मोन पड़ै छथि प्रफूल्ल कुमार सिंह ‘मौन’

संस्मरण

– रमानन्द झा रमण

मोन पड़ै छथि प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’
(20जनबरी 1938 – 20 जुलाइ 2018)
– श्रद्धांजलि!
पाठकक मौन भङ्ग करैत ‘मौन’क कथा :-
मैथिली भाषा-साहित्यक अधीत पाठकक मानस-पटलपर प्रफुल्ल कुमार सिंह‘मौन’क बिम्ब एक लोक साहित्यान्वेषी आ’ भाषा-संस्कृति प्रेमी रचनाकारक रूपमे अछि। ओ कौखन चेचर-बलिराजगढ़मे मिथिलाक गौरवमय परम्परा आ’ सांस्कृतिक धरोहिरक उत्खनन एवं मूल्यांकन करैत भेटैत छथि, तँ कौखन थारू लोकगीतमे मैथिलीक अस्मिताक विराट स्वरूपक दर्शन करबैत, कौखन नेनागीतमे मैथिल ललनाक वात्सल्य-प्रेमक उच्च आदर्शक सङ्ग बालमनोविज्ञानक सुललित विवेचन-प्रतिपादन करैत छथि तँ कौखन ‘विदापतनाच’मे लोक संस्कृतिक प्रवाहित अजस्र स्रोतकेँ समक्ष अनैत। प्रो. मौन कौखन मध्यकालीन आ’ आधुनिक नेपालमे रचित मैथिली भाषा-साहित्यक युक्तिपूर्ण व्याख्याक प्रयास करैत छथि तँ कौखन ‘ब्रह्मग्राम’मे आपादमस्तक तल्लीन। कहबाक तात्पर्य जे प्रो. मौन मैथिलीक एक एहन सजग साहित्यकार छथि जे वर्तमान आक्रान्त युग-जीवनकेँ जीवनरस प्रदान करबाक निमित्त परम्परा आ’ इतिहाससँ उच्च सांस्कृतिक मूल्यक आसब छानि-छानि मुक्त हाथेँ बिलहि स्वयं धूरा-माटि फंकैत छथि। किन्तु एहिठाम प्रो. मौनक ओहि अवदानक चर्च नहि कए, मैथिली लघुकथाक क्षेत्रमे हुनक योगदानक चर्च करब जे प्रायः अचर्चित अछि।
प्रो. मौन समय-समयपर लघु आकारक किछु कथा लिखल अछि। ओसभ अद्यावधि विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छिड़िआएल अछि। ओहिमे प्रमुख अछि – ‘मुर्दा उठेबाक काज’, उधिआइत’, भदवाक झंडा, मुर्दा आश्वासन’, ‘चुटकी भरि नोन’, ‘लखिया’, ‘मुरकट्टा’, ‘सेवा’, ‘भगवती आबि गेलीह’, कंठी’, ‘जूता’ आदि। मौनक कथाक आकर लघु अछि। अङरेजीक शौर्ट स्टोरीसँ कतेको गुणा लघु। किन्तु ई कथा सभ कथाकारक गहन सामाजिक चेतनाक परिचय दैत समाजमे विभिन्न स्तरपर व्याप्त विकृति आ’ भ्रष्टाचारपर प्रहार करैत अछि। क्षणभरिक ई कथासभ अपना नोंकपर लोकक तेहन व्यथा-कथाकेँ पिऔने रहैत अछि जे पाठकक हृदयमे सोझे भेंसा जाइत छैक आ’ वर्तमान परिवेशक कारुणिक दृश्य आँखिक समक्ष उपस्थित भए जाइत छैक। स्वाधीनताक बाद विकास-योजनाक सफलताक प्रसङ्ग जतेक कागत दकचाएल हो, नेतालोकनिक भाषणसँ जरैत खेतमे जतेक करीन लागल हो, भूखल-अभावग्रस्त आ’ नाङट लोकक लेल जतेक आश्वासनक वर्षा भेल हो, किन्तु वर्तमानक ई यथार्थ छैक जे भ्रष्टाचारेक खेती भेल अछि, भ्रष्टाचारे उपजल अछि, आ’ भ्रष्टाचारेक बिआ पलटल अछि।
देशक भविष्य निर्भर करैत अछि भ्रष्टचारविहीन शिक्षण-व्यवस्थापर, राष्ट्रक निर्माणक पाया थिक बालक-बालिकाकेँ उचित शिक्षा; शिक्षाक लेल अनुकूल वातावरण आ’ सुविधा। एकर प्रतिकूल बालशिक्षाकेँ महगसँ महग बनाओल जाए रहल अछि। ई अभिभावककेँ कुहैत अछि किन्तु जकर जीवन गुदस्त भए गेल छैक, तकर शिक्षा(वयस्क शिक्षा)पर बेहिसाब सरकारी धन खर्च भए रहल अछि। एहि स्थितिपर हिनक ‘अन्हार पसरि गेल’ कथामे तीक्ष्ण व्यंग्य अछि। परियोजना पदाधिकारीक आगमनपर बरहम थानमे लालटेन बरब आ’ जाइते मिझा जाएब एही दिश संकेत करैत अछि। एहिना ‘सेवा’मे सेवाक नामपर शिक्षण संस्था खोलि व्यवसाय कएनिहारपर व्यंग्य अछि।
लोककेँ कतहु चैन नहि छैक। सभठाम असुरक्षा अछि, सभठाम अशान्ति अछि, सभठाम भूख आ’ अभाव अछि, गामक लोक शहर दिस पड़ाइत अछि, शहरक चकमक इजोतमे आँखिक ज्योति क्षीण करैत अछि, तँ दोसर दिस शहरक कृत्रिम जीवन आ’ मनुष्यक खाल ओढ़ने पशुक चाङुर एवं हूरपेटसँ आक्रान्त भए गाम दिस लंक लैत अछि। गाममे जीवन-यापनक अवसर नहि छैक तँ शहर ओकर देहक सूतकेँ निष्प्राण बना दैत छैक। प्रो. मौनक कथा ‘मुर्दा उठेबाक काज’ एवं ‘चुटकी भरि नोन’मे लोकक एहि सन्त्रास आ’ दयनीयताक विलक्षण वर्णन अछि। आजीविकाक प्रसङ्ग पित्तीक अनुरोधपर भातिज कहैत छथिन्ह, ‘आइ-काल्हि खान क्षेत्रमे बड़का महामारी पसरि रहल छैक। मजदूर सभ भागि रहल छैक। मरि रहल छैक। एखन भेटबाक (नौकरी) कोनो उमेद नहि, बेहिसाब लोक मरि रहल छैक।’ एहिपर पित्ती अनुरोध करैत छथिन्ह, ‘तखन मुर्दे उघबाक काजपर लगा दिहक।’ रौदीदास (‘चुटकी भरि नोन’) शहरसँ पड़ा केँ गाम अबैत अछि, परञ्च भरि पेट अन्नक लेल बेलल्ल अछि। मालिकक खलल पारीक मासु भरि पेट खएबाक सेहन्ता नोनक अभावमे पूरा होएब सम्भव नहि छैक। किन्तु ओकर पत्नीक मोनमे उचरैत छैक, ‘जखन एक चुटकी सिनूरसँ दू प्राण बन्हा जाइछ, तखन एक चुटकी नोनसँ काज किएक नहि चलत।’ ई छोट-छीन कथा गामक प्रति आकर्षण, शहरी जीवनक विकर्षण, आर्थिक दुःस्थिति आ’ घोर अभावहुमे जीवन खेपबाक जिजीविषा दिस पाठकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि।
प्रो. मौनक लघुकथाक भाषा सेहो तहिना आकृष्ट करैत अछि। परभाषाक प्रभावसँ मुक्त मैथिलीक खाँटी शब्द-सम्पदाक आस्वादनक अवसर भेटैत अछि। कहि सकैत छी, संख्यामे कम रहितो प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह’मौन’क लघुकथा मैथिली कथा साहित्यमे अपन स्थान रखैत अछि।
स्रोत: कर्णामृत, 1997/भजारल।