डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन केर दार्शनिक विरासत: तत्वमीमांसा, नैतिकता, सौंदर्यशास्त्र आर लोक प्रशासन मे तेकर प्रासंगिकता
– कार्यपत्रः कतोच निधि (मूल आलेख अंग्रेजी, नीचाँ मे पोस्ट कयल अछि, हिन्दी अनुवाद सहित)
परिचय
एक दार्शनिक, भारत केर दोसर राष्ट्रपति आ सबसँ महत्वपूर्ण बात, एक महान शिक्षक डॉ. एस. राधाकृष्णन केँ कोनो परिचयक आवश्यकता नहि अछि । ओ एकटा प्रख्यात विद्वान आर 20वीं सदीक प्रमुख दार्शनिक लोकनि मे सँ एक छलाह । सर्वपल्लीक स्नातक डिग्रीक थीसिस केर शीर्षक “वेदांत केर नैतिकता आर एकर आध्यात्मिक पूर्व-मान्यता सब” (The Ethics of Vedanta and its Metaphysical Presuppositions) छल । ई 20 वर्षक उमेर मे प्रकाशित भेल छल आर हुनका एहि लेल काफी प्रशंसा भेटल छलन्हि । ओ दर्शनशास्त्र केर क्षेत्र मे बहुत पैघ योगदान देलनि आर पूर्वी तथा पश्चिमी विचारधारा सभक बीच केर अन्तर केँ मेटेबाक काज कयलनि । एकर अलावे, शिक्षा, धर्म व नैतिकता मे हुनकर योगदान तथा एहि सब विषयक प्रति हुनकर एकीकृत दृष्टिकोण आइयो प्रभाव पाड़ैत अछि तथा समाज मे नैतिक ओ आध्यात्मिक मूल्य सब केँ बढ़ावा देबाक काज करयवला लोक सब केँ प्रेरित करैत अछि । हुनकर विचार सब मे दार्शनिक तत्व बचपनहि सँ समाहित छलन्हि आर समय केर संग ओ सब आरो विकसित होइत रहल । ओ शोधक वास्ते तत्वमीमांसा (metaphysics) आर धार्मिक दर्शन केर चयन कयलनि । ओ भारतीय दर्शन आ धर्म केर आलोचनात्मक परीक्षण कयलनि जाहि सँ कि ऐ पता लगायल जा सकय जे कि जीवित अछि आ कि सुसुप्त (निष्क्रिय) अछि । अद्वैत वेदांत आर आत्मा तथा ब्रह्म केर एकता हुनक तत्वमीमांसा संबंधी विचार सभक केंद्र बिंदु छल । ओ नैतिकता मे आध्यात्मिक आधार वला नैतिक सिद्धांत सभक महत्व पर जोर देलनि । ओ सौंदर्य केर दृष्टि सँ भारतीय कला एवं संस्कृतिक आध्यात्मिक ओ दार्शनिक पक्ष केर प्रशंसा कयलनि । ई लेख तत्वमीमांसा, नैतिकता आर सौंदर्यशास्त्र मे हुनकर योगदान आर लोक प्रशासनक क्षेत्र मे तेकर प्रासंगिकता पर केंद्रित अछि ।
“ई भारतक गहन आध्यात्मिकते छी – नहि कि कोनो महान राजनीतिक ढांचा या सामाजिक संगठन जे एकरा विकसित कयलक – जे एकरा समय केर मारि आ इतिहास केर घटना सभक सामना करय मे सक्षम बनेलक अछि ।” – डॉ. एस. राधाकृष्णन ।
डॉ. एस. राधाकृष्णन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध दार्शनिक आ शिक्षाविद रहथि । आदर्शवादी मूल्य मे अटूट विश्वास राखयवला डॉ. राधाकृष्णन दुनिया भरि मे भारतीय मूल्य आ विचार सभक प्रतिनिधित्व कयलनि । पश्चिमी दर्शनक एकतरफा विचारधाराक बावजूद, डॉ. राधाकृष्णन पूर्वी आ पश्चिमी दुनू विचारधारा सब केँ एकीकृत करय मे विश्वास करैत छलथि । ई नहि केवल पूर्व आर पश्चिमक बीच, बल्कि आनो सभक बीच केर अन्तर केँ मेटेबय मे सामंजस्य देखबैत अछि । हुनकर पुस्तक सब, जेना “इंडियन फिलॉसफी” (Indian Philosophy) आर “द फिलॉसफी ऑफ द उपनिषद” (The Philosophy of the Upanishads) द्वारा जटिल (कठिन) भारतीय दार्शनिक सिद्धांत सभक सरल व्याख्या प्रस्तुत कयलक, जाहि सँ ओ वैश्विक पाठक लोकनिक वास्ते बेसी बुझय योग्य बनि गेल । हुनकर कार्य आर विचार आइयो प्रासंगिक अछि तथा आजुक दार्शनिक लोकनि, राजनेता लोकनि, प्रशासक लोकनि तथा शोधकर्ता लोकनि केँ प्रेरित करैत अछि । ई पेपर डॉ. एस. राधाकृष्णन केर मेटाफ़िज़िक्स (तत्वमीमांसा), नैतिकता आर सौंदर्यशास्त्र केर दर्शन पर प्रकाश पाड़ैत अछि तथा बतबैत अचि जे ई विचार आजुक लोक प्रशासन मे कोन तरहें उपयोगी अछि ।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन केर दर्शन
राधाकृष्णन केर दर्शन महाभारत, भगवद्गीता, उपनिषद व शंकर एवं रामानुज जेहेन विचारक लोकनि सँ गहराइ सँ प्रभावित रहनि । हुनकर मानब छलन्हि जे हिंदू धर्मक बारे मे हुनकर विचार सार्वभौमिक अछि तथा ओ पश्चिमी आलोचना सभक विरूद्ध एकर बचाव (पक्षपोषण) कयलनि । ओ उपनिषद सब तथा वेद सभक नव व्याख्या कयलनि तथा दुनिया केँ हिंदू धर्म केर एकटा नव समझ प्रदान कयलनि, जे एकटा धर्म आ जीवन जिबय केर तरीका, दुनू छी ।
तत्वमीमांसा (Metaphysics)
ओ हिंदू धर्म केँ एकटा वैज्ञानिक धर्म मानैत रहथि जे अंतर्ज्ञान या धार्मिक अनुभव सभक बदला तथ्य सबपर आधारित अछि । ओ बुझेलनि जे अंतर्ज्ञान ‘स्वतःसिद्ध’ (स्वयं प्रमाणित) आर ‘स्वसंवेद्य’ (स्वयं सिद्ध होयवला) प्रकारक होइछ, संगहि ई ‘स्वयं प्रकाश’ (स्वयं प्रकाशित) सेहो होइछ । ओ वेदांतक एकटा प्रसिद्ध समर्थक रहथि जे आधुनिक दर्शक (मोडर्न अडियंस) केर लेल अद्वैत वेदांत केँ नया ढंग सँ परिभाषित कयलक । हुनकर दर्शनक आधार आदर्शवाद अछि (किशोर, 2021) । राधाकृष्णन अद्वैत वेदांत केर दृढ़ अनुयायी छलाह । हुनक कार्य मे अद्वैत दर्शनक प्रभाव स्पष्ट रूप सँ देखाय पड़ैत अछि । ओ नहि केवल शंकर केर अद्वैत वेदांत दार्शनिक सिद्धांत सभक पुनर्व्याख्या कयलनि, बल्कि आधुनिक विज्ञान आ प्रौद्योगिकी केर विकास तथा पश्चिमी विचारधाराक नजरिया सँ ओकरा नव ढंग सँ प्रस्तुतो कयलनि (शर्मा, 2020) । राधाकृष्णनक लेल, अंतर्ज्ञान अनुभव केर सर्वोच्च शिखर थिक । अंतर्ज्ञान ‘वास्तविक’ (ब्रह्म) केर सबसँ व्यापक आर तेँ सबसँ सत्य अनुभव थिक, जे एकरा परम (सर्वोच्च) अनुभव बनबैछ । राधाकृष्णन कहैत छथि जे अंतर्ज्ञान आन सब तरहक अनुभव सभक आधार थिक ।
राधाकृष्णन केर आदर्शवाद अनुभव केर दुनिया (प्रकृति) केर वास्तविकता आ विविधता केँ स्वीकार करैत अछि, संगहि पूरे तरह सँ परे ‘परम’ (ब्रह्म) केर अवधारणा केँ सेहो बनौनौ रखैछ — एकटा एहेन ‘परम’ जे स्वयं (आत्मा) केर समान छथि । हालाँकि अनुभव केर दुनिया आ नित्यदिनक चीज सब परम वास्तविकता नहि थिक, कियैक तँ ई सब परिवर्तनक अधीन अछि आर ओहि मे सीमितता तथा विविधता (अनेकता) छैक, तैयो एकर उत्पत्ति आर आधार ‘परम’ (ब्रह्म) मे अछि, जे समस्त सीमा, विविधता व भेद सब सँ मुक्त (निर्गुण) छथि । ब्रह्महि दुनिया आ ओकर रूप सभक स्रोत थिकाह, लेकिन ई रूप ब्रह्म केर अखंडता पर कोनो असर नहि दैत अछि (Internet Encyclopedia of Philosophy (IEP, n.d.) ।
राधाकृष्णन मायाक बारे मे शंकरक ओहि दृष्टि मे परिवर्तन कयलनि, जेकरा मुताबिक माया केँ मात्र एकटा भ्रम मानल जाइत छल । राधाकृष्णनक मुताबिक, मायाक अर्थ एक गोट कठोर वस्तुनिष्ठ आदर्शवाद (objective idealism) नहि हेबाक चाही, जाहि मे दुनियाक मूल रूप सँ ब्रह्म सँ अलग मानल जाइत अछि; बल्कि मायाक अर्थ, आर बात सभक अतिरिक्त, दुनिया केँ असल मे सही मानबाक एकटा व्यक्तिपरक गलत समझ छी (Braue, 1985) ।
नीतिशास्त्र (Ethics)
चरित्र, यानि इच्छाशक्ति केर आदति, पहिले सँ तय नहि होइछ बल्कि अपने बनायल जाइछ । “कोनो काज एहि लेल नीक नहि होइत छैक जे ओकर बाहरी परिणाम कि छैक, बल्कि एहि लेल नीक होइत छैक जे ओकर पाछाँ केहेन आंतरिक इच्छा छैक । सदाचार अस्तित्व मे रहबाक एकटा तरीका थिकैक, नहि कि किछु नहि करय के । ई कोनो एहेन चीज नहि थिकैक जेकरा प्राप्त कयल जा सकय, बल्कि ई इच्छाशक्तिक एकटा काज या अभ्यास थिकैक” (Radhakrishnan S., 1914) । ओ पश्चिम मे प्रचलित धर्म केर अवधारणा केँ खारिज कय देलनि आर एकरा जीवन जिबय केर एकटा तरीकाक रूप मे बुझलनि । राधाकृष्णन केर मानब छन्हि जे धर्म आर नीतिशास्त्रक बीच गहींर संबंध छैक । धर्म धार्मिक और नैतिक कानून केर चरम रूप थिक । धर्म असल मे नीतिशास्त्र और धर्म केर मेल थिक (Naravane, 1964) । नीतिशास्त्र सँ जुड़ल अनुभव सभक राधाकृष्णन पर गहींर परिवर्तन लाबयवला असैर (प्रभाव) पड़लन्हि । ई अनुभव समस्या सब केँ सुलझेबाक आ काज करबाक अलग-अलग बुझायवला तरीका सबक बीच तालमेल (सामंजस्य) बैसाबय मे मदति करैत अछि ।
“जीवनक हरेर रूप, मनुष्यक हरेक समूह केर अपन ‘धर्म’ होइत छैक, जे ओकर अस्तित्वक नियम थिकैक । धर्म या सदाचार चीज सभक सच्चाइ अनुरूप होयब थिक, आर अधर्म ओकर विरोध थिक । नैतिक खराबी ओहि सच्चाइ केर संग तालमेल नहि बैसा पेनाय थिक जे दुनिया केँ घेरने अछि आर ओकरा नियंत्रित करैत अछि” (Radhakrishnan S., 1927) ।
हिंदू आदर्शवाद मे हुनकर सुधार कर्म केर नीतिशास्त्र पर आधारित अछि, जेकरा ओ भगवद्गीता, सिख दर्शन आर महायान बौद्ध धर्म सँ लेने रहथि । ओ वैज्ञानिक आर तकनीकी प्रयास सब मे पश्चिमक एकतरफा प्रगति आर सुख-सुविधा सब केँ प्राप्ति पर ओकर जोरदार आलोचना करिते हिंदू धर्म द्वारा बढ़ावा देल गेल स्थायी आध्यात्मिक सिद्धांत सब दिश इशारा कयलनि । हुनकर ई मानब नहि रहनि जे पश्चिमी जीवन शैली केँ अपनेनाय टा मानवीय क्षमताक चरम थिक । तेँ, हुनका लेल, “आत्मा केर धर्म” ओ केंद्र-बिंदु छी जेकर चारू दिश ओकर समस्त बौद्धिक प्रतिबद्धता सब एकरहि अगल-बगल घुमैत अछि (सिंह, 1988) । एहि तरहें, हुनकर मानब रहनि जे मनुष्यक जीवन मे नैतिकता अत्यंत महत्वपूर्ण अछि । ई मानवीय आत्मा केँ प्रशिक्षित करैत अछि तथा ओकरा पूर्णता दिश लय जाइत अछि ।
सौंदर्यशास्त्र
राधाकृष्णन केर अनुसार, सौंदर्यशास्त्रक गहींर दार्शनिक तथा आध्यात्मिक अर्थ छैक, विशेष कयकेँ भारतीय कला आर संस्कृति केर संदर्भ मे । राधाकृष्णन कहैत छथि जे “समस्त कला कोनो माध्यम मे अनुभव केर अभिव्यक्ति थिक” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) ।
सहज अनुभूतिक बिना कला यांत्रिक आर प्राचीन विषय सभक पुनरावृत्ति बनि जाइछ । वास्तविकताक संग कलाकार केर सहज अनुभव केँ व्यक्त करबाक बदले, एहेन “कला” केवल (पुनः) उत्पादन केर एकटा प्रक्रिया बनिकय रहि जाइत अछि (इंटरनेट इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फिलॉसफी (IEP), बिना तारीख) ।
राधाकृष्णन केर वास्ते, सौंदर्यशास्त्र कला आ विज्ञान दुनूक संयोग (मिलन) थिक । लेकिन तैयो, ओहि दुनू बीच किछु अंतर छैक । ओ कहलनि; “कविता आत्माक भाषा थिक, जखन कि गद्य विज्ञान केर भाषा थिक । कविता रहस्य, भक्ति आर धर्म केर भाषा थिक । गद्य अपन पूरा अर्थ बुद्धिक सामने स्पष्ट कय दैत अछि, जखन कि कविता हमरा लोकनि केँ जीवनक गहींर रहस्य सब मे लय जाइत अछि आर बतबैत अछि जे किछु सच्चाइ सब केँ शब्द मे नहि कहल जा सकैछ” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) ।
लोक प्रशासन सँ प्रासंगिकता
डॉ. राधाकृष्णन केर दार्शनिक विचार सीधा रूप सँ प्रशासन आर शासन केर आदर्श प्रणाली सँ जुड़ल अछि ।
1. निर्वैयक्तिक उद्देश्य: स्वार्थ कहियो भी कोनो कार्यक पाछाँ प्रेरक शक्ति नहि बनबाक चाही । कोनो भी कार्य स्वार्थ या अपन इच्छा सब केँ पूरा करबाक लेल नहि कयल जेबाक चाही । विवेक हमरा सब केँ सिखबैत अछि जे दोसरक सेवा करब सब सँ पैघ लक्ष्य थिक, आर हरेक स्थिति मे कि सही अछि, ई तय करबाक लेल विवेकक उपयोग कयल जेबाक चाही । यदि हमर अंतर्मन हमरा कोनो चीज केँ सही मानबाक लेल प्रेरित करैत अछि, तँ हमरा ओ चीज करबाक चाही आर संगहि जीवनक हरेक रूप (नीक या बेजा) केर सामना करबाक लेल तैयार रहबाक चाही । हमरा सब केँ निष्पक्ष व्यवहार करबाक चाही (राधाकृष्णन डी. एस., एथिक्स ऑफ़ वेदांत, 1914) ।
2. परिवर्तनक प्रति झुकाव: राधाकृष्णन कहलनि, “यदि अंतर्दृष्टिक क्षण सब मे देखाय पड़यवला नव सामंजस्य केँ प्राप्त करबाक अछि, त आदत सभक पुरान (प्राचीन) व्यवस्था केँ छोड़य पड़त” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) । तहिना, विकास आर प्रगतिक लेल प्रशासन केँ परिवर्तनक अनुकूल हेबाक चाही ।
3. निर्णय करब: डॉ. एस. राधाकृष्णन अंतर्ज्ञान आ नियम, दुनूक आधार पर निर्णय लेबाक महत्वक बारे मे बात कयलनि अछि ।
4. नियम: लोक प्रशासन कानून आ नियम सब सँ चलैत अछि । राधाकृष्णन खुलिकय मानैत छथि जे स्थापित नैतिक नियम मात्र बेसी रास नैतिक निर्णय सभक आधार होइछ ।
5. समन्वय: “एतय हमरा सब केँ धर्मक सार (निचोड़) भेटैछ, जे जीवनक एकटा मिश्रित समझ थिक । धार्मिक व्यक्ति जनैत अछि जे हरेक चीज महत्वपूर्ण अछि; ओकरा पता रहैत छैक जे टकरावक (विरोधाभास) केर बीचो मे सामंजस्य (तालमेल) रहैत छैक आर ओ ताहि महत्व एवं सामंजस्य केँ बुझबाक शक्ति रखैत अछि” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) । एहि तरहें, लोक प्रशासन मे सेहो सुचारू रूप सँ काज करबाक लेल सामंजस्य आ समन्वय जरूरी छैक ।
6. काजक विभाजन: डॉ. एस. राधाकृष्णनक अनुसार, ज्ञान हासिल कयनाय ब्राह्मणक कर्तव्य थिक; कमजोर लोकक रक्षा कयनाय क्षत्रिय केर कर्तव्य थिक; व्यापार आ खेती वैश्यक जिम्मेदारी थिक; तथा दोसरक सेवा कयनाय शूद्रक कर्तव्य थिक (राधाकृष्णन डी. एस., भारतीय दर्शन-I, 2004) । काजक विभाजनक ई प्राचीन सिद्धांत आइयो प्रासंगिक अछि ।
7. विज्ञान आर कला: डॉ. राधाकृष्णन सौंदर्यबोध केँ विज्ञान आर कलाक रूप मे देखलनि, “जखन कोनो वैज्ञानिक कोनो नव नियम (सिद्धान्त) केर खोज करैत अछि, त ओ देखल गेल घटना सब केँ एकटा नया क्रम दैत अछि । कलाकार सेहो एहने काज करैत अछि । ओ हमरा सभक अनुभव केँ नया अर्थ दैत अछि आर वास्तविकताक सूक्ष्म गुण सब केँ बुझबाक कारण ओकरा अलग तरह सँ व्यवस्थित करैत अछि” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) । तहिना, लोक प्रशासन मे सेहो कला आ विज्ञान दुनूक दृष्टिकोण शामिल अछि । डी. वाल्डो केर अनुसार, लोक प्रशासन कला आ विज्ञान दुनू थिक । लोक प्रशासन कला थिक कियैक तँ ई काज पूरा करय सँ संबंधित अछि । लोक प्रशासन विज्ञान थिक कियैक तँ ई काज करबाक लेल निरीक्षण करैत अछि, शोध करैत अछि आ डेटा विश्लेषण केर उपयोग करैत अछि ।
8. विचार सभक एकता: डॉ. एस. राधाकृष्णन पश्चिमी आर पूर्वी विचारधारा सब केँ मिलेबा पर जोर देलनि । एहि तरहें, तुलनात्मक लोक प्रशासन मे, हम सब दुइ अथवा दुइ सँ बेसी प्रशासन सभक तुलना करैत छी आर दक्षता ओ प्रभावशीलताक लेल ओकरा सभक कामकाज केँ मिलबैत छी ।
9. अनुभवक महत्व: डॉ. एस. राधाकृष्णन कहलनि, “धर्म जीवन या अनुभव केर एकटा प्रकार थिक । ई वास्तविकताक प्रकृति (दर्शन) केर समझ या वास्तविकताक अनुभव (आत्मसात करब) थिक” (राधाकृष्णन एस., 1927) । एहि तरहें, कार्मिक प्रशासन शीर्ष-स्तरीय प्रबंधन मे अनुभवी सदस्य सब पर जोर देलक । कोनो भी कर्मचारीक व्यक्तिगत विकासक वास्ते अनुभव आवश्यक है आर ई लम्बा समय मे संगठनक मदति करैत अछि ।
10. तार्किक ज्ञान: डॉ. एस. राधाकृष्णनक दर्शन ई अछि जे तार्किक सोच विश्लेषण आ संश्लेषण केर प्रक्रिया सँ प्राप्त होइत अछि । ओ तर्कसंगत प्रणाली सभक लेल कामकाजक लेल तार्किक ज्ञान केँ महत्व देलनि । एहि तरहें, लोक प्रशासन तार्किक सोच आर तर्कसंगतता मे विश्वास करैत अछि ।
निष्कर्ष
ई कोनो अज्ञात तथ्य नहि अछि जे डॉ. एस. राधाकृष्णन दर्शनशास्त्रक क्षेत्र मे बहुत पैघ योगदान देलनि अछि । भारतीय विचारधारा आ विचार सभक प्रतिनिधित्व करय मे हुनकर योगदान केँ नजरअंदाज नहि कयल जा सकैछ । हुनक विचार सामाजिक विज्ञान केर हरेक दोसर क्षेत्र मे प्रासंगिक अछि । जखन भारतीय विचारधारा केँ प्राचीन आ कोनो प्रासंगिकता नहि मानल जाइत छल, तखन उपनिषद आदि, भगवद्गीता, वेद तथा कतेको रास प्राचीन ग्रंथ सभक ओकर पुनर्व्याख्या भारतीय विचारधारा केँ एकटा आधुनिक दृष्टिकोण प्रदान कयलक । पश्चिमी विचारधारा द्वारा आलोचनाक बावजूदो ओ (राधाकृष्णन) सम्पूर्ण विचारक एकीकरण पर जोर देलनि । ओ धर्म केँ जीवनक तरीका आर व्यवहार केर तरीकाक रूप मे पुनर्व्याख्यायित कयलनि । नैतिकता मे हुनक कार्य सब तार्किक तर्क, अंतर्ज्ञान, अनुभव करू आ नियम सभक अनुसरण करबाक माध्यम सँ मनुष्य केँ नैतिक बनय पर जोर देलनि । एहि सँ पता चलैत अछि जे 20वीं सदी मे लिखल गेलाक बादो हुनकर काज एखनहुँ प्रासंगिक अछि । एहि तरहें, राधाकृष्णनक दर्शन आजुक अनसुलझल समस्या सभक प्रति कतेको रास समाधानक उपाय सब प्रकट करैत अछि । शिक्षा पर हुनकर विचार नीति निर्माता सब केँ एक दिश समावेशी सामाजिक नीति डिजाइन करबाक सुविधा प्रदान करैत अछि आ दोसर दिश हिंदू धर्म केँ एकटा धर्मक रूप मे अपनेला सँ कृतज्ञताक अभिभावक तथा संस्कृति केर संरक्षक बनबैत अछि ।
सन्दर्भ
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Dr Sarvepalli Radhakrishnan’s Philosophical Legacy: Metaphysics, Ethics, Aesthetics and their Relevance to Public Administration
– Katoch Nidhi
Introduction
The philosopher, the second President of India and most importantly the great teacher, Dr S Radhakrishnan doesn’t need any introduction. He was an eminent scholar and one of the prominent philosophers of the 20th century. Sarvepalli’s bachelor’s degree thesis was titled “The Ethics of Vedanta and its Metaphysical Presuppositions”. It was published at the age of 20 and he received tremendous accolades for it. He made a great contribution to the field of philosophy and bridged the gap between Eastern and Western ideologies. Other than that, his contribution to education, religion, and ethics and his integrated approach to these subjects continue to have an impact and inspire people who work to promote moral and spiritual values in society. The philosophical contents in his visualisation were very much embedded since his childhood and blossomed over the period of time. He chose metaphysics and religious philosophy for research purposes. He critically examined Indian philosophy and religion to determine what was live and dormant. Advaita Vedanta and the oneness of Atman and Brahman were focal points of his ideas on metaphysics. He emphasised the significance of moral principles that have a spiritual foundation in ethics. He praised Indian art and culture’s spiritual and philosophical facets on an aesthetic level. The paper focuses on his contributions to metaphysics, ethics and aesthetics and their relevance in the field of Public Administration.
“It is the intense spirituality of India and not any great political structure or social organisation that it has developed that has enabled it to resist the ravages of time and the accidents of history.”- Dr. S Radhakrishnan.
Dr. S. Radhakrishanan was an internationally renowned philosopher and academician. A true believer in idealistic values, he represented Indian values and thoughts all over the world. Despite the one-sided ideology of Western philosophy, Dr. S. Radhakrishnan believed in integrating both Eastern and Western ideologies. It shows a congruency in bridging the gap between not only the east and west but also the rest. His books, such as “Indian Philosophy” and “The Philosophy of the Upanishads,” presented straightforward explanations of complicated Indian philosophical principles, making them more understandable to a global readership. His works and ideas are still relevant and inspiring today’s philosophers, politicians, administrators and researchers. The paper provides insight into the philosophy of metaphysics, ethics and aesthetics of Dr S. Radhakrishnan and how these ideas are useful in modern-day Public Administration.
Philosophy of Dr. Sarvepalli Radhakrishnan
Radhakrishnan’s philosophy was deeply influenced by Mahabharata, Bhagwat Gita, Upanishads and also thinkers like Sankara and Ramanuja. He believed that his idea of Hinduism was universal and defended it against Western criticism. He reinterprets the Upanishads and Vedas and provides the world with a new wisdom of Hinduism both as a religion and a way of life.
Metaphysics
He regarded Hinduism as a scientific religion founded on facts rather than intuition or religious experiences. He explained that intuition is of the Savatassiddha (self-certifying) and Svasamvedya (self-evidencing) types, as well as the Swayam Prakash (self-luminous) type. He was a renowned Vedanta advocate who redefined Advaita Vedanta for a modern audience. Idealism underpins his philosophy (Kishore, 2021). Radhakrishnan was a devout Advaita Vedanta adherent. His works easily demonstrate the impact of Advaita philosophy. He not only reinterpreted but also reconstructed, Sankara’s Advaita Vedanta philosophical theories through the lens of developing modern science and technology, as well as through the lens of Western ideology (Sharma, 2020). To Radhakrishnan, intuition is the pinnacle of experience. Intuition is the broadest and, consequently, most genuine realisation of the Real (Brahman), making it the ultimate realisation. Radhakrishnan explains intuition serves as the foundation for all other types of experiences.
Radhakrishnan’s idealism acknowledged the actuality and diversity of the world of experience (prakti) while retaining the concept of a completely transcendent Absolute (Brahman), an Absolute that is equal to the self (Atman). While the world of experience and everyday things is not ultimate reality because it is subject to change and is marked by finitude and multiplicity, it does have its origin and support in the Absolute (Brahman), which is free of all limits, diversity, and distinctions (nirgua). Brahman is the source of the world and its manifestations, but these modes do not affect Brahman’s integrity (Internet Encyclopedia of Philosophy (IEP, n.d.).
Radhakrishnan revised what he believed to be Sankara’s view of Maya as solely an illusion. According to Radhakrishnan, Maya should not be interpreted to mean a rigid objective idealism, one in which the world is thought to be fundamentally separate from Brahman, but rather Maya denotes, among other things, a subjective misconception of the world as ultimately accurate (Braue, 1985).
Ethics
Character, the habit of will, is self-created rather than predetermined. “An action is good, not because of its external consequences, but on account of its inner will. Virtue is a mode of being and not of doing. It is not something to be found, but a function or an exercise of the will” (Radhakrishnan S., 1914). He rejected the concept of Dharma as in the West but interpreted it as a way of life. Radhakrishnan contends that there is a close connection between religion and ethics. Dharma is the culmination of religious and moral law. Dharma is simply a synthesis of ethics and religion (Naravane, 1964). Experiences with ethics had a profoundly transformational effect on Radhakrishnan. The experience helps to solve problems and bring seemingly opposing lines of action into harmony.
“Every form of life, every group of men has its ‟dharma, which is the law of its being. Dharma or virtue is conformity with the truth of things, and dharma is opposition to it. Moral evil is disharmony with the truth which encompasses and controls the world” (Radhakrishnan S., 1927).
His reformation of Hindu idealism is based on the ethics of action, which he derived from the Bhagwad Gita, Sikh philosophy, and Mahayana Buddhism. He pointed to the enduring spiritual principles promoted by Hinduism to attack the West’s one-sided advancement in scientific and technological endeavours as well as its emphasis on pursuing comforts and pleasures. He did not believe that achieving the Western way of life was the pinnacle of human potential. Thus, for him, “the religion of the spirit” serves as the pivot around which all of his intellectual commitments revolve (Singh, 1988). Thus, he holds that ethics are extremely important in a man’s life. It trains the human spirit and transforms him towards perfection.
Aesthetics
According to Radhakrishnan, aesthetics has profound philosophical and spiritual implications, especially in the context of Indian art and culture. Radhakrishnan states that “all art is the expression of experience in some medium” (Radhakrishnan D. S., An Idealistic View of Life, 1932).
Art becomes mechanical and a repetition of previous themes without the intuitive feeling. Instead of communicating the artist’s intuitive encounter with reality, such “art” is an exercise in (re)production (Internet Encyclopedia of Philosophy (IEP), n.d.).
To Radhakrishanan, aesthetics is a synthesis of both arts and science. But still, there is some difference between them. He stated; “Poetry is the language of the soul, while prose is the language of science. The former is the language of mystery, of devotion, of religion. Prose lays bare its whole meaning to the intelligence, while poetry plunges us in the mysterium tremendum of life and suggests the truths cannot be stated” (Radhakrishnan D. S., An Idealistic View of Life, 1932).
Relevance to Public Administration
Dr. Radhakrishnan’s philosophical views are directly related to the administration and ideal system of governance.
1. Impersonal motive: Selfishness should never be the driving force behind any action. No action should be taken out of self-interest or to fulfil one’s desires. Reason teaches us that serving others is the highest goal, and reason must be used to determine what is right in every given situation. If our conscience leads us to believe something is right, we must do it while being well-equipped to handle fortune in all of its guises. We must behave impartially (Radhakrishnan D. S., Ethics of Vedanta, 1914).
2. Change orientation: Radha Krishna stated, “If the new harmony glimpsed in the moments of insight is to be achieved, the old order of habits must be renounced” (Radhakrishnan D. S., An Idealistic View of Life, 1932). Similarly, for growth and development administration should be adaptive to change.
3. Decision making: Dr. S. Radhakrishnan talked about the importance of decision-making based on intuition as well as codes.
4. Rules: Public Administration is governed by laws and codes code. Radhakrishnan freely acknowledges that established moral rules are the source of the vast majority of moral judgements.
5. Coordination: “Here we find the essence of religion, which is a synthetic realization of life. The religious man knows that everything is significant, the feeling that there is harmony underneath the conflicts and the power to realize the significance and the harmony” (Radhakrishnan D. S., An Idealistic View of Life, 1932). Similarly in Public administration harmony and coordination is important for smooth functioning.
6. Division of work: According to Dr S Radhakrishnan, knowledge acquisition is the obligation of the Brahman; protecting the weak is the duty of the Kshatriya; business and agriculture are the responsibilities of the Vaishya; and serving others is the duty of the Shudra (Radhakrishnan D. S., Bhartiya Darshan-I, 2004). This ancient principle of division of work is still relevant.
7. Science and Arts: The way Dr. Radhakrishanan viewed aesthetics as science and arts, “What the scientist does when he discovers a new law is to give a new ordering to observed facts. The artist is engaged in a similar task. He gives new meaning to our experience and organizes it differently due to his perception of subtler qualities in reality” (Radhakrishnan D. S., An Idealistic View of Life, 1932). Similarly, public administration holds art and science views. According to D. Waldo, Public Administration is art as well as science. Public administration is art because it is related to getting things done. Public administration is science as it observes, conducts research and uses data analysis for functioning.
8. The integrity of thoughts: Dr. S. Radhakrishnan emphasised on integration of both Western and Eastern ideology. Similarly in Comparative Public Administration, we compare two or more administrations and integrate the working of machinery for efficiency and effectiveness.
9. Importance of experience: Dr. S Radhakrishnan stated “Religion is a kind of life or experience. It is an insight into the nature of reality (darsana), or experience of reality (anubhava)” (Radhakrishnan S., 1927). Similarly, Personnel Administration emphasised experienced members at top-level management. Experience is necessary for the personal growth of any employee and it helps the organisation in the long term.
10. Logical knowledge: The philosophy of Dr. S. Radhakrishnan is that logical reasoning is obtained by the process of analysis and synthesis. He gave importance to logical knowledge for the working of rational systems. In the same way, public administration believes in logical reasoning and rationality.
Conclusion
It is not an unknown fact that Dr. S. Radhakrishnan has contributed immensely to the field of philosophy. His contribution in representing Indian ideology and thoughts can’t be ignored. His ideas are relevant in every other field of social sciences. When Indian ideology was considered outdated and of no relevance, his reinterpretation of the Upanishads, Bhagavad Gita, Vedas and many ancient scriptures provided a modernised view of Indian ideology. Despite the criticism from Western ideologies, he emphasized on integration of thoughts. He reinterpreted Dharma as the way of life and mode of behaving. His works in ethics emphasised making man moral through logical reasoning, intuition, experience and following codes. This shows that his work still holds relevance despite being written in the 20th century. As such, the philosophy of Radhakrishnan unfolds many responses to unsolved problems of the day. His thoughts on education facilitate policymakers to design inclusive social policies on the one hand and embrace Hinduism as a religion turns out to be the guardian of gratitude and custodian of culture.
References
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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की दार्शनिक विरासत: तत्वमीमांसा, नैतिकता, सौंदर्यशास्त्र और लोक प्रशासन में उनकी प्रासंगिकता
परिचय
एक दार्शनिक, भारत के दूसरे राष्ट्रपति और सबसे महत्वपूर्ण बात, एक महान शिक्षक डॉ. एस. राधाकृष्णन को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है । वे एक प्रख्यात विद्वान और 20वीं सदी के प्रमुख दार्शनिकों में से एक थे । सर्वपल्ली की स्नातक डिग्री की थीसिस का शीर्षक “वेदांत की नैतिकता और इसकी आध्यात्मिक पूर्व-मान्यताएं” (The Ethics of Vedanta and its Metaphysical Presuppositions) था । यह 20 साल की उम्र में प्रकाशित हुई थी और उन्हें इसके लिए बहुत प्रशंसा मिली थी । उन्होंने दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया और पूर्वी तथा पश्चिमी विचारधाराओं के बीच की खाई को पाटने का काम किया । इसके अलावा, शिक्षा, धर्म और नैतिकता में उनका योगदान तथा इन विषयों के प्रति उनका एकीकृत दृष्टिकोण आज भी प्रभाव डालता है और समाज में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए काम करने वाले लोगों को प्रेरित करता है । उनके विचारों में दार्शनिक तत्व बचपन से ही समाहित थे और समय के साथ वे और विकसित हुए । उन्होंने शोध के लिए तत्वमीमांसा (metaphysics) और धार्मिक दर्शन को चुना । उन्होंने भारतीय दर्शन और धर्म का आलोचनात्मक परीक्षण किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या जीवित है और क्या सुप्त (निष्क्रिय) है । अद्वैत वेदांत और आत्मा तथा ब्रह्म की एकता उनके तत्वमीमांसा संबंधी विचारों के केंद्र बिंदु थे । उन्होंने नैतिकता में आध्यात्मिक आधार वाले नैतिक सिद्धांतों के महत्व पर जोर दिया । उन्होंने सौंदर्य की दृष्टि से भारतीय कला और संस्कृति के आध्यात्मिक और दार्शनिक पहलुओं की सराहना की । यह लेख तत्वमीमांसा, नैतिकता और सौंदर्यशास्त्र में उनके योगदान और लोक प्रशासन के क्षेत्र में उनकी प्रासंगिकता पर केंद्रित है ।
“यह भारत की गहन आध्यात्मिकता ही है – न कि कोई महान राजनीतिक ढांचा या सामाजिक संगठन जो उसने विकसित किया है – जिसने उसे समय की मार और इतिहास की घटनाओं का सामना करने में सक्षम बनाया है ।” – डॉ. एस. राधाकृष्णन ।
डॉ. एस. राधाकृष्णन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध दार्शनिक और शिक्षाविद थे । आदर्शवादी मूल्यों में अटूट विश्वास रखने वाले डॉ. राधाकृष्णन ने दुनिया भर में भारतीय मूल्यों और विचारों का प्रतिनिधित्व किया । पश्चिमी दर्शन की एकतरफा विचारधारा के बावजूद, डॉ. राधाकृष्णन पूर्वी और पश्चिमी दोनों विचारधाराओं को एकीकृत करने में विश्वास करते थे । यह न केवल पूर्व और पश्चिम के बीच, बल्कि अन्य के बीच भी अंतर को पाटने में सामंजस्य दिखाता है । उनकी पुस्तकों, जैसे “इंडियन फिलॉसफी” (Indian Philosophy) और “द फिलॉसफी ऑफ द उपनिषद” (The Philosophy of the Upanishads) ने जटिल भारतीय दार्शनिक सिद्धांतों की सरल व्याख्या प्रस्तुत की, जिससे वे वैश्विक पाठकों के लिए अधिक समझने योग्य बन गए । उनके कार्य और विचार आज भी प्रासंगिक हैं और आज के दार्शनिकों, राजनेताओं, प्रशासकों और शोधकर्ताओं को प्रेरित करते हैं । यह पेपर डॉ. एस. राधाकृष्णन के मेटाफ़िज़िक्स (तत्वमीमांसा), नैतिकता और सौंदर्यशास्त्र के दर्शन पर प्रकाश डालता है और बताता है कि ये विचार आज के लोक प्रशासन में किस तरह उपयोगी हैं ।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का दर्शन
राधाकृष्णन का दर्शन महाभारत, भगवद्गीता, उपनिषदों और शंकर व रामानुज जैसे विचारकों से गहराई से प्रभावित था । उनका मानना था कि हिंदू धर्म के बारे में उनका विचार सार्वभौमिक है और उन्होंने पश्चिमी आलोचनाओं के खिलाफ इसका बचाव किया । उन्होंने उपनिषदों और वेदों की नई व्याख्या की और दुनिया को हिंदू धर्म की एक नई समझ दी, जो एक धर्म और जीवन जीने का तरीका, दोनों है ।
तत्वमीमांसा (Metaphysics)
वे हिंदू धर्म को एक वैज्ञानिक धर्म मानते थे जो अंतर्ज्ञान या धार्मिक अनुभवों के बजाय तथ्यों पर आधारित है । उन्होंने समझाया कि अंतर्ज्ञान ‘स्वतःसिद्ध’ (स्वयं प्रमाणित) और ‘स्वसंवेद्य’ (स्वयं सिद्ध होने वाला) प्रकार का होता है, साथ ही यह ‘स्वयं प्रकाश’ (स्वयं प्रकाशित) भी होता है । वे वेदांत के एक प्रसिद्ध समर्थक थे जिन्होंने आधुनिक दर्शकों के लिए अद्वैत वेदांत को नए सिरे से परिभाषित किया । उनके दर्शन का आधार आदर्शवाद है (किशोर, 2021) । राधाकृष्णन अद्वैत वेदांत के दृढ़ अनुयायी थे । उनके कार्यों में अद्वैत दर्शन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । उन्होंने न केवल शंकर के अद्वैत वेदांत दार्शनिक सिद्धांतों की पुनर्व्याख्या की, बल्कि आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास तथा पश्चिमी विचारधारा के नज़रिए से उन्हें नए सिरे से प्रस्तुत भी किया (शर्मा, 2020) । राधाकृष्णन के लिए, अंतर्ज्ञान अनुभव का सर्वोच्च शिखर है । अंतर्ज्ञान ‘वास्तविक’ (ब्रह्म) का सबसे व्यापक और इसलिए सबसे सच्चा अनुभव है, जो इसे परम अनुभव बनाता है । राधाकृष्णन बताते हैं कि अंतर्ज्ञान अन्य सभी प्रकार के अनुभवों का आधार है ।
राधाकृष्णन का आदर्शवाद अनुभव की दुनिया (प्रकृति) की वास्तविकता और विविधता को स्वीकार करता है, साथ ही पूरी तरह से परे ‘परम’ (ब्रह्म) की अवधारणा को भी बनाए रखता है — एक ऐसा ‘परम’ जो स्वयं (आत्मा) के समान है । हालाँकि अनुभव की दुनिया और रोज़मर्रा की चीज़ें परम वास्तविकता नहीं हैं क्योंकि वे परिवर्तन के अधीन हैं और उनमें सीमितता व अनेकता है, फिर भी उनकी उत्पत्ति और आधार ‘परम’ (ब्रह्म) में है, जो सभी सीमाओं, विविधताओं और भेदों से मुक्त (निर्गुण) है । ब्रह्म ही दुनिया और उसके रूपों का स्रोत है, लेकिन ये रूप ब्रह्म की अखंडता पर कोई असर नहीं डालते (Internet Encyclopedia of Philosophy (IEP, n.d.).
राधाकृष्णन ने माया के बारे में शंकर के उस नज़रिए में बदलाव किया, जिसके अनुसार माया को केवल एक भ्रम माना जाता था । राधाकृष्णन के अनुसार, माया का अर्थ एक कठोर वस्तुनिष्ठ आदर्शवाद (objective idealism) नहीं होना चाहिए, जिसमें दुनिया को मूल रूप से ब्रह्म से अलग माना जाता है; बल्कि माया का अर्थ, अन्य बातों के अलावा, दुनिया को असल में सही मानने की एक व्यक्तिपरक गलतफहमी है (Braue, 1985) ।
नीतिशास्त्र (Ethics)
चरित्र, यानी इच्छाशक्ति की आदत, पहले से तय नहीं होती बल्कि खुद बनाई जाती है । “कोई काम इसलिए अच्छा नहीं होता कि उसके बाहरी नतीजे क्या हैं, बल्कि इसलिए अच्छा होता है कि उसके पीछे कैसी आंतरिक इच्छा है । सदाचार होने का एक तरीका है, न कि कुछ करने का । यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे पाया जा सके, बल्कि यह इच्छाशक्ति का एक काम या अभ्यास है” (Radhakrishnan S., 1914) । उन्होंने पश्चिम में प्रचलित धर्म की अवधारणा को खारिज कर दिया और इसे जीवन जीने के एक तरीके के रूप में समझा । राधाकृष्णन का मानना है कि धर्म और नीतिशास्त्र के बीच गहरा संबंध है । धर्म धार्मिक और नैतिक कानूनों का चरम रूप है । धर्म असल में नीतिशास्त्र और धर्म का मेल है (Naravane, 1964) । नीतिशास्त्र से जुड़े अनुभवों का राधाकृष्णन पर गहरा बदलाव लाने वाला असर पड़ा । ये अनुभव समस्याओं को सुलझाने और काम करने के अलग-अलग लगने वाले तरीकों के बीच तालमेल बिठाने में मदद करते हैं ।
“जीवन के हर रूप, इंसानों के हर समूह का अपना ‘धर्म’ होता है, जो उसके अस्तित्व का नियम है । धर्म या सदाचार चीज़ों की सच्चाई के अनुरूप होना है, और अधर्म उसका विरोध है । नैतिक बुराई उस सच्चाई के साथ तालमेल न बिठा पाना है जो दुनिया को घेरे हुए है और उसे नियंत्रित करती है” (Radhakrishnan S., 1927) ।
हिंदू आदर्शवाद में उनका सुधार कर्म के नीतिशास्त्र पर आधारित है, जिसे उन्होंने भगवद गीता, सिख दर्शन और महायान बौद्ध धर्म से लिया था । उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी प्रयासों में पश्चिम की एकतरफा प्रगति और सुख-सुविधाओं को पाने पर उसके ज़ोर की आलोचना करते हुए हिंदू धर्म द्वारा बढ़ावा दिए गए स्थायी आध्यात्मिक सिद्धांतों की ओर इशारा किया । उनका यह मानना नहीं था कि पश्चिमी जीवन शैली को अपनाना ही मानवीय क्षमता का चरम है । इसलिए, उनके लिए, “आत्मा का धर्म” वह केंद्र-बिंदु है जिसके चारों ओर उनके सभी बौद्धिक प्रतिबद्धताएँ इसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं (सिंह, 1988) । इस प्रकार, उनका मानना है कि मनुष्य के जीवन में नैतिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है । यह मानवीय आत्मा को प्रशिक्षित करती है और उसे पूर्णता की ओर ले जाती है ।
सौंदर्यशास्त्र
राधाकृष्णन के अनुसार, सौंदर्यशास्त्र के गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक मायने हैं, खासकर भारतीय कला और संस्कृति के संदर्भ में । राधाकृष्णन कहते हैं कि “सभी कलाएँ किसी माध्यम में अनुभव की अभिव्यक्ति हैं” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) ।
सहज अनुभूति के बिना कला यांत्रिक और पुराने विषयों की पुनरावृत्ति बन जाती है । वास्तविकता के साथ कलाकार के सहज अनुभव को व्यक्त करने के बजाय, ऐसी “कला” केवल (पुनः) उत्पादन की एक प्रक्रिया बनकर रह जाती है (इंटरनेट इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ फिलॉसफी (IEP), बिना तारीख) ।
राधाकृष्णन के लिए, सौंदर्यशास्त्र कला और विज्ञान दोनों का मेल है । लेकिन फिर भी, उनके बीच कुछ अंतर है । उन्होंने कहा; “कविता आत्मा की भाषा है, जबकि गद्य विज्ञान की भाषा है । कविता रहस्य, भक्ति और धर्म की भाषा है । गद्य अपना पूरा अर्थ बुद्धि के सामने स्पष्ट कर देता है, जबकि कविता हमें जीवन के गहरे रहस्यों में ले जाती है और बताती है कि कुछ सच्चाइयों को शब्दों में नहीं कहा जा सकता” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) ।
लोक प्रशासन से प्रासंगिकता
डॉ. राधाकृष्णन के दार्शनिक विचार सीधे तौर पर प्रशासन और शासन की आदर्श प्रणाली से जुड़े हैं ।
1. निर्वैयक्तिक उद्देश्य: स्वार्थ कभी भी किसी कार्य के पीछे प्रेरक शक्ति नहीं होना चाहिए । कोई भी कार्य स्वार्थ या अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए । विवेक हमें सिखाता है कि दूसरों की सेवा करना सबसे बड़ा लक्ष्य है, और हर स्थिति में क्या सही है, यह तय करने के लिए विवेक का उपयोग किया जाना चाहिए । यदि हमारा अंतर्मन हमें किसी चीज़ को सही मानने के लिए प्रेरित करता है, तो हमें उसे करना चाहिए और साथ ही जीवन के हर रूप (अच्छे या बुरे) का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए । हमें निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए (राधाकृष्णन डी. एस., एथिक्स ऑफ़ वेदांत, 1914) ।
2. बदलाव के प्रति झुकाव: राधाकृष्णन ने कहा, “यदि अंतर्दृष्टि के क्षणों में दिखाई देने वाले नए सामंजस्य को प्राप्त करना है, तो आदतों की पुरानी व्यवस्था को छोड़ना होगा” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) । इसी तरह, विकास और प्रगति के लिए प्रशासन को बदलाव के अनुकूल होना चाहिए ।
3. फ़ैसला लेना: डॉ. एस. राधाकृष्णन ने अंतर्ज्ञान और नियमों, दोनों के आधार पर फ़ैसला लेने के महत्व के बारे में बात की ।
4. नियम: लोक प्रशासन कानूनों और नियमों से चलता है । राधाकृष्णन खुलकर मानते हैं कि स्थापित नैतिक नियम ही ज़्यादातर नैतिक फ़ैसलों का आधार होते हैं ।
5. समन्वय: “यहाँ हमें धर्म का सार मिलता है, जो जीवन की एक मिली-जुली समझ है । धार्मिक व्यक्ति जानता है कि हर चीज़ महत्वपूर्ण है; उसे पता होता है कि टकरावों के बीच भी तालमेल है और वह उस महत्व और तालमेल को समझने की शक्ति रखता है” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) । इसी तरह, लोक प्रशासन में भी सुचारू रूप से काम करने के लिए तालमेल और समन्वय ज़रूरी है ।
6. काम का बँटवारा: डॉ. एस. राधाकृष्णन के अनुसार, ज्ञान हासिल करना ब्राह्मण का कर्तव्य है; कमज़ोरों की रक्षा करना क्षत्रिय का कर्तव्य है; व्यापार और खेती वैश्य की ज़िम्मेदारी है; और दूसरों की सेवा करना शूद्र का कर्तव्य है (राधाकृष्णन डी. एस., भारतीय दर्शन-I, 2004) । काम के बँटवारे का यह प्राचीन सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है ।
7. विज्ञान और कला: डॉ. राधाकृष्णन ने सौंदर्यबोध को विज्ञान और कला के रूप में देखा, “जब कोई वैज्ञानिक किसी नए नियम की खोज करता है, तो वह देखी गई घटनाओं को एक नया क्रम देता है । कलाकार भी ऐसा ही काम करता है । वह हमारे अनुभव को नया अर्थ देता है और वास्तविकता के सूक्ष्म गुणों को समझने के कारण उसे अलग तरह से व्यवस्थित करता है” (राधाकृष्णन डी. एस., एन आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ़ लाइफ़, 1932) । इसी तरह, लोक प्रशासन में भी कला और विज्ञान दोनों के दृष्टिकोण शामिल हैं । डी. वाल्डो के अनुसार, लोक प्रशासन कला और विज्ञान दोनों है । लोक प्रशासन कला है क्योंकि यह काम पूरा करने से संबंधित है । लोक प्रशासन विज्ञान है क्योंकि यह काम करने के लिए निरीक्षण करता है, शोध करता है और डेटा विश्लेषण का उपयोग करता है ।
8. विचारों की एकता: डॉ. एस. राधाकृष्णन ने पश्चिमी और पूर्वी विचारधाराओं को मिलाने पर ज़ोर दिया । इसी तरह, तुलनात्मक लोक प्रशासन में, हम दो या दो से अधिक प्रशासनों की तुलना करते हैं और दक्षता और प्रभावशीलता के लिए उनके कामकाज को मिलाते हैं ।
9. अनुभव का महत्व: डॉ. एस. राधाकृष्णन ने कहा, “धर्म जीवन या अनुभव का एक प्रकार है । यह वास्तविकता की प्रकृति (दर्शन) की समझ या वास्तविकता का अनुभव (अनुभव) है” (राधाकृष्णन एस., 1927) । इसी तरह, कार्मिक प्रशासन ने शीर्ष-स्तरीय प्रबंधन में अनुभवी सदस्यों पर जोर दिया । किसी भी कर्मचारी के व्यक्तिगत विकास के लिए अनुभव आवश्यक है और यह लंबे समय में संगठन की मदद करता है ।
10. तार्किक ज्ञान: डॉ. एस. राधाकृष्णन का दर्शन यह है कि तार्किक सोच विश्लेषण और संश्लेषण की प्रक्रिया से प्राप्त होती है । उन्होंने तर्कसंगत प्रणालियों के कामकाज के लिए तार्किक ज्ञान को महत्व दिया । इसी तरह, लोक प्रशासन तार्किक सोच और तर्कसंगतता में विश्वास करता है ।
निष्कर्ष
यह कोई अज्ञात तथ्य नहीं है कि डॉ. एस. राधाकृष्णन ने दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया है । भारतीय विचारधारा और विचारों का प्रतिनिधित्व करने में उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । उनके विचार सामाजिक विज्ञान के हर दूसरे क्षेत्र में प्रासंगिक हैं। जब भारतीय विचारधारा को पुरानी और कोई प्रासंगिकता नहीं माना जाता था, तब उपनिषदों, भगवद गीता, वेदों और कई प्राचीन ग्रंथों की उनकी पुनर्व्याख्या ने भारतीय विचारधारा का एक आधुनिक दृष्टिकोण प्रदान किया । पश्चिमी विचारधाराओं की आलोचना के बावजूद उन्होंने विचारों के एकीकरण पर जोर दिया । उन्होंने धर्म को जीवन के तरीके और व्यवहार के तरीके के रूप में पुनर्व्याख्यायित किया । नैतिकता में उनके कार्यों ने तार्किक तर्क, अंतर्ज्ञान, अनुभव और नियमों का पालन के माध्यम से मनुष्य को नैतिक बनाने पर जोर दिया । इससे पता चलता है कि 20वीं सदी में लिखे जाने के बावजूद उनका काम अभी भी प्रासंगिक है। इस प्रकार, राधाकृष्णन का दर्शन आज की अनसुलझी समस्याओं के प्रति कई समाधान के उपाय प्रकट करता है । शिक्षा पर उनके विचार नीति निर्माताओं को एक ओर समावेशी सामाजिक नीतियों को डिजाइन करने की सुविधा प्रदान करते हैं और दूसरी ओर हिंदू धर्म को एक धर्म के रूप में अपनाने से कृतज्ञता के संरक्षक और संस्कृति के संरक्षक बनते हैं ।
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