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टिकट भेट जायत – व्यंग्य प्रसंग

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टिकट भेट जायत

“भैया! अहाँ चिन्ता नहि करब। हम राजधानी पूरा हिलाकय राखि रहल छी। लगभग सब बड़का नेताक चाटुकारिता मे लागल छी। हल्ला-हुच्चर सेहो समुचिते मात्रा मे कय रहल छी। प्रेस सब मे फोटो पहुचय ताहुक पूरा इन्तजाम करैत छी।”

“ठीक छैक छोटू!”

“जँ भाजपा सँ टिकट कटियो जायत तऽ आआपा तऽ अपनहि बुझू। तेहेन तरे-तर सेटिंग भऽ गेल अछि।”

“ठीक छैक छोटू! ई बढियाँ केलह।”

“अहाँ खाली मंच पर आगाँ बैसल करू आ जतेक राज्य-स्तरीय नेता सब अछि तेकरा सबकेँ चाटैत रहू।”

“कि? अच्छा… चाटैत रहू। हाहाहाहा! ठीक छैक छोटू।”

“एम्हर किछु लोक अपना सबहक गामहिकेर बदमाशी कय रहल अछि। तेकरा सबकेँ सलटनाय जरुरी अछि। लग-पासक गामक लोककेँ बेसी भाव दियौक।”

“ठीक छैक छोटू।”

“अच्छा! आ ओ जे सुनैना देवी दलित नेता छथि, तिनका पाछू पूरा समर्थन मे लागल रहू। दलित कार्ड आ जातीय कार्डक अतिरिक्त आइ-काल्हि अन्य कोनो कारगर नहि होइत छैक। बाभन भाइ सब सँ बेसी भाव गैर-बाभन सबकेँ देने रहब। बाभन भाइ सबकेँ खाली साल मे दु बेर अठगामा भोज करय पड़त, भऽ गेल।”

“हाहाहा! ठीक छैक छोटू!”

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