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सनातनी शिक्षाक अभाव सौं अपन परंपरा आ सभ्य सांस्कृतिक पतन भए रहल अछि

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लेख विचार

प्रेषित : रिंकू झा

श्रोत : लेखनीक धार”, वृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि, दहेज मुक्त मिथिला समूह।

विषय:—पाश्चात्य संस्कृति आ सभ्यता दिसि आकर्षित होईत एखन के युवा…… भविष्य मे एकर परिणाम और दुष्परिणाम।

कोनो भी समाज के पहचान ओहि समाज के संस्कृति आर सभ्यता स होई छै।भारत अपन सभ्यता आर संस्कृति के लेल समस्त विश्व मे पुज्यनिय आर विख्यात अछि। धैर हमरा ई कहैत कनियो संदेह नहीं भ रहल अछि की स्वयं भारतीय अपना संस्कृति स दूर भ रहल छैथ। पाश्चात्य संस्कृति के चकाचौंध मे दिन -प्रतीदिन अपना संस्कृति स दूर भागि रहल छैथ। त्याग, समर्पण, क्षमा, दया,संयम,सत्य अहिंसा आर धर्म भारत के संस्कृति आई ई सब कतौ ने कतौ किताब आर कहानी मे गुम भ रहल अछि।
आधुनिक युग मे युवा पीढ़ी सब पाश्चात्य संस्कृति स बेशी प्रभावित भ रहल छैथ। अपना संस्कृति, सभ्यता आर मान्यता स जेना मोह नहीं रहि गेल छैन्ह। परिणाम स्वरूप युवा पीढ़ी सब रास्ता भटैक रहल छैथ।सहनशीलता लेश मात्र नहीं रही गेल छैन्ह।पैघ -छोट के सम्मान करब, अपना रीति -रिवाज स जूड़ल रहब,पावैन -तिहार मनाऐब,आदि सब बिसैर रहल छैथ। सामाजिक अस्तित्व जेना मिट रहल अछी। भारतीय खानपान आर वेषभूषा के छोड़ी पश्चिमी रहन -सहन के अपना रहल छैथ। ओना आधुनिक होवय मे कोनो खराबी नहीं छै।समय के संग बदलाव जरूरी छै। तखनहि त समाज के तरक्की होएत धैर अपना परंपरा के छोड़ी दोसर के संस्कृति मे पुर्ण रुपे ढली जाएब ई उचित नहि। अहि स भारत के पहचान मिटा जैत। कोनो  चीज मे संतुलन बनाए के चलब तखनहि त समाज आर देश के विकास संभव अछि। ओना युवा पीढ़ी के भटकय मे एकल परिवार सेहो जिम्मेदार अछि।वुजुर्ग के छाया किनको उपर रहि नहीं गेल।आजूक युग भौतिक युग भ चुकल अछि मनुष्य के ज़रुरत बढैत जा रहल छै।सुख -सुविधा आर ऐशो -आराम के जिनगी के चक्कर मे युवा पीढ़ी सब सदैव तनाव आर गुस्सा स विचलित रहय छैथ। अंग्रेजी माध्यम के शीक्षा प्राप्त करब,घर स दूर रहि पढाई करब, प्रतियोगता के टेंशन,पैघ शहर आर विदेश मे नौकरी करब ई सब पाश्चात्य सभ्यता के तरफ झुकावय छै,आर अपना संस्कृति स दूर होबय लेल मजबूर रहय छैथ युवा पीढ़ी। अहि सब मे मोबाइल, इंटरनेट, टीबी यानी सोशल मीडिया अहम भूमिका निभावैत अछि। आधुनिक चकाचौंध मे युवा पीढ़ी सब अपन संस्कार विसैर रहल छैथ।एकरे असर अछि कि युवा पीढ़ी मे विवाह के बाद तुरंत तलाक, माय -बाप के वृद्धाश्रम मे छोड़ब,कम उम्र मे नशा के सेवन, लीभईन रिलेशनशिप मे रहब, क्रिया,कर्म नहीं करब, धर्म नहीं मानब, आदि बढि रहल अछी समाज मे। नैतिक मूल्य के पतन भ रहल अछि। मानवता कराहि रहल अछी।एक,दोशरक संग कोनो लगाव नहीं रही गेल छैन्ह।वश अपना स्वार्थ के सिद्ध करय मे लागल रहय छैथ सब। संबंध केर नाम पर देखावा रहि गेल छैन्ह।लोक -लाज के ताख पर राखी देने छथिन। आधुनिक होवय के नाम पर प्रदर्शन आर फुहरपन रहि गेल छैन्ह संस्कार मे।जे समाज के लेल कदापि उचित नहि अछि।हम ई नहीं कहि सकय छि कि पुरा समाज अहि स लिप्त छैथ कदापि नहीं कारण निक -बेजाए सब जगह रहय छै।धैर एकटा पैघ तबका अहि में फसल जा रहल छैथ। ओना युवा पीढ़ी पर पुर्ण रुपे दोषारोपण करब उचित नहीं होयत कारण अहि के लेल हम आहां सेहो जिम्मेदार छी। पाश्चात्य सभ्यता स किछु निक सेहो भेल समाज के।नव तकनीकी आर औधौगिकरण अहि के देन अछि। बहुत रास अवगुण जेना कि लैंगिक भेदभाव, विधवा विवाह,घुंघट प्रथा आदि अहि स दूर भेल अछी।

अभिभावक आर शिक्षक के संग समस्त समाज के जिम्मेदारी अछि कि युवा पीढ़ी के अपना संस्कृति स जोड़ी क राखी। बच्चे स धर्म आर आध्यात्म के पाठ पढाबी, सही -गलत के पथ देखावि जाहि स ओ अपना संस्कृति स जुरल रहैथ आर आधुनिकता के अपनावैत आगु बढ़थि ।

 

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