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ईष्टदेव सीताराम केर विशेष स्मरण – मानव जीवन लेल विशेष फलदायी

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धनुष-बाण सहित राम

महाकवि तुलसीदासक सम्पूर्ण कथन मानू हमरा लेल महान सत्यक आधार अछि । गुरुश्रेष्ठक कथन कोनो बेजा नहि जे एक-एक चौपाइ, एक-एक दोहा, एक-एक सोरठा या एक-एक छन्द मे केवल आ केवल सत्यक निरूपण कयल गेल अछि ।

एकटा कथन छन्हि जे जँ रामक ओज भरल चेहरा जाहि मे युद्धरत हाथ मे धनुष आ ताहि पर बाणक सन्धान कएने असुरादि दुर्जन-दुष्ट-अधर्मी पर संहार करयवला दृश्य अभरैत अछि से याद कय लेब त अहाँक विरूद्ध युद्ध लेल ठाढ़ केहनो दुर्जन-दुष्ट-अधर्मी स्वतः किनार लागि जायत ।

पिता सिखौलनि जे केहनो शंका-आशंका, दुविधा, अनिश्चितताक भय या संकटक भय मोन मे प्रवेश करय, तुरन्त ईष्टदेव भगवान् सियारामजीक स्मरण हेतु ‘सीताराम सीताराम’ केर जाप आरम्भ करू ।

सियाराम भगवान् प्रति गहींर आस्थाक अनेकों आधार एहि जीवन मे प्राप्त भेल । तदनुसार जीवन जियए मे सहारा भेटल । एहि विरूद्ध कतेको तर्क-कुतर्क देनिहार पर हम सब दिन हँसिकय नकारलहुँ आ संगहि अपन मोन केँ बुझेलहुँ जे एहि तरहक दुर्विचार किन्नहुं हमरा दुबारा सुनय लेल नहि भेटय ।

रामायण हृदय मे बैसल अछि । संयोग सँ जन्म सेहो मिथिला मे भेटल । मैथिली यानि जगज्जननी सियाक अवतरण एहि भूमि मे भेलनि । रामायण मे जतबे राम छथि, ततबे सीता सेहो छथि । सीताक चरित्र तँ आर महान प्रस्तुत भेल अछि । करुणाक खान माता दुर्जनक चपेट स्वयं झेलबाक चरित्र प्रस्तुत कयलिह । ताहि पर पुरुषोत्तम राम द्वारा धनुष पर बाण सन्धान कय अन्तिम गति प्रदान करबाक लीला भेल अछि । रामायणक अन्तिम दृश्य यैह थिक ।

हमरो-अहाँक जीवन मे असुरादिक प्रभाव बड बेसी होइत अछि । एतय पुरुषोत्तम रूप मे स्वयं ठाढ़ होयब तखनहि आसुरिकताक संहार संभव होयत । जँ स्वयं आसुरिक बनब त फेर रामक चरित्र आ लीला संग हुनक जपादिक मर्यादा सेहो भंग भ’ जायत । अतः ईष्टदेव सीताराम प्रति सम्पूर्ण समर्पण बरकरार रहय । मनुष्य जीवन एहि तरहें साकार होयत ।

हरिः हरः!!

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