“विद्या ददाति विनयम्, विनयाददाति पात्रताम्।”

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— कीर्ति नारायण झा।     

“विद्या ददाति विनयम्, विनयाददाति पात्रताम्।पात्रत्वाध्नमाप्नोति, धनाद्धर्म ततः सुखम्” अर्थात विद्या सँ विनय प्राप्त होइत छैक, विनय सँ पात्रता अर्थात योग्यता प्राप्त होइत छैक, पात्रता सँ धन केर प्राप्ति होइत छैक, धन सँ धर्म होइत छैक आ धर्म सँ सुख केर प्राप्ति होइत छैक।आधुनिक शिक्षा जे भारतीय संस्कृति के छोड़ि पश्चिमी सभ्यता के तर्ज पर नव धिया पूता के घसीटने जा रहल अछि जकर दुष्प्रभाव नवयुवक आ नवयुवती के बैवाहिक जीवन पर स्पष्ट देखाइ पड़ि रहल अछि। नव परिपाटी नियम कानून सेहो तदनुरूप बनल जा रहल छैक। भारतीय सभ्यता में आइयो सभ सँ बेसी अभिभावक द्वारा कराओल गेल बिवाह बेसी सफल मानल जाइत छैक। बिवाह जे मनुखक दू टा पवित्र आत्मा के मिलन के कहल जाइत छैक आ अपरिचित आत्मा के मिलन बेसी रोमांचित करय बला होइत छैक नहि तऽ “देखले कनियाँ आ देखले बर, भऽ गेल सभ किछु, चल अपन घर” बाली बात होइत छैक। हम सभ ओहि मिथिला के रहनिहार छी जाहि ठामक बेटी जनक नन्दिनी जानकी बिवाह सँ पूर्व भगवान राम के मात्र फूलवाड़ी में देखने छलीह, दुनू एक दोसर सँ अपरिचित आ आब तऽ बिवाह सँ पूर्व वर कनियाँ के एक संग रहवाक नियम” लिविंग इन रिलेशन “न्यायालय द्वारा मान्य भऽ गेलैक आ जकर दुष्परिणाम सँ सभ दिन अखबार रंगल रहैत अछि जे युवक के द्वारा युवती के एतेक टुकड़ा में काटि कऽ फेकि देल गेलैक, एकर पाछू आधुनिक शिक्षा आ आधुनिक परिपेक्ष्य आ रहन सहन पूर्ण रूप सँ जिम्मेवार अछि।प्राचीन वैदिक काल में गुरु शिष्य परम्परा सँ शिक्षाक उपार्जन कयल जाइत छल जाहि मे शिष्य गुरु के आश्रम में रहि कऽ शिक्षा ग्रहण करैत छलाह। शिक्षाक अतिरिक्त ओहि शिष्य के रहन सहन, बात बिचार पर सेहो अत्यंत बारीकी सँ ध्यान राखल जाइत छल। अपन सभक देश भारत शिक्षा के क्षेत्र में जगत गुरु के पदवी सँ विभुषित भेल छल। संसार में सभ सँ पहिले सभ्यता, संस्कृति आ शिक्षाक शुभारम्भ भारत में भेल छल। शिक्षार्थी के गुरूकुल में रहि कऽ विज्ञान, नीति, युद्धकला, वेद आ शास्त्र केर ज्ञान देल जाइत छल। आब परिस्थिति पूर्ण रूप सँ बदलि गेल अछि, शिक्षार्थी अभिभावक सँ दूर शिक्षक के नजरि सँ दूर रहि आधुनिक शिक्षा ग्रहण करैत छैथि आ हुनका में मात्र किताबी ज्ञान रहैत छैन्ह मुदा नीति, ब्यवहार अथवा संस्कार के शिक्षा सँ ओ मीलों दूर रहैत छैथि। एकर सभ सँ पैघ कारण छैक जे आधुनिक पढाइ के एकमात्र उद्येश्य छैक आजीविका ग्रहण केएनाइ, ओकर बैचारिक विकास, ब्यवहारिकता, चरित्र निर्माण इत्यादि प्रकारक कोनो शिक्षा नहिं देल जाइत छैक जकर दुष्परिणाम ओकर बैवाहिक जीवन पर प्रत्यक्ष रूप सँ देखल जाइत छैक। पहिले के जमाना में शिक्षार्थी पच्चीस वर्ष धरि गुरूकुल में रहि कऽ ब्रम्हचर्य के पालन करैत शिक्षा ग्रहण करैत छलाह जे आब पूर्ण रूप सँ पलटि गेल अछि। धिया पूता के खराब चीज के आदति यथा सिगरेट, गुटका, मद्यपान इत्यादि केर लत विद्यालय के अवस्था सँ अप्रत्यक्ष रूप सँ सिखाओल जाइत छैक। आइ काल्हि के युवक युवती के बर्दाश्त करवाक क्षमता सेहो समाप्त भऽ गेल छैक जकर दुष्प्रभाव बैवाहिक जीवन पर प्रत्यक्ष रूप सँ पड़ैत छैक। आवश्यकता छैक युवक युवती के पारिवारिक संस्कार, सझिया परिवार के विषय में आ अपन दादा दादी अथवा नानी द्वारा पारिवाररूपी गाड़ी के सफलता पूर्वक चलेवाक विषय में चर्चा केएनाइ, लड़ाई झगड़ा के दुष्परिणाम के विषय में धिया पूता लग चर्चा कयनाइ आ सफल बैवाहिक जीवन के मूल मंत्र सँ धिया पूता के परिचित करायव इत्यादि आ तखने एहि पारिवारिक कलह के समाप्ति आ सफल बैवाहिक जीवन केर परिकल्पना कयल जा सकैत अछि।