“तिले – तिले बहब’..!”

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— कृति नारायण झा।   

तिला संक्रांति, भोरे भोर मायक शब्द कान मे ममतामयी आभास करवैत “तिले – तिले बहब, तिले – तिले बहब, तिले – तिले बहब” पाछू पाछू काकी, बाबी सभ पंक्तिबद्ध भेल ठाढ़ आ हमरा सभक मुँह सँ सतत् निकलेए जे हँ – हँ – हँ बहब। एकर माने सेहो नहिं बूझैत रहियै आ अप्पन आ आन में कोनो तरहक अंतरो नहिं बुझियै। हाथ में भेटैत छल भीजल चाउर, गूड़ आ तिल सभटा एकहि संग मिलल आ एकर अतिरिक्त माथा ठोकि कऽ आशीर्वाद भेटैत छल आ हमहुँ चट्ट दऽ सभके गोर लागि लैत छलियन्हि भोरे भोर नवकी पोखरि मे डुबकी मारि कऽ अबैत छलहुँ आ जाड़ तऽ जेना एहि दिन पड़ा जाइत छल ओना कहल जाइत छैक जे एहि दिन सँ दिन एक तिल तिल कऽ बढैत छैक। एखनो तिला संक्रांति दिन पोखरि मे नहिं मुदा शहरक स्नान घर में नहाइत छी, माय काकी आ नानी के आशीर्वाद तऽ प्राप्त अछिए, मायक शब्द” तिले बहब” केर अप्रत्यक्ष अनुभव आइयो करैत छी। आब एहि ठाम जगह बहुत रास अछि मुदा भको भंड, ओ छोट आँगन जतय चिल्लौर आ तिलबा खयवाक लेल धिया पूता में प्रतिद्वंदिता रहैत छल। प्रसन्नताक पराकाष्ठा रहैत छलैक। गूड़ बला चुरलाइ आ तिलवाक विशिष्टता अवर्णनीय रहैत छल। दलान पर कोबी के गाछ आ ताहि मे कसल कोबी के फूल, ओहि दिन खिच्चड़ि के संग आलू कोबी के तरकारी अवश्य बनैत छल। मायक हाथ के आलू आ भांटा के तरुआ जिनगी भरि नहि बिसरि सकैत छी। तिला संक्रांतिक दिन सँ खरमास समाप्त भऽ जाइत छैक आ बिवाह दान के लग्न शुरू भऽ जाइत छैक। ज्योतिष शास्त्र केर अनुसार एहि दिन भगवान भास्कर अपन कक्षा में परिवर्तन कऽ दक्षिणायन सँ उत्तरायण भऽ कऽ मकर राशि मे प्रवेश करैत छैथि। एहि पावैन में खान पान मौसम के अनुकूल राखल गेल अछि। नव बिवाहित के लेल जराउर के नाम सँ प्रचलित अछि।शास्त्र केर अनुसार, सूर्य के दक्षिणायन रहवाक कारणे समस्त अवधि देवताक लेल निशाकाल होइत अछि, आ उत्तरायण के अवधि देवताक लेल दिन के समय होइत छैन्ह तें एहि कारण सँ तिला संक्रांति के नकारात्मकता पर सकारात्मकता केर प्रवेश करवाक अवसर सेहो कहल जाइत छैक। एहि अवसर पर गंगा, कमला आ तीर्थराज प्रयाग संगम सँ लऽ कऽ गंगा सागर के महासंगम धरि में स्नान दान आदि करवाक प्रावधान अछि। पौराणिक मान्यता केर अनुसार पतित पावनी गंगा एहि दिन भागीरथक तपस्या सँ प्रसन्न भऽ स्वर्ग लोक सँ पृथ्वी पर उतरि ऋषि शाप सँ भष्म भेल महाराज सगर के साइठ हजार पुत्र के उद्धार करवाक पश्चात् कपिल मुनि केर आश्रम होइत मुख्य सागर मे प्रवेश कयने छलीह। तिलक भोग लगओलाक पश्चात ओकरा प्रसादक रूप में सेहो ग्रहण करबाक चाही।जय मिथिला आ जय मिथिलाक पावनि तिहार……