“प्रवासी मैथिल अपन संस्कृतिक संरक्षण आ संवर्द्धन कोना करथि..!”

92

— अरुण कुमार मिश्रा       

परिवर्तन प्रकृतिक नियम छैक तेँ समय, काल आ परिस्थिति अनुसार बहुत रास परिवर्तन देखबामे अबैत अछि। आब एहि सँ पृथक इहो जानि लेबय पड़त जे स्थान विशेषक परिवर्तन सँ परिवर्तनक बयार तीर्वता सँ लगैत छैक।

नहि जानि कियक मैथिलमे अपन संस्कृति सँ विमुख होबाक प्रवृत्ति किछु विशेषे देखबामे अबैत अछि। सम्भवत एकर प्रमुुख कारण ई जे अट्ठारहवीं शताब्दिक मध्य फरवरी १८३५ के, ब्रिटिश इतिहासकार आ राजनीतिज्ञ थॉमस बबिंगटन मैकाले अपन ‘भारतीय शिक्षा पर मिनट’ प्रस्तुत केलनि जाहिमे भारतीय ‘मूल निवासी’ के अंग्रेजी शिक्षा प्रदान करबाक आवश्यकताक मांग काएल गेलनि। अग्रेजी हुकूमत जनैत छल जे एहि ठाम संस्कृतिक समर्द्ध अछि आ अकर पतन करबा लेल अग्रेजी शिक्षाक अनिवार्यता छैक।

मिथिलामे एहि सँ पुर्व शिक्षाक माध्यम प्राय: संस्कृत टा छलैक, आओर संस्कृत पढ़निहार अपन संस्कृति सँ कखनो विमुक्त नहि होइत छल मुदा जखन अंग्रेज द्वारा अंग्रजी शिक्षा अनिवार्य काएल गेलैक आ अंग्रेजी पढ़निहार के नौकरीमे राखल जाय गेलैक तखन लोक अंग्रेजी पढ़बा दिस अग्रसर होमय लागल। नौकरीक लेल मैथिलक मिथिला सँ दुर रहबाक क्रम तखन प्रारम्भ भ’ गेलैक। आब मैथिल देश विदेशमे रोजगारक लेल जाय लागल आ ओहि ठाक भ’ क’ रहि गेला। आब स्थित ई छैक जे अंग्रेजी बाजब माने नीक पढ़निहार आ हिन्दी बाजब माने शिक्षित होबाक पहचान थिक। मैथिली बाजब त’ मुर्खक लक्षण छैक।

रोजगार लेल पलायनक समस्या मात्र मैथिले संग नहि अछि अपितु आनो प्रदेश वा समुदायक लोकक संग छैक जेनाकि माड़वारी, बंगाली, गुजराती आ सिख इत्यादि प्रमुख अछि। मुदा माड़वारी, बंगाली, गुजराती आ सिख समुदाय जतय कतयो गेलैथ अपन संस्कृति के कमोबेस पकड़ने रहलैथ।खानपान, भाषा, रीति रिवाज आ पाबनि तिहार कुनु भी संस्कृतिके जीवंत राखैत अछि। आनो भाषा के पढ़ब, लिखब वा बाजब, आन’क रीति-रिवाज के मानब वा अपनायब कुनु ओतेक बेजाय गप्प नहि छैक मुदा अपन के बिसरब वा छोड़ब ततेक घातक सिद्ध भ’ रहल छैक जे मैैथिल अपन मैथिलत्व खोने जा रहल छैथ। पाश्चात्य संस्कृति सँ ओतप्रोत भ’ नबतुरक वा अधबयसक लोक केँ रहन सहन आ बात विचार देखि बुझबा नहि आओत जे ई लोकनि मैथिलो छैथ।

प्रवासी मैथिल अपन संस्कृतिक संरक्षण आ संवर्द्धन कोना करथि ? ई आब एक गोट यक्ष प्रश्न अछि। हमरा जनैत मैथिल कतयो रहैथ जयों प्रबल इच्छाशक्ति सँ चाहि लैथ त’ अपन संस्कृतिक संरक्षण आ संवर्द्धन कतयो रहि क’ सकैत छैथ। हम किछु उपाय बतबय चाहब जाहि सँ ई सम्भव भ’ सकैत अछि…………………..

१) अपन भाषा मैथिली अपना लोकमे अवश्ये बाजी।
२) मिथिलाक पारम्परिक खानपान केँ अपनाबी।
३) मिथिलाक पाबनि तिहार केँ मनाबी।
४) कम सँ कम एक गोट मिथिला पेंटिंग अपन शयनकक्ष वा बैठकमे अवश्य लगावी।
५) मैथिली साहित्य आ मिथिलाक इतिहास अपनो पढ़ी आ अपन नब पीढ़ी के सेेहो पढ़बाक लेल प्रेरित करी।
६) सालमे एक बेर सपरिवार गाम जाई आ मिथिला स्थित विभिन्न तीर्थस्थलक भ्रमण करी।
७) उपनयन, मूड़न आ विवाह इत्यादि यथासम्भव गाममे करी।
८) मैथिल लोकगीत सुनी आ गाबी।
९) मिथिलाक्षर मे अपन नाम पता लिखी आ हस्ताक्षर करी।
१०) मैथिल पत्र पत्रिका नियमित रूप सँ कीनी आ पढ़ी।

हम व्यक्तिगत रूपें कुनु संस्कृति के विरूद्ध नहि छी, सब संस्कृतिक मे किछु विशेषता होइत छैक मुदा देखसिक रोग कखनो क’ बड्ड घातक होइत छैैक। आजुक समयके मैथिलक विवाह देखि ऐना लगैत अछि जेनाकि पंजाबीक विवाहमे छी वा कुनु फिल्म देख रहल छी। पागक स्थान पर सेहरा आ धोती कुर्ताक स्थान पर शेरवानी देखि रहल छी। अतवे नहि ब’रक नादिर कट दाढ़ी देखि क्षुब्ध रहैत छी। कनिया केँ लहंगा चोली पहिरने स्टेज पर सभक सोझा निधोक भेल बैसल देखैत छी। ओहु सँ इतर आब डांस ब’र कनिया संगे करैत छैथ। जयमाल, मेहन्दी आ महिला संगीतक आड़ मे वैदिक रीति करोओल विवाह आब गोंड़ भेल जा रहल अछि। हम सब भंयकर संक्रमण काल सँ गुजरि रहल छी जयों अखनो नहि चेतब त’ कतयो भ’ क’ नहि रहि सकब। अस्तु।

………..अरुण कुमार मिश्र ‘अरुणोदय’

Vandana Choudhary Deepika Jha