“बेमेल विवाह : पहिने आ आब “

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— आभा झा   

हमर माननाइ अछि कि हरेक विवाह बेमेल विवाह होइत अछि, कियैकि कियो दू व्यक्ति एके सोच, एके विचारधारा, एके धार्मिक आस्था, एके रहन-सहन, एके मन- मिजाज, रूपरंगमे समकक्ष, आर्थिक स्थितिमे समान, शिक्षामे समान हुए, भेटनाइ लगभग असंभव अछि। जीवनसाथी
भेटनाइ कपड़ा सियेबाक जेकां तऽ नहिं होइत अछि कि अपन नाप देलौं, अपन डिजाइन चुनलौं, पसंदक कपड़ा किनलौं आ कोनो बढ़ियाँ दर्जीसँ सिया लेलहुँ।
बेमेल विवाह कोनो ने कोनो कारणसँ हमेशा होइत रहल अछि, ताहि लेल ई देवदासक पारोकेँ विवाह हुनकर मायक जिद्दकेँ कारण जल्दबाजीमे बूढ़ धनीक आदमीसँ करवा देल गेलनि। प्रेमचंदक उपन्यासमे निर्मला दहेजक अभावमे बूढ़सँ ब्याहि देल गेलीह। दुनू नायिकाकेँ जीवनक त्रासदीकेँ कारण बेमेल विवाह ही छलनि।
हरेक विवाहमे सामंजस्य बनेनाइ जरूरी अछि, पहिने लड़कीसँ केवल उम्मीद कएल जाइत छल कि ओ सासुरक माहौलमे अपना आपके ढालि सकैथ। ई सेहो कहल जाइत छल कि लड़कीकेँ पालन-पोषण एहेन हेबाक चाही कि ओ पइनकेँ जेकां ही जे रंग मिला दिय ओहने रंगमे ढलि जेती। जाहि बासनमे राखि दियौन ओहने आकार लऽ लेती। एक तरहसँ लड़कीकेँ पहचानकेँ ही नकारि देल जाइत छल, मुदा आब एहेन बिल्कुल नहिं अछि। लड़काकेँ सेहो विवाहकेँ सफल बनेबाक लेल बहुत सामंजस्य बनाबै पड़ैत छैक। ई सामंजस्य केवल पति-पत्नीक बीच ही नहिं दुनू परिवारक बीच बनेनाइ जरूरी अछि।
बेमेल विवाहक अर्थ अछि कि जयऽ पति-पत्नी एक दोसरसँ बहुत अलग होइथ। एहि अंतरक आधार, लंबाई, मोटाई या दुबर भेनाइ, रंगरूप, शिक्षा, वयस, धार्मिक आस्था, परिवारक आर्थिक स्थिति, विचारधारा, शौक, मिजाज, शहरी या ग्रामीण परवरिश अथवा किछु भऽ सकैत अछि। माता-पिता अपन बच्चाक संबंध बच्चाक अनुरूप पात्रसँ ही करय चाहैत छथि। बेटीक संबंध जाहि परिवारमे होइ ओ कमसँ कम हुनकर बराबरीकेँ होइ, लड़का लड़कीसँ वयसमे पैघ होइ, हुनकासँ बेसी कमाइत होइ। कतेक ठाम तऽ अगर लड़कीकेँ दरमाहा लड़कासँ बेसी रहैत छैक तखन लड़का वालाकेँ इज्जत पर पड़ैत छैन्ह। लड़काकेँ माता-पिताकेँ लड़की सुंदर, सुशील चाही जे बाहर बेटा संग हाॅट पैंटमे आ स्कर्टमे रहैथ आ गाममे घोघो तनैथ। दहेज सेहो एक मुख्य मुद्दा भऽ सकैत अछि।
पति-पत्नीमे सँ एक बेसी शिक्षित आ दोसर कम शिक्षित तखनो कहल जाइत अछि कि बेमेल विवाह अछि। कियो व्यवसायी व्यक्ति कतबो कमा लैथ मुदा विवाहक समय हुनकर शिक्षा पूछल जाइत अछि। शिक्षा केवल विश्वविद्यालयक डिग्रीसँ ही नहिं भेटैत अछि, जीवनक अनुभव, व्यवसायक अनुभव सेहो बहुत महत्वपूर्ण होइत अछि।
सामाजिक रूपसँ वैवाहिक बेमेलता हम तखन देखैत छी जखन कि पति-पत्नीक मध्य संस्कृति एवं सभ्यताक स्तर पर स्पष्ट अंतर होइत अछि। दुनूमे सँ कियो एक गामसँ संबंधित अछि तऽ दोसर शहरसँ, जतऽ एक परंपरा आ रूढ़िकेँ पुजारी अछि, तऽ दोसर हर बातकेँ तर्कक कसौटी पर कसयकेँ अभ्यस्त होइत अछि। अपन-अपन डफली, अपन-अपन-राग, परिणामतः टकराव आ अलगाव स्वाभाविक रूपसँ जन्म लैत अछि।
एक ही धर्मकेँ मानय वालाकेँ आस्था, संस्कार, विचार आ रीति-रिवाजमे बहुत अंतर भऽ सकैत अछि। कोनो परिवारमे पूजा-पाठ, हवन-पूजन रोजकेँ बात छैक आ कोनो परिवारमे खास पाबनि-तिहार पर ही पूजा होइत छैक। कियो मूर्ति पूजक होइत अछि तऽ कियो कोनो गुरूकेँ मानैत अछि। लड़का-लड़कीमे कियो शाकाहारी रहैत अछि तऽ कियो मांसाहारी। ई सेहो एकटा बेमेलक आयाम भऽ सकैत छैक। लड़की अगर शाकाहारी अछि तखन सासुरक लोककेँ होइत छैन्ह कि ओहो मांसाहारी खाइथ या मांसाहारी बनबैथ। कियो एहनो छथि जिनका एहिसँ कोनो फर्क नहिं पड़ैत छैन्ह।
कोनो विवाहमे अनुकूलता हेबाक यानि एक-दोसरकेँ अनुरूप ढलनाइ, ओहो अपन पहचान आ अस्तित्व बना कऽ रखनाइ बहुत जरूरी होइत छैक। यदि ई नहिं भऽ सकल तखन विवाह बेमेल ही रहैत अछि। हमर अपन अनुभव अछि कि मिथिलांचलमे 90% विवाह बेमेल होइत छैक।
बेमेल रहलाक बादो विवाहमे अगर ईश्वरक कृपासँ प्रेमरस घूलि जाइत अछि तखन पति-पत्नीक जीवन सुखमय रहैत अछि। एकर विपरीत बहुत चीज समान रहबाक बावजूद यदि पति-पत्नीकेँ बीच यदि प्रेम-भाव नहिं विकसित भऽ पाबय छैक तखन ओ विवाह बेमेल मानल जायत।
बेमेल विवाह होमयमे विभिन्न एहेन तथ्यक भूमिका होइत अछि जेकरा हम अक्सर विवाहक समय अनदेखा कऽ दैत छियैक। यदि कुंडलीकेँ गुणक मिलानक अपेक्षा एहि छोट-पैघ बातकेँ ध्यान देल जाइ तखन संभवतः संबंधक निरंतर टूटयकेँ श्रृंखलाकेँ सीमाबद्ध कएल जा सकैत अछि।
जय मिथिला, जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद