अथ श्री गीतामाहात्म्यम् ॥
The Greatness of The Gita
श्री गणेशाय नमः !! श्री राधारमणाय नमः !!
भगवान् श्री गणेश केँ प्रणाम अछि ! श्री राधारमण केँ प्रणाम अछि !!
गणेश बुद्धिक देवता थिकाह आर सब बाधा सब केँ दूर करयवला छथि; तेँ हरेक कार्यक आरम्भ करैत समय हुनका आवाहन एवं पूजा कयल जाइत छन्हि । राधारमण, राधाक प्रेमी, श्री कृष्ण ! हुनको हम प्रणाम करैत छी ।
धरोवाच ।
भगवन्परमेशान भक्तिरव्यभिचारिणी ॥
प्रारब्धं भुज्यमानस्य कथं भवति हे प्रभो ॥१॥
धरा (पृथ्वी) कहलनिः
हे धन्य प्रभु, हे सर्वोच्च शासक (सर्वसत्तावान्), अपन प्रारब्ध कर्म सब सँ पाछाँ पड़ि गेल कोनो लोक केँ अपनेक प्रति अव्यभिचारिणी (अनन्य-अटूट) भक्ति कोन प्रकारें प्राप्त भ’ सकैत छैक ?
श्रीविष्णुरुवाच ।
प्रारब्धं भुज्यमानो हि गीताभ्यासरतः सदा ॥
स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नोपलिप्यते ॥२॥
यदि कियो गीता केर निरन्तर अभ्यास करबाक लेल (भक्तिपूर्वक) समर्पित भ’ जाय, चाहे कतबो प्रारब्ध कर्म सब सँ कियैक न वंचित हो, तैयो ओ एहि संसार मे मुक्त आ प्रसन्न रहैत अछि । ओ नव कर्म सब द्वारा बन्धन मे नहि पड़ैत अछि ।
महापापातिपापानि गीताध्यानं करोति चेत् ॥
क्वचित्स्पर्शं न कुर्वन्ति नलिनीदलमम्बुवत् ॥३॥
कोनो पाप (खराबी, दुराशक्ति), चाहे कतबो पैघ हो, गीता अभ्यास सँ ओकरा प्रभावित नहि कय सकैत छैक । ओ कमल फूल केर पात जेकाँ जल सँ अस्पर्शित अछि ।
(ओकरा केहनो खराबी सँ दाग-कलंक नहि लागि सकैछ यदि ओ गीताक नित्य अभ्यास मे समर्पित अछि ।)
गीतायाः पुस्तकं यत्र यत्र पाठः प्रवर्तते ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि तत्र वै ॥४॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये ॥
गोपाला गोपिका वापि नारदोद्धवपार्षदैः ॥५॥
जेतय गीताक पुस्तक हो, जेतय एकर पाठ (स्वाध्याय, अध्ययन, आदि) कयल जाइत हो, ओतय सच मे प्रयाग आदि सबटा तीर्थ मौजूद रहैत अछि । ओहिठाम समस्त देवगण, ऋषिगण, योगीगण आ पन्नगगण सब सेहो रहैत छथि । तहिना, गोपाल आ गोपी सब, नारद, उद्धव आ हुनक समस्त टोलीक संग रहैत छथि ।
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ॥
यत्र गीताविचारश्च पठनं पाठनं श्रुतम् ॥
तत्राहं निश्चितं पृथ्वि निवसामि सदैव हि ॥६॥
जाहि स्थान पर गीता पढ़ल जाइत अछि, ओतय शीघ्रहि मदति भेटय लगैत अछि । जेतय गीता उपर विचार (विमर्श) कयल जाइत अछि, पाठ कयल जाइत अछि, पढ़ायल जाइत अछि, या सुनल जाइत अछि, ओहिठाम, हे धरा, बिना कोनो सन्देह केँ हम स्वयं अपन रूप सँ निवास करैत छी । (रहैत छी ।)
गीताश्रयेऽहं तिष्ठामि गीता मे चोत्तमं गृहम् ॥
गीताज्ञानमुपाश्रित्य त्रीन्लोकान्पालयाम्यहम् ॥७॥
गीताक आश्रय मे हमहूँ रहैत छी; गीते हमर प्रमुख निवासस्थान (घर) थिक । गीता केर ज्ञान (बुद्धि) पर आश्रित रहिकय हम तीनू लोक केर पालन-पोषण करैत छी ।
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः ॥
अर्धमात्राक्षरा नित्या स्वानिर्वाच्यपदात्मिका ॥८॥
चिदानन्देन कृष्णेन प्रोक्ता स्वमुखतोऽर्जुनम् ॥
वेदत्रयी परानन्दा तत्त्वार्थज्ञानसंयुता ॥९॥
गीता हमर परम विद्या (बुद्धि) थिक, जे निस्सन्देह ब्रह्मरूप अछि । ई ज्ञान सब मे पूर्ण, अक्षर (अविनाशी) एवं नित्य (अर्धमात्राक्षरा नित्या) अछि तथा हमर कखनहुँ प्रकट नहि होयबला भाव (अवस्था) केर सारतत्त्व अछि । ई चिदानन्द कृष्ण केर अपनहि मुख सँ अर्जुन केँ कहल गेल अछि तथा तीनू वेद सभक सम्पूर्ण ज्ञान, परम आनन्द दयवला ज्ञान आर अपन आत्माक सत्य स्वभाव (प्रकृति) केँ बुझयवला (आत्मसाक्षात्कार करयवला) ज्ञान अछि ।
अर्धमात्राः साहित्यिक अर्थ, आधा मात्रा सब, जे ॐ केर उपर मे स्थित ‘विन्दु’ केँ इंगित करैत अछि, सांकेतिक रूप सँ, ई तुरीय अवस्था, अर्थात् पूर्णब्रह्म केर द्योतक होइत अछि ।
योऽष्टादश जपेन्नित्यं नरो निश्चलमानसः ॥
ज्ञानसिद्धिं स लभते ततो याति परं पदम् ॥१०॥
ओ व्यक्ति जे दृढ़ मन (स्थिर चित्त) केर संग एकर अठारहो अध्याय सभक नित्य पाठ (जप) करैत अछि, से ज्ञान केर पूर्णता (सिद्धि) केँ प्राप्त करैत अछि तथा एहि (ज्ञानसिद्धि केर लाभ सँ) ओ परमपद (सर्वोच्च स्थान) केँ प्राप्त करैत अछि ।
पाठे समग्रेऽसम्पूर्णे ततोऽर्घं पाठमाचरेत ॥
तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥११॥
यदि समग्र पाठ नहि कयल जा सकय, तँ एकर आधा भाग केर पाठ कयल जा सकैत अछि; आर जे एहि प्रकार सँ करैत अछि (आधा भाग केर पाठ करैत अछि), ओकरा एकटा गाय केर दान बराबर पुण्य केर लाभ होइत छैक । एहि मे कोनो सन्देह नहि अछि ।
त्रिभागं पठमानस्तु गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥
षडंशं जपमानस्तु सोमयागफलं लभेत् ॥१२॥
एकर तेसर भाग केर जे पाठ करैत अछि, ओ वैह पुण्य अर्जित करैछ जे गंगा स्नान करबाक होइत छैक । छठम भाग केर जप (पाठ) कयला सँ सोमयज्ञ करबाक फल प्राप्त करैत अछि ।
एकाध्यायं तु यो नित्यं पठते भक्तिसंयुतः ॥
रुद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसेच्चिरम् ॥१३॥
ओ, जे पूर्ण भक्तिक संग, मात्र एकटा अध्याय टा नित्य पढ़ैत अछि, ओ रुद्रलोक केँ प्राप्त करैत अछि, तथा ओतय ओ शिव केर कृपापात्र (गण) बनिकय चिरकाल (बहुते समय) धरि निवास करैत अछि ।
अध्यायं श्लोकपादं वा नित्यं यः पठते नरः ॥
स याति नरतां यावन्मन्वन्तरं वसुन्धरे ॥१४॥
ओ व्यक्ति जे नित्य एकटा अध्याय केर चारिम भाग, या एक टा श्लोक मात्र पढ़ैत अछि, हे धरा, ओ एकटा मनु केर सम्पूर्ण कालखंड (एक मन्वन्तर) धरि मनुष्यक रूप मे जन्म प्राप्त करैत रहैत अछि ।
मनुष्य केर रूप मे जन्मः हरेक बेर ओ मनुष्यक शरीर मे मात्र जन्म लैत अछि ।
गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पञ्च चतुष्टयम् ॥
द्वौ त्रीनेकं तदर्धं वा श्लोकानां यः पठेन्नरः ॥१५॥
चन्द्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतंं ध्रुवम् ॥
गीतापाठसमायुक्तो मृतो मानुषतां व्रजेत् ॥१६॥
ओ व्यक्ति जे दस, सात, पाँच, चारि, तीन या दुइ श्लोक सभक, या फेर एतय तक कि गीता केर एकटा श्लोकक आधे भाग टा नित्य पढ़ैत अछि (जपैत अछि), ओ निश्चय टा चन्द्रलोक मे दस हजार वर्ष धरि रहैत अछि । ओ जे अपन शरीर गीता पढ़िते छोड़ैत अछि (यानि मृत्यु प्राप्त करैत अछि), से मानव (मनुष्य) केर संसार केँ प्राप्त करैत अछि ।
गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम् ॥
गीतेत्युच्चारसंयुक्तो म्रियमाणो गतिं लभेत् ॥१७॥
फेर, गीताक अभ्यास करिते, ओ परम मोक्ष (मुक्ति) केँ प्राप्त करैत अछि । मरैत समय कोनो व्यक्ति यदि ‘गीता’ शब्द बजैत अछि त ओकरा सद्गति (उत्तम गति) प्राप्त होइत छैक ।
गीतार्थश्रवणासक्तो महापापयुतोऽपि वा ॥
वैकुण्ठं समवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥१८॥
ओ जे गीताक अर्थ सुननाय पसिन करैत अछि, भले ओ कतबो पैघ पाप कियैक न कएने हो, स्वर्गलोक केँ प्राप्त करैत अछि, आर हमरा (विष्णु) संग वैकुण्ठलोक केर सुख प्राप्त करैत अछि ।
गीतार्थं ध्यायते नित्यं कृत्वा कर्माणि भूरिशः ॥
जीवन्मुक्तः स विज्ञेयो देहान्ते परमं पदम् ॥१९॥
ओ जे निरन्तर गीता केर अर्थ सब पर ध्यान करैत रहैत अछि, ओ निर्बाध गति सँ कर्म सब केँ करिते, ओकरा जीवनमुक्त मानल जाइत छैक’ आर एहि शरीरक खत्म भेलाक बाद ओ सर्वोच्च स्थान (सब सँ उच्चपद) केँ प्राप्त करैत अछि ।
गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः ॥
निर्धूतकल्मषा लोके गीता याताः परं पदम् ॥२०॥
एहि गीता केर सहयोग मात्र सँ, जनक आदि बहुते रास राजा लोकनि अपन अशुद्धता सँ मुक्त भ’ कय सर्वोच्च उद्देश्य (लक्ष्य, यानि मोक्ष) केँ प्राप्त कयने छथि । एना कहल गेल अछि (विज्ञलोक सब एना गायल करैत छथि) ।
गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत् ॥
वृथा पाठो भवेत्तस्य श्रम एव ह्युदाहृतः ॥२१॥
ओ, जे गीताक पाठ पूरा कय लेलक, जँ माहात्म्य जेना एतय (हमरा द्वारा) कहल गेल अछि, ओकरा नहि पढ़ैछ तँ ओकर पढ़ल सबटा व्यर्थ भ’ जाइत छैक; ओकर सारा परिश्रम (मेहनत) पानि मे चलि गेल बुझू । (परिश्रम बेकार भ’ जाइछ ।)
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीताभ्यासं करोति यः ॥
स तत्फलमवाप्नोति दुर्लभां गतिमाप्नुयात् ॥२२॥
ओ जे गीताक अध्ययन एहि माहात्म्य पर देल गेल शिक्षा सभक संग करैत अछि, ओकर एतय वर्णित फल प्राप्त होइत छैक, आर ओ एहेन पद केँ प्राप्त करैत अछि जेकरा पेनाय अत्यन्त कठिन छैक ।
सूत उवाच ।
माहात्म्यमेतद्गीतायाः मया प्रोक्तं सनातनम् ॥
गीतान्ते च पठेद्यस्तु यदुक्तं तत्फलं लभेत् ॥२३॥
सुत कहलनिः
ओ जे हमरा द्वारा कहल गेल एहि सनातन गीता माहात्म्य केँ, स्वयं गीताक पाठ पूरा कयकेँ पढ़त, तेकरा एतय कहल गेल फल अवश्य भेटतैक ।
एकरा या तँ (१) केवल अर्थवाद केर रूप मे अथवा गीताक पढ़ाइ केर गहींर इच्छा जगेबाक लेल महिमामंडन केर रूप मे बुझल जा सकैत अछि, जे नित्य कयलापर, एकर कोनो एकटा सन्देश (शिक्षा) केर सत्यता आ महानताक आधार पर, यदाकदा हृदय केर भीतर तक पहुँचि सकैत अछि, एतेक तक कि लोकक पूरा स्वभाव नीक वास्ते बदैल सकैत छैक; (२) या, पूरा या कोनो भाग केँ “पढ़नाय” आ “पाठ कयनाय” आदि, शायद ओकर सामान्य अर्थ मे नहि लेल जाय, जेना मुख सँ वाचन कयनाय आदि; मुदा कहल गेल पैघ फलादेश सब केँ देखैत, एकर सही मतलब ई निकालल जा सकैछ जे गीता शिक्षाक सार (निचोड़) मनुष्यक दैनिक जीवन मे शामिल भ’ रहल अछि । तखन फेर, एहि मे कोन आश्चर्यक बात अछि जे एहेन लोक जे गीता केर रूप अछि, एकटा सत्य ज्ञानी, या जीवनमुक्त होयत, या ओ, एहेन बनय मे अपन सफलताक हिसाब सँ, जीवनक विकासक्रमक बीच केर क्षेत्र मे पाओत आ अन्त मे मुक्ति पाओत ?
इति श्रीवाराहपुराणे श्रीगीतामाहात्म्यं संपूर्णम् ॥
Thus ends in the Varaha Purana the discourse designated, The Greatness of the Gita.
Harih Harah!!
