“मिथिलामे तिला संक्रान्ति मनेबाक तैयारी किछु दिन पहिलेसँ शुरू भ’ जाइत छैक।”

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— अखिलेश कुमार मिश्रा।   

मिथिला में जतेक पावनि तिहार होइत अछि से ऋतु आ मौसम के अनुरूपें होइत अछि। इ बात तिला संक्रान्ति पर सेहो पूर्णतया लागू होइत अछि। तिला संक्रान्ति ताहि दिन मनाओल जाइत अछि जाहि दिन पूस बीति माघक आगमन होइत अछि। बुझु कड़करउआ जाड़। तिला संक्रान्ति के मनेबाक जे विधि अछि, बुझु जे अहि जाड़ सँ बचै कें पूर्णतया जुगाड़।
चलु पहिले इ बुझी जे तिला संक्रान्ति कें अर्थ की भेल। तिला संक्रान्ति में दू शब्द अछि, पहिल तिला जे तिल सँ बनल अछि दोसर संक्रान्ति। तिल सँ सभ कियो अवगत होयब जे एक विशिष्ट खाद्य पदार्थ अछि जाहि सँ तेल तेहो बनैत अछि आ गुड़ चीनी खोया आदि द’ क’ तिलबा सेहो। इ पौष्टिकता सँ भरपूर एवं औषधीय गुण बाला होइत अछि। एकर सेवन सँ रोगक सँ लड़ै के क्षमता शरीरक बढि जाइत अछि। जाड़ में शरीर पर जाड़क कम असर होइत अछि। तिला संक्रान्ति क’ एकर उपयोग आ एकर दानक अलग महत्व अछि। संक्रान्ति शब्द संक्रमण शब्द सँ बनल अछि। इ दू राशि कें जोड़ अर्थात एक राशि खत्म आ दोसर राशि शुरू के बीचक काल होइत अछि। अहि दिन तिला संक्रान्ति क’ सूर्य धनु राशि सँ मकर राशि में प्रवेश करै छैथि त’ अहि संक्रान्ति के नाम वास्तव में मकर संक्रान्ति अछि। मुदा मिथिला में अहि दिन तिलक उपयोगक एक विशिष्ट महत्व अछि, तैं एकर नाम तिला संक्रान्ति कहल गेल अछि।
भारत समेत पृथ्वी के करीब सत्तर प्रतिशत आबादी उत्तरी गोलार्ध में अछि। अहि समय में सूर्य दक्षिण मकर रेखा कें तरफ रहैत छैथि जे उत्तरी गोलार्ध सँ दूर तैं एम्हर जाड़ रहैत अछि। कहल गेल अछि जे सूर्य अहि दिन मकर रेखा सँ कर्क रेखा कें तरफ गमन करै छैथि अर्थात सूर्य उत्तरायण (उत्तरमुखी) होइत छैथि। एम्हरका लोक तैं खुशी मनबैत छैथि जे आब अहि कष्टकारक जाड़ सँ मुक्ति भेंटत। जाबेत सूर्य दक्षिणगामी रहै छैथि जाड़ में (पूस मास) एकरा खर मास मानि कुनो शुभ काज नै कैल जाइत अछि। मुदा उत्तर मुखी होइते (माघ मास) में सभ शुभ काज आरम्भ भ’ जाइत अछि।
मिथिलांचल में तिला संक्रान्ति मनेबाक तैयारी किछु दिन पहिले सँ शुरू भ’ जाइत अछि। नवका धानक नवका चूरा कें भूजि आ ओकर संग नवका गुड़ सँ चिल्लौर तैयार कैल जाइत अछि। तिल आ गुड़ या चीनी-खोआ संग तिलबा। मुरही गुड़ कें लाइ आदि दू चारि दिन पहिले तैयार कैल जाइत अछि। तिला संक्रान्ति कें भोरे सरोवर में स्नान क’ पूजा आ दान कैल जाइत अछि। अहि दिन सभ सँ विशिष्ट स्नान गंगासागर के स्नान के मानल गेल अछि। अहि दिन दान करै के लेल अनाज, कच्चा तरकारी, कम्बल वस्त्र आ तिल प्रमुख होइत अछि। ततपश्चात चुरा दही, चिल्लौर दही आदि कें नास्ता। दिन में विशेषतया उड़िद दालि देल खिच्चइड़ आ देसी घी आ तरुआ तरकारीक भोजन। पूजा में नैवेद्य के रूपें खिच्चइड़ सेहो होइत जे पातरि कें रूप में मानल जाइत अछि। अहि तरहक व्यंजन, भोजन वातावरण कें हिसाबे शरीर कें लेल बहुत उपयोगी होइत अछि। दिन में उत्साह उमंग कें संग गुड्डी सेहो उरैल जाइत अछि। साँझ में चुरा-दही, चिल्लौर दही या खिच्चइर कें भोजन होइत अछि।
तिला संक्रान्ति के महत्व: मिथिलांचल कृषि प्रधान क्षेत्र अछि। धान आ कुसियारक खेती सम्पन्न भ’ गेल रहैत अछि। पूस में जाड़ सँ हाल बेहाल रहैत अछि। वस्त्र आ गर्म रजाइ आदि कें अभावे बुझु। त’ लोक कें इ अनुभव होइत छैन्ह जे तिला संक्रान्ति सँ जाड़ घटनाइ शुरू भ’ जैत। राति के लंबाई सहो कम भेनाइ शुरू। त’ खुशी कें व्यक्त करै कें तरीका इ पावनि भेल। भगवान कें अभिवादन नवका अन्न आ गुड़ सँ निर्मित बस्तु सँ कैल जाइत छैन्ह।
ऐ दिन में नवकनियाँ सभ साँझ सेहो पूजै छैथि। कनियाँ जतय रहै छैथि त’ ओतय साँझक भार सेहो आबैत अछि जाहि में तिलबा चिल्लौर पकवान समेत सिर’क, कम्बल आ जाड़क वस्त्र प्रमुख होइत अछि।
अहि सन्दर्भ में किछु गप्प मोन पड़ि गेल। ततेक जाड़ रहैत छल जे भोरे स्नान केनाइ मुश्किल रहैत छल। तहन हमर दाइ (दादी) कहैत छल जे भोरे पोखड़ि में जतेक डुब्बी लागैब ओतेक चिल्लौर भेंटत। अहि लालच में पोखड़ि में दुब्बी मारि चिल्लौर ढूंढ’ के चक्कर में स्नान भ’ जाइत छल।