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रामचरितमानस मोतीः हनुमान्‌जीक अशोक वाटिका मे सीताजी केँ देखिकय दुःखी होयब आ रावण केर सीताजी केँ भय देखायब

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स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

रामचरितमानस मोती

हनुमान्‌जीक अशोक वाटिका मे सीताजी केँ देखिकय दुःखी होयब आ रावण केर सीताजी केँ भय देखायब

१. विभीषणजी जानकी माताक दर्शन केर सबटा उपाय कहि सुनौलनि। ताहिपर हनुमान्‌जी हुनका सँ विदा मांग चलि पड़लाह। ओ फेरो पहिने जेकाँ मसक रूप धयकय ओतय गेलाह जतय अशोक वन मे सीताजी रहैत छलीह।

२. सीताजी केँ देखिकय हनुमान्‌जी हुनका मनहि मन प्रणाम कयलनि। हुनका बैसले-बैसल रातिक चारू पहर बिति जाइत छन्हि। शरीर दुब्बर भ’ गेल छन्हि। माथ पर जटाक वेणी (लट) छन्हि। हृदय मे श्री रघुनाथजीक गुण समूह सभक जाप (स्मरण) करैत रहैत छथि। श्री जानकीजी नेत्र केँ अपनहि चरण मे लगौने नीचाँ दिश टकटकी दृष्टि सँ देखैत रहैत छथि आ मोन श्री रामजीक चरणकमल मे लीन छथि।

३. जानकीजी केँ दीन (दुःखी) देखिकय पवनपुत्र हनुमान्‌जी बहुते दुःखी भेलाह। हनुमान्‌जी गाछक पात मे नुकायल अवस्था मे रहला आ विचार करय लगलाह जे हे भाइ! कि करू? हिनकर दुःख केना दूर करू?

४. ताहि समय बहुते रास स्त्री सब केँ संग लेने सजि-धजिकय रावण ओतय आबि गेल। ओ दुष्ट सीताजी केँ बहुतो बुझा रहल अछि। साम, दान, भय आर भेद देखा रहल अछि। रावण कहैत अछि – हे सुमुखि! हे सयानी! सुनू! मन्दोदरी आदि सब रानी लोकनि केँ अहाँक दासी बना देब, ई हम प्रण करैत छी। बस अहाँ एक बेर हमरा दिश देखू त सही!

५. अपन परम स्नेही कोसलाधीश श्री रामचन्द्रजी केँ स्मरण कयकेँ जानकीजी तिनकाक आड़ (परदा) करैत कहय लगलीह – “हे दशमुख! सुने, भगजोगनीक प्रकाश सँ कहियो कमलिनी फुला सकैत अछि? तूँ अपना लेल सेहो एहिना मोन मे बुझि ले। रे दुष्ट! तोरा श्री रघुवीर केर बाणक खबरि नहि छौक। रे पापी! तूँ हमरा सून्न मे हरि अनलें हँ। रे अधम! निर्लज्ज! तोरा लाज नहि अबैत छौक?”

६. अपना केँ भगजोगनीक समान आ रामचन्द्रजी केँ सूर्यक समान सुनिकय आ सीताजीक कठोर वचन सब सुनिकय रावण तलवार निकालि अत्यन्त क्रोध मे आबिकय बाजल – सीता! तूँ हमर अपमान कयलें। हम तोहर माथ एहि कठोर कृपाण सँ काटि देबौक। नहि त आबहु जल्दी हमर बात मानि लेल। हे सुमुखि! नहि तँ जीवन सँ हाथ धोअय पड़तौक।

७. सीताजी कहलखिन्ह – “अरे दशग्रीव! प्रभुक भुजा जे श्याम कमल केर मालाक समान सुन्दर आ हाथीक सूँड समान पुष्ट आ विशाल अछि, या त ओ भुजा टा हमर कंठ मे पड़त या फेर तोहर भयानक तलवारे टा। अरे शठ! सुन, यैह हमर सत्य प्रण अछि।” सीताजी फेर कहैत छथिन – “हे चंद्रहास (तलवार)! श्री रघुनाथजीक विरह केर अग्नि सँ उत्पन्न हमर बड़ा भारी जलन केँ तूँ हरि ले। हे तलवार! तूँ शीतल, तीव्र आर श्रेष्ठ धारा बहबैत छँ, तोहर धारा ठंढा आ तेज छौक, तूँ हमर दुःखक बोझ केँ हरि ले।”

८. सीताजीक ई वचन सुनिते देरी ओ मारय दौड़ल। तखन मय दानवक पुत्री मन्दोदरी नीति कहिकय ओकरा बुझेलीह आ रोकलीह। फेर रावण सब दासी सब केँ बजाकय कहलक जे जाकय सीता केँ खूब डराबे। यदि महीना भरि मे ई हमर कहल नहि मानत त हम एकरा तलवार निकालिकय मारि देबय। एतेक कहिकय रावण घर चलि गेल।

९. एम्हर राक्षसी सभक समूह बहुतो तरहक डराउन रूप धयकय सीताजी केँ भय देखबय लागल। ओहि मे एकटा त्रिजटा नाम के राक्षसी रहय। ओकर श्री रामचन्द्रजीक चरण मे काफी प्रीति छलैक आर ओ विवेक (ज्ञान) मे निपुण छल। ओ सब राक्षसी सब केँ बजाकय अपन एकटा सपना सुनेलक आ बाजल – “सीताजीक सेवा कय केँ सब अपन-अपन कल्याण कय लय जो। सपना मे हम देखलियैक जे एकटा बानर आबिकय लंका जरा देलक। राक्षस सभक सबटा सेना मारि देल गेल। रावण नंगटे अछि आ गदहा पर बैसल अछि। ओकर केस सेहो मुंडन करा देल गेल छैक। बीसो गोट हाथ कटि गेल छैक। एहि तरहें ओ दक्षिण (यमपुरी) दिश जा रहल अछि। लंका विभीषण केँ भेटि गेलैक। नगर मे श्री रामचन्द्रजीक दोहाइ सब गाबि रहल अछि। तखन प्रभु सीताजी केँ बजबौलनि अछि। हम चिकरिकय (निश्चय संग) कहैत छियैक जे ई सपना किछुए दिन बाद सत्य भ’ कय रहत।” ओकर वचन सुनिकय ओ सबटा राक्षसी सब डरा गेल आ जानकीजीक चरण मे खसि पड़ल।

हरिः हरः!!

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