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जनकपुर साहित्य, कला तथा अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव २०८२ – फागुन ५ सँ ८ गते जनकपुरधाम मे

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जनकपुरधाम साहित्य, कला तथा अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव २०८२
फागुन ५ सँ ८ गते २०८२ साल – कुल चारि दिनक भाषा-साहित्य, संस्कृति, अर्थ, कला, पर्यावरण संग मिथिलाक अद्भुत रंग-परम्पराक अन्तर्राष्ट्रीय महोत्सव केर घोषणा कयल गेल अछि । विदित हो जे पराम्बा जानकी “मैथिली” केर अंगना मे प्रत्येक दुइ वर्ष पर एहेन महाकुम्भक आयोजना कयल जाइछ । मैथिली विकास कोष, जनकपुरधाम केर तत्त्वावधान मे एहेन आयोजना मैथिली भाषा-साहित्य एवं मिथिला संस्कृति-सभ्यताक समकालीन स्थिति मे सब सँ पैघ आयोजन मानल जाइछ ।
हालांकि मैथिल पहिचानधारी मानुसमंडल मे अपन भाषा-साहित्य प्रति देरिये सँ सही मुदा जागरुकता बढ़ैत देखल जा रहल अछि, विगत डेढ़ दशक मे ई यात्रा आब मिथिलाभूमि मे गोटेक-आधेक मुदा प्रवासक क्षेत्र मे आर बेसी देखल जा रहल अछि । आइ मिथिला कल्चरल सोसाइटी यूके हो, मिथिला-मैथिली सँ जुड़ल विभिन्न आयोजक एटलान्टा (अमेरिका) या न्यूयोर्क या वाशिंगटन हो, भारतीय महानगर-उपमहानगरक अनेकों प्रभाग हो, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भारत (दिल्ली व आसपास) हो, भारतक प्राचीन राजधानी कोलकाता या आसामक गुआहाटी व झारखंड संग बिहारक अनेकों भूभाग हो – मैथिलीभाषी अपन भाषा व साहित्यक डंका बजबैत देखाय लगला अछि ।
समस्या एखनहुँ धरि यैह छैक जे भाषा-साहित्यक महत्ता सामान्यजन मे स्थान नहि पाबि सकल अछि, तथापि गोटेक-आधेक स्थान पर जनसामान्य मात्र केँ जोड़ल जेबाक सिद्धान्त अनुरूप मैथिलीक झंडा सातमा आसमान मे फहराय लागल अछि । एखन एहि तरहक आयोजन मे विराटनगर आ जनकपुर केर अतिरिक्त नेपालक आरो किछु स्थान सब पर, विद्यालय स्तर पर, टोल आ मोहल्ला धरि जमीनी स्तर पर मैथिलीक झंडा फहरायल जाय लागल अछि ।
समस्या इहो छैक जे एलिट्स द्वारा मास (बहुलजन) धरि पहुँचबाक जहमत (कोशिश) नहि कयल जा रहल छैक, कारण आपस्वार्थहि दुनिया पागल रहला पर ‘के केकरा पूछत आ केकरा लग एतेक समय छैक’ वला सिद्धान्त सर्वोपरि रहबाक दुरुह बेरा मे केकरो अपना छोड़ि दोसर सँ सरोकार नहि, ताहि पर सँ आडम्बरी प्रदर्शन व स्वनामक भूख, आत्मकामी स्वभाव आ ‘तूँ के होइ छँ, तूँ के रौ, तोरा सँ हम कि रौ’ वाली कहावत सरेआम चरितार्थक समय मे मैथिलीक महत्वपूर्ण पक्ष सँ जनसामान्य कटले-कटल अबस्था मे अछि । परञ्च, आब आर बेसी समय नहि जखन मास केर सब्जेक्ट मे मातृभाषाक महत्व रहत, कारण एलिट्स मे बहुलजन अपन सन्तान आ परिवारक भाषा फैशन मे चूर भ’ बदलि लेलक, बदलइये मे अपन प्रतिष्ठाक गुमान बुझैत अछि ।
आउ जनकपुर दिश
उपरोक्त महाकुम्भक आयोजन ‘मैथिली विकास कोष’ द्वारा होयत से घोषणा सामाजिक संजाल मे कय देल गेल अछि । आगामी माह फरवरी मे ई चारि दिनक आयोजन मे दर्जनों सत्र विमर्श पर केन्द्रित रहत । राति रंगीन होयत से एक सँ बढ़िकय एक दिग्गज कलाकार सभक प्रस्तुति सँ । दिन संगीन होयत से रंगकर्मक अन्तर्राष्ट्रीय रूप केर प्रदर्शन सँ, जाहि मे मैथिली सेहो अपन प्रखर छटा बिखेरत ।
विद्वान् सब पहिने जुटल करथि जनक दरबार मे । अष्टावक्रक पिता केँ शास्त्रार्थ मे हारिक सामना करय पड़ल छलन्हि । पुत्र अष्टावक्र भले आठ ठाम सँ शारीरिक तौर पर टेढ़ रहथि, वक्र रहथि, मुदा बौद्धिक स्तर पर विलक्षण योग्यता सँ पूर्ण रहथि । ओ अयला जनकपुर । देखिते कियो हँसि देलखिन । बस, फेर कि छल । देखबय लगला अपन छटा । आर, होइत होइत स्वयं विदेहराज तक हुनका गुरु मानि सम्मान सँ परिपूर्ण कय देलनि ।
त, एहु बेर तेहने होयबला अछि । हालांकि विषय चयन आ तदनुसारक वक्ता सभक बारे जनकपुर मे बड मारामारी भेल करैत अछि, राजनीतिक ‘समावेशिकता’ केर खानापूर्ति मानू नेपालक नवका फैशन विगत दुइ दशकक राजनीतिक क्रान्तिक विलक्षण देन केँ पूरा करय लेल हमरा लोकनिक सामाजिक अगुआ सब बड बेहाल देखाइत छथि । ताहि मे कहियो-कभार मधुसूदन केँ महिषासुरसूदन बना देल जाइछ, आ महिषासुरमर्दिनी केँ मधुमर्दिनी बना देल जाइछ । आर एहि मे जे ‘चार्मिंग-एलार्मिंग’ विमर्श होबक चाही, जेकर प्रासंगिकता समाज मे स्थापित होयबाक चाही, से ढेर बुधियारी मे नहि भ’ पबैछ । उम्मीद अछि, हम सब अपन कमी-कमजोरी आ गलती सब सँ सिखैत आगू बढ़ब एहि बेर ।
अस्तु, हम एहि चारि दिवस मे गोटेक दिवस अपन रुचि सँ उपस्थित रहबे टा करब । बाकी जानकी पराम्बा स्वयं जनती !
हरिः हरः!!

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