कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड अध्याय पाँच

स्वाध्याय

– प्रवीण नारायण चौधरी

कविचन्द्र विरचित मिथिलाभाषा रामायण

अरण्यकाण्ड – अध्याय पाँच

।चौपाइ।

पञ्चवटी गोदावरि कात। आइलि सूर्पनखा उत्पात॥
कमल कुलिश अंकुश पद – रेख। अङ्कित अवनि रमनि से देख॥
जनु जगतीपति कयल निवास। सूर्पनखा मन काम विलास॥
गौलि कुटीतट गमयित भाज। बन्द कि रहय भावि विधि-काज॥
काम – सदृश सुन्दर – चवि राम। सीता – लक्ष्मण – युत घन-श्याम॥
ओ पूछल राघवकाँ जाय। की दण्डक वन अयलहुँ हाय॥
के नृप थिकहुँ कहू की काज। मुनि सन वेष तेष नहि लाज॥
परिचय – निचय हमर शुनु कान। कवि-मुह काव्य कहत की आन॥
दशमुख-बहिनि थिकहुँ की लाथ। पतिक मरण रण रावण हाथ॥
खर दूषण छथि सतत सहाय। दल बल सहित समन्धिक भाय॥
भाग्य देल दण्डक – वन राज। रानी अयलहुँ अहँक समाज॥
सूर्पनखा भ्राताक दुलारि। आज्ञा हमर शकथि नहि टारि॥
कहलनि रावण वन निर्व्वाह। अभ्यागत मुनि मृगकैँ खाह॥
परिचय अपन कहल हम वेश। के तिनु जन पाहुन एहि देश॥
दशरथ – नृपति – तनय हम राम। हे वर – सुन्दरि जानिअ नाम॥
वैदेही थिकि वनिता मोर। अनुज हमर अनुरक्त किशोर॥
हमरा लोकसौँ अछि की काज। दण्डक – स्वामिनि कहु निर्व्याज॥
कामक किङ्कर केँ कत लाज। लाजैँ अपन सिद्धि नहि काज॥
कामरूपिणी जानिय देव। स्वामिक सुख सम्बन्धेँ लेब॥
भाग्य परस्पर पुण्यहि पाब। समुचित भोग विरञ्चि मिलाब॥
काम-विवश मन किछु न सोहाय। करु विहार गिरि – गहवर जाय॥
कुसुमित वन वनप्रिय कल गान। सुख इन्द्राणी इन्द्र समान॥
उदित भाव तन मन नहि हाथ। धक धक छाती कर रघुनाथ॥
निज वन निज मन विहरब घूमि। सुधा सरस अधरासव चूमि॥
हृदयवेध कर कामक बाण। आलिङ्गन दय राखिय प्राण॥
भेल मात्र छल हमर विवाह। दशकन्धर-कर मृत मोर नाह॥
कि करब सुख हम दैवक घाड़। अलप वयस मे भेलहुँ राँड़॥
गओले गीत कहाँ धरि गाउ। राम काम-दुख हमर मेटाउ॥

।सोरठा।

कहलनि हँसि रघुनाथ, सुनु भुवनाधिक – सुन्दरी।
करब हेतु की लाथ, सङ्गहि नारि पतिव्रता॥
बाहर छथि छोट भाय, अभिप्राय तनिकहि कहब।
ओ उठता खिसिआय, मानब नहि हठ करब तत॥

।चौपाइ।

सूर्पनखा लक्ष्मण सौँ कहल। कत अपमान कामिनी सहल॥
कुल विशुद्ध दशमुख मोर भाय। वनिता एहन भाग्य – फल पाय॥
ऋतुपति घटक काम पंजिआर। जेठ भाय पुन दल विचार॥
दण्डक – वनक विदित मलिकानि। हो सिद्धान्त भाग्य मन मानि॥
ई सुख समय रमय चलु नाथ। तन मन धन अर्पित अहँ हाथ॥
हम अबला शुनु सुन्दर शूर। करु करु हमर मनोरथ पूर॥
कहलनि तखन सुमित्रा – तनय। सुन्दर सुमुखि विदुषि शुुनु विनय॥
हम रघुनन्दन – चरणक दास। अहँकाँ यहि सम्बन्धसौँ हास॥
रानीसौँ बानी बनि जयब। पाँछाँ अहाँ बहुत पछतयब॥

।सोरठा।

कहल राम सौँ फेरि, सूर्पनखा कामातुरा।
वञ्चक करह अंधेरि, हम कि अवज्ञा-योग्य जन॥

।चौपाइ।

जनि बलसौँ जितइत छह काम। प्रथमहि तनिकहि खायब राम॥
एतगोट दर्प्प हमर वन वास। हमर न मन मध मानथि त्रास॥
सीतापर दौड़लि मुह बाय। धारण कयल भयङ्कर काय॥
चेष्टहि सूचित कर रघुनाथ। लक्ष्मण तीक्ष्ण खड्ग लेल हाथ॥
रह रह ठाढ़ि कोपसौँ डाँटि। नाक कान तनिकर लेल काटि॥
तखन पड़ाइलि मन बड़ त्रास। धर धाकड़ी नहि भोखिक आस॥
खसयित पड़यित दौड़लि जाय। कनइत कनइत कह गेल भाय॥
दौड़ दौड रे कटलक नाक। सूर्पनखा कानथि दय हाक॥
आयल काल हमर वन तीनि। नाक कानसौँ कयलक हीनि॥
खर दूषण त्रिशिरा नहि आनि। डुबि मर डुबि मर ठेहुनहि पानि॥
खर आगोमे खसली जाय। छाती पिटि कह तोर बल छाय॥
मुनि वन मे हम छलहुँ निशङ्क। कत गोट लागल वंश कलङ्क॥
दशवदनक शमनहुँ केँ त्रास। भेल भुवन भरि बड़ उपहास॥
शोणित लपटल सकल शरीर। गिरि गेरुक झरना गम्भीर॥
खर-दल हलचल देखि शुनि कान। रावणसौँ अतिबल के आन॥
क्षण वेदन सह कह की हाल। पुछथि कुपित खर लोचन लाल॥
के कयलक दुर्ग्गति तोर आज। बुझि पड़ अपढ़ बताहक काज॥
चुप रह चुप रह की हो कानि। तनिकाँ मारि शीघ्र देब आनि॥
अछि कोन ठाम पता काँ पाय। हमरासौँ कत बचत पड़ाय॥
पुछता दशमुख होयब अवाक। सूर्पनखाक भेल की नाक॥
बड अपराध कयल मति हीन। मति – नहि रहय आयु जौँ क्षीन॥

।षट्पद छन्दः।

राम नाम थिक तनिक नारि वैदेही सङ्गहि।
लक्ष्मण भ्राता सहित अवनि – पति जानल रङ्गहि॥
बसथि गौतमी – तीर पञ्चवटि आश्रम सुन्दर।
सची सहित जनि आबि गेल छथि अवनि – पुरन्दर॥
लक्ष्मण रामक अनुज-कृत बड दुर्ग्गति भेल की कहू।
विकट शपथ तोहरा थिकहु मारि आनि दय ओ दुहू॥
तनिक करब हम रुधिर पान कट कट कय खायब।
नहि तौँ छाड़ब प्राण हठहि यमपुर चलि जायब॥
सीताकाँ लय आनि दशानन काँ हम देबनि।
होयता भाय प्रसन्न बहुत धन सम्पति लेबनि॥
चौदह सहस सकोप चललि खर – दूषण – सेना।
प्रलय – काल जीमूत प्रबल मारुतयुत जेना॥
एक कहय चल गमहि बाज नहि विजयक डङ्का।
जायत दूर पड़ाय मानि मन मे मृति – शङ्का॥

।चौपाइ।

राम कहल लक्ष्मण शुनु शब्द। प्रलय – कालमे जेहन अब्द॥
अबइत अछि राक्षस – बल घोर। मार मार धर धर कर सोर॥
युद्ध भयङ्कर सम्प्रति हयत। खर-दल सकल विकल भय जयत॥
अहाँ सङ्ग मन मे न डराथु। सीता गिरिगह्वर मे जाथु॥
चटपट सबहिक जयतनि प्राण। ई कहि राम धनुष लेल बाण॥
अक्षय भरल तीर तूणीर। सुप्रसन्न – मुख श्रीरघुवीर॥
गिरि – गह्वर पति – आज्ञा पाय। गेलि सीता सौमित्रि – सहाय॥
पहुचलि सेना बजरल मारि। अस्त्र शस्त्र चल शर तरुआरि॥
केओ राक्षस कर धर पाषाण। गाछ उपारय केओ बलवान॥
रामचन्द्र पर से सभ फेक। प्रभु – कर – शर उपरहि से टेक॥
फेकलक अस्त्र सकल एक झोक। रामचन्द्र शरसौँ सभ रोक॥
लीलासौँ सभ काटल राम। अस्त्र – विहीन कि कर सङ्ग्राम॥
राम चलाओल बाण हजार। विषधर सन के रोकय पार॥
जनिकां लागय रामक बाण। पलमे सङ्कल्पित लय प्राण॥
खर दूषण त्रिशिरा खिसिआय। आयल युद्ध करब सभ भाय॥
आध पहर धरि कयलक मारि। खसल समर-महि नयन निड़ारि॥
लक्ष्मण सीता देखल नयन। राक्षस विकट युद्ध – महि शयन॥
अति विस्मय मन हर्ष अपार। देखल पति-कृत रण – व्यवहार॥
जानकि रघुपति मिलि निज हाथ। रण-ब्रण पोछथि कर गुण – गाथ॥
सूर्प्पनखा देखइत छलि मारि। विकल पड़ाइलि निज जन हारि॥
पाछाँ घुरि घुरि तकितहि जाय। आतुरि लङ्का गेलि समाय॥
दशमुख बैसल सभा लगाय। कह निज दुर्ग्गति लाज न काय॥
लागलि चरणक निकट लोटाय। हमर एहन गति अपनैँ भाय॥
कह रावण उठ कह की काज। इन्द्र – वरुण-यम – कृत की काज॥
की कुबेर-कृत अनुचित कर्म्म। लेब खलवाय तनिक तन-चर्म्म॥
सूर्प्पनखा कह शुनु गुरु – भाय। से प्रताप गेल कतय मिझाय॥
कि कहब दुःख अपन हम आन। देखु विशलोचन नाक न कान॥
वनिता – विजित बहुत मद – पान। नृपति प्रकृति-पर रह कत ज्ञान॥
चारनयनसौँ नृपति विहीन। देखितहि दिन से कौड़िक तीन॥
हरि आनह मन-इच्छित नारि। बल अभिमान करत के मारि॥
व्यसनाकुल राजा दशकण्ठ। सतत बनल सङ्ग दश बिश लण्ठ॥
देखल हम रण रामक रङ्ग। सदल सकल खर-दूषण भङ्ग॥
राक्षस बहुत राम एक गोट। सभकाँ कय देलक लोट पोट॥
जनस्थानवासी मुनि लोक। मन प्रसन्न वन रोक न टोक॥
रावण कहल स्पष्ट कह वाक। कि कहब अनुनासिक नहि नाक॥
धयलह साप जानि जिब जौड़ि। छुटल कलङ्क कि खर्चहु कौड़ि॥
के थिक राम समर खर जीत। की बल दण्डक फिर कि निमित्त॥
की तोँ कयल तनिक अपराध। कहह अशुद्ध न अक्षर आध॥
सत्य कहै छी बड़का भाय। नदी गौतमी गेलहुँ नहाय॥
पञ्चवटी नामक मुनि – गाम। ततहि नियत बस सानुज राम॥
धनुष बाण कर धर श्रीमान। तेहन न सुन्दर त्रिभुवन आन॥
जटा सुवल्कल सुन्दर देह। पिता -वचन सौँ त्यागल गेह॥
अपनैँ जेहन तेहन छोट भाय। सीता – रूप कहल नहि जाय॥
देखल न आँखि शुनल नहि कान। लक्ष्मी – रूप देल भगवान॥
रामचन्द्र काँ कहल बुझाय। काल देश क्रम सकल सुझाय॥
हम माँगल निज वनिता दैह। धन सम्पत्ति यथेच्छित लैह॥
लङ्केश्वर धथि हमरा भाय। देव उपायन ततय पठाय॥
सीता बल सौँ लेबय चहल। काल-विवश मन ज्ञान न रहल॥
लक्ष्मण रामक छोटका भाय। रामक अभिमत ओ खिसिआय॥
ओ काटल मोर नासा कान। क्षत्रिय जाति शूर मन मान॥
खर घर कहल गेलाहो जूमि। आयल एक न रणसौँ घूमि॥
आँखि देखल हम युद्धक रीति। चाहथि लेथि त्रिलोककँ जीति॥
करु जनु साहस दण्डक जाय। राम – शरानल शलभ समाय॥
कोटि रती छबि जोतनिहारि। हुनि सङ्ग एक मनोहरि नारि॥
माया – छल – बल लाउ चोराय। प्रकट हयब तौँ प्राणे जाय॥

।सोरठा।

शुनल वचन लङ्केश, दान मान सन्तोष दय।
निज गृह कयल प्रवेश, सूर्प्पनखा लङ्का रहलि॥
निद्रा आँखि न राति, रावण – मन चिन्ता भरल।
राम मनुज एक जाति, खर-दूषण – गण नाश कर॥
थिकथि मनुष्य न राम, परमात्मा अव्यय अमल।
हमर विनाशक काम, विधि-प्रार्थित नररूप धर॥
जौँ मृति तनिकहि हाथ, राज्य करब वैकुण्ठ मे।
नहि तौँ सहित समाज, लङ्कापति बनले रहब॥
प्रभुसौँ करब विरोध, लड़ब भिड़ब रणमे मरब।
से करता जौँ क्रोध, बनत काज सभटा हमर॥

।इति।

हरिः हरः!!