घटकैती – हास्य प्रसंग

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साहित्य

– अरुण कुमार मिश्र

१९९१ ई० क ई घटना छैक, तहिया हम बी० काम (आनर्स) मे पढ़ैत रही। घनघोर लग्नक समय छल, हम अपन एक गोट ग्रामीण महावीर झाक आग्रह पर एक टा घटकैतीमे अपन गाम सँ एक कोस पश्चिम भंटबढ़ना गेलौ, लड़काक नाम शत्रुघ्न झा छल। लड़का हमर गाम सँ एक कोस उत्तर ‘मुुढ़ही कचरी’ कालेजमे बीएससी (आनर्स) मे पढ़ैत छलाह। नित दिन हमरे गाम द’ कालेज अबैत जाइत छलाह।

पढ़ाई त’ ओ नामे लेल करैैत छलाह वा बुझि लिय ब्याहे लेल करैत छलाह। शर्टक जेबमे तीन टा पेन खौंसने सदिखन घुमैथ। लड़का देखयमे बडु सुन्नर, बुझु त’ राजकुमार छलैथ। माथ पर पांच बीघा जत्था सेेहो छलनि। दरबज्जा पर महिस बड़द आ पुआरक टाल देखि एक गोठ ठोस दिरहस्तक बुझना जाइत छल मुदा हुुनक परिवारक मोट चालि देखि, एको टा नीक कन्यागत नहि पहुँचैत छलैन। लड़का के पिता पच्चास हजार टका आ एक टा फटफटिया के मांग रखने छलखिन, से आर बड़का मुश्किल।

हम सब चारि मनुहारी साँझमे हुनका दरवज्जा पर पहुचलौं, ओहि मे पढ़ल लिखल जे किछु से हमी छलौं ……लड़का सँ परिचय पात पुछवाक भार हमरे भेटल………परिचय पातक औपचारिकताक उपरांत हम हुनका सँ न्युटनक तेसर नियम पुछि देलयिन। लड़का कतेेको देर धरि बरेरी दिस तकैँत रहि गेला आ उत्तर नै द’ सकलाह। साइंसक विद्यार्थी जानि किछु आर पुछलैन जेना (a+b)^2=? इत्यादि। हमरा भेल जे किछु इतिहास वा सामान्य ज्ञान सम्बन्धित प्रश्न पुछल जाय…… जेना अखन सर्वोच्च न्यायालय के मुुख्य न्यायाधीश के छैथ ?……………मुदा ओ किछु नहि कहि सकलाह। जखन हुनका बुते हमर एको टा प्रश्नक जवाब नहि देल भेलनि…….. हम हुुनका कहलियन……. जखने हम अहाँक शर्टक जेबमे तीन टा पेन खोंसने देखलौं, तखने बुझि गेल छलौं जे अपने कतेक होशगर छी…….हमरा पर तमतमाइत ओ बजलाह जे अहाँ जतेक बुढ़बक अहाँ हमरा बुझैत छी ततेक हम नहि छी……. ताहि पर हमरा नहि रहल गेल। हम कहलैन…….. जे अपने बुड़बक छी से धरि स्वीकारलौं……..थोरेक कम्मे सही।

लड़काक पिता इ सब सुनि तमासे पैर पटकैत आंगन गेला आ किछु मंत्रणा क’ बाहर अएला आ हमरा एकांतमे ल’ जा क’ कहलखिन……… जे अपने आब बेसी किछु नहि पुछियो……..हम ई कथा करय चाहैत छी अपनेके जे उचित बुझना जाय से दिया देबैक आ हमरा कानमे कहलनि जे अपनेहुँ लेल एक टा अद्वितीय सुन्नरि कन्या हम देखने छी, हमर लंगितमे छैथ, शीघ्र हम सब अहाँ ओहिठाम अबैत छी। हम सुनि अवाके रहि देलौं……….आब त’ हमर वाके बंद भ’ गेल।😀

तकर बाद आंगनमे चारि कप चाहक लेल ओ कहलखिन……..आधा घंटाक धरि जखन चाह नहि आएल त’ पुन: ओ अपन बेटी के नाम ल’ शोर करैत कहलखिन जे चाहक कि भेल ? हुनक बेटी आंगन सँ निकलि बजली…………. बाबू चाह पत्ती आ चिन्नी त’ दरवज्जे पर राखल कटही बाक्स मे अछि। बुढ़ा बजलखिन……कालहि जे ओतेेक रास चिन्नी आ चाह पत्ती देने रही से निघटि गेल कि ?

बुढ़ा अपने जे ओहि कटही बक्सा पर बैसल छलैैथ…… ओहि सँ उतरि थोरेक चिन्नी आ चाह पत्ती बाहर क’ बेेटी के देलखिन। चाह पत्ती सालगस्त छलैक आ चिन्नीमे बेस चुट्टी लागल छलैक……. थोरेक कालमे ओहि चाह पत्ती आ चुट्टी लागल चिन्नी के बनल चारि कप चाह सोझामे आएल, हम बाम दहिन देखि चाह फेंकि देलौं। हमर तीनू ग्रामीण कुनु तरह चाह पीब लेलनि। आगु ओ कथा आदर्शे भेलैक मुदा हम दोहरा के पुुन: नहि गेलौं ओहि ठाम।

……अरुण कुमार मिश्र