्रियतमा-मालव-छन्दः।

लक्ष्मण सीता रामचन्द्र गिरि, चित्रकूट चढ़ि गेला ॥६१॥
गिरि आश्रम शोभा काँ देखल, मन आनन्दित भेला ॥६२॥
मृग पक्षीक विलक्षण शोभा, फल भल फूल अनेक ॥६३॥
मुनि वाल्मीकि धर्म्ममय आश्रम, ऋषि-सङ्कुल सुविवेक ॥६४॥
आश्रममे वाल्मीकि महामुनि, तेजपुञ्जसौँ बैसल ॥६५॥
देखल जाय प्रणाम तिनू जन, कएलनि कौशल कौशल ॥६६॥
सानुज श्रीरघुकुल-सरसिज-रवि, जटा मुकुट शिर धारण ॥६७॥
अम्बुज-नयन मदन-मद-मोचन, चिन्हलनि मुनि-जन-तारण ॥६८॥
परमानन्द राम काँ सत्वर, उठिकेँ हृदय लगाओल ॥६९॥
हरषल नोर नयन बह अविरल, कहल जन्म-फल पाओल ॥७०॥
पूजा विविध अतिथि परमेश्वर, शीतल जल भरबाओल ॥७१॥
अपने नरपति थिकहुँ वनी हम, उचिती बहुत शुनाओल ॥७२॥
कि कहब रामचन्द्र एहि गिरिपर, आबि कष्ट अहँ पाओल ॥७३॥
बद्धाञ्जलि रघुनन्दन कहलनि, किछु दिन मुनि हम रहबे ॥७४॥
पिता-वचन सौँ वनी-वेष बनि, जनितहिँ छी की कहबे ॥७५॥
स्थान देखाओल जाय से हमरा, करब जतय सुख-वासा ॥७६॥
सीतालक्ष्मण सहित रहित-दुख, अपनेक सभ प्रत्याशा ॥७७॥
हसि मुनि कहल सकल लोकक अहँ, निश्चय वासस्थाने ॥७८॥
अथवा अहँ सर्व्वत्रहिँ व्यापक, दोसर कि कहब आने ॥७९॥
द्वेष-रहित समदृष्टि शान्त-मन, अपनैँ चरणक भक्त ॥८०॥
तनिकर हृदय-कमलमे रघुवर, अपनैँक गृह अनुरक्त ॥८१॥
धर्म्माधर्म्म त्याग कय सभटा, अपनैँक भजनानन्द ॥८२॥
अपनैँक मन्त्र सदा मन दय जप, जे निस्पृह निर्द्वन्द ॥८३॥
निरहङ्कार राग सौँ वर्ज्जित, अपनैँ मे मति चित्त ॥८४॥
सुख दुख सम मायामय सभ थिक, जानथि विश्व अनित्य ॥८५॥
कनक जेहन इट माटि तेहन सन, लोभ-लेश नहि जानथि ॥८६॥
षट विकार देहहि मे सभ अछि, आत्मामे नहि मानथि ॥८७॥
जे संसार धर्म्मसौँ बाहर, चिद्घन सभ-गत देखथि ॥८८॥
सीता लक्ष्मण रामचन्द्र अहँ, मन-मन्दिर मे लेखथि ॥८९॥
अपनैँक नाम सतत कीर्तन सौँ, पाप-लेश नहि रहते ॥९०॥
राम-नाम-महिमा रघुनन्दन, वर्णन के कय शकते ॥९१॥

भावार्थः

तखन लक्ष्मण आ सीता सहित रामचन्द्र चित्रकूट पर्वत पर चढ़लाह । पर्वत उपर बसल आश्रम सभक शोभा देखिकय हुनकर मोन प्रसन्न भ’ गेलनि । ओतय मृग आ चिड़ै‍-चुनमुनीक शोभा बहुते सुन्दर छल । भाँति-भाँतिक सुन्दर फल-फूल सब लागल छल । ओतय मुनि वाल्मीकि केर धर्ममय आश्रम छल । ओ विवेकवान् ऋषि सब सँ भरल छल । आश्रम मे महामुनि वाल्मीकि तेजक राशि जेकाँ बैसल छलाह । तीनू गोटे हुनका देखलनि आ अदब (तरीका) सँ हुनकर लग मे जाकय हुनका प्रणाम कयलनि । रघुवंश रूपी कमल केँ प्रफुल्लित करय मे सूरज समान लक्ष्मण-सहित राम सिर पर जटाक मुकुट धारण कएने छथि । हुनक आँखि कमल-समान छन्हि । हुनक सुन्दरता कामदेवहु केर मान-मर्दन करयवला छन्हि । ओ मुनि लोकनिक रक्षा करयवला छथि । देखिते देरी मुनि वाल्मीकि हुनका चिन्हि गेलाह । ओ परम आनन्दित भ’ तुरन्त ठाढ़ भ’ कय राम केँ छाती सँ लगा लेलनि । हर्षातिरेकवश आँखि सँ नोरक धार बहय लगलनि; आर बजलाह – “आइ हमरा जन्म लेबाक फल भेटि गेल ।” परमेश्वर अतिथि बनिकय आयल छथि, ई बुझिकय भाँति-भाँति प्रकार सँ हुनकर पूजा कयलनि आ हुनका लेल टटका शीतल जल मंगबौलनि । फेर बहुते-रास विनय-वचन कहलाह – “अपने राजा छी आ हम वनवासी छी । हे रामचन्द्र, हम कि कहू ? अपने जे एहि चित्रकूट गिरि पर अयलहुँ, ओहि मे अहाँ केँ बहुते कष्ट भेल होयत ।” तखन राम हाथ जोड़िकय कहलखिन – “हे मुनि, हम पिताक आज्ञा सँ मुनिक वेष धारण कय किछु समय एतहि रहब । कहू कि, अपने तँ जनिते छी । कृपया हमरा ओ स्थान देखा दिय’ जेतय हम सीता आ लक्ष्मण संग बिना कोनो तकलीफ केँ आराम सँ निवास करी । अपनहिक भरोसा अछि ।” मुनि हँसिकय कहला – “अपने त स्वयं सब लोकक वासस्थान थिकहुँ । अपने तँ सर्वत्र व्याप्त छी । फेर दोसर जगत कोन कहल जाय ! जे द्वेस सँ रहित हो, सब केँ समान दृष्टि सँ देखयवला हो, जेकर मोन मे शान्ति विराजमान रहय, जे अहाँ चरणक भक्त हो, हे रघुवीर, अहाँक स्नेहिल घर ओकरहि हृदय-कमल मे हेबाक चाही, जे सब धर्म आ अधर्म केर चिन्ता छोड़िकय केवल अहाँक भजन केर आनन्द मे लीन रहैत अछि; सदा मोन लगाकय अहीँक मंत्र केर जप करैत रहैत अछि; जे स्पृहारहित, द्वन्द्वरहित, अहंकार-रहित आ राग-रहित अछि, तथा जेकर चित्त सदैव अहीँ मे रमल रहैत छैक, जे सुख आ दुःख केँ बराबर बुझैत अछि, आर संसार केँ नाशवान् एवं मायास्वरूप बुझैत अछि; जेकरा लेल सोना आ माटि केर ईंटा बराबर छैक, जेकर मोन मे लोभ नामो मात्रक नहि छैक, जे बुझैत अछि जे छः प्रकारक सब विकार केवल शरीर मे होइत छैक, नहि कि आत्मा मे; जे सांसारिक धर्म सब सँ परे (दूर) रहैत अछि, जे सब प्राणी मे घनीभूत चित्तशक्तिक दर्शन पबैत अछि; आर जे सीता एवं लक्ष्मण सहित अहाँ राम केँ अपन मनरूपी गृह मे वर्तमान (उपस्थित) पबैत अछि – अहाँक नामक कीर्तन सदिखन करैत रहला सँ पाप निःशेष भ’ जाइत अछि – हे रघुनन्दन! राम-नाम केर महिमाक बखान भला कइये के सकैत अछि ? ॥६१-९१॥

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण कामोदनाट छन्दः।

हम ब्रह्मर्षि कहाओल नाम । कारण तकर कहैछी राम ॥९२॥
द्विज-घर जन्म किरातक सङ्ग । बढ़लहुँ गहलहुँ तकरे रङ्ग ॥९३॥
शूद्री-रति-कृत पुत्र बहूत । विगत विराग भ्रमिअ अवधूत ॥९४॥
चोर कुसंगेँ बान्हल साटि । हमरा सौँ सभ तस्कर घाटि ॥९५॥
धनुष-बाण-धर जंगल जाइ । जीव-घात कय सभ दिन खाइ ॥९६॥
लूटि मारि ओ तस्कर कर्म्म । नीच कर्म्म बड़ मानल धर्म्म ॥९७॥
छपकल छलहुँ कतहु वन कात । अबइत देखल हम मुनि सात ॥९८॥
अनल दिवाकर दिव्य शरीर । तनिपर दौड़लहुँ लय धनु तीर ॥९९॥
रहु रहु ठाढ़ कहल ललकारि । धन लेब लूटि देब जिब मारि ॥१००॥
मुनि-जनकाँ नहि हरष विषाद । कहलनि शुन द्विज अधम निषाद ॥१०१॥
करइत छह कथिलय ई कर्म्म । करह न लाथ सत्य कह मर्म्म ॥१०२॥
मुनिकाँ हम उत्तर देल फेरि । स्त्री सुत नाति हमर घर ढेरि ॥१०३॥
वन बुलि चुलि तत्पालन काज । यथातथा हो कयल न व्याज ॥१०४॥
मुनि कहलनि अपना घर जाउ । सत्य कथा एकटा बुझि आउ ॥१०५॥
हम करइत छी हिंसा कर्म्म । हमरा वा सभकाँ इ अधर्म्म ॥१०६॥
तावत हम रहबे एहि ठाम । घुरि आयब जायब जे गाम ॥१०७॥
शुनि मुनि वचन गेलहुँ वनटोल । बुझि अयलहुँ हम माँथक मोल ॥१०८॥
हम आनिअ धन कय अन्याय । हमर उपार्ज्जन सभ जन खाय ॥१०९॥
तोहरहु पाप कि हमरहि माँथ । कहह करह जनु एक जन लाथ ॥११०॥
केवल फल-भागी हम तात । पाप-कर्म्म-फल सौँ हम कात ॥१११॥
हम से शुनि घुरि मुनि लग आय । तीर धनुष काँ देल नड़ाय ॥११२॥
हुनि मुनि आगाँ खसलहुँ जाय । नरक घोरसाँ लिअओ बचाय ॥११३॥
मुनि-दर्शन सौँ मन निर्व्वेद । ओ कृपालु किछु कहलनि भेद ॥११४॥
उठ उठ सत-सङ्गति फल पाबि । भल फल आब तोहर अछि भावि ॥११५॥
शरणागत काँ करब न त्याग । उपदेशहु मे गड़बड़ लाग ॥११६॥
मरा मरा जप मन एक ठाम । यावत हम आबी एहि गाम ॥११७॥
मन एकाग्र सुजप हम कयल । विषय विराग दिव्य हठ धयल ॥११८॥
हमरा उपर बढ़ल वल्मीक । हम नहि जानल की ई थीक ॥११९॥
युग-हजार हम फिरला फेरि । बाहर होउ कहल कय बेरि ॥१२०॥
रवि सौँ हमर तेज नहि घाटि । जनु कुहेस रविसौँ गेल फाटि ॥१२१॥
ई उतपति वल्मीक सौँ थीकि। संज्ञा हमर धयल वाल्मीकि ॥१२२॥
शुनु रघुनन्दन नाम-प्रभाव । हम ब्रह्मर्षि विदित जग आब ॥१२३॥
चलु चलु लक्ष्मण ठाम देखाउ । पर्ण-कुटी दुइ दिव्य बनाउ ॥१२४॥
गङ्गा-पर्व्वत-मध्य प्रदेश । मुनि कहलनि थल अछि ई बेश ॥१२५॥
पर्णकुटी बान्हल दुइ गोट । एक गोट वृहत एक गोट छोट ॥१२६॥

भावार्थः

हमर नाम ब्रह्मर्षि केना भेल, से हम कहैत छी । हमर जन्म तँ ब्राह्मण वंश मे भेल, मुदा संगत रहल किरात सभक । हुनके सब संग हम बढ़लहुँ आ हुनके सभक आचरण सिखलहुँ । शूद्र जातिक स्त्रीक संग संगम कय केँ बहुते रास पुत्र सब जन्मेलहुँ ।अवधूत जेकाँ वगैर कोनो परहेजक घूम-फिर करैत रहलहुँ । चोर सभक संग दोस्ती कय केँ एकटा गिरोह बना लेने रही । सब चोर हमर लोहा मानैत छल । तीर-धनुष लयकय रोग जंगल जाय आ जानवर सब केँ मारिकय रोज पेट भरैत रही । लूट, हत्या आ चोरी – एहि अधर्म कर्म केँ हम अपन धर्म मानैत रही । हम कतहु जंगलक किनार मे घात लगाकय नुकायल रही कि सात ऋषि केँ अबैत देखलहुँ । हुनका लोकनिक शरीर आगि आ सूरज समान चमकि रहल छल । हम चिकरिकय कहलियनि – “ठाढ़ रह । तोरा सभक सबटा धन लूटि लेब आ तोरा सब गोटे केँ जान सँ मारि देब ।” ओहि सप्तर्षि केँ हमर एहि बात सँ नहि कोनो हर्ष भेलनि आ न विषादे भेलनि । ओ सब हमरा सँ कहला – “हे द्विज, हे अधम निषाद, सुनह । एहेन खराब कर्म कियैक करैत छह ? बहाना जुनि बनाबह, अपन अन्तरमनक बात सच-सच बताबह ।” हम मुनि लोकनि केँ उत्तर देलियनि – “हमर घर मे स्त्री, पुत्र, पोता आदि बहुते-रास लोक अछि । ओकरे सब केँ पालय-पोसय लेल घूमि-फिरिकय जे कोनो कर्म करय पड़ैत अछि, से सब करैत छी । ई हम सही-सही बता देलहुँ, कोनो बहाना नहि कयलहुँ ।” ऋषि लोकनि हमरा सँ कहलनि – “घर जाह आ सत्य बात पूछि आबह त ! हिन्सा त तूँ करैत छह, मुदा ओहि पापक फल तोहर घरक सब लोक भोगतह आ कि तूँ असगरे भोगबह ? जाबत धरि तूँ घर जयबह आर ओतय सँ पूछिकय घुरबह ताबत धरि हम सब एतहि तोहर प्रतीक्षा करैत रहबह ।” मुनि लोकनिक बात सुनिकय हम अपन जंगलवला बस्ती मे गेलहुँ आ ओतय सँ किछु मूल्यवान् ज्ञान लय केँ घुरलहुँ । हम पूछलहुँ – “हम पाप‍-कर्म द्वारा कमाकय धन अनैत छी आ हमर कमायल धन तूँ सब गोटे खाइत छँ । एहि पापक फल तोरो सब केँ भेटतौक आ कि मात्र हमरहि टा माथ पर पड़त ? एकर उत्तर कहे त ! कोनो बात नहि नुकाबे ।” उत्तर भेटल – “हे तात, हम सब मात्र ओहि धनक भोग करैत छी । पापक फल सँ त हम सब दूर रहैत छी ।” ई सुनिकय हम घर सँ घुरलहुँ आ मुनि लोकनिक लग पहुँचलहुँ आ तुरन्त तीर-धनुष फेंकि देलहुँ । ओहि मुनि सभक पैर पर जा खसलहुँ आ कहलहुँ – “हे मुनि लोकनि! आब हमरा घोर नरक सँ बचाउ ।” मुनि सभक दर्शन सँ हमर मोन मे वैराग्यक उदय भेल । ओ कृपालु ऋषि लोकनि हमरा किछु मर्मक बात सुनौलनि – “उठह, उठह! सन्त सभक संगत पाबिकय आब तोरा नीक फल भेटयवला छह । तूँ हमरा सब केँ धर्मसंकट मे डालि देलह । तूँ शरण मे आबि गेलह, तेँ हेतु तोहर उपेक्षा नहि कय सकैत छी । मुदा तोरा उपदेश देनाय सेहो ठीक नहि लागि रहल अछि (कियैक त तूँ पतित छह) । ‘राम-राम’ मंत्र तोरा केना दी, एहि लेल एकर उलटा ‘मरा-मरा’ मंत्र एकचित्त भ’ कय ताबत धरि जपैत रहह जाबत धरि हम सब घुमिकय फेर एहि निषाद ग्राम मे नहि आबैत छी ।” तखन हम एकाग्र चित्त सँ ‘मरा-मरा’ मंत्र जपैत रहलहुँ । आग्रहपूर्वक मोन केँ विषय-भोग सँ विरत कयलहुँ । हमर शरीर वल्मीक (दीवार/दीमक केर टीला) बनि गेल । हमरा बुझहो मे नहि आयल जे ई कि छी । एक हजार युगक बाद ऋषि लोकनि घुमिकय ओतय अयलाह आ बेर-बेर आवाज दैत सोर करय लगलाह – ‘अरे, दीवारक टीला सँ बाहर त निकलह ।’ हमर चमक सूर्य सँ कम नहि छल । मानू सूर्य केर उगला सँ कोहरा फाटि गेल हो । चूँकि एहि प्रकार सँ हमर उद्भव वल्मीक (दीमकक टीला) सँ भेल, यैह लेल मुनि सब हमर नाम ‘वाल्मीकि’ राखलनि । हे रघुनन्दन! नाम जप केर महिमा सुनू । आब हम दुनिया मे ‘ब्रह्मर्षि’ कहाइत छी । हे लक्ष्मण, चलू । आब हम अहाँ केँ स्थान देखा दैत छी । एतय दुइ गोट सुन्दर पर्णकुटी (फूसक झोपड़ी) बनाउ । गंगा नदी आ पर्वतक बीच केर ई जगह नीक अछि ।” जखन वाल्मीकि मुनि एना कहलनि, तखन ओ दुइ गोट पर्णकुटी बनौलनि – एकटा बड़का आ एकटा छोटका ॥९२-१२६॥

।दोहा।

सीता लक्ष्मण सहित प्रभु, वास कयल स्वच्छन्द ॥१२७॥
मनुष वेष बनि विबुध गण, देखथि परमानन्द ॥१२८॥

भावार्थः

ओतय सीता आर लक्ष्मणक संग राम स्वच्छन्दतापूर्ण निवास कयलनि । देवता सब मानव-रूप धारण कय-कय केँ ओहि परम आनन्दस्वरूप राम केर दर्शन करय अबैत रहैत छलाह ॥१२७-१२८॥

॥इति श्री मैथिल चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला भाषा रामायणे अयोध्याकाण्डे षष्ठोऽध्यायः॥

॥मैथिल चन्द्रकवि विरचित मिथिला भाषा रामायण मे अयोध्याकाण्ड केर छठम् अध्याय समाप्त भेल॥

हरिः हरः!!

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