अपन कल्याण लेल अपने जागल रहीः आध्यात्मिक चिन्तन

आउ किछु नीक चिन्तन करी
 
(स्वाध्याय)
 
वन्दना
 
शङ्खं प्रसारितसुखं स्वपदाश्रितानां चक्रं सदा दमितदानवदैत्यचक्रम्।
कौमोदकीं भुवनमोदकरीं गदाग्र्याँ पद्मालयाप्रियकरं प्रथितं च पद्मम्॥
संधारयन्तमतिचारुचतुर्भुजेषु श्रीवत्सकौस्तुभधरं वनमालयाढ्यम्।
सिन्धोस्तटे मुकुटकुण्डलमण्डितास्यं श्रीद्वारकेशमनिशं शरणं प्रपद्ये॥
 
जे अपन चरणाश्रित भक्तक लेल सुखक प्रसार करयवला शंख केँ, सदा दैत्य ओ दानव केर दल केँ दमन करयवला चक्र केँ, सम्पूर्ण भुवन केँ आनन्द प्रदान करयवला कौमोद केर नामवला श्रेष्ठ गदा केँ तथा पद्मालया (लक्ष्मीस्वरूपा रुक्मिणी) केँ प्रिय करऽ वला प्रख्यात पद्म-पुष्प केँ अपन अत्यन्त मनोहर चारू हाथ मे धारण कएने रहैत छथि, जे अपन वक्षःस्थलपर श्रीवत्स केर चिह्न तथा कौस्तुभमणि धारण कयकेँ रखने छथि, जे वनमाला सँ विभूषित छथि, तथा जिनकर मुखमण्डल किरीट आ कुण्डल सँ अलंकृत अछि; ओहेन सिन्धु-तटवर्ती श्रीद्वारकानाथजीक हम निरन्तर शरण ग्रहण करैत छी।
 
– पं. श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री ‘राम’ कृत ‘श्रीद्वारकेशाष्टक’ सँ
 
चेतना हो प्रवीणः
 
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपाजयते।
सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥गीता, अध्याय २, श्लोक ६२ आ ६३॥
 
जीवन लेल बहुत रास शिक्षा अपन शास्त्र-पुराणक स्वाध्याय सँ प्राप्त होएत अछि, आवश्यकता एहि बातक छैक जे अहाँ जीवन केना जियब पसीन करैत छी। ध्यान जँ परमपुरुष परमात्माक अदृश्य निराकार परञ्च यत्र-तत्र-सर्वत्र हुनकहि दर्शन करबाक रहत तँ श्रेष्ठ सँ श्रेष्ठ दर्शन ओहि श्रेष्ठतम् – महानतम् – परमेश्वरक दर्शनक क्रम मे सभ बातक दर्शन होएत रहत। आब जँ ध्याने अहाँक सदिखन क्षुद्र बहस आ निरर्थक विवाद मे रहत त कहू जीवनक सदुपयोग केना करब!
 
गीताक ई दुइ श्लोक जीवन लेल एकटा गंभीर दर्शन दय रहल अछि। कोनो विषय मे रमण करब हमरा-अहाँ लेल घातक अछि। प्रत्येक एहेन विषय केँ मन सँ हँटबैत रहबाक चाही जे प्रसन्नताक बाधक हो। अपनहि हानि पर बेर-बेर आ बहुत देर तक नहि सोचक चाही। हानिक भावना प्रसन्नता केँ नाश कय दैत अछि। एहि सँ हमरा लोकनिक आध्यात्मिक शक्तिक सेहो ह्रास होएत अछि। सब तरहक घटनाक नीक पक्षपर विचार केला सँ मनक प्रसन्नता बनल रहैत छैक। परमपिताक चिन्तन सेहो सदैव मनुष्य केँ आत्मप्रसन्नता प्रदान करयवला होएत अछि। खाली मस्तिष्क मे तरह-तरह केर उपद्रवी विचार आयब स्वाभाविक छैक। जहतर-पहतर घूमय वास्ते जँ एकरा (अपन मस्तिष्क केँ) छूट देबैक तैयो ई बौआएत रहत। अतः रमण करबाक लेल एकमात्र विषय छैक ‘जय सियाराम, जय जय सियाराम’।
 
विषये मे रमण करबाक एकटा आरो पक्ष छैक, सदैव अपन लाभे टा सोचय मे कथमपि भौतिक सुख-सुविधा आ टका-पैसा केर चिन्ता जँ धय लेत त फेर बर्बाद! उपरका श्लोक मे यैह स्पष्ट कहि देल गेल छैक जे जँ सांसारिक विषय मे मोन बेसी सोचत तँ ओहि विषय मे आसक्ति उत्पन्न होयत। आसक्ति भेला सँ ओहि विषय लेल मोन मे कामना उत्पन्न होयत। पुनः ओ कामनाक पूर्ति मे विघ्न पड़ला पर तामश चढत, क्रोध आयत। क्रोध मे संमोह यानि मूढताक (मूर्खता) भाव एब्बे टा करत। आर, ई संमोह भेला सँ यानि मूर्खताक भाव सवार भेला सँ स्मृतिक विभ्रम यानि नाश, नीक-नीक बात जे आ सही-गलत केर विवेकादि सब चौपट होयत। तैँ, भगवान् कृष्ण स्पष्ट लिंक जोड़ैत कहलनि अछि ‘स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो…. बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।’ अर्थात् स्मृतिक नाश भेला सँ बुद्धिक नाश, बुद्धिक नाश भेला सँ स्वयं नाश, सर्वनाश भऽ जायत।
 
सर्वनाश सँ बचबाक लेल बैक गेयर लगाकय फेर सँ पहुँचू… बुद्धिक रक्षा करू, स्मृतिक रक्षा करू, मूढताभाव सँ बचू, कोनो कामना मे जुनि फँसू, विषय मे आसक्त एकदम नहि होउ, बड बेसी संसार मे रमण करबे नहि करू। निरपेक्षभाव सँ ईश्वरक देल जीवन सदिखन जियैत आगू बढैत रहू। कोनो एहेन कर्म जुनि करू जे बान्हय। उन्मुक्त जीव बनिकय अपन पारी खत्म होयबाक प्रतीक्षा करू। ‘जय सियाराम, जय सियाराम, जय सियाराम जय जय सियाराम!!
 
नम पार्वतीपतये हर हर महादेव!!
 
हरिः हरः!!