महेश डखरामीक ‘महेश मञ्जरी’ पुरान आ आधुनिक शैलीक संगम आ सन्देशमूलक रचना

पोथी परिचयः महेश मञ्जरी

– लेखकः महेश डखरामी
 
प्रकाशकः साहित्य संचय, मूल्यः १५० टका (भारत तथा नेपाल मे) $4.00 अन्य मुलुक मे।
 
ई थिक काव्य संग्रह। मैथिलीक ओ छंद आ रसक प्रयोग जे विद्यापतिक पदावली मे भेटैत अछि। विद्यापतिक पदावली बुझबाक लेल शब्दकोश आ भावार्थ कोनो विज्ञजन सँ बुझब आवश्यक होइत अछि आमजन केँ, लेकिन वैह विद्यापतिक कतेको रास रचना जन-गण-मन केर कंठ मे जिबैत आबि रहल अछि। एतेक तक कि आनो-आनो कविक रचना मे ‘भनहि विद्यापति गाओल हे…’ आदि जोड़ि देला सऽ ओ विद्यापतिक रचना बुझल जाइत अछि सामान्य समझ मे। महेश मञ्जरीक ९०% रचना वैह प्रयोग मे सोझाँ आयल अछि। कवि महेश डखरामी ई प्रयोग सोशल मीडिया मंच पर करैत देखेलाह, २०१४ केर दिल्ली अकास तर बैसकी (राजघाट, गाँधी स्मारक स्थल, दिल्ली) मे पहिल बेर हिनकर कविता श्रवण करैत केहेन अनुभूति दैछ ताहि लेल विशेष अनुरोध कयने रहियन्हि आ भाइ महेश डखरामीजी एलाह, अपन प्रस्तुति सब परसलन्हि। श्रोता सब सेहो हमर भावना सँ सहमत भेलाह जे बहुत दिनक बाद फेर सँ विद्यापति शैली मे अवहट्ठरूपी मैथिली यानि संस्कृत आ प्राकृत मिश्रित मैथिली लेखनी करैत छथि। एकर प्रस्तुति छंद गान शैली मे बेसी आकर्षण करत…, आदि।
 
प्रस्तुत काव्य संग्रह महेश मञ्जरी मे कुल ८३ गोट रचना, अधिकांश भक्ति भाव प्रकट करैत हमरा लोकनिक परम प्रिय कन्हैया आ हुनक राधाक संग आ बिछोह केँ सेहो समेटैत पूर्णरूपेण विद्यापति शैली मे लिखल भेटैत अछि। लेकिन आधुनिक अवस्था मे मैथिलीभाषी समाज, मिथिला लोक संस्कृति आ कवि सहित हमरा लोकनि प्रवासक जीवन मे कोना छी ताहि सब स्थिति केँ सेहो समेटने छथि। ‘देवी स्तुति’ त लगभग संस्कृत केर स्तुतिक तर्जपर राखल गेल अछि, पुनः भगवती-वंदना, गणेश वंदना सँ होइत कवि अपन परिचय, गाम डखरामीक स्वरूपक वर्णन करैत अपन ईष्ट राधा-कृष्णक वर्णन करैत-करैत बीच-बीच मे जानकी, बेटी, माय, समाज, गाम मे अछैते सन्तान असगर रहि रहल बाबा-बाबी (वृद्ध-वृद्धाक) मानसिक अवस्था आदिक सुन्दर वर्णन अपन विशिष्ट लेखनी-शैली मे कवि महेश डखरामी द्वारा कयल गेल अछि। हिनकर लेखनी-शैलीक एकटा नमूना एतय राखय चाहब। जानकीक परिचय करबैत कहैत छथि –
 
प्रभा पुञ्ज आलोकित सकल जग संचारे
शोभित कंचन किरीट मुख मण्डल अपारे
 
युगल कमल पद ध्रुव धरणी धरम विहारे
बिंदी लाल भाल भूषण भव्य विभा रे
 
कंचन वरण तन लोचन कज्जल कारे
सकल कुशल शिव धनुषा कर धारे
 
रंग रुचिर छवि चपला विज्जुल विस्तारे
वामहस्त आशीष शुभांगी अशुभ सभ टारे
 
विभा विभूषित वास मन मिथिला सुखसारे
शुभा गमन मन आंगन सिनेह सुधा बरसारे
 
श्रीमुखी शतोदरी शुभकरी भव्य विभारे
दर्शन दिव्य निशदिन महेश मन उद्गारे
 
कवि केँ अपन रचना करबाक समय पाठकक समझ मे किछु शब्द कठिनाइ सँ बुझय मे आओत ताहि लेल रचनाक निचाँ गोटेक शब्दक अर्थ सेहो सहज बुझयवला शब्द मे वर्णन करैत छथि। उपरोक्त रचना मे सँ कज्जल केर अर्थ काजर, विज्जुल केर अर्थ बिजुरी आ शतोदरीक अर्थ पातर डाँर वाली लिखैत छथि। बाकी जानकीभावक जे स्वरूप राखल गेल अछि, जाहि शैली मे राखल गेल अछि, एकरे हम विशिष्ट शैली आ विद्यापतिक पदावलीक रचना अनुरूप देखि रहल छी।
 
सामान्य लेखन-शैली मे सेहो गोटेक रचना उपलब्ध अछि एहि पोथी मे, यथा – कवि द्वारा वर्णित ‘जिनगी’ शीर्षक केर ई रचनाक अंश पर ध्यान दियौकः –
 
रूसल जिनगी दौड़ मनाबू
पहिने अप्पन बौंस के आबू
 
बहसल मुंह अखने जाबू
सोचू पहिने तक्खन बाजू
 
सभुक हृदय मे प्रीति जगाबू
प्रसन्न रहैक रीति बनाबू
 
सोचू जिनगीक की सार
की दामहि एकर एक आधार ……
 
कवि अपन जीवनक अनुभव आ शिक्षा केँ ‘दार्शनिक सन्देश’ जेकाँ सेहो रखैत पाठक सँ ‘कुम्हार’ बनबाक आह्वान करैत छथि, जहिना ओ सब नव-नव वर्तन केर निर्माण करैत अछि, ठीक तहिना आजीवन हरेक मनुष्य केँ नव-नव सृजन लेल कविमन एहि पोथीक अनेकों रचना सँ सृजनशीलताक सन्देश दैत अछि।
 
मिथिला मान, मिथिलाधाम यात्रा, विद्यापति वन्दना, उद्वेग, नेहोरा, मैथिल हुंकार, छनाक, अम्बा पुकारक संग मैथिलीक परिचय करबैत कवि द्वारा पिताक वेदना अत्यन्त मार्मिक शब्द मे निरूपित कयल गेल अछि –
 
धिया पुता सब दिल्ली धेलन्हि
बुढवा धेलन्हि गाम
हुनिका थारी नहि तरकारी
पुतक मुँह मे पान
कहूँ अहाँकेँ नीक लगैए
 
चरचास उपजा उपजा
दबा के धरथि दाम
बेटा ओतय क्लब मे नाचथि
बुढहा परल दलान
कहूँ अहाँकेँ नीक लगैए….
 
त, निष्कर्ष मे यैह कहब जे अपन मैथिली भाषाक ओ प्राचीन शैली सँ नव शैलीक मिश्रणरूपी ई पोथी ‘महेश-मञ्जरी’ हर तरहें लाभकारी अछि। एहि मे भक्ति सँ लैत समसामयिक परिस्थिति सँ लड़बाक सन्देश आ पलायन सँ उत्पन्न दरिद्रता केँ हरेबाक लेल जनजागृति आदि लेल नीक आह्वानमूलक रचना सब समेटल गेल अछि। कवि महेश डखरामी केँ बधाई – एतेक नीक जेकाँ क्रमिक रूप सँ सब तरहक रचना केँ समेटैत ई सुन्दर पोथी मैथिली भाषा-साहित्य केँ सौंपबाक लेल।
 
हरिः हरः!!