लेख विचार
प्रेषित: कीर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय : परिवार मे असगर नारी कतेक सहज आ असहज
इ एकटा अजीब विडम्बना छैक जे अपन सभक समाज में जँ कियो नीक काज करैत छैथि तऽ ओकर श्रेय पुरूष के देल जाइत छैक आ कोनो काज जँ खराब भऽ गेल तऽ सभटा दोष घरक स्त्रीगण पर। ओकरा घरक स्त्रीगण सभ नीक नहिं छैक तेँ ओकरा ओतय लोक जाए नहिं चाहैत छैक, फलामा बाबू तऽ अपने बेचारे बड्ड नीक लोक मुदा कनियाँ बड्ड कलामी छथिन्ह आ एकर सभ सँ पैघ कारण छैक जे अपन सभक समाज पुरूष प्रधान होयवाक कारणे पुरूष के दोष के झांपैत सभटा स्त्रीगण दिस हस्तांतरित कऽ दैत छथिन्ह। दहेज प्रथा के लेल सेहो आब स्त्रीगण के बेसी दोषी मानल जाइत छैक जे बरक बाप तऽ गाय छथिन्ह मुदा बरक माय के विषय मे पूछू जुनि आ एहि संदर्भ सेहो सभटा दोषारोपण स्त्रीगण पर कऽ दैत छथिन्ह। आब तऽ स्त्री शिक्षा बढलैक अछि मुदा जे स्त्रीगण कम पढल लिखि कऽ कुशल गृहणी छैथि, हुनका इ ताना बेसी काल सुनय पड़ैत छैन्ह जे अहाँ भरि दिन करिते की छी? कमा कऽ हम अनैत छी…….. जखन कि इ बात पूर्णतः गलत छियैइ, पुरूष कतबो कमाइथ मुदा ओकरा नीक जकाँ खर्च स्त्रीगण करैत छैथि। घरबला के अतिरिक्त अपन धिया पूता के नखरा के हुनका उठवय पड़ैत छैन्ह। बेटा विशेष कऽ कपड़ा लत्ता खोलि कऽ घर मे एम्हर ओम्हर फेकि दैत अछि आ माय ओकर सभटा के सम्हारि कऽ रखैत छैथि। धिया पूता के समग्र विकास मे स्त्रीगणकेँ भूमिका पुरूष के अपेक्षा बेसी होइत छैक। आधुनिक काल मे स्त्रीगण अपन घरक संग संग कार्यालयक भार सेहो वहन करैत छैथि एकर उपरान्तो जँ बच्चा सुधरि गेल तऽ एकर श्रेय ओकर पिता के जाइत छैक मुदा एकर विपरीत जँ बच्चा नहि सुधारल तऽ दोषारोपण सभ सँ बेसी माय के उपर जाइत छैक। एकर अतिरिक्त संयुक्त परिवार के समाप्त होयवाक मुख्य कारण स्त्रीगण के मानल जाइत छैक। भैयारी में झंझट, माय बाप सँ दूरी के मुख्य कारण स्त्रीगण पर थोपि देल जाइत छैक मुदा वास्तविकता किछु आओर रहैत छैक। ब्यवहार के मामला मे स्त्रीगण पुरूष सँ बेसी ब्यवहारिक होइत छैथि।भरल पूरल परिवार स्त्रीगण के मुख्य उद्येश्य होइत छैन्ह मुदा दोषारोपण सँ ओ पूर्ण रूप सँ आरोपित रहैत छैथि। आदिकाल मे सेहो कलंक सीता के लगेबाक प्रयास भेल छल राम पर नहिं।
अन्त मे येएह जे आन परिवार के संस्कार में पालित स्त्री दोसर संस्कार में प्रवेश कयलाक उपरान्तो ओकरा स्वीकार करैत छैथि, नव सदस्य के स्वीकारि घर के मन्दिर बनबैत छैथि, इ काज स्त्रीगणे द्वारा संभव।
