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मिथिला भाषा रामायण – प्रथम अध्यायः मंगलाचरण एवं प्रस्तावना – रामकथा, राम-रहस्य व रामगीताक महत्व

859 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिला भाषा रामायण

बालकाण्ड – प्रथम अध्याय

मंगलाचरण एवं प्रस्तावना – रामकथा, राम-रहस्य व रामगीताक महत्व

॥ॐ॥श्री गणेशाय नमः॥ॐ॥

॥ॐ॥बालकाण्ड॥ॐ॥

सरसमधुसुधातो गद्यपद्यन्नवीनण
वचनजनिधरायाश्शारदाया अधीनम् ।
सकलजननमस्यास्सन्नमस्यन्ति यस्याः
पदयुगलमतोऽस्या नौमि नित्यं सुभक्त्या ॥१॥

वन्दे वारणावदनं विघ्नध्वान्तप्रणाशने सुरम् ।
शाङ्करिमतुलोदारं विधिगणाशरणं गुणातीतम् ॥२॥

भावार्थः

मधु आ अमृतो सँ सरस, नव गद्य-पद्यक रचना कय सकब, शब्दक जननी शारदाक कृपा मात्र सँ संभव होइछ । ताहि हेतु हम भक्तिभावक संग शारदाक दुनू चरण केँ प्रणाम करैत छी, जिनका समस्त लोकक प्रणम्य देवता लोकनि सेहो प्रणाम करैत छथि ॥१॥ हम शंकर केर पुत्र गजवदन गणेशजीक वन्दना करैत छी जे विघ्नरूपी अन्धकार केँ दूर करयवला सूरज समान छथि; अनुपम छथि, उदार छथि; ब्रह्मा, विष्णु आर महेश केँ सेहो शरण देनिहार छथि; आर सब गुण सँ अतीत (उपर) छथि ॥२॥

।चौपाइ।

वन्दे गिरिपति कन्याकान्तं । अप्रमेयमगणितगुणाशान्तं ॥३॥
राजत भूधर द्युति हर भासं । श्रितकैलासं जगन्निवासं ॥४॥
भुक्तिमुक्तिदं गणपति तातं । परमोदारतया विख्यातं ॥५॥
श्रीपतिरवनिभारसंहर्त्ता । सेव्यो विभुः स्वतन्त्रः कर्त्ता ॥६॥
कर्त्तुरीप्सितं कर्म्म च येन । मखमवता प्रभुतातस्तेन ॥७॥
तस्मै नमो यतो निर्भीताः । मुनयो भुवन शान्तये प्रीताः ॥८॥
भक्त्या तस्य च नामस्मरणे । मरणे भयमपि नान्तःकरणे ॥९॥
हे रघुनन्दन दुर्गति खण्डन । पालय मां दिनकर कुलमण्डन ॥१०॥

श्रीमन्महीजनिमही जनि जानिगीतिं
वैदेह देश वचसा रुचिरां सुरीतिम् ।
रामायणीय चरितस्य सदर्थधारां
चन्द्रः प्रगृह्य वितनोति शुभैकसाराम् ॥११॥

जनुरिह मम जातं जानकी-जन्मभूमौ
बुधसदसि निवासात्प्राप्तविद्यस्य सौख्यं ।
अनुभक्त उदार श्रीललक्ष्मीश्वरैश्शं
शृणुत शृणुत धोराः श्रीलचन्द्रस्य वाचम् ॥१२॥

इह जगति यदस्ति स्थावरं जंगमं य-
त्तदिशयनमस्यं ब्रह्मतो नापि भिन्नम् ।
भवति भवतु लोके सत्कथायाः प्रचारो
जनकनृपति पुत्री मातृभाषाञ्चितायाः ॥१३॥

भावार्थः

हम गिरिराज हिमालयक पुत्री पार्वतीक पति भगवान शिवक वन्दना करैत छी जे असीम छथि, अनगिनत गुण सँ भरल छथि तथा शान्त छथि, चाँदीक पर्वत केर चमक केँ चोराबयवला शोभा सँ युक्त छथि, कैलाश पर्वत पर आसीन छथि, तैयो समस्त जगत मे व्याप्त छथि, भोग आ मोक्ष दुनू देनिहार छथि, आर गणेशजीक पिता छथि ॥३-५॥ हम श्री रामचन्द्र केँ प्रणाम करैत छी जे श्रीस्वरूपा सीताक पति छथि, धरतीक भार केँ दूर करनिहार छथि, आराध्य छथि, विश्वव्यापी छथि, स्वतंत्रकर्ता अर्थात् स्वेच्छा सँ सृष्टि, स्थिति, प्रलय कयनिहार छथि, जे अपन प्रभुता सँ मुनि लोकनिक यज्ञ केर रक्षा करैत कर्त्ताक कर्म केँ इष्ट कयलनि यानि स्वयं अनासक्त रहितो रावणक वध मे कर्त्ता बनलाह आर जिनकर एहि काज सँ भयहीन भ’ कय मुनिगण संसारक हित वास्ते प्रसन्न भेलाह ॥६-८॥ भक्तिपूर्वक श्री रामचन्द्रक नाम केर स्मरण कयला सँ हृदय मे मृत्यु-भय नहि रहि जाइछ ॥९॥ दुर्गति केँ दूर करयवला छथि रघुनन्दन रामचन्द्रजी, हे सूर्यवंश केर भूषण, हमर पालन करू ॥१०॥

धरती सँ अवतार लेनिहाइर श्रीमती सीता आर हुनक पति श्रीमान् रामचन्द्र केर गुणगाथा चन्द्रकवि मिथिलादेशक भाषा मैथिली मे रचैत छथि, जे गाथा रोचक अछि, पूर्णतः शुभमय अछि आर रामायण मे गायल गेल चरित केर सद्भावधारा सँ पूर्ण अछि ॥११॥ हमर जन्म जनकनन्दिनी सीताक जन्मभूमि मिथिला मे भेल । हम सुखपूर्वक पंडित मंडली मे रहैत विद्या प्राप्त कयलहुँ । हे गम्भीर विद्वान् लोकनि, श्रीमान् लक्ष्मीश्वर सिंह केर उदारता सँ सुखक अनुभव करू आर श्रीचन्द्र कवि केर वाणी अर्थात् ई काव्य सुनू ॥१२॥ एहि संसार मे जेहो किछु स्थावर या जङ्गम पदार्थ अछि, ओ सबटा परम प्रणम्य अछि, कियैक तँ ओ ब्रह्मा सँ भिन्न नहि अछि । राजा जनकक बेटीक मातृभाषा अर्थात् मैथिली मे लिखल गेल ई सत्कथा अर्थात् मिथिलाभाषा रामयण केर लोक मे प्रचार हो ॥१३॥

सूत-शौनक-संवादः नारद-ब्रह्मा संवादः शिव-पार्वती संवाद

।चौपाई।

शौनक पुछल कहल भल सूत । अति आनन्द मगन मन पूत ॥१४॥
नारद जोगी पर उपकार । करक हेतु सञ्चर संसार ॥१५॥
सत्य लोक मुनि पहुचल जखन । देखल विरञ्चिक वैभव तखन ॥१६॥
जनिकर सिरजल सब संसार । तनिक विभव के वरनय पार ॥१७॥
बाल दिवाकर सन छवि भास । मार्कण्डेय प्रभृति तट वास ॥१८॥
स्तुति करइत छलछथि छल हीन । ककरहु ततय देखल नहि दीन ॥१९॥
ब्रह्मा संग शारदा दार । सकल अर्थ जानल व्यवहार ॥२०॥
देव चतुर्मुख विश्वक नाथ । तनिका नारद जोड़ल हाथ ॥२१॥
भक्ति दण्डवत चरण प्रणाम । कयलनि स्तुति वचनै अभिराम ॥२२॥
तुष्ट कहल तनिका खग-केतु । कहु नारद अयलहुँ की हेतु ॥२३॥
कहलनि नारद देव समाज । अयलहुँ प्रभु अछि बड़ गोट काज ॥२४॥
सकल शुभाशुभ जे किछु रहल । हमरा अपनै पूर्व्वहि कहल ॥२५॥

॥दोहा॥

कहू कृपा कय भय-हरण, सम्प्रति अछि श्रोतव्य ।
कमलासन मङ्गल-करण, दुष्ट समय भवितव्य ॥२६॥

भावार्थः

शौनक पुछलनि आ सूत परम आनन्द मे मग्न भ’ पवित्र मन सँ कहलखिन – योगी नारद! जे परोपकार करय लेल संसार मे घुमैत रहैत छथि, सत्यलोक पहुँचलाह आ ब्रह्माक वैभव देखलनि ॥१४-१६॥ सम्पूर्ण संसारे जिनकर रचल हो, हुनकर वैभव केर वर्णन कय पाओत ! हुनकर शोभा उदयकालक सूरज समान चमकि रहल छलन्हि आ मार्कण्डेय आदि ऋषि लोकनि हुनका लग बैसल रहथि ॥१७-१८॥ आर ओ ऋषि लोकनि निश्छल भाव सँ हुनकर स्तुति कय रहल छलथि । ओतय किनको दीनताग्रस्त नहि देखलनि ॥१९॥ ब्रह्माक संग हुनक पत्नी सरस्वती सेहो छलीह, जिनका सबटा अर्थ आ व्यवहारक जानकारी छन्हि ॥२०॥ ओ चारि मुँहवला भगवान् ब्रह्मा विश्व केर मालिक छथि । हुनका नारदजी हाथ जोड़िकय, भक्तिपूर्वक चरण पर दण्डवत् प्रणाम कयलनि आ प्रिय वचन सब सँ स्तुति कयलनि ॥२१-२२॥ प्रसन्न भ’ कय ब्रह्मा कहलखिन – ‘हे नारद मुनि ! कहू, कोन काज सँ अयलहुँ ?’ ॥२३॥ नारद कहलखिन – ‘हे प्रभु, एक गोट बड़ पैघ काज सँ अपने लग आयल छी ॥२४॥ कि शुभ आ कि अशुभ से बात त अपने हमरा पहिने बता चुकल छी ॥२५॥ हे भयहारी, हे कमलासन, आब हमरा कृपा कयकेँ ई सुनाउ जे आबयवला खराब समय मे कोन काज कयला सँ लोकक कल्याण होयत ॥२६॥

।चौपाइ।

होयत कलियुग जखना घोर । सभ जन लम्पट सभ जन चोर ॥२७॥
सत्य कथा ककरहु नहि नीक । दुराचार रत मन सबहीक ॥२८॥
पर अपवाद मध्य मन निरत । पर धनमे अभिलाषी फिरत ॥२९॥
आनक वनितामे मन सटल । पर हिंसाक परायण पटल ॥३०॥
आत्मा भिन्न देह नहि जान । नास्तिक गति मति पशुक समान ॥३१॥
माय बापमे द्वेष अलेख । अपनेँ संसारी सुख देख ॥३२॥
वनिता बूझत देव समान । कामक किङ्कर कुत्सित ज्ञान ॥३३॥
ब्राह्मणकाँ बाढ़त बड़ लोभ । वेदक विक्रय नहि मन क्षोभ ॥३४॥
धनक उपार्ज्जनेँ व्याकुल चित्त । विद्या पढ़ता मोह निमित्त ॥३५॥
सभ जन त्यागत निज निज जाति । वञ्चक व्यवहारी दिन राति ॥३६॥
क्षत्रिय वैश्य स्वधर्म्मक त्याग । करता कि कहब तनिक अभाग ॥३७॥
नीचक उन्नति हयत अपार । शूद्र-निरत ब्राह्मण आचार ॥३८॥
बहुतो होइति धृष्टा नारि । पतिकाँ विपति देति कत गारि ॥३९॥
श्वशुरक मन्द-कारिणी हयति । स्वेच्छा सुपथै कुपथमे जयति ॥४०॥
तनिकाँ सबहिक की गति हयत । जखना ई परलोक मे जयत ॥४१॥
कहल जाय की तकर उपाय । सभ ज्ञाता विधि नाम कहाय ॥४२॥

भावार्थः

जखन कलियुग घोर (प्रौढ़) होयत, तखन सब कियो लम्पट आर सब कियो चोर बनि जायत । सत्य बात केकरो नीक नहि लगतैक । सभक चित्त खराबे काज मे लागल रहतैक । दोसरक निन्दा मे मोन लगतैक । पराया धन केँ हड़पबाक लोभ मे लोक भटकैत रहत । पराया स्त्री मे मोन टाँगल रहतैक । दोसरा पर हिन्सा मे लागल रहब लोकक धन्धा बनि जेतैक, मात्र अपनहिं सांसारिक सुख टा सुझेतैक । पत्नी केँ देवता बुझत । कामवासनाक दास होयत । ज्ञान कुत्सित हेतैक । ब्राह्मण सब मे लोभक वृद्धि हेतैक । ओ सब वेद केँ (ज्ञान केँ) बेचत, आ एहि कुकर्म सँ ओकरा ग्लानि तक नहि हेतैक । धन-सम्पत्ति बटोरय मे मन बेहाल रहतैक । विद्या केवल मोह (अज्ञान) वास्ते पढ़त । सब लोक अपन-अपन जाति छोड़ि देत । राति-दिन चालबाजी मे लागल रहत । क्षत्रिय आर वैश्य सेहो अपन-अपन धर्म केँ छोड़ि देत, ओकरा सभक जे खराब हाल होयत से कतय धरि कहू । नीच लोकक बहुते उन्नति हेतैक । शूद्र ब्राह्मणक आचरण करय लागत । अधिकतर स्त्री सब धृष्ट भ’ जायत आर पति केँ विपत्तिक घड़ी मे गारि पढ़त । ससुरक बुराइ करत आ स्वच्छन्दाचारिणी भ’ कय सुमार्ग केँ छोड़ि कुमार्ग मे चलि जायत । जखन एहेन स्त्री सब परलोक मे जायत त ओकरा लोकनिक केहेन गति हेतैक ? प्रभु, कहल जाय जे एकर प्रतिकार कि होयत ? कहल जाइत अछि जे ब्रह्मा सब बातक ज्ञाता-सर्वज्ञ छथि ॥२७-४२॥

रामकथा, राम-रहस्य आर रामगीताक माहात्म्य 

शुनि मुनि कथा विरञ्चि उदार  । ई भल कथा कयल सञ्चार ॥४३॥
भल अहँ पुछल कहै छी नीक । शुभ गति कारक जे सबहीक ॥४४॥
एक समय गिरिराज-कुमारि । राम-तत्त्व पूछल त्रिपुरारि ॥४५॥
भक्ति-वत्सला विनयक धाम । बूझल कथा चित्त बिसराम ॥४६॥
विश्वजननि नित पूजन करथि । लोचन मन आनन्दित धरथि ॥४७॥
लोकक जखन होयत गय भाग । रामायणक बढ़त अनुराग ॥४८॥
पढ़इत नर सदगतिमे जयत । जिबइत पूर्ण मनोरथ हयत ॥४९॥
एकादशि तिथि कय उपवास । सभा रमायण करथि प्रकास ॥५०॥
वर्ण वर्ण गायत्री जेहन । पुरश्चरण फल पाबथि तेहन ॥५१॥
राम-नवमि दिन कर उपवास । रात्रि जागरा मन उल्लास ॥५२॥
कुरुक्षेत्र तीर्थादि निवास । सूर्य्य-ग्रहणमे पाप विनाश ॥५३॥
आत्मतुल्य धन द्विजकाँ देथि । व्यासक सम द्विज दान से लेथि ॥५४॥
तनिकाँ से फल लाभ अनन्त । सत्य कहल छल गिरिजा-कन्त ॥५५॥
प्रति दिन रामायण कर गान । सुरपति आज्ञा तनिकर मान ॥५६॥
रामायणक कथा बड़ गोटि । पढ़लय फल पाबी गुण कोटि ॥५७॥
हनुमानक प्रतिमाक समीप । राम हृदय शिव मानस दीप ॥५८॥
तीनि बेरि मौनी जे पढ़त । पूर्ण मनोरथ सुखचय बढ़त ॥५९॥

।सवैया।

करथि प्रदक्षिण पीपर तुलसिक, राम हृदय पढ़इत जे भक्त ।
ब्रह्मघात पातक सभ छूटय, भक्ति भावना मन अनुरक्त ॥६०॥

भावार्थः

उदार (सभक हितक कामना कयनिहार) ऋषि नारदक बात सुनिकय ब्रह्माजी ई कल्याणकारी कथा सुनौलनि – भने अहाँ ई सब बात पुछलहुँ । हम एकटा नीक कथा सुनबैत छी जे सब केँ शुभ परिणाम दयवला अछि । एक समय पर्वतराज हिमालयक पुत्री गिरिजाजी शिवजी सँ रामक महिमा पुछलीह । भक्त सभक प्रति पुत्रक भाव रखनिहाइर परम विनीता गिरिजा केँ बुझय मे आबि गेलनि जे रामकथा मात्र चित्त केँ विश्राम (परमशान्ति) दयवला वस्तु थिक । विश्वजननी गिरिजा रोज रामक पूजा करय लगलिह आर रामकथा केँ अपन आँखि मे तथा हृदय मे आनन्दपूर्वक राखय लगलिह । लोक सब केँ जखन भाग्यक दिन आओत त ओकरा सब केँ रामायणक प्रति अनुराग बढ़ि गेल करैछ । रामायण पढिते लोक अन्त मे सद्गति पाबि जाइछ आ जीवनकाल मे ओकर सबटा मनोरथ पूरा होइछ । जे कियो एकादशीक तिथि केँ व्रत कय केँ सभा (भक्त लोकनिक मंडली – समूह) मे रामायणक प्रचारण करत, ओहि अनुष्ठानक ओहने फल पाओत, जेना मानू रामायणक हर अक्षर गायत्री मंत्र हो । जे कियो राम-नवमीक दिन व्रत करत आ प्रसन्न मन सँ रात्रि जागरण करत, ओकरा ओहिना अनन्त पुण्यक प्राप्ति होयत जेहेन पुण्य पापनाशक सूर्यग्रहणक समय मे कुरुक्षेत्र मे रहैत अपन शरीरक तौल बराबर सोना व्यास जेहेन द्विज केँ दान देला सँ भेटैत अछि । पार्वतीजीक पति शिवजी ई सत्य बात कहने रहथिन । जे सब दिन रामायणक पाठ करैत अछि, देवता लोकनिक राजा इन्द्रदेव सेहो ओकर आज्ञा मानैत छथिन । रामायणक कथा महान अछि । एकरा पढ़ला सँ कोटि गुणा फल भेटैत अछि । शिवजीक मन केँ दीप जेकाँ आलोकित करयवला ‘राम-हृदय’ नामक स्तोत्र जे कियो हनुमानजीक मूर्ति लग बैसिकय तीन बेर मनहि-मन पढ़त, ओकर कामना अवश्य पूरा होयत आर ओ अधिकाधिक सुखी होइत रहत । जे कियो भक्त पुरुष ‘रामहृदय’ पढ़ैत पिपर आ तुलसीक परिक्रमा करत, ओ ब्रह्महत्याक पाप सँ पर्यन्त मुक्त भ’ जायत, आर ओकर मन भक्ति-भावना मे रमि जेतैक ॥४३-६०॥

।चौपाइ।

कहल महात्म राम-गीताक । जानथि एक कान्त गिरिजाक ॥६१॥
तकर आध गिरिजा पुन जान । तकर आध हमरा अछि ज्ञान ॥६२॥
से हम किछु कहइत छी आज । सावधान सुनु सकल समाज ॥६३॥
जनितहिँ मन निर्म्मल भय जाय । श्रीपति गीता देल पढ़ाय ॥६४॥
उपनिषदुदधिक मन्थन कयल । गीता-सुधा राम से धयल ॥६५॥
से लक्ष्मणकां कहि देल कान । अमर भेला से शुनि से ज्ञान ॥६६॥

।रूपमाला।

धनुर्विद्या पढ़य कारण शैलजेश समीप ।
कार्त्तवोर्य्यक नाश – कारण पूर्व्व भृगुकुल-दीप ॥६७॥
पार्व्वती ओ शम्भुकाँ से छल कथा संवाद ।
शुनल धारण कयल मनमे भेल अति आह्लाद ॥६८॥
ब्रह्महत्या आदि पातक शीघ्र होय विनास ।
राम-गीता पाठसौँ मन भक्तिसौँ एक मास ॥६९॥
दुः प्रतिग्रह निन्द्य भोजन असद्भाषण पाप ।
नाश हो एक मास पढ़लेँ रामचरित प्रताप ॥७०॥

।नरेन्द्र दोबय हरिपद।

शालग्राम तुलसि यति सन्निधि गीता पाठ जे करथी ॥७१॥
वचन अगोचर से फल पाबथि भव जलनिधि से तरथी ॥७२॥
निराहार एकादशि दिनमे द्वादशि संयम कारी ॥७३॥
वृक्ष अगस्तिक निकट वासकर तनिकर फल बड़ भारी ॥७४॥
जानि लेब तनिकाँ रघुनन्दन सकल देव कर अर्च्चा ॥७५॥
जीवन्मुक्त भक्तिसौँ संयुत यम घर तनिक न चर्च्चा ॥७६॥
विना दान सौँ विना ध्यान सौँ विना तीर्थ मे गेले ॥७७॥
राम गीत अध्ययन मात्र मे फल अनन्त अछि धैले ॥७८॥
शुनु मुनि नारद बहुत कहब की श्रुतिस्मृति सकल पुराणे ॥७९॥
रामायणक कथा तुलना नहि ई गति अछि किछु आने ॥८०॥

।हरिपद।

कमलासन नारद सौँ कहलनि रामायण तहिठाम ।
श्रद्धा सौँ पढ़ि सुनि जन जायत सुर पूजित हरिधाम ॥८१॥

भावार्थः

फेर ब्रह्माजी ‘रामगीता’क माहात्म्य बतौलनि – “ई माहात्म्य एकमात्र गिरिजापति शिवजी टा जनैत छथि । आर ओकर आधा पार्वतीजी जनैत छथि, आर ओहि आधाक आधा हम जनैत छी । ताहि मे सँ थोड़ेक बात हम अहाँ केँ आइ कहैत छी । हे समवेत मुनि-गण! अपने सब गोटे ध्यानपूर्वक सुनू । ई जनिते सभक मोन निर्मल भ’ जायत । लक्ष्मीपति भगवान् कृष्ण उपनिषदरूपी समुद्रक मथन कय केँ गीताक उपदेश कयलनि । वैह गीतारूपी सुधा केँ भगवान् रामचन्द्र प्राप्त कयलनि । ओ गीतामृत श्रीराम लक्ष्मणजीक कान मे देलनि । गीताक ज्ञान पाबिकय लक्ष्मणजी अमर भ’ गेलाह । कार्तवीर्य केँ नाश करबाक उद्देश्य सँ भृगु-कुल केँ उजागर करयवला भगवान् परशुराम धनुर्विद्या सिखबाक लेल पार्वतीपति शिवजी लग गेल छलाह । ताहि समय पार्वती आर शिवजीक बीच राम-गीताक संवाद चलल । परशुराम सेहो सुनलनि आ अतिशय आह्लादक संग मोन मे धारण कय लेलनि – याद कय लेलनि । जे कियो भक्तिभावनाक संग एक मास रामगीताक पाठ करत, ओकर ब्रह्महत्या आदि बड़का-बड़का पाप सेहो नष्ट भ’ जेतैक । एकर एक मास पाठ कयला सँ वर्जित दान लेबाक पाप, अखाद्य वस्तु खेबाक पाप आ खराब बात बजबाक पाप रामचरितक महिमा सँ कटि जाइत छैक । जे कियो शालिग्राम, तुलसी आ संन्यासी लग रामगीताक पाठ करत, ओकरा भेटयवला पुण्य केर वाणी सँ वर्णन करब सम्भव नहि अछि आर ओ संसाररूपी समुद्र सँ सेहो तरि जाइत अछि । एकादशीक दिन व्रत कय केँ द्वादशीक दिन संयम सँ अगस्त गाछ लग जे निवास करत, ओकरा महान पुण्य भेटतैक । ओ रामचन्द्रक तुल्य पूज्य मानल जायत । सब देवता ओकर अर्चना करताह । ओ जीविते अवस्था मे भव-बन्धन सँ मुक्त भ’ जायत आर यमराजक घर मे ओकर चर्चा तक नहि हेतैक । नहिये दान करबाक जरुरत पड़तैक, नहिये ध्यान करबाक आ न तीर्थ-यात्रे करबाक; मात्र रामगीता पढ़ि लियए, ओकरा लेल अनन्त पुण्य राखल रहतैक । हे नारद मुनि! सुनल जाउ, हम बेसी कि कहू – वेद, स्मृति आ सबटा पुराणहुं मे राम-कथाक तुलना नहि अछि । एकर सुफल किछु आरे अछि । यैह ठाम ब्रह्माजी नारदजी केँ रामायणक उपदेश कयलनि, जे पढ़िकय आ सुनिकय लोक देवता सब द्वारा पूजित भ’ कय वैकुंठ धाम केँ प्राप्त करैत छथि ॥६१-८१॥

।चौपाइ।

पृथिवी काँ बाढ़ल बड़ भार । चिन्मय पुरुष लेल अवतार ॥८२॥
कयल प्रार्थना ई सुर-लोक । कहलनि धरणी काँ बड़ शोक ॥८३॥
पृथिवी मे रघुकुल अवतार । धय प्रभु हरलनि पृथिवी भार ॥८४॥
पुन ब्रह्मत्व पदहि चल गेल । पाप विनाशि वृहत यश भेल ॥८५॥
जानकि-नाथक करिय प्रणाम । भुक्ति-मुक्तिप्रद जनिकर नाम ॥८६॥
कारण उत्पत्ति स्थिति नाश । माया-बाहर माया-बास ॥८७॥
मूर्त्ति अचिन्त्य सान्द्र आनन्द । अमल सुबोध-रूप सुख-कन्द ॥८८॥
विदित-तत्त्व सीतेश प्रणाम । हम करइत छी मन सुख काम ॥८९॥
पढ़ शुन नित्य रमायण जैह । सकल पाप हर गुणमय सैह ॥९०॥
नारायण पद सुख सौँ जयत । तनिकाँ कष्ट लेश नहि हयत ॥९१॥
जौँ इच्छित भव बन्धन मुक्ति । पाठ रमायण अछि बड़ युक्ति ॥९२॥
कोटि-कोटि जे कर गोदान । से फल सम जे पढ़ इ पुरान ॥९३॥
पुरुब समय शिव विश्व-निवास । छल छथि बसइत गिरि कैलास ॥९४॥
मणि सिंहासन बैसल ध्यान । यति-वर एहन दोसर के आन ॥९५॥
सिद्ध संघ सौँ सेवित चरण । अभय त्रिनेत्र सकल अघ हरण ॥९६॥
गिरिजा प्रश्न कयल तहि ठाम । वास जनिक शंकर तन बाम ॥९७॥
हे परमेश्वर जगन्निवास । सकल चराचर अहँक विलास ॥९८॥
कय प्रणाम हम पूछिअ सैह । परम इष्ट अपनैँ काँ जैह ॥९९॥
भक्त छोड़ि अनका नहि कहथि । बुध विज्ञानि लोक जे रहथि ॥१००॥
ईश्वर अपनैँक ईश्वर राम । जनिक जपैत रहैछी नाम ॥१०१॥
स्त्री स्वभाव सौँ पूछल फेरि । राम तत्त्व विभु कहु एक बेरि ॥१०२॥
मानुष रूपक धारण कयल । दशरथ नृपक पुत्र बनि अयल ॥१०३॥
तृण दिव्यास्त्र जयन्तक बेरि । शिव धनु तोड़ल तृण सम फेरि ॥१०४॥
गौतम-गेहिनि छलि पाषाण । तनिकर कयल राम कल्याण ॥१०५॥
अगम जलधि मे बाँधल सेतु । बानर योधा रावण हेतु ॥१०६॥
मानुष रूप अमानुष काज । एक कथा पुछइत हो लाज ॥१०७॥
निर्ग्गुण ब्रह्म सगुण अवतरल । दुष्टभार धरणिक सभ हरल ॥१०८॥
जनिकाँ सुख दुख लेश न व्याप । सीता – कारण कयल विलाप ॥१०९॥

।रोला छन्द।

पुछल भक्ति सौँ जखन कथा ई गिरिवर कन्या ।
अति प्रसन्न शिव कहल प्रिया अपनै अति धन्या ॥११०॥
जनु मयूर आनन्द मेघ-माला धुनि शुनि शुनि ।
रामचन्द्र काँ कय प्रणाम तनि तत्त्व कहल पुनि ॥१११॥
प्रकृतिहुँ सौँ पर छथि अनादि पुरुषोत्तम रामे ।
अद्वितीय आनन्द सकल कारण विश्रामे ॥११२॥
तनिके सभ चैतन्य दृश्य सकलावच्छिन्ने ।
लिप्त कतहु नहि होथि गगनवत पुन से भिन्ने ॥११३॥
सृष्टि सकल व्यवहार करथि जनिकर वर माया ।
मिथ्या सत्य प्रतीति यथा जल गगनक छाया ॥११४॥
विषयी जन काँ भाष दोष सौँ दूषित दृष्टी ।
उत्तर दक्षिण कहथि विपर्य्य भय गेल सृष्टी ॥११५॥
होइछ दिवा न रात्रि भानु काँ गिरिजा जहिना ।
नहि तम सम अज्ञान राम चिद्घन रवि तहिना ॥११६॥
जाग्रत्स्वप्न सुषुप्ति सकल साक्षी से निष्कल ।
तनिकर सेवा बिना जन्म काँ मानब निष्फल ॥११७॥

भावार्थः

धरती पर बहुते भार बढ़ि गेल छल । चिन्मय परमेश्वर अवतार लेलनि । कियैक तँ देवता लोकनि एहेन प्रार्थना कएने रहथि आ कहने रहथिन जे धरती केँ बहुते पीड़ा भ’ रहल छन्हि । प्रार्थना सुनिकय ईश्वर धरती पर रघुवंश मे अवतार लेलनि आ धरतीक भार उतारलनि । ई काज कय केँ ईश्वर पुनः अपन ब्रह्मत्वक पद पर चलि गेलाह । ओ पाप केँ नाश कय भारी यश प्राप्त कयलनि । जानकीक पति श्री रामचन्द्रजी केँ हम प्रणाम करैत छी, जिनकर नाम सँ भुक्ति (सांसारिक सुख) सेहो भेटैत अछि आ अन्त मे मुक्ति सेहो । ओ श्रीराम उत्पत्ति, स्थिति आ प्रलय केर मूल कारण छथि । ओ माया सँ दूर (परे) रहितो नर-रूप धारण कय माया मे पड़लाह अछि । हुनकर स्वरूप अचिन्त्य अछि, घन आनन्दमय अछि, निर्मल-निष्कलुष अछि, सम्यक् ज्ञान रूप अछि, सुख केर खजाना अछि । हम सीतापति श्रीराम केँ, जिनका सब तत्त्व ज्ञात छन्हि, मोन मे सुखक कामना सँ प्रणाम करैत छी । जे सब पाप केँ दूर करयवला रामायण केँ प्रतिदिन पढ़त आ सुनत ओ अन्त मे सुविधापूर्वक वैकुंठलोक केँ प्राप्त करत, ओकरा लेशो मात्र कष्ट नहि हेतैक । यदि कियो सांसारिक बन्धन सँ छुटकारा पाबय चाहैत अछि त ओकरा लेल रामायण पढ़ब एकटा बहुत उत्तम साधन छैक । जे करोड़ों गोदान करैत अछि आर जे एहि रामायण रूपी पुराण केँ पढ़ैत अछि, दुनू केँ बराबर पुण्य भेटैत छैक ॥८२-९३॥

प्राचीन युग मे एक समय विश्व मे व्यापक भगवान शिव कैलाश पर्वत पर रहि रहल छलाह । ओ रत्न सँ बनल सिंहासन पर समाधि लगाकय बैसल रहथि । हुनकर समान श्रेष्ठ योगी दोसर के अछि ! सिद्ध सभक दल हुनकर चरणक सेवा कय रहल छल । हुनक तीनू आँखि अभयदान दयवला आ सब पाप केँ दूर करयवला छल । ओतय पार्वती, जिनकर वास शिवजीक बामभागक आधा शरीर मे रहैत छन्हि, शिवजी सँ प्रश्न कयलिह – ॥९४-९७॥

‘हे परमेश्वर शिव! अपने तँ सारा संसार मे व्याप्त रहैत छी । विश्व मे जेहो कोनो चल आ कि अचल पदार्थ अछि से सबटा अपनेक खेल थिक । प्रणाम कय केँ हम एकटा एहेन प्रश्न पुछैत छी जे अहाँ केँ परम प्रिय अछि । जे लोक विद्वान आ ज्ञानवान छथि सेहो सब (कोनो ज्ञानक बात) भक्त (यानि ज्ञानक बात सब सँ अनुराग रखनिहार) केँ छोड़िकय आन (दोसर) केकरो नहि बतबैत छथि । हे ईश्वर! अहाँ तँ स्वयं ईश्वर छी; फेर अहाँक ईश्वर रामजी केना भेलाह जिनकर नाम अपने हरदम लैत (रटैत) रहैत छी ? स्त्रीक स्वभावक कारण (हम) ई बात फेरो पुछैत छी । एक बेर हमरा रामक रहस्य बुझा देल जाउ । राम जे नर-तनु केँ धारण कयलनि आ दशरथक पुत्र बनिकय धरती पर अयलाह, ओ जयन्त पर दिव्यास्त्र छोड़लनि तथा शिवजीक धनुष केँ तिनका समान तोड़ि देलनि, गौतमक स्त्री पाथर केर भ’ गेल छलिह तिनकहु राम हुनकर उद्धार कयलनि, अगाध समुद्र मे पुल बनबा देलनि, रावण केँ मारबाक लेल वानरक दल केर सेना बनौलनि, मानव भ’ कय ओ असम्भव काज सब कयलनि, आर एकटा कथा पुछय मे हम लजाइत छी – ओ निर्गुण ब्रह्म भ’ओ कय सगुण रूप मे अवतार लयकेँ धरती पर पड़ल दुष्ट सभक भार केर हरण कयलनि, जिनका सुख आ दुःख छू’ओ नहि सकैत छल, से राम सीताक विरह सँ कनबो कयलाह ।’ ॥९८-१०९॥

जखन पर्वतराज हिमालयक पुत्री गिरिजाजी भक्तिपूर्वक उपर्युक्त प्रश्न पुछलखिन, तखन शिवजी बड़ा प्रसन्न भ’ कय कहय लगलाह – ‘हे प्रिये! अहाँ परम धन्य छी ।’ जेना मेघक गर्जना सुनि-सुनिकय मोर आनन्दित भ’ जाइत अछि, ताहि तरहें आनन्दित भ’ शिवजी रामचन्द्रजी केँ प्रणाम कय केँ गिरिजाजी केँ रामक रहस्य बुझाबय लगलाह ॥११०‍-१११॥

“राम अनादि छथि, पुरुषोत्तम छथि आ प्रकृति सँ परे छथि । अनुपम आनन्दस्वरूप छथि आर सब कारणहु सभक मूल कारण छथि । जे किछु संसार मे भिन्न-भिन्न रूप मे देखाय दैत अछि से सबटा हुनकहि चैतन्य रूप थिक । मुदा ओ कोनो वस्तु मे लिप्त नहि छथि, जेना आकाश सब वस्तु मे व्याप्त रहितो सब सँ भिन्न अछि । रामहि केर माया सारा सांसारिक व्यवहारक सृष्टि करैत अछि, आर जाहि तरहें पानि मे आकाश प्रतिविम्ब-रूप मे मिथ्या देखाइ दैछ, ठीक तहिना मिथ्या मे सत्य केँ प्रतीत करबैत अछि । जे लोक सांसारिक विषय-भोग मे आसक्त अछि, ओकर दृष्टिदोष (मिथ्या ज्ञान) सँ गड़बड़ भ’ जाइत छैक तथा भ्रान्तिवश उत्तर-दक्षिण आदिक मिथ्या व्यवहार करय लगैत अछि । यैह ज्ञान-विपर्यम सँ सृष्टि भ’ जाइछ । हे पार्वती! जेना सूरज लेल न कखनहुँ राति होइछ आ न कखनहुँ दिन होइछ, तहिना राम केँ सेहो, जे घनीभूत चैतन्यरूपी सूर्य थिकाह, हुनका अन्धकार-समान अज्ञान नहि होइत छन्हि । ओ निन्द सँ दूर रहैत जाग्रत, स्वप्न आ सुषुप्ति – सब अवस्थाक साक्षी छथि । ताहि राम केर सेवा कएने बिना अपन जन्म केँ निष्फल बुझबाक चाही ॥११२-११७॥

।चौपाइ।

कति बेरि राम लेल अवतार । कति बेरि हरलनि अवनी भार ॥११८॥
ओ रामायण अछि शत कोटि । ब्रह्मलोक महिमा बड़ि गोटि ॥११९॥
सदल सपुत्र दशानन मारि। धरणी भार सकल देल टारि ॥१२०॥
मारुत तनय प्रभृति महावीर । ज्ञान भक्ति शूरत्व गभीर ॥१२१॥
सीता लक्ष्मण कपिपति सहित । अयला निजपुर विधि शिव सहित ॥१२२॥
गुरु वसिष्ठ विधि सौँ अभिषेक । पाओल राज्य राम नृप एक ॥१२३॥
सिंहासन संस्थित महिपाल । कोटि सूर्य्यसम कान्ति विशाल ॥१२४॥
अञ्जनि-सुतकाँ भक्ति न थोड़ि । आगाँ ठाढ़ भेल कर जोड़ि ॥१२५॥
प्रभु जानथि हनुमानक धर्म्म । अतिशय अद्भुत हिनकर कर्म्म ॥१२६॥
लोभक रहित कयल सभ काज । ज्ञान चहै छथि से पुन आज ॥१२७॥
शुनु वैदेही कहिऔनि ज्ञान । अधिकारी सेवक हनुमान ॥१२८॥
हमरहि निकट सुुचित भय रहिय । हमर तत्त्व हिनका अहँ कहिय ॥१२९॥
वैदेही प्रभु आज्ञा पाय । कथा कहल हनुमान बुझाय ॥१३०॥

।सोरठा।

जानब अहँ हनुमान, परब्रह्म श्रीराम काँ ।
ई निश्चय करु ज्ञान, मूल प्रकृति हमहीँ थिकहुँ ॥१३१॥
उद्भव पालन नाश, हमहिँ स्वतन्त्रा कारिणी ।
हमरहु हुनके आश, तनिके सन्निधि मुख्य बल ॥१३२॥

भावार्थः

राम कतेको बेर अवतार लय चुकल छथि, कतेको बेर धरतीक भार उतारि चुकल छथि । हुनक चरितगाथा रामायण, एक्के टा नहि, सौ-सौ करोड़ अछि । ब्रह्मलोकक महिमा अपार अछि । सेना आ पुत्र सहित रावण केँ मारिकय रामचन्द्रजी धरतीक सबटा भार उतारलनि । तेकर बाद परमवीर हनुमान आदिक संग, जे अगाध ज्ञान, भक्ति आ वीरतावला छथि – सीता, लक्ष्मण, सुग्रीव, ब्रह्मा व शिव केर संग अपन राजधानी घुरलाह । गुरु वसिष्ठ द्वारा शास्त्र मे कहल गेल रीति सँ अभिषेक कयलनि आ राम एकच्छत्र राज्य प्राप्त कयलनि । राजा राम सिंहासन पर बैसलाह त हुनकर चमक एक करोड़ सूर्यक बराबर भ’ गेलनि । अपार भक्तिवला अंजनिपुत्र हनुमान हाथ जोड़िकय हुनकर सोझाँ ठाढ़ भेलाह । हनुमानक गुण केँ रामचन्द्र जनैत रहथि । हुनकर करनी अत्यन्त अद्भुत रहन्हि । ओ बिना कोनो लोभ केँ सारा काज कयने छलथि । आइ ई ज्ञान चाहि रहल छथि । से जानि रामचन्द्र सीता सँ कहलनि – हे विदेहराजपुत्री! अहाँ हिनका ज्ञान कहियौन । ई हमर सेवक हनुमान ज्ञान पेबाक पात्र छथि । अहाँ हमरहि लग शान्ति-चित्त सँ बैसिकय हमर तत्त्व हिनका बुझाउ । राम केर आज्ञा पाबि सीता हनुमान केँ रामकथा बुझेलिह । “हे हनुमान! अहाँ श्रीराम केँ परब्रह्म बुझियौन आर निश्चित रूप सँ ई बुझू जे (सांख्य-दर्शन मे वर्णित) मूल प्रकृति (माया) हमहीं छी । संसारक सृष्टि, पालन आ नाश करय मे हम स्वतंत्र छी । हमरहु रामचन्द्रहि केर भरोस रहैत अछि आर हुनकहि लग हमर मुख्य प्रभाव रहैत अछि ॥११८-१३२॥

।चौपाइ।

राम अयोध्या वर रघुवंश । जन्म लेल शिव मानस हंस ॥१३३॥
मुनि मख रक्षा भेलनि तखन । कौसिक मुनि संग गेला जखन ॥१३४॥
छली अहल्या पाथर भेलि । शाप छुटल उत्तम गति गेलि ॥१३५॥
जनक पुरी मे शिव धनु भँग । कयलनि बहु विधि सज्जन संग ॥१३६॥
परिणय हमर भेल प्रभु संग । परशुराम अयला भल रंग ॥१३७॥
परिचय पाबि गेला तप भूमि । क्षत्रिय अरि नहि भेला घूमि ॥१३८॥
वास अयोध्या बारह वर्ष । नित नव नव अनुभव हिअ हर्ष ॥१३९॥
केकयि कहल भेल वनवास । दशरथ छोड़ल जीवन आश ॥१४०॥
चित्रकूट सौँ दण्डक गहन । कयल निवास बहुत दुख सहन ॥१४१॥
निधनि विराध तथा मारीच । यति बनि आयल रावण नीच ॥१४२॥
कयलक माया सीता हरण । युद्ध जटायुक भय गेल मरण ॥१४३॥
मोक्ष कबन्धहुकाँ भेल तेहन । मुनि लोकहुकाँ दुल्लभ जेहन ॥१४४॥
शवरी भक्ति सुपूजन कयल । तनिकाँ मुक्ति युक्ति छल धयल ॥१४५॥
सुग्रीवक संग मैत्रीकरण । तनिक हेतु बालिक भेल मरण ॥१४६॥
सीतान्वेषण कपि प्रस्थान । लंका दग्ध कयल हनुमान ॥१४७॥
रावण काँ रण मारण हेतु । बाँधल गेल समुद्रहुँ सेतु ॥१४८॥
लंका घेड़ल बजरल मारि । रावण मरण सुरण मे हारि ॥१४९॥
तनिकर पुत्र प्रभृति नहि रहल । बहुत अवज्ञा प्रभुवर सहल ॥१५०॥
देल विभीषण जनकाँ राज । प्रभुवर शरण धयल निर्व्याज ॥१५१॥
पुष्पक चढ़ि प्रभु हमरा सहित । जनपद अयला अरिसौँ रहित ॥१५२॥
राजा राम नाम अभिषेक । कहल कथा संक्षेप विवेक ॥१५३॥
सकल कयल हमहीँ सब कर्म्म । ज्ञानी जानथि एकर मर्म्म ॥१५४॥
निर्व्विकार अखिलात्मा राम । ई आरोप कि तनिका ठाम ॥१५५॥

।सोरठा।

सुनि गिरिजा वृत्तान्त, महादेव कहलनि कथा ।
तखना सीताकान्त, मारुतनन्दन सौं कहल ॥१५६॥

॥दोहा॥

यथा जलाशय त्रिविधि नभ, देथि पड़ै अछि जैह ।
महाकाश ह्रद मे तथा, प्रतिबिम्बहु मे सैह ॥१५७॥
एक पूर्ण चैतन्य मे, जीव भ्रम आरोप ।
त्रिगुणा मायाकृति सकल, तत्त्वज्ञान सौँ लोप ॥१५८॥
तत्त्वमसि प्रभृतिक श्रुतिक, महावाक्य सौँ ज्ञान ।
निश्चय मन भेलैँ तहाँ, ब्रह्म जीव नहि आन ॥१५९॥
मननशील जे हमर जन, जानि जाथि मद्भाव ।
ज्ञान बिना हो मोक्ष नहि, बहुत जन्म जौँ पाव ॥१६०॥
ई रहस्य अहँ काँ कहल, हम अपनहिँ शुभ ज्ञान ।
भक्तिहीन काँ देब नहि, जौँ हो इन्द्र समान ॥१६१॥

भावार्थः

रामचन्द्र रघु लोकनिक श्रेष्ठ वंश मे अयोध्या नगरी मे जन्म लेलनि । ओ मानू शिव केर मनरूपी सरोवर मे हंस (ज्ञानालोक) छथि । जखन कौशिक मुनि विश्वामित्रक संग हुनकर आश्रम पहुँचलाह तखन मुनिक यज्ञक रक्षा भेल । गौतमक पत्नी अहल्या शापवश पाथर भ’ गेल छलिह । राम हुनका शाप सँ मुक्त कयलनि आर ओ उत्तम लोक केँ गेलिह । राम जनकपुरी मे शिवजीक धनुष बहुते रास सज्जन लोकनिक सभा मे तोड़लनि । तखन प्रभु रामजीक संग हमर विवाह भेल । ताहि समय परशुराम ओतय रंगभूमि मे अयलाह । हुनको रामक परिचय भेट गेलनि आ ओ सीधे अपन तपोवन मे घुरि गेलाह । फेर कहियो ओ क्षत्रिय सँ शत्रुता नहि कयलनि । एकर बाद रामजी बारह वर्ष अयोध्या मे रहलाह, जेतय रोज नव-नव अनुभव सँ हृदय हर्षित होइत रहलनि । कैकेयि केर कहलापर हुनका वनवास भेटलन्हि आर दशरथ अपन प्राण केर त्याग कयलनि । पहिने चित्रकुट मे, फेर दण्डकारण्य मे वास कयलनि आर बहुते रास कष्ट उठेलनि । विराध एवं मारीच केर वध कयलनि । तेकर बाद दुष्ट रावण संन्यासीक कपट-वेष धारण कय पहुँचल । ओ छल कयकें सीताक हरण कय लेलक । ओकरा सँ लड़ैत जटायुक मृत्यु भ’ गेल । कबन्ध केँ सेहो ओहने मोक्ष भेटल जेना मुनि लोकनि केँ सेहो भेटब मुश्किल होइत छन्हि । शबरी भक्तिभाव सँ रामक पूजा कयलिह । हुनकर मुक्ति लेल यैह उपाय नियत छल । तखन राम सुग्रीव संग मित्रता कयलनि आ हुनकहि कारण बालिक वध कयलनि । हनुमान सीताक खोज करय चललाह । महावीर लंका जरौलनि । रावण केँ युद्ध मे मारबाक लेल समुद्र मे सेहो पुल बनायल गेल । लंका घेर लेल गेल । लड़ाइ ठनि गेल । घनघोर लड़ाइ मे रावण मारल गेल । रावणक कोनो बेटा-पोता तक नहि बचल । राम ओकर अपराध केँ बहुते बर्दाश्त कयलनि । अपन भक्त विभीषण केँ लंकाक राज दय देलनि आ ओहो शुद्ध हृदय सँ प्रभुवर रामचन्द्रक शरण केँ गहलनि । तखन श्री रामचन्द्र शत्रु सब सँ रहित भ’ हमरा संग पुष्पक विमान पर चढ़िकय अपन देश अयोध्या घुरलाह । राजा राम केर राज्याभिषेक नाममात्रक भेल । हुनकर कथा संक्षेप मे अपन बुद्धिक मुताबिक अहाँ केँ बतेलहुँ । वास्तव मे रावण-वध आदि जे किछुओ काज भेल ओ सबटा हमहीं कयलहुँ । एकर रहस्य केवल ज्ञानी लोक टा बुझैत छथि । कियैक तँ राम त निर्विकार आ अखिल ब्रह्माण्ड स्वरूप छथि; फेर हुनका उपर कोनो काजक कर्तव्य थोपनाय कि उचित होयत ?” ॥१३३-१५५॥

गिरिजा सँ वृत्तान्त सुनिकय शिवजी कथा सुनौलनि । तखन सीतापति रामचन्द्र पवनसुत हनुमानजी सँ कहलनि – “जाहि प्रकारे अलग-अलग पानिक बर्तन मे आकाश केर प्रतिबिम्ब अलग-अलग देखाय दैत अछि, अर्थात् एक्के टा आकाश अलग-अलग बुझाइत अछि, ताहि प्रकारे महाकाश झीलहु मे ओहने प्रतिबिम्ब रूप मे अछि । पूर्ण चैतन्यरूपी एक आत्माक दर्शन अनेकानेक आ भिन्न-भिन्न जीव रूप मे अछि, ई भ्रममूलक मिथ्या आरोप थिक । एहि तरहक भ्रम केर मूल कारण थिक त्रिगुणात्मिका माया । तत्त्व ज्ञान सँ एहि भ्रम केर अन्त होइत अछि । ई तत्त्व-ज्ञान तत्-त्वम्-असि (वैह अहाँ छी) इत्यादि वेदोक्त महावाक्य सँ होइत अछि । मोन मे हम वैह (ब्रह्म) छी एना निश्चय (असन्दिग्ध बोध) भ’ गेलापर ब्रह्म आ जीव मे भेद केर भ्रम दूर भ’ जाइत छैक । जे कियो हमर भक्त मननशील अछि ओ ज्ञान द्वारा मद्भाव केँ प्राप्त करैत अछि, यानि हमरा मे लीन भ’ जाइत अछि । बेर-बेर जन्म लेलो पर ज्ञान बिना मोक्ष सम्भव नहि छैक । ई गोपनीय कल्याणकारी ज्ञान हम स्वयं अहाँ केँ बतेलहुँ अछि । ई ज्ञान ओकरा नहि देब जे भक्ति सँ हीन हो, भले ओ इन्द्रक समान महाने कियैक न हो ॥१५६-१६१॥

।चौपाइ।

गिरिजा शंकर काँ संवाद । रघुपति हृदयक बड़ मर्य्याद ॥१६२॥
ई गोट पढ़लए रहए न पाप । गोपनीय थिक प्रबल प्रताप ॥१६३॥
पढ़थि भक्तियुत जे मन लाय । ब्रह्म वधादिक पाप मेटाय ॥१६४॥
बहुजन्मार्जित पापक नाश । यमक यातना कृत नहि त्रास ॥१६५॥

।घनाक्षरी।

जाति पाति नष्ट भ्रष्ट पापी पर-धन-रत ब्रह्मघाती उतपातो मित्रजन नासी जे ।
कुल मे कलंकि आ कुलघ्न हेमचोर चाढ़ योगिवृन्द-अपकारी धर्म्म मे उदासी जे ॥
रामचन्द्र पूजिकै करय जे हृदय-पाठ योगीन्द्र अलभ्य पदहीक होथि वासी से ।
‘चन्द्र’ भन सर्व्व लोक विजयि विभूतिमान पड़थि न कदापि कठोर जम फाँसी से ॥१६६॥

भावार्थः

ई शिव-पार्वती संवाद रामचन्द्रजी केँ हृदय सँ बहुत प्रिय छन्हि । एकर पाठ कयला सँ पाप सँ छुटकारा भेटैछ । एकर बहुत पैघ महिमा छैक । ई गोपनीय अछि । जे कियो एकर पाठ भक्तिक संग मोन लगाकय करत ओकरा ब्रह्मवध आदिक बड़का-बड़का पाप नाश भ’ जायत । जन्म-जन्मान्तर मे अर्जित पाप कटि जायत, आर ओकरा यमराज ओतय सेहो यातना पेबाक डर नहि होयत । जे जाति-पाँति सँ एकदम खसि गेल हो, पापी हो, दोसरक धन केँ अनुचित तरीका सँ भोगय मे लागल हो, पापी हो, ब्रह्महत्या करयवला हो, लोक सब केँ सतबयवला हो, अपन मित्र सब केँ नाश करयवला हो, कुल मे कलंक लगबयवला हो, कुल केर वास्ते घातक हो, सोना (स्वर्ण) चोरबयवला हो, उचक्का हो, योगी लोकनिक बुराइ करयवला हो, धर्म सँ विरत हो, ओहो सब यदि रामचन्द्रजीक पूजा कयकेँ ‘राम-हृदय’ केर पाठ करत त जे पद बड़का-बड़का योगी सब केँ सेहो नहि भेटि पबैत छैक तेहेन पद केँ प्राप्त करत; चन्द्र कवि कहैत छथि, ओ सब लोक मे विजयी होयत आर ऐश्वर्यशाली होयत, तथा यम केर कठोर फाँस मे कहियो नहि पड़त ॥१६२-१६६॥

।इति श्री चन्द्रकवि विरचिते मिथिलाभाषा रामायणे बालकाण्डे प्रथमोऽध्यायः।

॥ मैथिल चन्द्र कवि विरचित मिथिला भाषा रामायण मे बालकाण्ड केर पहिल अध्याय समाप्त भेल ॥

हरिः हरः!!

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