“मिथिलामे माछक महत्व “

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— दिलिप झा।   

 

मैथिल सभ्यता में माछक बड्ड पैघ सांस्कृतिक आ पारंपरिक महत्व अछि। मैथिल समाज माछ देख क’ यात्रा करब शुभ मानैत छैथ। एतबे नहि दरभंगा महाराजाक सभ राजकीय कागज पर जोड़ा माछक आकृति मुदृत छलैन्ह आ संगहि राज दरभंगा द्वारा निर्मित सभ लौह-गेट पर जोड़ा माछक आकृति बनल भेटैत अछि जे आइओ अवशेष पर देखल जा सकैत अछि। संभवतः एही कारण स’ हमर सभक पहचान विश्व पटल पर किछु एहि तरहक पंक्तिक संग कैल जाइत रहल अछि जे अपना आप में स्वयं स्पष्टीकरण के लेल पर्याप्त थिक
“पग-पग पोखर, माँछ, मखान,
मधुर बोल मुस्की मुख पान।
विद्या, वैभव, शांति प्रतीक,
सरस नगर ई मिथिला थींक”।
हमर सभक संस्कृति में प्रारंभे स’ माछ एना रचल बसल अछि जे जीवन पर्यन्त कोनो तरहक मांगलिक काज होइ अथवा अमांगलिक काज होई कतहु ने कतहु माछक अपन अलग अलग महत्व छैक जे एकर अनिवार्यता के लेल मैथिल समाज के वाध्य कै देने अछि जेना छटिहार, द्विरागमन, श्राद्ध कर्म, श्राद्धकभोज, चतुर्थी इत्यादि इत्यादि।
आध्यात्मिक महत्त्व त’ इ छैक जे स्वयं भगवान विष्णु मत्स्य अवतार लेने छलाह तैं हेतु एकरा शुभक संकेत मानल जाईत छैक। मान्यता छैक जे घर में माछ रखला पर मां लक्ष्मी केर बास होइत छैन्ह, घर में दरिद्रता दूर होइत छैक।
वास्तु शास्त्र के अनुसार सेहो घर में माछ राखब शुभ मानल जाइत अछि। ऐहेन मान्यता छैक जे घर में राखल सब वस्तु अगर वास्तु के अनुरूप होइक त’ सकारात्मक ऊर्जाक प्रवाह निरन्तर होईत छैक। पौराणिक मान्यताक अनुसार ब्रह्मा वास्तु-शास्त्र के बनेने छलाह जे कोनो घर वा कार्य स्थलक निर्माण के लेल विशेष फलदायी मानल जाईत छैक। घरक उन्नति में वास्तु शास्त्रक विशेष महत्व होइत छैक। चूकी माछ चपल, चंचल आ चलायमान होइत अछि। जकरा देखबा मात्र स’ नकारात्मकता खतम भ’ जाइत छैक आ शरीर में स्फूर्तिक संचार होइत छैक। ताहि कारण स’ वास्तु शास्त्र के अनुसरण करैत मिथिलाक घर घर में कोनो शुभ स्थल पर जेना की कोबर, उपनाइनक यज्ञशाला मरबा इत्यादि सब पर स्त्रीगण सभक द्वारा माछक चित्रालेख करबाक परम्परा रहल अछि। मिथिला पेटिंग में माछ के बहुलता देखल जाइत अछि। जे शुभ सुचक होइत अछि।
प्रतीकवाद में माछ के भावना आ अवचेतनक दायरा में गहराई तक जैबाक शक्ति, दिव्य स्त्रीत्व, प्रजनन क्षमता, कामुकता, उपचार आ रिश्ता में जुराव के संग जोरि क’ देख सकैत छी। माछ दृढ़ संकल्प आ लचिलापन व्यवहार के प्रतिनिधित्व करैत अछि।
ज्योतिष शास्त्र हस्तरेखा विज्ञान में तरहती पर माछक निशान के भेनाइ शुभ आ निक फलदायक मानल जाइत अछि। किछु लोक सब अपन तरहती पर माछक आकृति केतु या चंद्र पर्वत के ऊपर बनबैत छैथ। माछक आकृति के इ निशान अगर मणिबंध रेखा पर बनल होइक त’ ओ व्यक्ति बहुत भाग्यशाली आ सम्पन्न होइत छैथ। अतः मैथिल समाज में माछक आकृति गोदना गोदा क’ वा तरहती पर मेहंदी लगा क’ बनैल जाइत अछि।
माछ जीवन के जल में डुबल विश्वास सभक प्रतीक सेहो भ’ सकैत अछि। तइओ माछ ठंढ़ खुन बाला होइत अछि, जुनून स’ प्रेरित नहि होइत अछि आ अक्सर एहने जुनून भावनाहिन संस्था सभक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
माछक प्रतिकवाद के प्रयोग आदि कालहि स’ कोनो ने कोनो रूप में कैल जा रहल अछि। कतहु इ सम्मानक प्रतीक त’ कतहु ई निर्माणक प्रतीक। मत्स्य आ मनु के कहानी में स्पष्ट कहल गेल अछि जे कोन प्रकारे माछ सृष्टि के रचना में सहायक बनल छल। अन्य संस्कृति सभ में सेहो माछक प्रतीकवाद सृष्टिक निर्माण के संदर्भित करैत अछि। उदाहरण स्वरूप बौद्ध धर्म सेहो हमर मैथिल संस्कृति जेकाँ माछ के खुशी आ सौभाग्यक प्रतीक मानैत अछि। जाहि धर्म के उद्भव मिथिला स’ भेल होइक ओ भला माछक महत्व स’ कोना बंचित रहि सकैत अछि। बौद्ध धर्म के आठ शुभ प्रतीक सब में माछो एक टा प्रतीक अछि जे कल्याण, खुशी आ स्वतंत्रताक प्रतिनिधित्व करैत अछि। बौद्ध मत के अनुसार माछ निर्भयता के स्थिति में रहबाक, कष्ट में समुद्र में डूब’ स’ निर्भिक आ स्वतंत्र रूप स’ अनायासे कोनो जगह स’ पलायन करबाक प्रतीक अछि। कियैक त’ माछ अक्सर झुण्ड में हेलैत अछि ताहि कारण स’ जोड़ा माछक बौद्ध प्रतीक या दरभंगा राजक प्रतिक में जोड़ा माछ चित्रित कैल गेल अछि। जे पाइनक संग माछक सम्बंध के दर्शाबैत अछि। जल सब जीवन के आधार थिक आ एहि तरहे माछ सृष्टि के रचना के प्रतिनिधित्व करैत अछि। जल में माछक उपस्थिति एहि प्रकार होइछ जेना मनुष्यक भ्रूण अपन माय के गर्भ में रहैत अछि आ संसार में एला उपरान्त सबके खुशी आ समृद्धि दैत अछि। ओही तरहे माछ सबके खुशी आ समृद्धि प्रदान करैछ। बौद्ध मत के मान्यता थिक जे जोड़ा आकर्षक माछ शरीर आ मन के बीच संतुलन के व्यक्त करैत अछि। जे हमरा सभ के उच्च-चेतना तक पहुँचबा में सहायक होइत अछि जेकरा बौद्ध निर्वाण या समाधि कहल जाइत अछि। जखन मनुष्यक शरीर आ मन असंतुलित होइत अछि त’ ओ भ्रम सहित क्रोध, घृणा, ईर्ष्या आ अन्य भय-आधारित भावना सभक शिकार भ’ जाईछ आ तदुपरांत लोक के संतुलन के आवश्यकता होइछ।
मैथिलक सर्वश्रेष्ठ आ सभक रुचि पर राज करय बाला खाद्य में माछक वर्णन स’ वंचित रहनाई तर्कसंगत नहि प्रतीत होईछ। माछ अपन औषधिय महत्व के कारण मिथिलाक खाद्य में अपन विशिष्ट स्थान रखने अछि। माछ मिथिलाक सर्वप्रिय खाद्य थिक। जेकरा बनेबाक तरीका सेहो अपना आप में मिथिला में विशिष्ट अछि जे मिथिलाक मुख्य खाद्य अछि। जाहि स’ मिथिला बासी कुशाग्र एवं तीक्ष्ण बुद्धि के होइत छैथ। एहि में प्रोटिन के प्रचुरता मैथिल के शारिरीक आ मानसिक रूप स’ सबल बनबैत छैन्ह। हरिमोहन झाक इ पांति एकर प्रमाण अछि “यौ बाबा जन्म कियैक देल जखन रहुक मुरा हमरा कंठ तर नहि गेल”। स्पष्टतः मैथिल जन के खाद्य में माछक उपस्थिति पुर्बहि स’ हिनकर थारी के विशेष पहचान रहल अछि। जे मैथिल जन के मत्स्य प्रेम के दर्शबैत अछि।
माछक एहि तरहक आध्यात्मिक, प्रतिकवादी, औषधीय महत्व के भला मिथिलाक संस्कृति जे अपना आप में प्राचीन आ समृद्ध कहबैछ कोना अबहेलना करैत अतः मिथिला संस्कृति में डेग डेग पर एकर यथोचित एवं महत्वपूर्ण स्थान देल गेल अछि।
जय मिथिला जय मैथिली