“ऋतुराजकेँ अनुराग,प्रेम तथा स्नेहक प्रतीक तथा कामदेवक सखा मानल जाइत अछि।”

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— आभा झा।   

 

प्रकृति आ मानवक संबंध आदिकाल सँ रहल अछि। भारतमे शीत ॠतुक बाद मधुमास अथवा बसंत ॠतुक आगमन होइत छैक। ई ॠतु बड्ड मस्त —-बड्ड मनभावन होइत अछि। बसंत ॠतु प्राकृतिक सौंदर्यक प्रतीक अछि।भारतीय इतिहासक महानायक श्रीरामक जन्मक मंगल मुहुर्त सेहो यैह मधुमास अछि। भारतक संस्कृति प्रेममय रहल अछि। एकर सब सँ पैघ उदाहरण बसंत पंचमीक पावन पर्व अछि। प्राचीन कालमे स्त्री सभ एहि दिन अपन पतिकेँ कामदेवक रूपमे पूजा करैत छलीह, कियैकि एहि दिन कामदेव आ रति सर्वप्रथम मानव हृदयमे प्रेम आ आकर्षणक संचार कयने छलाह। यैह प्रेम आ आकर्षण दुनूकेँ अटूट संबंधक आधार बनल, संतानोत्पत्तिकेँ माध्यम बनल।
ऋतुराजकेँ अनुराग,प्रेम तथा स्नेहक प्रतीक तथा कामदेवक सखा मानल जाइत अछि। बसंतक आगमन पर स्वर्गमे समस्त देवगण सेहो सोमपान करैत आनंदोत्सव मनबैत छथि।
प्राचीन भारतमे पूरा वर्षकेँ छह ॠतुमे विभाजित कएल गेल अछि, ओहिमे बसंत जनमानसक प्रिय ॠतु अछि।एकरा मधुमास सेहो कहल जाइत अछि। एहि दौरान सूर्य कुंभ राशिमे प्रवेश करैत अछि। एहि ॠतुमे खेतमे फसल पाकय लगैत अछि, वृक्ष पर नब पात आबि जाइत अछि, आमक शाखामे मज्जर आबि जाइत अछि। उपवनमे रंग-बिरंगक पुष्प फुलाइत अछि। चारू दिस रंग-बिरंगक तितली वातावरणकेँ और बेसी सुंदर बना दैत अछि।
बसंत ॠतुक धार्मिक महत्व सेहो अछि। बसंत ॠतुक स्वागत करयकेँ लेल माघ मासक पांचम दिन महोत्सवक आयोजन कएल जाइत अछि।एहि उत्सवमे भगवान विष्णु आ कामदेवक पूजा होइत अछि। शास्त्रमे बसंत पंचमीकेँ ॠषि पंचमी सँ उल्लेखित कएल गेल अछि तऽ पुराण तथा अनेक काव्य ग्रंथमे एकर अलग-अलग ढंग सँ चित्रण भेटैत अछि। मान्तयता अछि कि सृष्टिक प्रारंभिक कालमे भगवान विष्णुक आज्ञा सँ ब्रह्मा जीवक रचना केलनि, परंतु एहि सँ ओ संतुष्ट नहिं छलाह। भगवान विष्णु अपन कमंडल सँ जल छिड़कलाह, जाहि सँ एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट भेलीह। जिनकर एक हाथमे वीणा तथा दोसर हाथ वर मुद्रामे छलनि। अन्य दुनू हाथमे पुस्तक एवं माला छलनि। ब्रह्मा देवी सँ वीणा बजबैकेँ अनुरोध केलनि। जहाँ ने देवी वीणाक मधुरनाद केलनि, तखने संसारक समस्त जीव-जंतुकेँ वाणी प्राप्त भऽ गेल। जलधारामे कोलाहल व्याप्त भऽ गेल। पवन चलला सँ सरसराहट होमय लागल। तखन ब्रह्मा ओहि देवीकेँ वाणीक देवी सरस्वतीक नाम देलखिन। बसंत पर्व सँ जुड़ल कतेक किंवदंती, कथा अथवा प्रसंग इत्यादि अछि-
जेना महादेव आ कामदेव, श्रीराधा – कृष्ण।
प्रकृति नवयौवना भऽ कऽ दुल्हिन जेकां सजि जाइत अछि। कवि कुलभूषण कालिदास अपन अनूठा श्रृंगारित प्रकृति वर्णन सँ परिपूर्ण ‘ ॠतुसंहारमे बासंती धराकेँ दुल्हिन मानैत छथि – बसंत अछि, फागुन अछि, रंग अछि तऽ होली सेहो हेबे करत। सालमे एक बेर बसंत अबैत अछि, एक बेर फागुनो अबैत अछि मुदा बासंती पवन आ फागुनी बौछार जीवनमे ओ रंग भरि जाइत अछि कि लोकक स्मृति रंगीन भऽ जाइत अछि और यदि रंग नहिं रहितै तऽ जीवन नीरस भऽ जइतै।
‘ मैथिल कोकिल ‘ केँ उपनाम सँ विख्यात मैथिली कवि विद्यापति बसंत ॠतुक मनोहर चित्रण प्रस्तुत करैत लिखने छथि –
नव वृंदवन नव-नव तरूगण
नव-नव विकसित फूल।
नवल बसंत नवल मलयानिल,
मातल नव अलिकूल
बिहराई नवल किशोर।
विद्यापति मनोहारी बसंतक माध्यम सँ जीवनक किछु सुखद क्षणकेँ वर्णन केने छथि, ओतहि दोसर दिस फूलक आगमनक संग वृक्षमे नव किसलय सुगंधित वायु सँ बसंतक आगमन बतौने छथि। कवि विद्यापति तऽ बसंतक राजसी ठाठक अपन कवितामे साकार कयने छथि – आयल ॠतुपति राज वसंत
धाओल अलिकुल माधवी पंथ।
भारत प्राकृतिक सुषमाक देश अछि। एतयकेँ ॠतुक अपन अलगे अंदाज छैक जाहिमे नागाधिराज हिमालय सँ लऽ कऽ पशु-पक्षी, चुट्टी, जीव-जंतु, गाछ-बिरिछ, पुष्पलता आदि सभ मिलि कऽ एकर शोभाकेँ अलग-अलग किंतु अनेकतामे एकताक दर्शन करबैत अछि। आजु वृक्षक कटाव आ शहरी जीवनकेँ जीबयकेँ होड़मे पर्यावरणकेँ प्रभावित कएने अछि। प्रकृतिक पुकार दृश्यकेँ बचबै आ संवारैकेँ आवश्यकता अछि। हमरा सभगोटेकेँ प्रकृतिक प्रति, जीव-जगतक प्रति सचेष्ट हेबाक आवश्यकता अछि।
जय मिथिला, जय मैथिली।

आभा झा
गाजियाबाद