मिथिलाभाषा रामायणः अयोध्याकाण्ड छठम् अध्याय

स्वाध्याय पाठ

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अयोध्याकाण्ड – छठम् अध्याय

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण नामान्तरेण च योगिया-मालव-छन्दः।

लक्ष्मण सौँ गुह कहल निषाद। राम – दशा देखि चित्त विषाद॥
देखिअ रामचन्द्र गति भाय। सुख – सुषुप्त कुश घास ओछाय॥
मणिपय्यङ्क भवन रमणीय। जेहन इन्द्र – सुखकर कमीनय॥
शुदिनि मन्थरता की अधलाहि। तकर कहलेँ रानि बताहि॥
हाहा केकयि कयलनि पाप। देखतहिँ हाअ चित्त सन्ताप॥
शुनि लक्ष्मण कहलनि शुनु मित्र। कर्म्म कठिन – गति बहुत विचित्र॥
सुख दुख कारण होथि न आन। दुख – दाता पर लघु – मति जान॥
हम ई करब व्यर्थ अभिमान। कर्म्म – सूत्र – ग्रन्थित नहि ज्ञान॥
शत्रु मित्र दारा सुत भाय। सभटा कर्म्मे देथ मिलाय॥
बड़ बड़ मुनि जन बैसला हारि। शक्य न कर्म्म शुभाशुभ टारि॥
पूर्व्वार्ज्जित सुख दुख जे आब। भोग करी मन सहज स्वभाव॥
करब भोग रहबे बिनु भोग। सभ होइछ कर्म्महिँ संयोग॥
कर्म्म कि मानत फलचय देत। केओ सुरपुर बस केओ बन प्रेत॥
व्यर्थ करिअ मन हर्ष विषाद। लाभ शुभाशुभ कर्म्म – प्रसाद॥
सकल सुरासुर विधिक विधान। वश छथि सभकाँ गति नहि आन॥
पाप पुण्य सौँ भेल शरीर। सुख दुख होअ रहय नहि थीर॥
सुख दुख उपमा कहल कि जाय। जेहने जल कादव लपटाय॥
मायामय थिक मनसौँ मानि। इष्टानिष्ट मध्य नहि हानि॥
कहितहिँ शुनितहिँ भय गेल भोर। राम कयल लक्ष्मण काँ सोर॥
कृतनितकृत्य वृत्त भय आउ। दृढ़ नव सुललित नाव मँगाउ॥
दृढ़ नौका अपनहि गुह टेबि। लयला सत्वर अपनहि खेबि॥
चढ़ल जाय किछु विलम्ब न आब। हे रघुनन्दन निकटहि नाब॥
थिर भय बैसक कहल पठाय। सीता काँ प्रभु नाव चढाय॥
मित्र हाथ धय चढ़ला राम। नाबक उपर कयल विश्राम॥
लक्ष्मण आयुध सभ धय देल। फानि नाव पर अपनहुँ गेल॥
लय रथ सचिव घूरि घर जाउ। पिता वृद्ध काँ बहुत बुझाउ॥
कहब प्रणाम माय काँ जाय। विद्यमान सुख देब जनाय॥
कहब प्रणाम ततय शत मोर। कहइत सीता नयन सनोर॥
लक्ष्मण कोपहिँ निन्दा कयल। नीति धर्म्म अद्यावधि धयल॥
शोकहिँ तुरग न चल एक डेग। पवनहुँ सौँ जनिकाँ अति वेग॥
गुह – परिजन कर धर करुआर। हे प्रभु नाव आब बिच धार॥
शुनि जानकि सुरसरिक प्रणाम। कयलओ अंगिरल पुर मन – काम॥
हे सुरसरि वन – दुख निस्तार। घुरब करब पूजा विस्तार॥
मदिरा मांस विविध उपचार। करब यथाविधि बारम्बार॥
झटितिहि पर – तट लाल नाव। सभ जन क्रमक्रम उतरिअ आब॥
गुह कह चलइत हम वन जयब। सङ्गहि सङ्ग एतय पुन अयब॥
जौँ नहि लय जायब रघुवीर। अपनहि मरब बेधि हिअ तीर॥
कहल राम शुनु मित्र निषाद। परिहरु परिहरु विषम विषाद॥
आयब चौदह वर्ष बिताय। लक्ष्मण सन हमरा अहँ भाय॥
मिलि मिलि देल बहुत आश्वास। सभ जन फिरला मन – विश्वास॥
ततय मेध्य मृग एकटा मारि। अग्नि पकाओल भूष विचारि॥
होम कयल तिनु जन किछु खाए। तरुवर – तर सुख सुतला जाय॥
सकल रजनि गेल सुखसौँ बीति। कहइत शुनइत धर्म्म सुनीति॥
भारद्वाजाश्रम लग जाय। पटु वटुकाँ कहि देल पठाय॥
सीता लक्ष्मण राम समाज। बाहर छथि आयल छथि आज॥
एहन कहब वटु मुनि-तट जाय। ओ मुनिकाँ सभ कहल बुझाय॥
रमणी – सह सानुज रघुवीर। सुन्दर एहन न देखल शरीर॥
वार्त्ता एहन शुनल मुनि जखन। अति आनन्द मगन मन तखन॥
अर्घ पाद्य सभ लेलहि हाथ। गेलाह शीघ्र जतय रघुनाथ॥
समुचित पूजा मुनि पुन कयल। आदरसौँ निज आश्रम लयल॥
तप जे कयल प्राप्त फल आज। अपने अयलहुँ राम समाज॥
माया मानुष धयल शरीर। चिन्हइतछी अहँ काँ रघुवीर॥
विधि अनुमति लेल अहँ अवतार। चललहुँ हरण होयत महि भार॥
कहइतछी हम नाथ यथार्थ। आज भेलहुँ हम बहुत कृतार्थ॥
श्रीरघुनन्दन लक्ष्मण – सहित। अभिवादन कयलनि छल – रहित॥
अपने मुनि हम क्षत्रिय जाति। अनुग्राह्य हमही सभ भांति॥
हमछी धन्य अहाँ भगवान। ई कहइत रजनी अवसान॥
प्रात समय रघुनन्दन जागि। मुनि – सुत-संग तिनू जन लागि॥
मुनि – सुत काँ से परिचित बाट। पार उतरता यमुना – घाट॥
काठक कौशल बेड़ बनाय। सुख सौँ पार देल पहुँचाय॥

।हरिपद छन्द।

।हरिपदं मिथिलासंगीतानुसारेण प्रियतमा-मालव-छन्दः।

लक्ष्मण सीता रामचन्द्र गिरि, चित्रकूट चढ़ि गेला।
गिरि आश्रम शोभा काँ देखल, मन आनन्दित भेला॥
मृग पक्षीक विलक्षण शोभा, फल भल फूल अनेक।
मुनि वाल्मीकि धर्म्ममय आश्रम, ऋषि-सङ्कुल सुविवेक॥
आश्रममे वाल्मीकि महामुनि, तेजपुञ्जसौँ बैसल।
देखल जाय प्रणाम तिनू जन, कएलनि कौशल कौशल॥
सानुज श्रीरगुकुल-सरसिज-रवि, जटा मुकुट शिर धारण।
अम्बुज-नयन मदन-मद-मोचन, चिन्हलनि मुनि-जन-तारण॥
परमानन्द राम काँ सत्वर, उठिकेँ हृदय लगाओल।
हरषक नोर नयन बह अविरल, कहल जन्म-फल पाओल॥
पूजा विविध अतिथि परमेश्वर, शीतल जल भरबाओल।
अपने नरपति थिकहुँ वनी हम, उचिती बहुत शुनाओल॥
कि कहब रामचन्द्र एहि गिरिपर, आबि कष्ट अहँ पाओल।
बद्धाञ्जलि रघुनन्दन कहलनि, किछु दिन मुनि हम रहबे।
पिता – वचन सौँ वनी-वेष बनि, जनितहिँ छी की कहबे॥
स्थान देखाओल जाय से हमरा, करब जतय सुख-वासा।
सीतालक्ष्मण सहित रहित – दुख, अपनेक सभ प्रत्याशा॥
हसि मुनि कहल सकल लोकक अहँ, निश्चय वासस्थाने।
अथवा अहँ सर्व्वत्रहिँ व्यापक, दोसर कि कहब आने॥
द्वेष-रहित समदृष्टि शान्त-मन, अपनैँ चरणक भक्त।
तनिकर हृदय – कमलमे रघुवर, अपनैँक गृह अनुरक्त॥
धर्म्माधर्म्म त्याग कय सभटा, अपनैँक भजनानन्द।
अपनैँक मन्त्र सदा मन दय जप, जे निस्पृह निर्द्वन्द॥
निरहङ्कार राग सौँ वर्ज्जित, अपनैँ मे मति चित्त।
सुख दुख सम मायामय सभ थिक, जानथि विश्व अनित्य॥
कनक जेहन इट माटि तेहन सन, लोभ-लेश नहि जानथि।
षट विकार देहहि मे सभ अछि, आत्मामे नहि मानथि॥
जे संसार धर्म्मसौँ बाहर, चिद्घन सभ-गत देखथि।
सीता लक्ष्मण रामचन्द्र अहँ, मन – मन्दिर मे लेखथि॥
अपनैँक नाम सतत कीर्तन सौँ, पाप – लेश नहि रहते।
राम – नाम – महिमा रघुनन्दन, वर्णन के कय शकते॥

।चौपाइ।

।मिथिलासंगीतानुसारेण कामोदनाट छन्दः।

हम ब्रह्मर्षि कहाओल नाम। कारण तकर कहैछी राम॥
द्विज – घर जन्म किरातक सङ्ग। बढ़लहुँ गहलहुँ तकरे रङ्ग॥
शूद्री – रति – कृत पुत्र बहूत। विगत विराग भ्रमिअ अवधूत॥
चोर कुसंगेँ बान्हल साटि। हमरा सौँ सभ तस्कर घाटि॥
धनुष – बाण – धर जंगल जाइ। जीव – घात कय सभ दिन खाइ॥
लूटि मारि ओ तस्कर कर्म्म। नीच कर्म्म बड़ मानल धर्म्म॥
छपकल छलहुँ कतहु वन कात। अबइत देखल हम मुनि सात॥
अनल दिवाकर दिव्य शरीर। तनिपर दौड़लहुँ लय धनु तीर॥
रहु रहु ठाढ़ कहल ललकारि। धन लेब लूटि देब जिब मारि॥
मुनि – जनकाँ नहि हरष विषाद। कहलनि शुन द्विज अधम निषाद॥
करइत छह कथिलय ई कर्म्म। करह न लाथ सत्य कह मर्म्म॥
मुनिकाँ हम उत्तर देल फेरि। स्त्री सुत नाति हमर घर ढेरि॥
वन बुलि चुलि तत्पालन काज। यथातथा हो कयल न व्याज॥
मुनि कहलनि अपना घर जाउ। सत्य कथा एकटा बुझि आउ॥
हम करइत छी हिंसा कर्म्म। हमरा वा सभकाँ इ अधर्म्म॥
तावत हम रहबे एहि ठाम। घुरि आयब जायब जे गाम॥
शुनि मुनि वचन गेलहुँ वनटोल। बुझि अयलहुँ हम माँथक मोल॥
हम आनिअ धन कय अन्याय। हमर उपार्ज्जन सभ जन खाय॥
तोहरहु पाप कि हमरहि माँथ। कहह करह जनु एक जन लाथ॥
केवल फल – भागी हम तात। पाप – कर्म्म – फल सौँ हम कात॥
हम से शुनि घुरि मुनि लग आय। तीर धनुष काँ देल नड़ाय॥
हुनि मुनि आगाँ खसलहुँ जाय। नरक घोरसाँ लिअओ बचाय॥
मुनि – दर्शन सौँ मन निर्व्वेद। ओ कृपालु किछु कहलनि भेद॥
उठ उठ सत – सङ्गति फल पाबि। भल फल आब तोहर अछि भावि॥
शरणागत काँ करब न त्याग। उपदेशहु मे गड़बड़ लाग॥
मरा मरा जप मन एक ठाम। यावत हम आबी एहि गाम॥
मन एकाग्र सुजप हम कयल। विषय विराग दिव्य हठ धयल॥
हमरा उपर बढ़ल वल्मीक। हम नहि जानल की ई थीक॥
युग – हजार हम फिरला फेरि। बाहर होउ कहल कय बेरि॥
रवि सौँ हमर तेज नहि घाटि। जनु कुहेस रविसौँ गेल फाटि॥
ई उतपति वल्मीक सौँ थीकि। संज्ञा हमर धयल वाल्मीकि॥
शुनु रघुनन्दन नाम – प्रभाव। हम ब्रह्मर्षि विदित जग आब॥
चलु चलु लक्ष्मण ठाम देखाउ। पण – कुटी दुइ दिव्य बनाउ॥
गङ्गा – पर्व्वत – मध्य प्रदेश। मुनि कहलनि थल अछि ई बेश॥
पर्णकुटी बान्हल दुइ गोट। एक गोट वृहत एक गोट छोट॥

।दोहा।

सीता लक्ष्मण सहित प्रभु, वास कयल स्वच्छन्द।
मनुष वेष बनि विबुध गण, देखथि परमानन्द॥

मिथिलाभाषा रामायण

।मिथिला संगीतानुसारेण पाव्वतीयबराड़ी नाम छन्दः।

ओतय अयोध्या मन्त्रि सुमन्त्र। पहुचि सरथ भेल दिवसक अन्त॥
वसनहि सौँ मुह कय लेल ओट। राम-वियोग दुःख बड़ गोट॥
नोरक लेल गेल तन तीति। पुर-प्रवेश मे हो अति भीति॥
रथ छोड़ल बाहर नृप-द्वार। भूप देखि जय शब्द उचार॥
स्तुति कय कयलनि चरण-प्रणाम। के अहाँ पुछल कहल से नाम॥
अहह कहू कत सानुज राम। जनक-नन्दिनी छथि कोन ठाम॥
हम निर्द्दय त्यागल मर्य्याद। पापिहुँ काँ किछु कहल समाद॥
हाहा राम कहाँ अहँ आज। गुणनिधि त्यागल हमर समाज॥
प्रियवादिनि जानकि कत गेलि। दुखमे हमर केओ नहि भेलि॥
उबडुब होइछि दुःख-पयोधि। निकट निधन सभटा सुख शोधि॥

।हरिपद छन्दो मिथिलासंगीतानुसारेण तु वसन्तनाम छन्दः।

कहल सुमन्त चढ़ाय लेल रथ, शृङ्गवेरपुर गेला॥
गङ्गातीर उतरला जखना भय गेल बड़का मेला॥
गुह नामक निषादपति सभ जन दौड़ि दण्डवत कयलनि॥
कन्द मूल फल मधुर मधुर से रामक आगाँ धयलनि॥
कन्द मूल फल एक लेल नहि परशि देल प्रभु हाथै॥
गुह कहलनि हम किङ्कर अपनेक आज्ञा कर हम माँथै॥
तनिका कहि कहि श्रीरघुनन्दन बड़क दूध मंगबाओल॥
सानुज राम ताहिसाँ माथा जटा मुकुट निर्म्माओल॥
अविकल कहल राम जे हमरा से समाद सभ आजे॥
कहितहु बहुत कलेश होइछ मन तदपि कहब महराजे॥
हमर निमित्त पिता नहि करिहथि ओ चिन्ता किछु मनमे॥
निज घर सौँ शत गुण सुख सन्तत हमरा होयत वनमे॥
राम कहल माता काँ कहि देब पिता शोक सभ हरिहथि॥
कहब प्रणाम धैर्य्य कय नृप लग चर्च्चा हमर न करिहथि॥

।सोरठा।

सभकाँ कहब प्रणाम, गुरुजन जे छथि नगर मे।
चलयित कहलनि राम, गेल जाय पुर शून्य अछि॥

।नरेन्द्र छन्दः।

सीता कहलनि प्रभु मुख देखइत गुरुजन जे छथि ग्राम।
कहिहथि मन दय शाशु-शशुर – पद शत साष्टाङ्ग प्रणाम॥
रथकाँ ओ हमरा दिश देखल भेलि अधोमुखि फेरि।
हमर प्रणाम कयल संज्ञहि सौँ कनइत चलती बेरि॥
रोषै लक्ष्मण किछु अनुचित सन कहक यत्नपर जखना।
सीताराम शपथ दय तनिकाँ स्वस्थ कयल कहि तखना॥
चढ़ि से नाव उतरि गङ्गा सौँ टक टक तकितहि रहलहुँ।
कहुना कहुना अयलहुँ कनइत देखल से नृप कहलहुँ॥

।मत्तगजेन्द्र छन्दः।

से शुनि कानि कहै लगली तहाँ भूपति सौँ बड़की महरानी।
केकयि काँ वर देलहुँ जे वर लेलनि राज्य कि होइत हानी॥
हा! हमरे प्रिय पुत्र पुतोहु वृथा वन देल कहाओल ज्ञानी।
शोच वृथा करणी अपने सभ आरि न बान्हल गेलहु पानी॥

।माधवीबराड़ी छन्दः।

बड़ निरदय विधि जानल रे ककरो नहि दोष।
राज न करत भरत एत रे केकयि सन्तोष॥
बुझि पड़ राज-भवन वन रे के रह एहिठाम।
नृपतिक की गति होयत रे विन लक्ष्मण राम॥
तिनु जन वन वन सञ्चर रे सहि भूष पिआस।
की होइत की कै देल रे विधि आश विनाश॥
हा धिक हा धिक जीवन रे जग भरि उपहास।
नाति-तन्त्र लिख ककरो रे नहि करि बिसवास॥

।वितत-सूहब छन्दः।

शुनि रानी वचन तहन राजा विकल कहल एहन।
अपन हानी कैलहु रानी विधिक शासन जेहन॥
केकयि कारण मानल मरण हरण अपन ज्ञान।
अन्तष्करण आधि हि दरण होइछ आन कि जान॥
मरण दिवस दैवक विवश क्षमा करिअ दोषे।
पतिक हीना केकयि दीना भोगथु विभव रोषे॥

।मुदिरा छन्दः।

पुत्र-पुतोहु-वियोग-व्यथा-ज्वरसौं हम आइ मरै परछी।
की दुख मे दुख दैछि अहाँ दुख-सागर आइ तरै परछी॥
अन्तरमे अनुभूत महानल बाहर मध्य जरै परछी।
हा रघुनन्दन प्रीति-प्रतीति धरातल मध्य करै परछी॥

।सोरठा।

कयल बहुत हम पाप, शुनु कौशल्य कुशल-मति।
तकरे फल सन्ताप, शाप देल मुनि प्राप्ति-दिन॥
तरुण अवस्था भूप, गेलहुँ खेलाय सिकार हम।
की कहु चूपहि चूप, एक समय शर-धनुष – कर॥
दूइ पहर छल राति, नदी-तीर वन घोर मे।
दुस्सह क्षत्रिय जाति, काण चलाओल जानि गज॥
गज पिबइत अछि पानि, शब्द-बेध सौं बिद्ध से।
व्याकुल उठला कानि, के मारल अपराध बिनु॥
की गति पओतहि माय, विकल बाप करताह की।
के देत पानि पिआय, हाहा पुत्र कतय रहल॥
शब्द शुनल हम कान, मुनि-मानुष-सूचक वचन।
भेल आन सौँ आन, गमहि गेलहुँ भय त्रस्त हम॥
मुनि हम दशरथ भूप, जल भरइत मारल वृथा।
जानल नहि ई रूप, गज-भ्रम सौँ अपराध बड़॥
धयल पयर पर माथ, त्राहि त्राहि कय बेरि कहि।
सब गति अपनेक हाथ, चोर न्याय सौँ नष्ट हो॥
मुनि कहलनि तहि राति, ब्रह्म – वधक संशय तजिय।
वैश्य हमर अछि जाति, भ्रमसौँ मारल कर्म्म-वश॥
करू एकटा काज, जतय पिता जननी हमर।
लय जल तनिक समाज, जाय देब कृति अपन कहि॥

।मत्तगजेन्द्र छन्द।

आंधर वृद्ध पिता जननी छथि जाय तहाँ नृप पानि पिआऊ।
बाणक वेदन देहमे होइछ खैँचि धरू मरिकैँ सुख पाऊ॥
जौँ नहि जायब भूप तहाँ कय भस्म देता जनु कोप बढ़ाऊ।
जे किछु कैल अहाँ करणी हमरो सब दुर्ग्गति मृत्यु शुनाऊ॥

।चौपाइ।

जेहन कहल मुनि मरती बेरि। सभटा तेहन कयल हम फेरि॥
जल भरि कलस लेल से कन्ध। गेलहुँ हम जत आन्धरि अन्ध॥
पद आहट शुनि से बजलाह। पुत्र रातिमे कतय छलाह॥
भूख पिआसेँ कण्ठ सुखाय। दिअ दिअ सत्वर पानि पिआय॥
शयन करू अपनहुँ जल पीबि। मन चिन्ता छल अयलहुँ जीबि॥
पयर धयल हम कहि निज नाम। अहँक पुत्र नहि छथि एहि ठाम॥
सकल विवर्त्त कहल निज काज। तैँ आयलछी अहँक समाज॥
दया करथि मुनि बड़ अपराध। कनइत कहलनि हा विधि व्याध॥
हमरा कहल दैह पहुँचाय। शुनि दम्पति लेल कांध चढाय॥
धिक धिक जीवन हमरो आब। कहि शव सुतकाँ अङ्ग लगाब॥
हे नृप चिता करिय निर्म्माण। हमरो निश्चय चलला प्राण॥
बूढ बूढि कय विविध विलाप। मरण समय हमरहु देल शाप॥
हमर पुत्र-सुख कयलह हरण। पुत्र – वियोगहिँ तोहरो मरण॥
एकहि चिता तिनू जरि अमर। सुरपुर गेल पार दिन हमर॥
नहि विलम्ब दिन से सम्प्राप्त। मर्म्म मर्म्म दुख हमरा व्याप्त॥
हा रघुनन्दन हा सुत राम। हा जानकि लक्ष्मण गुण-धाम॥
केकयि कारण अहँक वियोग। मरण होइ अछि आन कि रोग॥
ई कहइत त्यागल नृप प्रान। विकलि सकलि रानी – जनि कान॥
गेला वसिष्ठ मन्त्रि लै सङ्ग। की भय गेल रङ्ग मे भङ्ग॥
दशरथ – देह तेलमे रहय। सत्वर दूत भरत केँ कहय॥
अश्ववार घोड़ा दौड़ाउ। भरतक मातृक सत्वर जाउ॥
छथि शत्रुघ्न भरत तहि ठाम। गुरु-आज्ञा चलु एखनहि गाम॥
कहबनि पहुँचल ताकी आज। जननि जनक काँ देखय काज॥
नाम युधाजित भरतक माम। तनिकाँ कयल सबार प्रणाम॥
निज घर भरत चलथु दुहु भाइ। अयलहु गुरु पठाओल आइ॥

।सोरठा।

त्वरित भरत दुहु भाय, चलला तुरग सबार सह।
की थिक बुझल न जाय, भय-चिन्तातुर मन अधिक॥

।चौपाइ।

सगर नगरमे पसरल शोक। उत्सव-रहित सकल पुरलोक॥
प्राणि मात्रकाँ नहि उतसाह। कनइत कनइत जेहन बताह॥
त्यागल कमला जेहन निवास। देखि भरत-मन अतिशय त्रास॥
की अनर्थ थिक मन मन गून। राज-भवन निज जन सौँ शून॥
केवल केकयि बैसलि देखि। मुदित मन्थरा दशा विशेषि॥
कयल प्रणाम मातृ-पद छूबि। ओ आशिष देल मुख लेल चूमि॥
हरषित लेलनि हृदय लगाय। कुशल पिता छथि भ्राता माय॥
अहँ छी निकय देखल भरि नयन। देखला बिनु मन छल नहि चयन॥
व्याकुल पुछल पिता छथि कतय। भरत कहल हम जायब ततय॥
एकसरि अहँ कहँ छथि महिपाल। अति व्याकुल मन हो एहि काल॥
अपने बिनु नहि रहथि एकान्त। हाय माय थिक की वृत्तान्त॥
शून्य भवन कत प्रबल प्रताप। बिनु देखलेँ जिव थरथर काँप॥

।रूपमाला।

।मिथिला-संगीतरीत्या केदार-छन्दः।

जेहन छल छथि नृपति सुकृती अश्वमेध जे कयल।
भरत चिन्ता चित्त नहि करु दिव्य गति से धयल॥
कुलिश-कठिन कठोर केकयि – वचन से शुनि कान।
शोक – आकुल भरत खसला छिन्न वृक्ष समान॥
हा पिता कत गेलहुँ अपने त्यागि दुखमे देल।
राम काँ नहि सोपि गेलहुँ दुःख कीदहु देल॥
भरत व्याकुल देखि केकयि कहल की हो कानि।
माय बाप न सदा जीबथि धैर्य्य करु मन मानि॥

।सोरठा।

हा रघुनन्दन राम, हा वैदेही हा कहाँ।
हा लक्ष्मण गुणधाम, ई कहि त्यागल प्राण नृप॥
लक्ष्मण सीता राम, ई सभ छल छथि जननि कत।
शून्य देखि पड़ धाम, अति व्याकुल मन भरत कह॥

।चौपाइ।

शुनु सुत सम्प्रति अछि एकान्त। कहइतछी बड़ बड़ वृत्तान्त॥
मरण निकट नृप मन भेल व्याज। मन छल रामचन्द्र युवराज॥
बड़ि बुधिआरि देखैत अधलाहि। देल मन्थरा काज निबाहि॥
देलक विपत्ति समय मन पाड़ि। हम वर लेल देल नहि छाड़ि॥
वर धयले छल से लेल माँगि। नृपति-हृदय जनु लागल साँगि॥
चौदह वर्ष राम वन जाथु। कन्द मूल फल वन बसि खाथु॥
भरत एतय होअथु युवराज। हमरा एहि दुइटा सौँ काज॥
सगर नगर भेल हाहाकार। त्यागल हम कि कठिन व्यवहार॥
बड़ बड़ जन कहि गेला हारि। सुपुरुष मुरुख हमहि बुधिआरि॥
महति मन्थरा समय सहाय। बुद्धि विलक्षण कूबड काय॥
सीता सती रहलि नहि गेह। लक्ष्मण रामक सत्य सनेह॥
तिनु जन वन वश गत सामाज। पटल आन छल समटल काज॥
आर्त्त भरत की होयत कानि। काज सम्हारल हम हठ ठानि॥
गेल राज्य आयल अछि हाथ। कनलेँ पुत्र दुखाएत माँथ॥

।सोरठा।

जननी – वचन कठोर, शुनलनि भरत अनर्थ कहि।
धिक धिक जीवन तोर, कहइत कण्ठ न कटि खसल॥
खसला भरत तड़ाक, अशनि-पतन तरु‍ – वर जेहन।
रहित श्वास ओ वाक, केकयि लेल उठाय पुन॥
एहन करिय नहि ज्ञान, सुख सम्पति मे दुःख की।
राज्य देल भगवान, भाग्यवान बनि भोग्य करु॥
मुह नहि देखब तोर, असंभाष्य पतिघातिनी।
विषम हलाहल घोर, बरु मरि जाइत पिआय दे॥
तोहर पुत्र कहाय, बड़ पापी हम विश्वमे।
मरबे अग्नि समाय, की करबाल कराल सौँ॥
देल स्वामि – शिर डाक, दुष्ट मूर्त्ति के तोर सनि।
पड़बह कुम्भीपाक, सकल – लोक – सुख – नाशिनी॥
भरत भेला उठि ठाढ़, मन बिराम बिसराम कत।
पर सङ्कट की गाढ़, तनय सङ्कटा सर्प्पिणी॥

।चौपाइ।

कयलेँ पापिनि व्याधिनि काज। मुह न देखब नहि रहब समाज॥
उठि गेला कौसल्या गेह। तनिकाँ रामचन्द्र सम नेह॥
भरत देखि कनली कय शोर। अविरल युगल नयन बह नोर॥
कौसल्याक चरण लपटाय। भरतहु काँ नहि नोर शुखाय॥
कौसल्या लेल हृदय लगाय। राम – वियोग-शोक नहि जाय॥
अँह बिनु भरत एहन भेल हाल। करु सुत सकल प्रजा प्रतिपाल॥
कहलहि होइतिह केकयि माय। तनिकर रङ्ग देखल अँह जाय॥
हा रघुनन्दन हा रघुवीर। हा सीता लक्ष्मण रणधीर॥
दुख – सागर मे पड़लहुँ हाय। अहँ बिनु के लेत जीव बचाय॥
चीराम्बर – धर जटा – कलाप। वन चल गेलहुँ दय सन्ताप॥
परमात्मा विभु से अछि ज्ञान। शोक अरोक दैव बलवान॥

।सवैयाछन्दः।

रामचन्द्र राज्याभिषेकमे केकयि कयलनि जे अविचार।
सम्मत हमर मनस्पथहूँ जौँ जननिक कठिन कपट व्यवहार॥
ब्राह्मण-शतहत्याक जनित पड़ पातक सभटा हमरहि माँथ।
गुरु वसिष्ठ ओ अरुन्धतीकाँ खड्गहिँ मारी करि जौँ लाथ॥

।चौपाइ।

खड्गहि कटितहुँ केकयि माँथ। उचित न कहता श्रीरघुनाथ॥
कहि हा रघुनन्दन रघुनाथ। जननी-चरण भरत धर माँथ॥
भरत शपथ कर बारंबार। राम नृपति हम किङ्कर चार॥
कौशल्या कह शुनु सुत भरत। केओ ने अनुचित अहँकाँ कहत॥
अति सुशील भरतक सन भरत। अहाँक बराबरि के जन करत॥
हम जनइत छी अहँक स्वभाव। अहँक सुयश भलमानुष गाव॥
अयला भरत शुनल जन कान। गुरु प्रधान तत कयल प्रयाण॥
कहलनि गुरु जनु करु मनखेद। थिक कर्त्तव्य लिखल जे वेद॥
ज्ञानी सत्य – पराक्रम वृद्ध। दशरथ छल छथि विश्व-प्रसिद्ध॥
बहुत दक्षिणा दय कय बेर। अश्वमेध मख कयलनि ढेर॥
इत सुख भोग अमरपति सङ्ग। एकासन – संस्थित सुर रङ्ग॥
आत्मा नित्य एक छथि शुद्ध। जनम मरण व्यवहार विरुद्ध॥
जड़ अपवित्र विनश्वर देह। मृतक कहाबथि निस्सन्देह॥
पिता तनय मरणोत्तर लोक। मूढ मृषा कर मनमे शोक॥
जनिकर जनम मरण हो तनिक। मिलन सर्व्वदा मानक क्षणिक॥
नष्ट होइछ ब्रह्माण्डा कोटि। स्थितिक भावना थिकि अति छोटि॥
मेरु भसम हो सिन्धु शुखाय। से की वस्तु काल नहि खाय॥
कालहिँ उतपति कालहिँ नाश। कालहिँ होइछ भोग विलास॥
चल दलपर जलकण चल जेहन। आयुक गति मानक थिक तेहन॥
दुख सुख हो कर्म्मक अनुसार। निश्चय ज्ञानी करथि विचार॥
नव पट पहिरथि त्यागि पुरान। देही देहक एहन विधान॥
आत्मा मरथि न जनमथि जाय। षट विकार नहि ततय समाय॥
भरत त्यागु मन बाढ़ल शोक। करु जैँ तृप्त पितर परलोक॥
तेल-द्रोणि सौँ शव बहराय। यथा – कृत्य चिति अनल लगाय॥
समुचित जेहन कहल गुरु-लोक। कयल भरत तखना नहि शोक॥
ब्राह्मण वैदिक बहुत मँगाय। रुद्र – प्रमित दिन भोज्य कराय॥
नृपति निमित्त विप्र मे दान। गो – रत्नादि ग्राम सविधान॥
वस्त्र बहुत देल बापक नाम। चिन्तित आठ पहर निज धाम॥
राम राम हा गुणनिधि भाय। देलक बड़ दुख केकयि माय॥

।मिथिला-संगीतरीत्या भैरव-छन्दः।

विधि हम सकल अनर्थक मूले।
हमरहि कारण केकयि जननी कयल कर्म्म प्रतिकूले॥
रामचन्द्र लक्ष्मण शुभ-लक्षण वैदेही वन हयती।
नहि घर द्वार निवास नियत नहि कन्द मूल कोना खयती॥
सदा प्रशंस वंश हंसक थिक केहनि केकयि अइली।
चट पट प्राण लेल प्राणेशक रामक शीर विशइली॥
सानुज हमहु रामवत् बनिकैँ ताहि विपिन मे जयबे।
परमोदार जानकी – जानिक चरणक भृत्य कहयबे॥

।छठम् अध्याय समाप्त।

हरिः हरः!!