स्वाध्याय
– प्रवीण नारायण चौधरी
मिथिलाभाषा रामायण – अरण्यकाण्ड
तेसर अध्याय
रामजीक अगस्त्य मुनिक आश्रम पर पहुँचब
।चौपाइ।
मुनि सभकाँ जानल व्यवहार । सत-स्वागत फलमूलाहार ॥१॥
प्रभु एक दिन तहि थल रहलाह । प्रात भेल कहि कहि चललाह ॥२॥
मुनि अगस्ति-मण्डली प्रवेश । सभ ऋतु फल फुल लागल बेश ॥३॥
मृग नानाधिप कत तेहि थान । पक्षी करय विलक्षण गान ॥४॥
तहाँ देव ब्रह्मर्षि बहूत । आबि न शकथि जतय यमदूत ॥५॥
नन्दन-वन सन शोभा लाग । ब्रह्मलोक जनु दोसर भाग ॥६॥
शुनु सुतीक्ष्ण कहलनि रघुवीर । मुनिकेँ कहब देखि पड़ भीर ॥७॥
हम आयल छिअ दर्शन काज । कहू जाय अहाँ मुनिक समाज ॥८॥
भावार्थः
अगस्तिक आश्रम समीपक मुनि सब बहुत व्यवहारिक छलथि । ओ सब फल, मूल आदि आहार सँ खुब नीक जेकाँ सत्कार कयलनि । राम एक दिन ओहिठाम रहलाह । भोर भेला पर विदाइ लय-लय केँ चलि पड़लाह । तखन ओ मुनि अगस्तिक मण्डली मे प्रवेश कयलाह । ओतय सब ऋतुक सुन्दर-सुन्दर फुल आ फल खुब बेश सँ लागल छल । भाँति-भाँति केर हरिण सब थानक-थान भरल छल आर पक्षी सब खुब विलक्षण गान कय रहल छल । ओतय बहुते रास देवगण एवं ब्रह्मर्षि लोकनि सेहो छलथि, ओतय यमदूत सेहो नहि आबि सकैत छलथि । ओहिठामक शोभा नन्दन वन जेकाँ लागि रहल छल – ब्रह्मलोकक बुझू दोसर भाग छल ओ स्थान । राम कहलनि – “हे सुतीक्ष्ण जी ! सुनू ! अगस्तिक आश्रम मे बहुते भीड़ देखा रहल अछि, तेँ अहाँ आगू जा कय हुनका सँ कही जे हम हुनकर दर्शन लेल आयल छी ॥१-८॥
।सोरठा।
विधिवत कयल प्रणाम, जाय सुतीक्ष्ण अगस्ति-पद ॥९॥
सीता लक्ष्मण राम, आश्रम बाहर ठाढ़ छथि ॥१०॥
कहयित शिष्यक कान, तन्मन्त्रार्थ विचार हम ॥११॥
कयलहि छलछी ध्यान, शीघ्र लाउ कहलनि गुरू ॥१२॥
भावार्थः
सुतीक्ष्णजी मुनि अगस्तिक लग पहुँचलाह आर हुनकर चरण मे विधिवत् प्रणाम कय केँ कहलनि – “गुरु महाराज! सीता आ लक्ष्मण सहित रामजी आश्रमक बाहर मे ठाढ़ छथि ।” कान मे शिष्य सुतीक्ष्णक एतेक कहिते गुरु अगस्त्य कहलनि – “अरे ! हुनकहि मंत्रक अर्थ केर विवेचना करैत हम एखनहिं त हुनकर स्मरण कएने रही । हुनका जल्दी सँ लेने आउ ।” ॥९-१२॥
।चौपाइ।
अपनहु चलला मुनि-गण सङ्ग । मुनिकेँ हर्ष समाय न अङ्ग ॥१३॥
रामचन्द्र प्रभु आयल जाय । बड़ गोट अतिथिक नाम कहाय ॥१४॥
कयल दण्डवत तिनु जन आबि । कहल सकल उत्तम फल भावि ॥१५॥
मुनि लेल प्रभुकाँ हृदय लगाय । हर्षक नोर हृदय बढ़ि आय ॥१६॥
रामचन्द्र-कर करसौँ धयल । आश्रम आनि प्रियातिथि कयल ॥१७॥
बड़ सेवा पूजा विस्तार । जेहन अकार तेहन व्यवहार ॥१८॥
वन फल भोजन अपनहुँ ठाढ़ । उचिती मध्य हर्ष मन बाढ़ ॥१९॥
सुख एकान्त जखन बैसलाह । मुनि अगस्ति पुन ततय गेलाह ॥२०॥
कहल कृताञ्जलि शुनु मायेश । एतबहि लय बसलहुँ ई देश ॥२१॥
क्षीर-समुद्र विधाता जाय । स्तुति कय कहलनि होउ सहाय ॥२२॥
सहइत छथि नहि धरणी भार । लेल जाय अपने अवतार ॥२३॥
सभ जीवक धरणी आधार । रावण-मरणक मुख्य विचार ॥२४॥
कहल से कयल मनोरथ पूर । दर्शन देल कष्ट गेल दूर ॥२५॥
प्रथम एकसौँ बाढ़लि सृष्टि । रविसौँ जेहन होइ अछि वृष्टि ॥२६॥
अपनैँक माया-कृत संसार । शास्त्र बहुत कह बहुत विचार ॥२७॥
स्तुति करयित करयित भेल बेर । धनुष ग्रहण करु कहलनि फेर ॥२८॥
सुरपति एहि थल गेला राखि । देब रामकाँ ई सम्भाषि ॥२९॥
अक्षय बाण तेहन तूणीर । अपनैँक योग्य वस्तु रघुवीर ॥३०॥
रत्न-विभूषित वर तरुआरि । एहिसौँ करब भयङ्कर मारि ॥३१॥
निज-माया-कृत नर-आकार । लेल यदर्थ देव अवतार ॥३२॥
दुइ योजन एतसौँ से ठाम । पञ्चवटी कहइछ जन राम ॥३३॥
गोदावरी विमल तट जाउ । कार्य्य हेतु किछु काल गमाउ ॥३४॥
भावार्थः
अगस्त्य जी मुनि लोकनिक संग स्वयं सेहो (हुनक) अगवानी करय चलि पड़लाह । हुनका एतेक हर्ष भेलनि जे हृदय मे समा नहि रहल छलन्हि । अगस्ति कहलनि, “हे प्रभु राम जी ! आयल जाउ । अतिथिक नाम बहुत पैघ कहल जाइछ ।” तीनू गोटे आबिकय दण्डवत् प्रणाम कयलनि आर ऋषि आशीर्वाद देलनि, “अपने लोकनि केँ सबटा शुभ फल भेटत ।” पुनः अगस्ति रामजी केँ गला सँ लगौलनि आर हर्षक नोर हृदय धरि बढ़ि गेलनि । रामक हाथ केँ अपन हाथ सँ पकड़िकय हुनका अपन आश्रमक प्रिय अतिथि बनौलनि । अत्यन्त विस्तार सँ सेवा आ पूजा कयलनि । कहावत अछि जे जेहेन आकार रहैछ, तेहने व्यवहार भेटैछ । वनक फल भोजन करौलनि आर सतत स्वयं सेहो ठाढ़ रहलाह । उचिती (विनय-वचन) कहय मे मन मे अपार हर्ष होइत छलन्हि । जखन भोजनादिक बाद राम एकान्त मे विश्रामक लेल सुख सँ बैसलाह, तखन अगस्ति मुनि फेर ओतय अयलाह आर हाथ जोड़िकय कहलाह, “हे मायापति राम ! सुनल जाउ । हम एहि स्थान पर एहि खातिर बसल रही जे हमरा अहाँक दर्शन भेटय । ब्रह्माजी क्षीर-समुद्र मे जाकय स्तुति कय केँ कहलनि जे अहाँ हम समस्त देवता लोकनिक सहयोग करी । आब धरती आर भार सम्हारि नहि सकती; तेँ अपने अवतार लेल जाउ । धरती सब प्राणीक आधार थिक तेँ ओकरा बचेनाय जरूरी छैक । एहि वास्ते रावणक बध मुख्य कर्तव्य अछि । ब्रह्माजी जे अपने सँ कहलनि, अपने हुनकर मनोरथ केँ पूरा कयलहुँ । अपने हमरा दर्शन देलहुँ । हमर सबटा दुःख दूर भ’ गेल । आरम्भ मे केवल एक अपने छलहुँ, ताहि अपने सँ सम्पूर्ण सृष्टि पसरल अछि, जेना सूरज सँ वृष्टि होइछ । ई संसार अपनहिं माया द्वारा रचलहुँ अछि । अनेकों शास्त्र सब मे अपनेक बारे मे बहुते रास बात सब कहल गेल अछि ।” एहि तरहें स्तुति करैत-करैत बहुते समय बीति गेलनि । तखन अगस्ति कहलनि, “हे प्रभु ! ई धनुष ग्रहण कयल जाउ । इन्द्र कहने रहथि जे ‘ई राम केँ देबनि’, यैह कहिकय एतय राखि गेल छलाह । एकरा संग जे तरकस अछि, तेकर तीर कहियो खत्म नहि होइछ । हे राम ! ई अपनहिं केर योग्य अछि । आर ई रत्न सँ जड़ित खड्ग थिक । एहि सँ अपने भयंकर युद्ध करब । एहि युद्ध लेल त अपने अपनहिं मायाक प्रभाव सँ मनुष्यक रूप मे अवतार लेलहुँ अछि । जेकरा लोक पञ्चवटी कहैत अछि, से स्थान एतय सँ दुइ योजन पर अछि । ओतय अपने गोदावरी नदीक तट पर जाउ और अपन इष्टकार्य लेल किछु समय ओतहि रुकू ।” ॥१३-३४॥
।सोरठा।
जखना ई बजलाह, मुनि अगस्ति भगवान शुनि ॥३५॥
तिनु जन प्रभु चललाह, पञ्चवटी उद्देश्य कय ॥३६॥
भावार्थः
जखन अगस्ति मुनि एना कहलनि तखन भगवान राम से सुनिकय लक्ष्मण आ सीता सहित पञ्चवटी दिश चलि पड़लाह ॥३५-३६॥
।इति श्री चन्द्रकवि-विरचिते मिथिला-भाषा रामायणे आरण्यकाण्डे तृतीयोऽध्यायः।
।श्री चन्द्रकवि विरचित मिथिलाभाषा रामायण मे अरण्यकाण्ड मे तेसर अध्याय समाप्त।
हरिः हरः!!

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Aajuk ehi prasang m Agast munik aa prabhu Ram k vartalap jahi m prabhu Ram hunkar darbar par pahinchav aa oto bhir dekh apan Sandesh bhejlah aa fer hunkar sange aasram par ja bartalap kenai mon bhabuk bho gel.
जखना ई बजलाह, मुनि अगस्ति भगवान शुनि ॥३५॥
तिनु जन प्रभु चललाह, पञ्चवटी उद्देश्य कय ॥३६॥
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