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पूज्य गुरुदेव केँ सदिखन मन आ स्मृति मे राखू – कल्याण सुनिश्चित अछि

110 भ्यूज

हुनका कहियो नहि बिसरू

विद्या बिना मानव पशु समान होइछ । विद्यालयक महत्व जीवन मे सर्वोपरि कहू । जन्म उपरान्त पारिवारिक पालन-पोषण मे सेहो विद्यारम्भ होइछ, मुदा औपचारिक विद्यार्जनक लेल ‘पाठशाला’ (विद्यालय) केर परिकल्पना अनुरूप मानव संसार चलि रहल अछि ।

विद्यालय मे अनेकों शिक्षक सँ विद्यार्थी विद्यार्जन करैछ । समस्त विद्याक महत्व ओतबे उच्च होइछ, तथापि गोटेक शिक्षक एहेन भेटैत छथि जिनकर विशेष कृपा सँ मात्र हम सब अपन जीवन मे कोनो तरहक विशेष विद्या हासिल कय पबैत छी ।

आइ हम फेर अपन गुरुदेव नित्यस्मरणीय रत्नेश्वर नारायण चौधरी केँ स्मरण मे किछु उक्ति उद्धृत करय चाहब । महाकवि तुलसीदास रचित रामायणक प्रथम सोपान ‘मंगलाचरण’ केर ओहि कथ्य केँ सर्वप्रथम मोन पाड़ैत छी –

श्रीगुरु-पद-नख मनि-गन-जोती। सुमिरत दिव्य-दृष्टि हिय होती।
दलन मोह-तम सासु प्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥

श्रीगुरु महाराज केर चरण-नख केर प्रकाश समूह मणिक प्रकाश होइछ, जेकरा स्मरण कयला सँ हृदय मे दिव्य दृष्टि उत्पन्न होइछ । ओ अज्ञान रूपी अन्धकार केँ नाश करबाक लेल सूर्यक प्रकाश थिक । जेकर हृदय मे ई प्रकाश आबि जाय ओकर भाग्य बड़ पैघ छैक ।

हमर आध्यात्मिक गुरुदेवक कथन छन्हि जे रामचरितमानसक एक-एक कथ्य ‘सिद्धतथ्य’ होइछ । कियो एहि सँ असहमत नहि होयब जे बात गुरुक महत्व केँ बुझबैत, हुनक चरण-नखक ज्योतिक उपमा दैत, हृदय मे दिव्यदृष्टि उत्पन्न हेबाक दावी करैत तुलसीदास रामचरितमानस मे लिखलनि अछि ।

हम रहियैक गोली खेलाइत । उड़ाँत छौंड़ा । माय-बाबूक पाँज सँ बाहर । निडर आ बदमाशो । ताहि समय गुरुदेव नहि जानि कतय सँ अयलाह आ ढेमफुल के १०-१२ के जुम दाहिना हाथक आंगुर मे सेट कय केँ एक्के टा गोटी कोहुना घुच्ची मे पैसि जाइक ताहि जोगाड़ मे पूरा माथा लगाकय चलि रहल छलियैक । बुझू । कतय हमर ध्यान रहल हेतैक । आ कि एम्हर पाछाँ सऽ कपड़ा केँ गसियाकय पकड़ि मास्टरसाहेब चाचा सीधे उपर उठेलनि आ तड़ाक्-तड़ाक् दुइ चमेटा मारिकय नीचाँ पटकि, बाँहि धेने, अपने हाँफैत आ हमरा घिसियाबैत अंगनाक कोन्टा तक लय गेलाह ।

चिकरिकय कहलखिन, “भौजी, भौजी छी ? आइ अहाँक बेटा कियोट-टोली पहुँचि गोली खेलाइत छल । एकरा बड मारि मारलहुँ हम ।”

माँ ओम्हर सँ आवाज देलकैक, “मारू जैनपिट्टा केँ, हेहर भ’ गेल अछि । बापक बात एकटा नहि सुनैत अछि । दिन भैर बौआइत रहैत अछि, गोली त बुझू एकरा बेरबाद कय देने छैक ।”

बाप रे ! ततेक सुनिकय हुनकर ‘ब्लड प्रेशर’ आर बढ़ि गेलनि । बगले मे निर्भय बाबाक बाड़ीक टाट सँ करची खींचिकय एक करची मारलनि, आ कि छुल्ल सऽ… । आ तेकर बाद त ओ छौंकी देह पर ताबत धरि चलल जाबत धरि टूटैत-टूटैत कनि टा ठुठ्ठी हुनकर हाथ मे बचि गेलनि ।

लेकिन वैह गुर खेने आ कान छेदेने – आब त मास्टरसाहेब सँ छीह काटय लगलहुँ । जीवन मे केकरो सँ डर नहि हुअय, धरि मास्टरसाहेबक छाँहो देखिकय थरथर काँपय लागी ।

“कल से तुम गणित और विज्ञान लेकर मेरे घर पर पढ़ने आना । और खबरदार कि अपन मुहल्ले से बाहर कहीं गये खेलने । कोई कह देगा तो छोड़ेंगे नहीं । समझा ?”

समझा त एहेन समझा कि फेर नै समझने का बाते नै रहा । सातमा मे पढ़ैत रही । १९८३ ई. । जखन दसमा के बोर्ड परीक्षाक समय आयल त मास्टरसाहेब एक बेर मात्र बजलाह – “जो, तोरो फर्स्ट डिविजन भेटि जेतौक ।”

बन्धुगण – वैह फर्स्ट डिविजन वला डिग्री आइ धरि काज आबि रहल अछि ।

विद्यार्थी होइ या कोनो उमेर के लोक होइ, गुरुदेवक स्मृति सँ जीवन केँ नित्य मंजन करैत रहू, शारीरिक गन्दगी जेना साफ होइछ स्नान-शौचादि सँ, तहिना मानसिक गन्दगी संग-संग मस्तिष्कक भोथ गति मे सुधार अबैछ गुरु-स्मरण सँ । हुनका कहियो नहि बिसरू जिनकर सिखेला सँ संसारक सही बोध भेटल ।

गुरु गोविन्दु दोउ मिले – काको लागूँ पाउँ । – स्वाभाविक उत्तर छैक जे गुरु केँ । गुरुदेव केँ बेर-बेर प्रणाम !!

हरिः हरः!!

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