“खंजनी चलली बगरा चालि, तऽ अपनो चालि बिसरली,”

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— कीर्ति नारायण झा। 

“खंजनी चलली बगरा चालि, तऽ अपनो चालि बिसरली,” “बारीक पटुआ तीत,” “अप्पन तीमन तीत आ अनकर तीमन मीठ””तीन तिरहुतिया तेरह पाग” इत्यादि अपना सभक ओहिठाम एहि तरहक अनेकों कहबी छैक जे एहि दिस हमरा सभके ध्यान आकृष्ट करैत अछि जे हमरा लोकनि बहुत जल्दी अपना के छोड़ि दोसर दिस आकृष्ट भऽ जाइत छी तेँ बहुत लोक हमरा सभकें परचट्ट के संज्ञा दैत छैथि। हमरा सभके भोजन के अतिरिक्त आनो चीज जेना वस्त्र, रहवाक तौर तरीका अपन संस्कार इत्यादि सेहो अपना सँ बेसी अनकर नीक लगैत अछि। साड़ी आ धोती पहिरनाइ हमरा सभ बेकवर्ड के निशानी बुझैत छी। मूल श्रृंगार के छोड़ि ब्युटी पार्लर कल्चर के श्रेष्ठ बुझैत छी, बिवाह पंचमी, मधुश्रावणी के गौण बुझैत करवा चौथ के मनावय में अपना के सर्वश्रेष्ठ बुझैत छी। ई हमर सभक दुर्भाग्य अछि जे हमरा लोकनि अपन स्वच्छ आ सबल सांस्कृतिक धरोहर के आहुति चढा कऽ दोसर संस्कृति के स्वीकारि अपना के आधुनिकताक नाम पर थोपड़ी बजबैत छी। हमर सभक श्रेष्ठ विधि ब्यवहार जकरा विषय में कहल जाइत छैक जे बिवाह सँ विध भारी आ ओहि विधि के छोड़ि पंजाब आ हरियाणा कल्चर सँ बरमाला के श्रेष्ठ बुझैत छी, बरियाती द्वारा सुहाग देवाक विधि के बेकवर्ड बुझैत छी आ ई सभ देखि हमरा सभके कतेको ठाम इ सुनय पड़ैत अछि जे अहाँ सभ जे स्त्री शिक्षाक लेल एतेक आह्वान करैत छियैइ इ तकरे दुष्परिणाम अछि आ हमरा लोकनि कखनहु काल कऽ सोचवाक लेल वाध्य भऽ जाइत छी जे की शिक्षा के एतेक दुष्प्रभाव होइत छैक जे लोक अपन संस्कृति के बिसरि दोसर संस्कृति के पुष्पित करवाक शिक्षा प्रदान करैत अछि तऽ निष्कर्ष पर पहुँचै छी जे नहि इ उचित शिक्षाक, आ पारिवारिक संस्कार के अभाव होयवाक कारणे होइत अछि। हम सभ अपन मिथिला छोड़ि कतहु प्रवास करैत होइ, हमरा लोकनि अपन मीठ बोली, इन्द्रधनुषी संस्कार, आ मधुर ब्यवहार सँ सभठाम अपना के सभ सँ आगू के पंक्ति में ठाढ कऽ सकैत छी। कार्यालय सँ अपन परिवार सँ जखन हमरा लोकनि अपन मीठ मैथिली भाषामे बात करैत छी तऽ एक बेर कार्यालय में उपस्थित अन्य भाषा बाजय बला लोकक मुँह सँ अवश्य निकलैत छैक जे वाह। कतेक मधुर भाषा? मुदा दुर्भाग्य एहि बात के जे एकरा हम सभ पिछड़ल होयवाक परिचायक बुझैत छी। हमरा सभक अपन सांस्कृतिक धरोहर के बचएबाक लेल खूब उत्साह के संग मुहल्ला बला सभ के आमंत्रित कऽ कऽ अप्पन सुच्चा मैथिलक संस्कार सँ पावनि तिहार, मुंडन, उपनयन, बिवाह इत्यादि सँ मनेवाक चाही आ सभकेँ अपन सुदृढ़ विधि ब्यवहार के विषय में विस्तार सँ बताओल जयवाक चाही तखने हमरा लोकनि अपन सांस्कृतिक संरक्षण आ सम्वर्धन कऽ सकैत छी। हमरा लोकनि प्रवासी मैथिल के केरल, बंगाल, तमिलनाडु इत्यादि के अप्रवासी लोकनि सँ शिक्षा लेवाक आवश्यकता अछि जे ओ लोकनि अपन एकहुटा संस्कृति के छोड़ैत नहिं छैथि। हमरा सभक ओहिठाम केर पवित्र छैठ पावनि आइ राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपन स्थान प्राप्त कयलक जे एहि दिस संकेत करैत अछि जे सांस्कृतिक गतिविधिक चर्चा आ ओकरा विधिवत रूप सँ मनाओला सँ क्षितिज धरि पहुँचाओल जा सकैत अछि मात्र इच्छाशक्ति होयवाक चाही। हम मिथिलावासी में येएह तऽ सर्वश्रेष्ठ गुण होइत अछि जे जँ हमरा लोकनि किछु ठानि ली तऽ ओकरा पूरा कयलाक पश्चाते दम लैत छी तऽ आउ सभ मिलि अपन इन्द्रधनुषी संस्कृति के प्रचार प्रसार हेतु आगू बढी आ दुनिया के अनुभव कराबी जे हमर संस्कार सर्वश्रेष्ठ अछि नहिं तऽ वेएह हाल हेएत जे वर्तमान में अछि जे “अपन बरद कुरहरिये नाथब ताहि सँ मतलब अनका की आहि रे तोरी भल्ला की 🙏