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मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड पाँचम अध्यायः सूर्पनखाक नाक-कान काटल जायब आ खर-दूषणक बध

1020 भ्यूज

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अरण्यकाण्ड – अध्याय पाँच

सूर्पनखाक नाक-कान काटल जायब, खर-दूषण केर बध

।चौपाइ।

पञ्चवटी गोदावरि कात । आइलि सूर्पनखा उत्पात ॥१॥
कमल कुलिश अंकुश पद-रेख । अङ्कित अवनि रमनि से देख ॥२॥
जनु जगतीपति कयल निवास । सूर्पनखा मन काम विलास ॥३॥
गौलि कुटीतट गमयित भाज । बन्द कि रहय भावि विधि-काज ॥४॥
काम-सदृश सुन्दर-छवि राम । सीता-लक्ष्मण-युत घन-श्याम ॥५॥
ओ पूछल राघवकाँ जाय । की दण्डक वन अयलहुँ हाय ॥६॥
के नृप थिकहुँ कहू की काज । मुनि सन वेष तेष नहि लाज ॥७॥
परिचय-निचय हमर शुनु कान । कवि-मुह काव्य कहत की आन ॥८॥
दशमुख-बहिनि थिकहुँ की लाथ । पतिक मरण रण रावण हाथ ॥९॥
खर दूषण छथि सतत सहाय । दल बल सहित समन्धिक भाय ॥१०॥
भाय देल दण्डक-वन राज । रानी अयलहुँ अहँक समाज ॥११॥
सूर्पनखा भ्राताक दुलारि । आज्ञा हमर शकथि नहि टारि ॥१२॥
कहलनि रावण वन निर्व्वाह । अभ्यागत मुनि मृगकैँ खाह ॥१३॥
परिचय अपन कहल हम वेश । के तिनु जन पाहुन एहि देश ॥१४॥
दशरथ-नृपति-तनय हम राम । हे वर-सुन्दरि जानिअ नाम ॥१५॥
वैदेही थिकि वनिता मोर । अनुज हमर अनुरक्त किशोर ॥१६॥
हमरा लोकसौँ अछि की काज । दण्डक-स्वामिनि कहु निर्व्याज ॥१७॥
कामक किङ्कर केँ कत लाज । लाजैँ अपन सिद्धि नहि काज ॥१८॥
कामरूपिणी जानिय देव । स्वामिक सुख सम्बन्धेँ लेब ॥१९॥
भाग्य परस्पर पुण्यहि पाब । समुचित भोग विरञ्चि मिलाब ॥२०॥
काम-विवश मन किछु न सोहाय । करु विहार गिरि-गहवर जाय ॥२१॥
कुसुमित वन वनप्रिय कल गान । सुख इन्द्राणी इन्द्र समान ॥२२॥
उदित भाव तन मन नहि हाथ । धक धक छाती कर रघुनाथ ॥२३॥
निज वन निज मन विहरब घूमि । सुधा सरस अधरासव चूमि ॥२४॥
हृदयवेध कर कामक बाण । आलिङ्गन दय राखिय प्राण ॥२५॥
भेल मात्र छल हमर विवाह । दशकन्धर-कर मृत मोर नाह ॥२६॥
कि करब सुख हम दैवक घाड़ । अलप वयस मे भेलहुँ राँड़ ॥२७॥
गेओले गीत कहाँ धरि गाउ । राम काम-दुख हमर मेटाउ ॥२८॥

भावार्थः

सूर्पनखा, एक उत्पातक रूप मे, पंचवटी मे गोदावरीक तट पर आयल । ओ धरती पर कमल, वज्र एवं अंकुश चिह्नवला पैरक निशान (छाप) देखलक । शायद कोनो राजा एतय निवास कयलनि अछि, ई सोचिकय सूर्पनखाक मोन मे काम-भावना जागि गेलैक । ओ भाँज लगबैत कुटी लग गेल । ब्रह्मा द्वारा बढायल गेल काम-भावना कि कतहु रोकल (बन्द) कयल जा सकैछ ! ओ ओतय कामदेवक समान सुन्दर राम केँ आ हुनका संग सीता आ लक्ष्मण केँ देखलक । ओ राम लग जाकय पुछलक – ‘कोन कारण सँ अहाँ दण्डकवन मे पधारलहुँ अछि ? अहाँ कतुका राजा छी ? कोन काज सँ आयल छी ? अहाँक वेष मुनि-समान अछि, तेँ हम लजा नहि रहल छी । हमर परिचय हमरहि सँ सुनू । काव्य तँ कविक मुँह टा सँ सुनबाक अछि, दोसर कि सुनायत । सब किछु कहैत छी । हम रावणक बहिन छी । हमर पति रावणक हाथे लड़ाइ मे मारल गेल । खर आ दूषण हमर भाइ लगैत अछि, जे अपन पूरा दल-बलक संग हमर रक्षा करैत अछि । भाइ एहि दण्डक वन केर राज हमरा दय देलनि अछि । रानी भ’ कय हम अहाँ लग अयलहुँ अछि । हम अपन भाइक दुलारी छी । ओ हमर कोनो आज्ञा टालि नहि सकैछ । रावण कहलक अछि, वन मे रहे आ एतय आबयवला मुनि आ जानवर सब केँ खो । हम अपन परिचय सुना देलहुँ । आब अहाँ बताउ जे एतय पधारयवला अहाँ तीनू के छी ?” ॥१-१४॥

राम उत्तर देलनि – “हे सुन्दरी ! हम राजा दशरथक बेटा छी । हमर नाम राम अछि । ई वैदेही हमर पत्नी थिकीह । ई किशोर हमर छोट भाइ थिक । हे दण्डकवन केर रानी ! अहाँ साफ-साफ बताउ, हम सब अहाँक कि सेवा करी ?” सूर्पनखा कहलक – “वासनाक अग्नि मे जरैत लेल लाजे की ? लज्जा कयला सँ काज नहि चलैछ । हम कामवासनाक आइग मे जरि रहल छी । अहाँ सँ पतिक सुख चाहैत छी । एहेन प्रेममिलनक सौभाग्य दुनू केँ परस्पर पुण्यहि टा सँ भेटैछ । हमर मन काम-भावना सँ व्याकुल भ’ गेल अछि, किछुओ नीक नहि लगैत अछि । चलू, पर्वतक गुफा मे जाकय विलास करी । वन मे फुल फुलायल अछि आ कोयली सब कूकि रहल अछि । हमरा दुनू गोटेक मिलन इन्द्र आ सचीक मिलनक समान सुखकर होयत । कामवेग सँ हमर तन-मन हमरा वश मे नहि रहल अछि । हे रघुनाथ, हमर छाती धक-धक कय रहल अछि । अपन वन मे अपना मन सँ घुमि-घुमिकय विहार करब आ अमृतक समान अधर-रस पियब । कामदेवक बाण हमर हृदय केँ घायल कय देने अछि । अहाँ छाती सँ लगाकय हमर प्राण बचाउ । हमर विवाह भेले छल कि रावण हमर पति केँ मारि देलक । हम कोनो सुख नहि भोगि सकलहुँ; काँचे उमेर मे विधवा भ’ गेलहुँ । गायले गीत हम कखन धरि गबैत रहू ! हे राम! आब अहाँ हमर कामवेदना केँ दूर करू ।” ॥१५-२८॥

।सोरठा।

कहलनि हँसि रघुनाथ, सुनु भुवनाधिक-सुन्दरी ॥२९॥
करब हेतु की लाथ, सङ्गहि नारि पतिव्रता ॥३०॥
बाहर छथि छोट भाय, अभिप्राय तनिकहि कहब ॥३१॥
ओ उठता खिसिआय, मानब नहि हठ करब तत ॥३२॥

भावार्थः

राम हँसिकय कहलनि – “हे विश्वसुन्दरी, ई हमर पतिव्रता पत्नी हमरा संग मे छथि; हम हुनका सँ कोन बहाना करी ? बाहर हमर छोट भाइ छथि । हुनकहि सँ अपन निवेदन कयल जाउ । ओ क्रोधित भ’ उठत, मुदा अहाँ तैयो नहि मानब, अपन जिद्द बनेने राखब ।” ॥२९-३२॥

।चौपाइ।

सूर्पनखा लक्ष्मण सौँ कहल । कत अपमान कामिनी सहल ॥३३॥
कुल विशुद्ध दशमुख मोर भाय । वनिता एहन भाग्य-फल पाय ॥३४॥
ऋतुपति घटक काम पंजिआर । जेठ भाय पुन दल विचार ॥३५॥
दण्डक-वनक विदित मलिकानि । हो सिद्धान्त भाग्य मन मानि ॥३६॥
ई सुख समय रमय चलु नाथ । तन मन धन अर्पित अहँ हाथ ॥३७॥
हम अबला शुनु सुन्दर शूर । करु करु हमर मनोरथ पूर ॥३८॥
कहलनि तखन सुमित्रा-तनय । सुन्दर सुमुखि विदुषि शुुनु विनय ॥३९॥
हम रघुनन्दन-चरणक दास । अहँकाँ यहि सम्बन्धसौँ हास ॥४०॥
रानीसौँ बानी बनि जयब । पाँछाँ अहाँ बहुत पछतयब ॥४१॥

तखन सूर्पनखा लक्ष्मण सँ कहलकनि – “हम कामवश बहुत अपमान सहि चुकल छी । हम पैघ घर सँ छी । रावण हमर भाइ अछि । हमरा जेहेन स्त्री भाग्यहि टा सँ भेटैछ । वसन्त ऋतु घटक (अगुआ) बनल छथि । कामदेव पंजीआर छथि । अहाँक जेठ भाइ राम अनुमति दय देलनि अछि । हम दण्डक वन केर रानी छी । अतः अपन अहोभाग्य बुझिकय हमरा सँ विवाह करबाक निर्णय करू । ई सुखद समय आबि गेल अछि । हे नाथ ! हमरा संग रमण करय लेल चलू । हे वीर सुन्दर ! हम अबला छी । हमर लालसा पूरा करू ।” ॥३३-३८॥

लक्ष्मण बजलाह – “हे बुद्धिमान सुन्दरी ! हमर विनती सुनू । हम राम केर चरणक दास छी । हमरा सँ विवाह कयला सँ अहाँक उपहास होयत । अहाँ रानी सँ बानी (दासी) बनि जायब आ बाद मे पछतावा करब ।” ॥३९-४१॥

।सोरठा।

कहल राम सौँ फेरि, सूर्पनखा कामातुरा ॥४२॥
वञ्चक करह अंधेरि, हम कि अवज्ञा-योग्य जन ॥४३॥

भावार्थः

काम-वेदना सँ विकल सूर्पनखा फेरो राम सँ कहलकनि – “कि हम अवहेलना करबा योग्य छी जे अहाँ हमरा संग छल-प्रपञ्च कय रहल छी ? ॥४२-४३॥

।चौपाइ।

जनि बलसौँ जितइत छह काम । प्रथमहि तनिकहि खायब राम ॥४४॥
एतगोट दर्प्प हमर वन वास । हमर न मन मध मानथि त्रास ॥४५॥
सीतापर दौड़लि मुह बाय । धारण कयल भयङ्कर काय ॥४६॥
चेष्टहि सूचित कर रघुनाथ । लक्ष्मण तीक्ष्ण खड्ग लेल हाथ ॥४७॥
रह रह ठाढ़ि कोपसौँ डाँटि । नाक कान तनिकर लेल काटि ॥४८॥
तखन पड़ाइलि मन बड़ त्रास । धर धाकड़ी नहि भोखिक आस ॥४९॥
खसयित पड़यित दौड़लि जाय । कनइत कनइत कह गेल भाय ॥५०॥
दौड़ दौड रे कटलक नाक । सूर्पनखा कानथि दय हाक ॥५१॥
आयल काल हमर वन तीनि । नाक कानसौँ कयलक हीनि ॥५२॥
खर दूषण त्रिशिरा नहि आनि । डुबि मर डुबि मर ठेहुनहि पानि ॥५३॥
खर आगोमे खसली जाय । छाती पिटि कह तोर बल छाय ॥५४॥
मुनि वन मे हम छलहुँ निशङ्क । कत गोट लागल वंश कलङ्क ॥५५॥
दशवदनक शमनहुँ केँ त्रास । भेल भुवन भरि बड़ उपहास ॥५६॥
शोणित लपटल सकल शरीर । गिरि गेरुक झरना गम्भीर ॥५७॥
खर-दल हलचल देखि शुनि कान । रावणसौँ अतिबल के आन ॥५८॥
क्षण वेदन सह कह की हाल । पुछथि कुपित खर लोचन लाल ॥५९॥
के कयलक दुर्ग्गति तोर आज । बुझि पड़ अपढ़ बताहक काज ॥६०॥
चुप रह चुप रह की हो कानि । तनिकाँ मारि शीघ्र देब आनि ॥६१॥
अछि कोन ठाम पता काँ पाय । हमरासौँ कत बचत पड़ाय ॥६२॥
पुछता दशमुख होयब अवाक । सूर्पनखाक भेल की नाक ॥६३॥
बड अपराध कयल मति हीन । मति-नहि रहय आयु जौँ क्षीन ॥६४॥

भावार्थः

हे राम ! जेकर बल पर अहाँ अपन काम-वासना केँ बलपूर्वक दबेने छी, ओकरे हम पहिने खा जायब । अहाँक एतेक घमन्ड ! हमरहि वन मे रहनाय आ हमरे सँ डर नहि ?” एतेक कहिकय ओ भयंकर रूप धारण कयलक आ मुँह बाबिकय सीता दिश दौड़ल । राम इशारा कयलनि । लक्ष्मण एकटा तेज तलवार उठौलनि आ क्रोधपूर्वक कहलनि – “अरे ! ठहर तूँ कनी !” आर झटपट ओकर नाक-कान काटि लेलनि । ओ विकल भ’ कय भागल । कहावत अछि, जेकर तन पर कपड़ा नहि ओकरा सँ भीख केर आस नहि करबाक चाही । ओ खसैत-पड़ैत दौड़ल, भाइ लग गेल आ कानि-कानिकय चिकरय लागल – “दौड़े-दौड़े ! हमर नाक कटि गेल ! हमर वन मे तीन उत्पाती आबि गेल अछि, ओ हमरा नाक-कान सँ हीन कय देलक । हे खर ! हे दूषण ! हे त्रिशिरा ! तोरा सब केँ कनिको आइन नहि छौक ? तूँ सब ठेहुने भरि पानि मे डूबिकय मरि जो !” एतेक कहिकय ओ खरक आगू जा खसल आ छाती पीटि-पीटिकय बिलखय लागल – “लानत छौक तोहर पौरुष केँ । हम मुनि-वन मे निश्चिन्त रहैत छलहुँ । आब वंश पर बड पैघ कलंक लागि गेल । रावणक डरे यमराजो केँ होइत छलन्हि; मुदा एहि घटना सँ त समूचा दुनिया मे भारी उपहास भ’ गेल ।” ॥४४-५६॥

ओकर पूरा शरीर लहू-लुहान भ’ गेल छलैक; लागैत छलैक जेना पहाड़ सँ गेरुआ रंग (पानिक) झरना खसि रहल होइ । खर केर दल मे हलचल मचि गेल । रावण सँ बढ़िकय के बलवान अछि ? क्षण भरि दुःख केँ दबाकय खर आँखि लाल कयने बाजल – “के आइ तोहर ई दुर्गति कयलक अछि ? लगैत अछि ई कोनो मूर्ख या पागल केर काज छी । तूँ चुप भ’ जो । कनला सँ कि लाभ हेतौक । जे ई हाल कयलक अछि ओकरा हम मारिकय आनि देबौ । ओ कोन ठाम अछि ? ओकर पता कहे, हमरा सँ बचिकय ओ जायत कतय ? रावण जखन पूछत जे सूर्पनखाक नाक कि भेल त हम कि जवाब देबैक ? कोनो बुद्धिहीन ई बहुत पैघ अपराध कयलक अछि । आयु शेष भ’ गेला पर बुद्धि संग नहि दैत छैक ।” ॥५७-६४॥

।षट्पद छन्दः।

राम नाम थिक तनिक नारि वैदेही सङ्गहि ॥६५॥
लक्ष्मण भ्राता सहित अवनि – पति जानल रङ्गहि ॥६६॥
बसथि गौतमी-तीर पञ्चवटि आश्रम सुन्दर ॥६७॥
सची सहित जनि आबि गेल छथि अवनि-पुरन्दर ॥६८॥
लक्ष्मण रामक अनुज-कृत बड दुर्ग्गति भेल की कहू ॥६९॥
विकट शपथ तोहरा थिकहु मारि आनि दय ओ दुहू ॥७०॥
तनिक करब हम रुधिर पान कट कट कय खायब ॥७१॥
नहि तौँ छाड़ब प्राण हठहि यमपुर चलि जायब ॥७२॥
सीताकाँ लय आनि दशानन काँ हम देबनि ॥७३॥
होयता भाय प्रसन्न बहुत धन सम्पति लेबनि ॥७४॥
चौदह सहस सकोप चललि खर-दूषण-सेना ।७५॥
प्रलय-काल जीमूत प्रबल मारुतयुत जेना ॥७६॥
एक कहय चल गमहि बाज नहि विजयक डङ्का ॥७७॥
जायत दूर पड़ाय मानि मन मे मृति-शङ्का ॥७८॥

भावार्थः

सूर्पनखा बाजल – “ओकर नाम राम छैक । ओकरा संग ओकर पत्नी वैदेही आ भाइ लक्ष्मण छैक । रंग-ढंग सँ लागल कि ओ राजा अछि । गौतमा नदीक कछेर पंचवटी एकटा सुन्दर आश्रम अछि । ओ ओतहि रहैत अछि । लगैत अछि जेना सचीक संग इन्द्र धरती पर आबि बसल होइथ । रामक जे छोट भाइ लक्ष्मण अछि वैह ई दुर्गति कयलक हँ । तोरा शपथ छौक, ओकरा सब केँ मारिकय आनि दे ।” ॥६५-७०॥

खर-दूषण बाजल – “हम ओकर खून पी जायब आ कड़कड़ाकय ओकरा खा जायब । नहि तँ हम अपन प्राण त्यागि देब । एहि सँ भाइ प्रसन्न होयत आ ओकरा सँ हम इनाम मे धन-सम्पत्ति आनब ।” खर आ दूषण केर चौदह हजार सेना क्रोध सँ चलि पड़ल, जेना प्रलय-कालक मेघ तेज हवाक संग उमड़ि पड़ैत अछि । कियो कहैत छल – “अस्थिरे सँ चलय-चल, विजय के डंका नहि बजबय जो । भ’ सकैत अछि जे ओ सब मरय के डर सँ कतहु दूर भागि जाय ।” ॥७१-७८॥

।चौपाइ।

राम कहल लक्ष्मण शुनु शब्द । प्रलय-कालमे जेहन अब्द ॥७९॥
अबइत अछि राक्षस-बल घोर । मार मार धर धर कर सोर ॥८०॥
युद्ध भयङ्कर सम्प्रति हयत । खर-दल सकल विकल भय जयत ॥८१॥
अहाँ सङ्ग मन मे न डराथु । सीता गिरिगह्वर मे जाथु ॥८२॥
चटपट सबहिक जयतनि प्राण । ई कहि राम धनुष लेल बाण ॥८३॥
अक्षय भरल तीर तूणीर । सुप्रसन्न-मुख श्रीरघुवीर ॥८४॥
गिरि-गह्वर पति-आज्ञा पाय । गेलि सीता सौमित्रि-सहाय ॥८५॥
पहुचलि सेना बजरल मारि । अस्त्र शस्त्र चल शर तरुआरि ॥८६॥
केओ राक्षस कर धर पाषाण । गाछ उपारय केओ बलवान ॥८७॥
रामचन्द्र पर से सभ फेक । प्रभु-कर-शर उपरहि से टेक ॥८८॥
फेकलक अस्त्र सकल एक झोक । रामचन्द्र शरसौँ सभ रोक ॥८९॥
लीलासौँ सभ काटल राम । अस्त्र-विहीन कि कर सङ्ग्राम ॥९०॥
राम चलाओल बाण हजार । विषधर सन के रोकय पार ॥९१॥
जनिकां लागय रामक बाण । पलमे सङ्कल्पित लय प्राण ॥९२॥
खर दूषण त्रिशिरा खिसिआय । आयल युद्ध करब सभ भाय ॥९३॥
आध पहर धरि कयलक मारि । खसल समर-महि नयन निड़ारि ॥९४॥
लक्ष्मण सीता देखल नयन । राक्षस विकट युद्ध-महि शयन ॥९५॥
अति विस्मय मन हर्ष अपार । देखल पति-कृत रण-व्यवहार ॥९६॥
जानकि रघुपति मिलि निज हाथ । रण-व्रण पोछथि कर गुण-गाथ ॥९७॥
सूर्प्पनखा देखइत छलि मारि । विकल पड़ाइलि निज जन हारि ॥९८॥
पाछाँ घुरि घुरि तकितहि जाय । आतुरि लङ्का गेलि समाय ॥९९॥
दशमुख बैसल सभा लगाय । कह निज दुर्ग्गति लाज न काय ॥१००॥
लागलि चरणक निकट लोटाय । हमर एहन गति अपनैँ भाय ॥१०१॥
कह रावण उठ कह की काज । इन्द्र-वरुण-यम-कृत की काज ॥१०२॥
की कुबेर-कृत अनुचित कर्म्म । लेब खलबाय तनिक तन-चर्म्म ॥१०३॥
सूर्प्पनखा कह शुनु गुरु-भाय । से प्रताप गेल कतय मिझाय ॥१०४॥
कि कहब दुःख अपन हम आन । देखु बिसलोचन नाक न कान ॥१०५॥
वनिता-विजित बहुत मद-पान । नृपति प्रकृति-पर रह कत ज्ञान ॥१०६॥
चारनयनसौँ नृपति विहीन । देखितहि दिन से कौड़िक तीन ॥१०७॥
हरि आनह मन-इच्छित नारि । बल अभिमान करत के मारि ॥१०८॥
व्यसनाकुल राजा दशकण्ठ । सतत बनल सङ्ग दश बिश लण्ठ ॥१०९॥
देखल हम रण रामक रङ्ग । सदल सकल खर-दूषण भङ्ग ॥११०॥
राक्षस बहुत राम एक गोट । सभकाँ कय देलक लोट पोट ॥१११॥
जनस्थानवासी मुनि लोक । मन प्रसन्न वन रोक न टोक ॥११२॥
रावण कहल स्पष्ट कह वाक । कि कहब अनुनासिक नहि नाक ॥११३॥
धयलह साप जानि जिब जौड़ि । छुटल कलङ्क कि खर्चहु कौड़ि ॥११४॥
के थिक राम समर खर जीत । की बल दण्डक फिर कि निमित्त ॥११५॥
की तोँ कयल तनिक अपराध । कहह अशुद्ध न अक्षर आध ॥११६॥
सत्य कहै छी बड़का भाय । नदी गौतमी गेलहुँ नहाय ॥११७॥
पञ्चवटी नामक मुनि-गाम । ततहि नियत बस सानुज राम ॥११८॥
धनुष बाण कर धर श्रीमान । तेहन न सुन्दर त्रिभुवन आन ॥११९॥
जटा सुवल्कल सुन्दर देह । पिता-वचन सौँ त्यागल गेह ॥१२०॥
अपनैँ जेहन तेहन छोट भाय । सीता-रूप कहल नहि जाय ॥१२१॥
देखल न आँखि शुनल नहि कान । लक्ष्मी-रूप देल भगवान ॥१२२॥
रामचन्द्र काँ कहल बुझाय । काल देश क्रम सकल सुझाय ॥१२३॥
हम माँगल निज वनिता दैह । धन सम्पत्ति यथेच्छित लैह ॥१२४॥
लङ्केश्वर छथि हमरा भाय । देव उपायन ततय पठाय ॥१२५॥
सीता बल सौँ लेबय चहल । काल-विवश मन ज्ञान न रहल ॥१२६॥
लक्ष्मण रामक छोटका भाय । रामक अभिमत ओ खिसिआय ॥१२७॥
ओ काटल मोर नासा कान । क्षत्रिय जाति शूर मन मान ॥१२८॥
खर घर कहल गेलाहो जूमि । आयल एक न रणसौँ घूमि ॥१२९॥
आँखि देखल हम युद्धक रीति । चाहथि लेथि त्रिलोककँ जीति ॥१३०॥
करु जनु साहस दण्डक जाय । राम-शरानल शलभ समाय ॥१३१॥
कोटि रती छबि जोतनिहारि । हुनि सङ्ग एक मनोहरि नारि ॥१३२॥
माया-छल-बल लाउ चोराय । प्रकट हयब तौँ प्राणे जाय ॥१३३॥

भावार्थः

राम लक्ष्मण सँ कहलनि – “ई आवाज सुनू । प्रलयकाल केर मेघ समान ‘मार-मार’, ‘पकड़-पकड़’ केर हल्ला करैत राक्षस दल सब आबि रहल अछि । आब घनघोर लड़ाइ होयत आ ओहि मे खर केर सारा सेना बर्बाद होयत । अहाँ संग मे रहू, सीता डराइथ नहि; ओ पहाड़क गुफा मे चलि जाइथ । तुरत हम सब केँ मृत्युक घाट उतारि देबैक ।” एतेक कहिकय राम धनुष‍-बाण हाथ मे लेलनि । कहियो खत्म नहि होयबला तीर सँ तरकस भरल छल । रामक चेहरा चमकि रहल छलन्हि । स्वामीक आज्ञा पाबिकय सीता, लक्ष्मणक संग पहाड़क गुफा मे चलि गेलिह । राक्षस सभक सेना आबि धमकल । लड़ाइ मचि गेल । अस्त्र-शस्त्र, तीर आ तलवार सब सँ युद्ध होबय लागल । कोनो राक्षस हाथ मे पत्थर उठा लैत अछि त कियो गाछे उखाड़ि लैत अछि । ओ सब रामचन्द्र पर फेकैत छल, जेकरा प्रभु रामक तीर आसमाने मे रोकि लैत छल ॥७९-८८॥

सब राक्षस अपन-अपन अस्त्र एक्कहि संग चलेनाय शुरू कय देलक, जेकरा राम तीर सँ रोकैत गेलाह । राम अपन लीला सँ सबटा अस्त्र सब केँ काटि देलनि । फेर अस्त्र-विहीन राक्षस लड़त केना ? राम हजारों बाण चलौलनि । विषधर जेहेन बढ़ैत ओ बाण सब केँ के रोकि सकैत छल ? जेकरा रामक बाण लगलैक ओकर प्राण पलहि भरि मे चलि गेलैक । खर, दूषण आ त्रिशिरा तीनू भाइ एकदम तमसाकय आयल जे सब भाइ मिलिकय लड़ाइ करब । आधा पहर धरि लड़ाइ कयलाक बाद ओ तीनू युद्धक मैदान मे आँखि बिदोरिकय खसि पड़ल । लक्ष्मण आ सीता देखलनि, विकट राक्षस युद्ध-भूमि मे सुतल अछि । पतिक युद्ध-कौशल देखि सीताक मन मे परम आश्चर्य आ अपार हर्ष भेलनि । सीता रामक समीप आबिकय अपना हाथ सँ लड़ाइक घाव पोछैत हुनक गुण-गान करय लगलिह । ओम्हर सूर्पनखा लड़ाइ देखि रहल छल । अपन लोकक हारि भेला पर ओ व्याकुल भ’ कय भागल । डर सँ पाछाँ घुमि-घुमिकय देखिते व्याकुल-सन लंका चलि गेल । ओतय रावण सभा लगौने बैसल छल । सूर्पनखा तुरन्त अपन दुर्गति सब सुनबय लागल । ओकरा देह मे कोनो लाज नहि रहि गेलैक । ओ रावणक पैर पर ओंघराय लागल आ बाजल – “तूँ हमर भाइ थिकह, तैयो हमर ई हालत हुअय ?” रावण कहलक – “उठ ! कह, तोरा कि चाही ? तोहर कि इन्द्र, वरुण या यम ई हाल कयलखुन हँ ? या कुबेर ई अनुचित काज कयलक अछि ? हम ओकरा सभक शरीर सँ चमड़ा उतरबा लेब ।” ॥८९-१०३॥

सूर्पनखा कहलक – “हे बड़ भाइ, सुनू ! अहाँक ओ प्रताप कतय हेरा गेल ? हम अपन आर दुःख कि कहू ? अपन बीसो आँखि सँ देखि लियह, हमर नाक-कान चलि गेल । जे राजा स्त्रीक वश मे रहैत अछि आ बहुते शराब पिबैत अछि ओकर प्रजा उपर कि ध्यान रहत ! जाहि राजाक खुफिया रूपी आँखि नहि हो, ओ देखिते-देखिते कौड़ीक तीन भ’ जाइत अछि । मनचाही नारी केँ हरण कय केँ आनू । अहाँ केँ बलक घमंड अछि । अहाँ सँ युद्ध के करत ? हे दशानन ! अहाँ राजा भ’ कय कामादि व्यसन मे डूबल छी, आर दस-बीस गुण्डा सदिखन अहाँक संग मे रहैत अछि । हम रामक रण-कौशल देखलहुँ । ओकरा आगू सबटा सेना-सहित खर-दूषण टिकि नहि सकल । राक्षस बहुते रास छल, मुदा राम अकेला छल । तैयो राम सभक दाँत खट्टा कय देलक । जनस्थान मे रहयवला मुनि सब बड प्रसन्न भेल अछि आ ओ सब बिना रोक-टोक केँ रहैत अछि ।” ॥१०४-११२॥

रावण कहलक – “कि बकैत जा रहल छँ ? साफ-साफ बाज ।” (सूर्पनखा कहलक – ) “साफ-साफ कि खाख बाजू ! जखन नाके नहि रहल त नकियइयेकय न बाजब ।” रावण कहलक – “तूँ साँप केँ रस्सी बुझिकय पकड़ि लेलें । कि ई कलंक लाखों खर्च कयलो पर मेटायत ? राम के छी, जे लड़ाइ मे खर केँ पछाड़ि देलक ? ओकर कतेक शक्ति छैक ? कोन कारण सँ ओ दण्डक वन मे भटैक रहल अछि ? तूँ ओकर कोन अपराध कयलें ? ठीक-ठीक बता, आधो अक्षर गलत जुनि कहिहें ।” ॥११३-११६॥

सूर्पनखा बाजल – “हे बड़ भाइ ! हम सच-सच बतबैत छी । हम गौतमी नदी मे नहाय लेल गेलहुँ । जेतय पञ्चवटी नामक मुनिक गाम छन्हि । ओतय लक्ष्मण-सहित राम ठहरल छथि । ओ हाथ मे धनुष आ बाण लेने रहैत छथि । हुनका जेहेन सुन्दर त तीनू लोक मे आर कियो नहि देखाय पड़ैत अछि । माथ पर जटा छन्हि । तन पर बल्कल वस्त्र पहिरने छथि । शरीर बड सुन्दर छन्हि । पिताक आज्ञा सँ ओ घरबार छोड़िकय वन मे आयल छथि । जेना राम छथि, तेहने रामक छोट भाइ लक्ष्मण सेहो छथि । सीताक सौन्दर्य केर तँ वर्णनो करब कठिन अछि । एहेन रूप नहि तँ आँखि सँ कतहु देखलहुँ आ न कान सँ कतहु सुनलहुँ । मानू भगवान हुनका लक्ष्मीक रूप देने होइथ । हम रामचन्द्रक स्थान, काल आ स्थितिक बोध करबैत हुनका बुझेलहुँ । आ कहलहुँ जे ‘हे राम ! अहाँ जतेक चाही ओतेक धन-सम्पत्ति लय ली आ ई अपन स्त्री दय दी । लंकाक राजा रावण हमर भाइ छथि । हम एहि सीता केँ हुनका भेंट करब ।’ एतबा कहिकय हम बलजोरी सीता केँ लियए चाहलहुँ । दुर्भाग्य सँ हमर मन ज्ञानहीन भ’ गेल । एहि पर रामक छोट भाइ लक्ष्मण रामक शह पाबिकय क्रुद्ध भ’ उठलाह, आ ओ हमर नाक आ कान काटि लेलनि । ओ वीर क्षत्रिय छथि । हुनकर मन मे आइन छलन्हि । हम भाइ खर केर घर जाय ओकरा सँ कहलहुँ आ ओ तुरत आबि धमकल । मुदा हाय ! लड़ाइक मैदान सँ एकहु टा नहि लौटल, सब मारल गेल । हम अपन आँखि सँ युद्धक रंग देखलहुँ । लगैत छल, चाहथि तँ ओ तीनू लोक केँ जीति लेथि । दण्डक-वन जेबाक साहसो जुनि करू नहि तँ रामक बाण रूपी आइग मे परवाना जेकाँ जरि जायब । हुनका पास एकटा रूपवती स्त्री अछि जे करोड़ों रति सभक शोभा केँ जीतयवाली अछि । मायाक छल सँ ओहि नारी केँ चोराकय आनि लियह । प्रकट रूप सँ जायब तँ प्राण गमायब ।” ॥११७-१३३॥

।सोरठा।

शुनल वचन लङ्केश, दान मान सन्तोष दय ॥१३४॥
निज गृह कयल प्रवेश, सूर्प्पनखा लङ्का रहलि ॥१३५॥
निद्रा आँखि न राति, रावण-मन चिन्ता भरल ॥१३६॥
राम मनुज एक जाति, खर-दूषण-गण नाश कर ॥१३७॥
थिकथि मनुष्य न राम, परमात्मा अव्यय अमल ॥१३८॥
हमर विनाशक काम, विधि-प्रार्थित नररूप धर ॥१३९॥
जौँ मृति तनिकहि हाथ, राज्य करब वैकुण्ठ मे ॥१४०॥
नहि तौँ सहित समाज, लङ्कापति बनले रहब ॥१४१॥
प्रभुसौँ करब विरोध, लड़ब भिड़ब रणमे मरब ॥१४२॥
से करता जौँ क्रोध, बनत काज सभटा हमर ॥१४३॥

लंकेश रावण सूर्पनखाक उपर्युक्त बात सुनलक । ओकरा उपर प्रसन्न भ’ ओ धन-सम्पत्ति देलक आ सम्मान कय केँ सन्तुष्ट कयलक । तखन ओ अपन भवन मे चलि गेल आ सूर्पनखा लंका मे रहि गेल । रावण केँ राति भरि आँखि मे नींद नहि आयल । ओकरा मोन मे चिन्ता भरि गेलैक । कि मनुष्य जातिक भ’ कय अकेले राम खर आ दूषण केर दल केँ समाप्त कय देलनि ? नहि, राम मनुष्य नहि छथि । ओ अवश्ये टा निर्विकार, अविनाशी, परमात्माक अवतार छथि । हमरहि विनाशक लेल ब्रह्माक प्रार्थना सुनिकय मानवक रूप धारण कय अवतरित भेला अछि । यदि हुनका हाथ सँ मृत्यु भ’ जायत तँ वैकुण्ठ प्राप्त कय ओतहि राज्य करब । अगर नहि, तँ सारा दलबल केर संग लंकाक राजा बनल रहब । हम प्रभुक विरोध करब । लड़िकय रणभूमि मे हुनकहि हाथे मरब । यदि ओ हमरा पर क्रोध मे आबि जेता त हमर सबटा काज बनि जायत ॥१३४-१४३॥

।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः।

॥मैथिल चन्द्रकवि-विरचित मिथिला-भाषा रामायण मे अरण्यकाण्डक पाँचम अध्याय समाप्त॥

हरिः हरः!!

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