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श्रीमद्भागवद्गीता अठारहम अध्याय

12 भ्यूज

ॐ श्री परमात्मने नमः !!

॥अष्टादशोऽध्यायः॥

अर्जुन उवाच ।

संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१८-१॥

अर्जुन कहलनि:

हे महाबाहु, हे हृषीकेश, हम संन्यासक सत्य तथा हे केशिनिषूदन (केशिनिक वध करनिहार – श्रीकृष्ण) ! हम त्याग केर सत्य – (एहि दुनू) केँ अलग-अलग जानय चाहैत छी ।

संन्यास आर त्याग दुनू केर मतलब त्याग अछि । (दुनूक अर्थ एक होइतो एहि मे जे किछु भेद अछि से जिज्ञासा अर्जुन कयलनि अछि ।)

केशिनि एकटा असुर छल । (जेकर वध श्रीकृष्ण कएने रहथि, तेँ केशिनिषूदन कहिकय अर्जुन हुनका एहिठाम सम्बोधन कयलनि अछि ।)

श्री भगवानुवाच ।

काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ॥
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥१८-२॥

भगवान कहलनि:

ऋषि लोकनि काम्य कर्म (कामना सहित कयल गेल कर्म) केर त्याग केँ संन्यास बुझैत छथि; बुद्धिमान लोकनि समस्त कर्मक फल केर त्याग केँ ‘त्याग’ कहैत छथि । 

काम्य: जाहि मे फल केर इच्छा (कामना) हो ।

त्याज्यं दोवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ॥
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥१८-३॥

किछु दार्शनिक (मनीषी लोकनि) कहैत छथि जे सब कर्म केँ खराब मानिकय छोड़ि देबाक चाही, जखन कि किछु अन्य (मनीषी लोकनि) कहैत छथि जे यज्ञ, दान आर तपस्या जेहेन कर्म सब केँ नहि छोड़बाक चाही । 

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ॥
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥१८-४॥

हे भरतश्रेष्ठ, त्याग केर बारे मे अन्तिम सत्य हमरा सँ सुनू । कियैक तँ त्याग तीन प्रकार केर कहल गेल अछि, हे पुरुषव्याघ्र (बाघ समान मनुष्य) !

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ॥
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥१८-५॥

यज्ञ, दान आ तप केर कर्म केँ नहि त्यागबाक चाही, बल्कि ई सब अवश्ये टा करबाक चाही; (कियैक तँ) यज्ञ, दान आ तपस्या बुद्धिमान सभक वास्ते पवित्र करयवला होइछ । 

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ॥
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥१८-६॥

मुदा हे पार्थ, इहो कर्म सब केँ आसक्ति आ ओकर फल (परिणाम) केँ छोड़िकय मात्र करबाक चाही; यैह हमर सब सँ नीक आ दृढ़ विश्वास अछि । 

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ॥
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥१८-७॥

मुदा जरूरी कर्म (नियत कर्म) सभक त्याग सही नहि अछि । भ्रम (मोह) केर कारण सँ ओकरा सब केँ छोड़नाय तामसिक कहल गेल अछि । 

कियैक तँ ई अज्ञानी सभक लेल पवित्र करयवला होइत अछि ।

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ॥
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥१८-८॥

जे शारीरिक कष्टक डर सँ कर्म केँ त्यागि दैत अछि, कियैक तँ ई कष्टदायक छैक, एहि प्रकार सँ राजसिक त्याग करैत, ओकरा ओकर फल प्राप्त नहि होइत छैक । 

फल: यानी मोक्ष, जे ज्ञानक संग सब कर्म सभक त्याग सँ उत्पन्न होइत अछि । 

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ॥
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥१८-९॥

हे अर्जुन, जखन नियत कर्म (जरूरी काज सब) केवल एहि द्वारे कयल जाइछ कियैक तँ ओकरा करबाके टा छैक, आसक्ति आ फल केँ छोड़िकय, तँ एहेन त्याग सात्त्विक मानल जाइछ । 

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ॥
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१८-१०॥

सत्व आर स्थिर समझवला (स्थिरबुद्धिवला) त्यागी, जेकर सन्देह (भ्रम, दुविधा आदि) दूर भ’ गेल छैक, ओ नहि तँ खराब कर्म सँ घृणा करैछ आ नहिये नीक कर्म मे आसक्त होइछ । 

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ॥
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥१८-११॥

कर्म सब केँ शरीरधारी जीव पूर्ण रूप सँ नहि छोड़ि सकैत अछि, मुदा जे कर्मक फल केँ छोड़ि दैत अछि, ओकरा त्यागी कहल जाइत छैक । 

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ॥
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१८-१२॥

कर्म केर तीन तरहक फल – अप्रिय (अनिष्ट), सुखद (इष्ट) आर मिलल-जुलल (मिश्र) – मृत्युक बाद त्याग नहि करयवला केँ भेटैत छैक, मुदा त्याग करयवला केँ (एना) कहियो नहि भेटैत छैक । 

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ॥
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१८-१३॥

हे महाबाहु, हमरा सँ समस्त कर्म केँ पूरा करय केर ई पाँच कारण सीखू, जेना कि ओहि ज्ञान मे कहल गेल अछि जे समस्त कर्म केर अन्त छैकः 

ज्ञान: सांख्य – शाब्दिक अर्थ, जाहि मे जानयवला सब बात सब बतायल गेल अछि, तेँ ई सब सँ पैघ ज्ञान छैक । 

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधाम् ॥
विविधाश्च पृथक् चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१८-१४॥

शरीर, कर्ता, विभिन्न इंद्रिय, विविध प्रकारक विभिन्न कार्य, आर अधिष्ठात्री (पीठासीन) देवत्व, एहि मे सँ पाँचम;

अधिष्ठात्री (पीठासीन) देवत्व: प्रत्येक इंद्रिय केर अपन देवता होइत छथि जे ओकर (ओहि इंद्रियक) अध्यक्षता करैत छथि, आर जेकर सहायता सँ ओ अपन कार्य सभक निर्वहन करैत अछि; उदाहरणक लेल, आदित्य (सूर्य) आँखि केर अधिष्ठात्री देवत्व छथि, जिनकर सहायता सँ ओ (आँखि) देखैत अछि आर कार्य करैत अछि; आर एहि तरहें अन्यान्य इंद्रिय सभक संग सेहो छैक । 

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ॥
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१८-१५॥

मनुष्य अपन शरीर, वाणी आ मन सँ जेहो कर्म करैत अछि – चाहे ओ सही हो या उल्टा – यैह पाँच ओकर कारण थिकैक ।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ॥
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥१८-१६॥

एहेन स्थिति मे, जे बिना शुद्ध समझ केँ अपन ‘स्व’ (आत्मा), ‘परम’ (पूर्णब्रह्म) केँ कर्ता (कारक) केर रूप मे देखैत अछि – ओ बिगड़ल मनवला (यथार्थतः) नहि देखि पबैत अछि ।

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ॥
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१८-१७॥

जे अहंकार केर भावना सँ मुक्त अछि, जेकरा बुद्धि पर (नीक या बेजा केर) कोनो असर नहि होइत छैक, भले ओ एहि लोक केँ मारि दियए, ओ नहि तँ मारैत अछि, आ नहिये (कर्म सब सँ) बन्हाइत अछि । 

जेकर आत्मचेतना (सेल्फ-कॉन्शसनेस), लम्बा, मजबूत (दृढ़) आर नीक जेकाँ प्रशिक्षित कयल गेल आत्म-एकाग्रता (सेल्फ-कॉन्सेंट्रेशन) केर बल पर, हमेशा ब्रह्म केर संग जुड़ल रहैत अछि, नहि कि श्लोक १४ मे कहल गेल पाँच कर्म-कारण सभक संग – जेकर आत्म-चेतना कहियो स्वयं केर शरीर, मन आ एहि तरहक चीज सभक लेल गलत नहि बुझैछ, एतय तक कि शारीरिक कर्म करैत समय सेहो – ओ हमेशा कर्मक कलंक (दाग सब सँ) मुक्त रहैत अछि । 

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ॥
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८-१८॥

ज्ञान, ज्ञेय (जानल गेल) आर परिज्ञाता (जानल जायवला), ई कर्म केर त्रिविध कारण थिक । साधन, वस्तु आर कर्ता, ई तीनू कर्म केर त्रिविध आधार थिक ।

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ॥
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१८-१९॥

सांख्य दर्शन मे ज्ञान, कर्म आर कर्ता केँ गुण सभक भेद सँ मात्र तीन प्रकारक कहल गेल अछिः तेकरा ठीक सँ सुनू । 

सांख्य: कपिल द्वारा गुण सभक विज्ञान । चूँकि सांख्य केर दृष्टि परम सत्य या वेदांत – ब्रह्म केर एकता या अद्वैत सिद्धान्त – सँ टकराव मे अछि, तैयो एतय पहिलवला (सांख्य) केर दृष्टि (नजरिया) देल गेल अछि, कियैक तँ ई गुण सभक विज्ञान केर एकटा प्रमाण (अथरिटी) छी ।

ठीक सँ: विज्ञान केर अनुसार, तर्क केर अनुसार कहल गेल अछि ।

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ॥
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥१८-२०॥

जाहि सँ एक अविनाशी तत्व सब प्राणी मे देखल जाइत अछि, अलग-अलग मे सेहो अविभाज्य रूप मे देखल जाइत अछि, ओहि ज्ञान केँ सात्विक जानू ।

अविभाज्य: बिना कोनो तरहक अन्तर (भेद) केँ; सब मे व्याप्त (सर्वव्यापक) ।

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ॥
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥१८-२१॥

मुदा जे ज्ञान सब प्राणी सब मे अलग-अलग तरह केर अलग-अलग चीज सब (एन्टिटिज) केँ एक-दोसर सँ अलग देखैत अछि, ओहि ज्ञान केँ अहाँ राजसिक जानू ।

चीज सब (एन्टिटिज): आत्मा सब ।

एक-दोसर सँ अलग: अलग-अलग शरीर सब मे अलग-अलग (आत्मा केँ देखनाय) ।

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्य सक्तमहैतुकम् ॥
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८-२२॥

जखन कि जे चीज एक्के प्रभाव (असर) धरि सीमित अछि, जेना कि वैह सब किछु हो, बिना कोनो कारण केँ, सच मे बिना कोनो आधार केँ, आर छोट-मोट (बात केर) हो – ओकरा तामसिक कहल जाइत छैक ।

एक्के प्रभाव (असर): जेना शरीर – एकरे आत्मा बुझनाय ।

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ॥
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥१८-२३॥

जे कर्म फल केर इच्छा नहि राखयवला आर आसक्ति सँ मुक्त भ’ कय बिना राग अथवा द्वेष (प्रेम अथवा घृणा) केँ करैत अछि, ओकरा सात्त्विक कहल जाइत छैक । 

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ॥
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥१८-२४॥

मुदा जे कर्म मनक चाहल इच्छा सभक संग, या अहंकार व अत्यधिक मेहनत सँ कयल जाइछ, ओकरा राजसिक कहल जाइत छैक । 

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ॥
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥१८-२५॥

ओ कर्म तामसिक मानल जाइछ जे भ्रम (मोह) मे, बिना प्रतिफल जनने, नुकसान (ताकत आर धन केर), हिन्सा (दोसर पर अत्याचार कयकेँ) एवं (अपन) योग्यता (काबिलियत) केर परवाह कयने बिना कयल जाइछ ।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ॥
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विकः उच्यते ॥१८-२६॥

जे कर्ता आसक्ति सँ मुक्त भ’, अहंकार रहित भ’, हिम्मत आ उत्साह सँ भरल हो, आर सफलता या असफलता सँ प्रभावित नहि हो, ओकरा सात्विक कहल जाइछ ।

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ॥
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥१८-२७॥

जे जोशीला, कर्म केर फल सब केँ चाहयवला, लालची, खराब, गन्दा, आसानी सँ प्रसन्न अथवा उदास होयवला, एहेन कर्ता केँ राजसिक कहल जाइत छैक । 

प्रसन्न या उदास: जाहि काज मे ओ लागल अछि, तेकर सफलता या असफलता पर । 

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ॥
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥१८-२८॥

अस्थिर, असभ्य, घमंडी, बेइमान, दुर्भावनापूर्ण, आलसी, निराश आ टालमटोल करयवला, एहेन कर्ता केँ तामसिक कहल जाइत छैक । 

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ॥
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥१८-२९॥

हे धनंजय, गुण सभक अनुसार बुद्धि आ हिम्मत केर तीन टा भेद (प्रकार) केँ सुनू, जेना कि हम ओकरा सभक बारे मे पूरापूरी आ अलग-अलग कहैत छी । 

धनंजय: धन केँ जितयवला – मानुषिक अथवा दैविक, लौकिक आ पारलौकिक, अर्जुन केर एक नाम ।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ॥
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८-३०॥

हे पार्थ, जे बुद्धि कर्म आ त्याग, सही आ गलत कर्म, भय आ निर्भयता, बंधन आ मोक्ष केर मार्ग केँ जनैत अछि, ओ बुद्धि सात्विक अछि ।

भय आ निर्भयता, बंधन आ मोक्ष: भय केर कारण आ निर्भयता केर कारण; एहि तरहें बंधन केर कारण आ मुक्ति केर कारण ।

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ॥
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥१८-३१॥

हे पार्थ, जे बुद्धि धर्म आर ओकर विपरीत केर, आर सही कर्म आ ओकर विपरीत केर सेहो गलत समझ रखैत अछि, ओ बुद्धि राजसिक अछि ।

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ॥
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धीः सा पार्थ तामसी ॥१८-३२॥

हे पार्थ, जे अंधकार मे लेपटायल (लपेटल) अछि, अधर्म केँ धर्म मानैत अछि आ सब चीज केँ गलत नजरि सँ देखैत अछि, ओ बुद्धि तामसिक अछि ।

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ॥
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८-३३॥

हे पार्थ, जाहि धैर्य सँ मन, प्राण आर इंद्रिय सभक काज नियंत्रित होइत अछि, ओ धैर्य, जे योग सँ अटल अछि, सात्विक अछि ।

यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन ॥
प्रसङ्गेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥१८-३४॥

मुदा जाहि धैर्य (धृति) सँ कियो धर्म, इच्छा आर धनक प्रति अपन मन केँ स्थिर करैत अछि, आर आसक्ति सँ हरेक केर फल चाहैत अछि, ओ धैर्य, हे पार्थ, राजसिक अछि ।

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ॥
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥१८-३५॥

हे पार्थ, जाहि धैर्य सँ मूर्ख मनुष्य नींद, भय, शोक, निराशा आर अहंकार केँ नहि छोड़ैत अछि, ओ धैर्य तामसिक अछि ।

नींद आदि केँ नहि छोड़ैछ: नींद आदि केँ बहुते बेसी आदी भ’ जाइत अछि, आर ओकरे उचित मानैत अछि । 

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ॥
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥१८-३६॥

आर आब, हे भरतर्षभ, हमरा सँ ओहि तीन प्रकार केर सुख केर बारे मे सुनू, जेकरा कियो आदति सँ आनंद उठबैत सिखैत अछि, आर जेकरा द्वारा ओ दर्द केर अन्त (परिणाम, नतीजा) धरि पहुँचैत अछि । 

यतदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ॥
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥१८-३७॥

जे सुख (आनन्द) पहिने (आरम्भ मे) जहर जेकाँ होइछ, मुदा अन्त मे अमृत जेकाँ होइछ; से सुख सात्विक कहल गेल अछि, जे आत्म-साक्षात्कार केर कारण बुद्धि केर पारदर्शी भेला सँ उत्पन्न होइत अछि ।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ॥
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥१८-३८॥

जे इंद्रिय सभक सम्पर्क सँ उत्पन्न होइछ, जे पहिने अमृत जेकाँ होइछ, मुदा अन्त मे जहर जेकाँ होइछ, ओहि सुख केँ राजसिक कहल जाइछ । 

अन्त मे जहर जेकाँः कियैक तँ एहि सँ ताकत, जोश, रंग, समझ, बुद्धि, धन आ ऊर्जा कम भ’ जाइत छैक ।

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ॥
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८-३९॥

ओ सुख जे नींद, आलस आर वहम (गलतफहमी) सँ शुरू भ’ कय स्वयं केँ धोखा दैत अछि, ओकरा तामसिक कहल गेल अछि । 

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ॥
सत्त्वं प्रकृतिर्जैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥१८-४०॥

धरती पर या फेर स्वर्ग मे सेहो देवता लोकनि मे कियो एहेन नहि छथि जे प्रकृति सँ उत्पन्न भेल एहि तीन गुण सब सँ रहित होइथ । 

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ॥
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥८-४१॥

हे शत्रु सब केँ जरौनिहार, ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्य केर संग-संग शूद्र लोकनि केँ सेहो कर्म हुनक अपन स्वभाव मात्र सँ उत्पन्न भेल गुण सभक हिसाब सँ बाँटल जाइत अछि । 

पैछला जन्म मे इच्छा, कर्म तथा संगति सँ बनल कर्म या आदति तथा प्रवृत्ति सभक हिसाब सँ, जे आइ प्रभावक रूप मे देखा रहल अछि । या, स्वभावक अर्थ एतय तीन गुण सब सँ बनल माया, यानि भगवानक प्रकृति भ’ सकैत अछि । 

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ॥
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥८-४२॥

मन आर इंद्रिय सब पर नियंत्रण, तपस्या, पवित्रता, सहनशीलता, आ ईमानदारी, ज्ञान, आत्मज्ञान, परलोक मे विश्वास – ई ब्राह्मण लोकनिक कर्तव्य थिक, जे हुनका लोकनिक अपन स्वभाव सँ उत्पन्न भेल अछि । 

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ॥
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥८-४३॥

वीरता (शौर्य), साहस (तेज), हिम्मत (धृति), फुर्ती (चपलता), आर लड़ाइ सँ नहि भगनाय, उदारता आर राज-काज क्षत्रिय सभक कर्तव्य थिक, जे (हुनका लोकनिक अपन) स्वभाव सँ उत्पन्न होइत अछि ।

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ॥
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥८-४४॥

कृषि, पशुपालन आर व्यापार वैश्य लोकनिक कर्तव्य थिक, जे (हुनका सभक अपन) प्रकृति से उत्पन्न भेल अछि; आर सेवा सँ सम्बन्धित कार्य शूद्र लोकनिक कर्तव्य थिक, जे (हुनका लोकनिक अपन) स्वभाव सँ उत्पन्न भेल अछि ।

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ॥
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यता विन्दति तच्छृणु ॥१८-४५॥

अपन कर्तव्यक प्रति समर्पित भ’ कय, मनुष्य सबसँ ऊँच पूर्णता केँ प्राप्त करैत अछि । अपन कर्तव्य मे लागल रहला सँ ओ पूर्णता केँ केना प्राप्त करैत अछि, ई सुनू ।

अपन कर्तव्य: अपन प्रकृति के अनुसारक कर्तव्य ।

आपस्तंब धर्म शास्त्र कहैत अछि: “कतेको जाति एवं वर्ण केर लोक, जे अपन-अपन कर्तव्यक प्रति समर्पित रहैत छथि, मृत्यु उपरान्त अपन कर्म केर फल भोगैत छथि, आर फेर बचल कर्म सँ श्रेष्ठ धर्म, जीवन, विद्या, आचरण, धन, सुख आर बुद्धिवला जन्म प्राप्त करैत छथि ।”

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्यं सिद्धिं विन्दति मानवः ॥१८-४६॥

जिनका सँ समस्त जीव केर उद्भव  (विकास, इवौल्यूशन) होइत अछि, जिनका सँ ई सब किछु व्याप्त अछि, अपन कर्तव्य केर संग हुनकर पूजा कयकेँ लोक पूर्णता केँ प्राप्त करैत अछि ।

भगवान केर सबसँ पैघ पूजा हुनक सबसँ नजदीक पहुँचय सँ होइछ । मायाक पर्दा, जाहि मे कर्म या आदति सब, रुचि (जाहि कर्म प्रति झुकाव होइछ) तथा कर्म सब शामिल अछि, मनुष्य केँ भगवानक समीप जाय सँ, यानि स्वयं केँ जानय सँ (आत्म-साक्षात्कार सँ) रोकैत अछि । मात्र अपन अस्तित्व (स्वयं केर होयबाक) नियमक अनुसार, अपन कर्म कयकेँ ई (मायाक) पर्दा हंटायल जा सकैत अछि आर लक्ष्य पूरा कयल जा सकैत अछि । 

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ॥
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥१८-४७॥

अपन धर्म, कोनो दोसरक बेसी नीक सँ कयल गेल धर्म सँ भले अधूरा हो, तैयो बेसी नीक होइछ । जे अपन स्वभाव (प्रकृति) सँ निर्धारित कयल गेल काज करैत अछि, ओकरा कोनो खराबी नहि होइत छैक । 

जेना कोनो विषैला चीज ओहिमे उत्पन्न भेल कीड़ा (वायरस आदि) केँ नुकसान नहि पहुँचाबैछ, तहिना जे अपन स्वधर्म करैत अछि, ओकरा कोनो खराबी नहि होइत छैक । 

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ॥
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥१८-४८॥

हे कुंतीपुत्र, जाहि कर्तव्यक लेल कियो उत्पन्न भेल अछि, से ओकरा नहि छोड़बाक चाही, भले ओहि मे खराबिये होइक; कियैक तँ सब काज खराबी सँ घेरायल (लेपटायल) होइत छैक, जेना आगि धुआँ सँ (घेरायल रहैछ) । 

कर्तव्य, आदि: एकर मतलब सिर्फ जाति केर कर्तव्य नहि अछि ।

सब कर्म: अपन आर दोसरक कर्तव्य ।

सबसँ बड़का खराबी बन्धन थिक, आर ई ताबत धरि रहैछ जाबत धरि कियो गुण सभक दायरा (घेरा) मे रहैछ, सिवाय एकटा मुक्त आत्मा केर । सब काज कोन न कोनो गुण मे शामिल होइते अछि । ताहि सँ सब काज मे बन्धन केर खराबी शामिल रहैत छैक । 

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ॥
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥१८-४९॥

जेकर बुद्धि हरेक जगह सँ अनासक्त (जुड़ल नहि) छैक, जे अपन हृदय केँ वश (काबू) मे कय लेने अछि, जेकर इच्छा सब भागि गेल अछि, ओ संन्यास सँ (त्याग कयकेँ) सबसँ पैघ सिद्धि केँ पबैत अछि, जाहि मे कर्म सब सँ मुक्ति भेटैत छैक ।

ओ संन्यास सँ… पबैत अछि: एकर मतलब इहो भ’ सकैछः ओ ओहि सब सँ पैघ अबस्था केँ पबैत अछि जाहि मे ओ सब कर्म सभक त्याग कयकेँ, बिना कर्म केँ आत्माक रूप मे रहैत अछि, जेकरा लेल ओ अपन सही ज्ञान सँ तैयार होइत अछि । 

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ॥
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥१८-५०॥

हे कुंतीपुत्र, हमरा सँ संक्षेप मे सीखू जे केना एहेन पूर्णता धरि पहुँचिकय ओ ब्रह्म केँ, ज्ञान केर सर्वोच्च पूर्णता केँ प्राप्त करैत अछि ।

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ॥
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥१८-५१॥

शुद्ध बुद्धिवला; शरीर आर इंद्रिय सब केँ हिम्मत सँ वश मे करयवला; आवाज आ दोसर इंद्रिय सभक चीज सब केँ त्यागयवला; आकर्षण आर घृणा (राग आ द्वेष) केँ छोड़यवला;

शुद्ध: सन्देह आ वहम (गलतफहमी) सँ मुक्त, ब्रह्म मे लीन भ’ कय ओहि सँ जुड़ल समस्त बाहरी गुण सब केँ खत्म कयनाय । 

आवाज आदि केँ छोड़नाय: समस्त फालतू ऐशो-आराम, सब चीज केँ छोड़ि देनाय, सिवाय ओकर जे मात्र शरीरक गुजारा वास्ते जरूरी छैक, आर ओहि चीज सभक लेल सेहो आकर्षण आ घृणा (राग आ द्वेष) छोड़ि देनाय । 

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ॥
ध्यनयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥१८-५२॥

कोनो अलग जगह पर रहनाय; खेनाय मुदा अत्यल्प खेनाय; शरीर, वाणी आर मन केँ नियंत्रण मे रखनाय; हमेशा ध्यान आर एकाग्रता मे लागल रहनाय आर वैराग्य रखनाय;

बहुत कम खेनाय: सुस्ती, नींद आर एहने-एहने चीज सब केँ दूर राखिकय विचार सभक शान्तिक लेल मददगार । 

ध्यान: आत्मा केर प्रकृति पर ।

वैराग्य: देखल आ अनदेखल चीज सभक लेल ।

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ॥
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१८-५३॥

अहंकार, शक्ति (ताकत), घमंड, वासना, क्रोध एवं सम्पत्ति आदि केँ छोड़िकय; “हमर” केर सोच सँ मुक्त अछि; तथा शान्त – ओ ब्रह्म बनबाक लायक अछि ।

शक्ति (ताकत): ओ ताकत जे लगड़पन (जोश, जुनून) आर इच्छा केँ मिलाकय बनैत अछि ।

सम्पत्ति: भले ही एक आदमी जे मन आर इंद्रिय सभक सारा लगड़पन सँ मुक्त अछि, ओकरा पास शरीर केर गुजारा आर अपन धार्मिक कर्तव्य सब (धर्म) केँ पूरा करबाक लेल आवश्यक बाहरी सम्पदा सब होइक, तैयो साधक ई सब छोड़ि दैत अछि, भले ई अपने आप होइक, कियैक तँ ओ शरीर केँ अपन नहि मानैछ; एहि तरहें ओ एकटा परमहंस परिव्राजक, सब सँ ऊँच दर्जाक संन्यासी बनि जाइत अछि । 

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ॥
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥१८-५४॥

ब्रह्म बनल, शांतचित्त (शांत मनवला), ओ नहि तँ दुःखी होइत अछि आ नहिये इच्छा करैत अछि; सब प्राणी केँ समान, ओ हमरा प्रति परम भक्ति केँ प्राप्त करैत अछि । 

ब्रह्म बनल: एकर मतलब ई नहि अछि जे ओ एखनहुँ धरि मुक्त भ’ गेल अछि आर परम (पूर्ण) बनि गेल अछि, बल्कि एहि ज्ञान मे दृढ़ अछि जे ओ ब्रह्म छी । ओकर मोक्ष केर प्राप्ति ऐगला श्लोक मे कहल गेल अछि । 

परम भक्ति: ७-१७ मे कहल गेल भक्ति ।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ॥
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥१८-५५॥

भक्ति सँ ओ हमरा असल मे जानि लैत अछि जे हम कि आ के छी; फेर हमरा वास्तव मे जानिकय, ओ तुरन्त हमरा मे प्रवेश कय जाइत अछि । 

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‌व्यपाश्रयः ॥
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥१८-५६॥

हमेशा समस्त कर्म सब केँ करैतो, हमर शरण मे रहिकय – हमर कृपा सँ ओ शाश्वत, अपरिवर्तनीय अवस्था केँ प्राप्त करैत अछि ।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ॥
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चितः सततं भव ॥१८-५७॥

मन सँ समस्त काज हमरा सौंपिकय, हमरा अपन सब सँ पैघ लक्ष्य मानिकय, बुद्धि-योग केर सहारा लयकेँ, अपन मन हमेशा हमरहि मे लगाउ ।

मच्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ॥
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनंक्ष्यसि ॥१८-५८॥

हमरा मे अपन मन लगाकय, अहाँ हमर कृपा सँ समस्त कठिनता केँ पार कय लेब; मुदा अगर अहाँ घमंड मे हमर बात नहि सुनब, त अहाँ खत्म भ’ जायब ।

यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ॥
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥१८-५९॥

अगर अहाँ घमंड मे आबिकय सोचैत छी, “हम नहि लड़ब”, त अहाँक ई सोच/निर्णय (मनसाय) बेकार अछि; अहाँक प्रकृति अहाँ केँ बाँधि देत ।

अहाँक प्रकृति: एक क्षत्रिय केर रूप मे अहाँक स्वभाव ।

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ॥
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥१८-६०॥

हे कुंतीपुत्र, अपनहिं कर्म सँ बँधायल, अहाँक अपनहि स्वभाव सँ जन्मल, मोहवश जे अहाँ नहि करय चाहैत छी, ओ अहाँ केँ अपनहि विरूद्ध भ’ कय करय पड़त । 

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ॥
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१८-६१॥

हे अर्जुन, भगवान समस्त प्राणीक हृदय मे निवास करैत छथि, आर अपन माया सँ समस्त प्राणी केँ (मानू) कोनो मशीन उपर बैसाकय घुमबैत छथि ।

९-१० पर टिप्पणी देखू ।

अर्जुन केर अर्थ अछि “श्वेत”, आर एतय एकर अर्थ अछि – “हे शुद्ध हृदयवला” ।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ॥
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥१८-६२॥

हे भारत (भरतवंशी), पूरा हृदय सँ हुनकर शरण मे जाउ; हुनकर कृपा सँ अहाँ केँ परम शांति (आर) शाश्वत धाम भेटत ।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद् गुह्यतरं मया ॥
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥१८-६३॥

एहि तरहें हम अहाँ केँ सबसँ गहींरो सँ बेसी गहींर ज्ञान बतेलहुँ अछि; एहि पर पूरा नीक जेकाँ सोचिकय, जेना चाहू तेना करू । 

एहिपर: शास्त्र, उपर बतायल गेल शिक्षा ।

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ॥
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥१८-६४॥

अहाँ फेर सँ हमर सबसँ पैघ बात सुनू, जे सबसँ गहींर अछि; चूँकि अहाँ हमर अत्यधिक प्रिय छी, तेँ हम वैह कहब जे अहाँ लेल नीक होयत । 

फेर सँ: चूँकि एक सँ अधिक बेर (कइएक बेर) कहल गेल अछि ।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ॥
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥१८-६५॥

अपन मन हमरा मे लगाउ, हमरा मे भक्ति केर संग समर्पित भ’ जाउ, सम्पूर्ण बलिदान हमरा लेल करू, हमरा प्रणाम करू । अहाँ हमरा धरि पहुँचब; हम अहाँ सँ सत्य वादा करैत छी (वचन दैत छी), (कियैक तँ) अहाँ हमरा प्रिय छी । 

अहाँ हमरा धरि पहुँचब: एहि तरहें काज करैत, यानि केवल भगवान केँ अपन लक्ष्य, साधन आ मंजिल (अन्तिम गन्तव्यस्थान) मानैत – अहाँ सब सँ ऊँच स्थान केँ प्राप्त करब । 

हम अहाँ सँ सत्य वादा करैत छी (वचन दैत छी): हम भगवान केर बात पर पूरा भरोसा राखू, कियैक तँ हम अहाँ केँ अपन सत्य बतबैत छी । 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ॥
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥१८-६६॥

सब धर्म केँ छोड़िकय मात्र हमर शरण मे आउ; हम अहाँ केँ समस्त पाप सँ मुक्त कय देब; शोक जुनि करू (दुःखी जुनि होउ) । 

सब धर्म: अधर्म सहित: सब काज, नीक या बेजा, कियैक तँ एतय सब कर्मक बंधन सँ पूर्णतया मुक्ति सिखेबाक उद्देश्य अछि । 

मात्र हमर शरण मे आउ: ई जनैत जे हमरा अलावा किछु नहि अछि, जे सभक आत्मा छी, आर सब मे एक जेकाँ रहैत छी । 

अहाँ केँ मुक्त कय देब: हम अपन आत्मा केँ अहाँक आत्माक रूप मे प्रकट कयकेँ ।

समस्त पाप: धर्म आर अधर्म केर सब बंधन ।

शंकर अपन भाष्य (टिप्पणी) मे एहिठाम ओहेन लोकक राय (मत) केँ बड़ा जोरदार विरोध करैत छथि जे मानैत अछि जे सबसँ ऊँच आध्यात्मिक उपलब्धि (ज्ञान) आर कर्मकांड (कर्म) एक्के व्यक्ति मे एक संग रहि सकैत अछि । कियैक तँ कर्म केवल सापेक्षिक (सम्बन्धित) दुनिया (संसार) टा मे संभव अछि, जे अज्ञानता केर परिणाम थिक; आर ज्ञान एहि अज्ञानता केँ दूर करैत अछि । तँ नहि त ज्ञान आर कर्म केर मेल (संयोग) सँ, आर नहिये अकेले कर्म सँ संसार सँ पूर्णतया मुक्ति भेटैत अछि, बल्कि केवल स्वयं (आत्मा) केर सत्य ज्ञान मात्र एना करैत अछि ।

हमर नोट: आब अर्जुन सँ साझा कयल जा रहल निष्कर्ष वाला भाग (उपसंहार) केँ बुझय जाय हम सब ।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ॥
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥१८-६७॥

ई बात अहाँ केँ कखनहुँ एहेन लोक सँ नहि कहबाक अछि जे तपस्या या भक्ति सँ रहित हो, नहिये एहेन लोक सँ जे सेवा नहि करैत हो, आ न एहेन व्यक्ति सँ जे हमर बुराइ करैत हो । 

ई: शास्त्र जे अहाँ केँ सिखायल गेल अछि ।

सेवा: गुरुक प्रति, अशुश्रूषवे केर अर्थ इहो छैक – ओकरा जे सुनय नहि चाहैत अछि ।

य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ॥
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥१८-६८॥

जे हमरा मे परम भक्तिक संग हमर भक्त सब केँ ई गहींर दर्शन (फिलॉसफी) सिखाओत, से बिना कोनो सन्देह केँ केवल हमरहि लग आओत ।

सिखाओत: एहि विश्वासक संग जे ओ एहि तरहें भगवान केर, सबसँ पैघ गुरु केर सेवा कय रहल अछि । 

बिना सन्देह केँ: या, सन्देह सँ मुक्त ।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ॥
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥१८-६९॥

नहि तँ मनुष्य मे कियो एहेन अछि जे हमर सेवा करयवला सँ बढ़िकय प्रिय अछि, आर नहिये पृथ्वी पर कियो दोसर हमरा लेल ओकरा सँ बढ़िकय प्रिय होयत । 

ओकरा: जे योग्य व्यक्ति केँ शास्त्र सौंपैत अछि ।

अधयेष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ॥
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥१८-७०॥

आर जे हमर एहि पवित्र संवाद केँ पढ़त, ओकरा द्वारा ज्ञान यज्ञ सँ हमर पूजा भ’ जायत; एहेन हमर माननाय अछि ।

ज्ञान यज्ञ: यज्ञ चारि तरीका सँ कयल जा सकैत अछि, जेना (१) विधि या रिचुअल, (२) जप, (३) उपांशु, या मद्धिम स्वर (धीमा आवाज) मे कयल गेल प्रार्थना, या (४) मनसा या मन सँ कयल गेल प्रार्थना । ज्ञान-यज्ञ, मनसा केर तहत अबैत अछि, आर तेँ ई सब सँ ऊँच अछि । 

गीता पढ़ला सँ ज्ञान यज्ञ केर बराबर प्रभाव (असर) होयत ।

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ॥
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥१८-७१॥

आर जे आदमी श्रद्धा सँ भरल आर द्वेष सँ मुक्त भ’ कय एकरा सुनैत अछि, ओहो मुक्त भ’ कय नीक कर्म करयवला सभक सुखी संसार (लोक) केँ प्राप्त करत । 

ओहो आदमी: आरो बेसी जे सिद्धान्त केँ बुझैत अछि । 

हमर नोट: एहि शास्त्र सब केँ पढ़नाय-सिखनाय आर एकर ज्ञान केँ योग्य लोक सभक संग साझा करबाक गंभीरता केँ बुझय जाय । एहि सँ आगाँ, आब हम सब किछु अलग देखब, श्री कृष्ण अर्जुन सँ किछु सवाल पुछथिन, तहिना हमहुँ सब (स्वयं) सँ पुछब ।

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ॥
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥१८-७२॥

हे पार्थ, कि अहाँ एकरा ध्यानपूर्वक सुनलहुँ अछि ? हे धनंजय, कि अहाँक अज्ञान रूपी भ्रम नष्ट भ’ गेल ?

अर्जुन उवाच ।

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ॥
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥१८-७३॥

अर्जुन कहलनि:

हे अच्युत, हमर भ्रम (मोह) नष्ट भ’ गेल अछि आर अपनेक कृपा सँ हमरा स्मृति प्राप्त भ’ गेल अछि । हम दृढ़ छी; हमर सन्देह दूर भ’ गेल । हम अपनेक वचन केँ मानब । 

स्मृति: स्वयं केर वास्तविक स्वरूप केर ।

दृढ़: अहाँक आज्ञा (निर्देश) मे ।

शास्त्र सभक ज्ञान केर उद्देश्य सन्देह आर भ्रम केर विनाश व स्वयं केर वास्तविक प्रकृतिक पहिचान होइछ । एतय अर्जुन केर उत्तर निर्णायक रूप सँ दर्शाबैत अछि जे हुनकर उद्देश्य पूरा भ’ गेलन्हि । 

शास्त्र केर शिक्षा एहिठाम अछि । बाकी त बस एकरा मुख्य कथा सँ जोड़ब अछि ।

सञ्जय उवाच ।

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥१८-७४॥

संजय कहलनि:

एहि प्रकारे हम वासुदेव आर महात्मा पार्थ केर बीच ई अद्भुत संवाद सुनलहुँ, जाहि सँ हमर रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेल अछि । 

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानिमं गुह्यमहं परम् ॥
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥१८-७५॥

व्यास केर कृपा सँ हम एहि सब सँ ऊँच आ सबसँ गहींर योग केँ सीधे योगेश्वर (योग केर भगवान) श्रीकृष्ण सँ सुनलहुँ अछि, जे स्वयं ई बता रहल छलथि । 

व्यास केर कृपा सँ: दिव्य चक्षु या दिव्य दृष्टि पाबिकय ।

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ॥
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥१८-७६॥

हे राजन, जखन हम केशव आ अर्जुन केर बीच भेल ई अद्भुत एवं पवित्र संवाद केँ याद करैत छी, त हम बेर-बेर आनन्दित होइत छी ।

राजा: धृतराष्ट्र

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ॥
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥१८-७७॥

आर जेना-जेना हम हरि केर ओहि सबसँ अद्भुत रूप केँ याद करैत छी, हे राजन, हमरा बहुत आश्चर्य होइत अछि; आर हम बेर-बेर प्रसन्न होइत छी । 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ॥
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८-७८॥

जेतय कतहु योगेश्वर (योग केर भगवान) कृष्ण छथि, जेतय कतहु धनुर्धर (धनुष चलबयवला) पार्थ छथि, ओतय श्री (समृद्धि, खुशियाली), विजय (जीत), विस्तार (तरक्की) आर सुनीति (बढियाँ नीति) अछि; एहेन हमर मत (माननाय) अछि । 

धनुष: जेकरा गांडीव कहैत छैक ।

इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥

Thus in the Srimad-Bhagavad-Gita, the Essence of the Upanishads, the Science of the Brahman, the Scripture of Yoga, the Dialogue between Sri Krishna and Arjuna, ends the eighteenth chapter, designated, 

The Way of Liberation in Renunciation. 

Here the Bhagavad Gita ends.

हरिः हरः!!

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