“अगहन मास सोहाओन – जन’क मूहमे पान ।”

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— उग्रनाथ झा।     
भारतीय हिन्दू पंचांगक दृष्टिए साल में बारह महिना आ छहटा ऋतु पाओल जाएत छैक । सभ महिना आ ऋतु के अपन विशिष्टता छैक । मुदा धार्मिक आ भौतिक रूपे हेमंत ऋतु अन्तर्गत मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मासक विशेष महत्व छैक । एखन हमरा लोकनि अगहन मासक भौतिक सम्पन्नताक अवलोकन करब ।हेमंत ऋतु के आगमन अगहन मासक शुरुआत के संग होईत छैक । इ ओ मास छैक जाहिमे सर्दी अपन पैर पसारैत यौवनावस्था दिश अग्रसर होएत छैक । फलत: भोरका रौद’स लोकक सिनेहक तंतु मजबूत होएत जाएत छैक । दिनकर के उगैत स्वर्णिम किरणक ऊष्मा असुआएल मानवके नव स्फूर्ति आ आरोग्यता प्रदायक होएत छैक । मौसमक आवश्यकता के अनुरूप रौद प्रीयगर होए छै जाहि कारणे बाल वृद्ध सभ एकरा स्वरुचि तापैत छथि। एहि मासक सबसँ बेसी आह्लादित करै वाला बात त ई छै जे मिथिलामे परंपरागत कृषिक बहुलता छैक एखनो तक आधुनिक तकनिक स’ मिथिला बहुत दूर छैक ताहि हेतु एतय सिंचाई के समुचित व्यवस्था के अभाव छैक जाहि लेल एतय मुख्य रूप’स धानक खेती होएत छैक जे बर्षा पर आधारित रहैत छैक । बर्षा ऋतुमे कयल गेल धान अगहन तक पाकि जाईत छैक ।जेकर शिश सऽ डांट तक सुखा क स्वर्णमय रंगमे सरावोर रहैत अछि, जाहि पर उदियमान रवि के आभा सं संपूर्ण चराचर मनोहारी स्वर्ण नगरी में परिणत भऽ जाए छैक । पकैत धानके गिरहत द्वारा कटनी प्रारंभ करबा सं पूर्व मिथिला में परंपरा रहल अछि जे पहिल अन्न देव/ पितर के अर्पण कयल जाए । ताहि हेतु मूईठ लेबाक प्रावधान रहल अछि । मुईठ लेबाक अर्थ एतय भोरे कृषक द्वारा खेत में धानक बिट के जड़ी में हासु राखि जल फूल अक्षत सं पूजि फसल कटबाक आज्ञा लेनाए आ तत्पश्चात धान काटि आनि ओकर चुड़ा कुटल जाएत छैक जाहि मे दूध , दही ,नवका गुड़ मिलाय गंभासंक्रान्ति दिन कुमारि कन्याक द्वारा पाथल चिपड़ी के पजाड़ी ओहि पर सभ सदस्य द्वारा ओहि मिश्रण के अग्नि देव के समर्पित कैल जाएत छैक आ कुल देवी के प्रसाद स्वरूप चढ़ौलाक बादही ग्रहण करैत छैक । एकर उमंग अद्वितीय उत्साह जन्य आ ऐतिहासिक छैक जे नवान्न रूपे प्रतिष्ठित छैक । एहि पाबनिक उपरांते मैथिल खेतिहर कटनी प्रारंभ करैत छैथ । जखन कटनी प्रारंभ होएत छैक त चरचांचर के सौन्दर्यता तऽ अवर्णनीय रहैछ । बुझाएत छैक जे गाम घर दिन भरि लेल विरान भय गेल हो आ खेत खरिहान गुलजार । खेत आड़ि पर गमछा ओछा पानक खिल्ली गलोठने पड़ल किसान खेत में लाल पिअर वस्त्रमे निंघूर केँ कटनी करैत जन -बोनिहार । कटनीक क्रम में धानक बीट आ कचिया हाँसूक संघर्ष सं घर्र… घर्र… के सतरंगी आवाज एतेक कर्णप्रीय जे चलैत बटोही ठमका दैत छैक । बरवश खेतके निंघारय पर मजबूर कय दैत छैक । आड़िए आड़िए माथ पर पथिया में मूरही , कचड़ी, घूघनी, लाई, लय हांक लगबैत फेरिवाली के देख बच्चा के कहैया बूरहो सभ अपना के पनियाएत जीह के रोकि नहि पबैत छथि । धिया पूता झट द धान के शिश मिरकय खरीदय लेल उताहुल त जनबोनिहार लोरहा बिछा लय तैयार । लेकिन जलखै के जरूर होए छै जोगार ।तै कहबी छै जे मुसहरनी कटैत रहै धान त गिरहत खेने रहै पान । ई देख मुसहरनी लोरहा के मिरक पान किनय गेलै त गिरहत पुछलकै कि करबीही त कहलकै यौ गिरहत जहन धाने के पान त मोर सैंया के किये नै मुंह में पान । कहबाक तात्पर्य जे अगहन मास में मिथिला में साक्षात अन्नपूर्णाक आगमन रहैत छन्हि । जाहि लेल गिरहत सं लऽ कऽ बोनिहार तक के कोठी अन्न सं परिपूर्ण रहैत छैक । मिथिला में कहावत छैक अगहन में मूषो के सोलहटा बौहू रहैत छैक मतलब जीवजंतू तक के भोजनक परिपूर्णता। खेतक कटनी उपरांत दोसर चरण छैक दौउनी जे पारंपरिक रूपे मेंह ( बासक मजबूत खुटा गाड़ल जाएत छल तकरा बाद जमीन पर गोबर आ खखरी/भूस्सी छिट आ पानि द बरद धूमाओल जाए छल जाहि जमीन पथरीला भ जाए आ धान जमीन में धंसे नहि)गारिक पांच सात बरद के एक संग बान्हि धूमाओल जाएत छल आ निचा में यानी जमीन पर धानक शिश ओछाओल जाएत छल जे बरदक लतखुर्दन सं शिश सं बिलग भ जाएत छल । घूमैत बरद के गर्दनिक घंटी के टुन टुन आवाज आ बीच बीच में हरबाह के आउरे आउरे के ललकारा अति मनमोहक लगै । जे थाकल पथिक के बाट रोकि बिलम्बबाक लेल मजबुर क दैत छलै।दौउनिक बाद किसान सभटा पुआरके अलग क धान के गोलियायल जाएत छल । खरिहान में धानक प्रकार हिसाबे अलग अलग ढेरि । जेकरा बांसक सूप में उठाक ऊपर निचा खसाओल जाएत छल आ ओहि सूप सं जोर सं हवा देल जाएत छल जाहि सं खखरी आ छोट खर पात उड़ि’क दूर चल जाए आ निस्सन दाना ओतय रहि जाए एहि विधि के ओसेनाय कहल जाए। ओसेलाक बाद उठा’क सुखा अबा क भंडारित कैल जाए । समयानुसार धान कुटा कऽ चाउर तैयार होए। एहि क्रम में धरती मैया सं तीन रत्न प्राप्त होए धान , पुआर आ नार ।धान मनुष्यक भोजन त नार पुआर पशुधनक चारा ।लेकिन एहि नार पुआरक उपयोग किसान मौसमक शितलता सं स्वयं सुरक्षित रखबा लेल करैत छलाह जाहि मे पुआर के सेजौट करैत छलाह । सेजौट अर्थात जमीन पर खुब मोटगरक पूआर के ओछाए ताहि पर बिस्तर करै छलाह जे ठंड के घोर कुचालक छल आ शरीर के ऊष्मा प्रदान करैत छल । ओतय नार के गोनैर से हो बनाओल जाए छल जाहि के विशेष तकनिकी सं बूनल जाएत छल जेकर उपयोग ठंड सं बचाकर लेल ओढ़ना के रूप में करैत छल । ई अभाव ग्रस्त लोकक ब्रह्मास्त्र । जाड़के बढ़ैत प्रकोप में सुर्यास्त पश्चात नार पुआर जे मालजालक द्वारा निंघेश क देल जाए छल ओकरा पजारि धधकाओल जाएत छल । जे आफियत प्रदान करैत छल ।मुदा आब भौतिकवादी विकास के बहैत धारा सं मिथिला बांचल नहि रहल फलत दौउनी , ओसौनी, सेजौट , गोनौर , सभ सपना । आब त धियापूता के बरद देखबा लेल किछु दिनक बाद चिड़िया घर जाए पड़तै । थ्रेसींग मशीन आबि गेल ओ अन्न त छोड़ा दैत छैक मुदा नार पुआर के गर्दा बना दैत छै । जे कहियो प्राण रक्षक छल से आई गर्दा रुप में प्राणघातक सिद्ध भय रहल अछि। हमरा लोकनि विकास क गेल छि मुदा विनाशक ओतबेक ल’ग जा ठार छि। एहि मास में नवका दूधिया धानक चुड़ा आ नवका गुड़क स्वाद तऽ कल्पना मात्र सं मूंह पनीयां दैत छैक । एहि मास में गुड़ खेबाक चाहि । कारण गुड़ गरम होएत छैक जे शरीर में ऊष्मा प्रदान करैत रक्त शोधन के काज से हो करैत छैक । चर चांचर में जनबोनिहार द्वारा माथ पर उघैत बोझ सं ससरि॑क खसैत शिश आ ताहि के बिछ बिछ उठबैत गिरहत के मनोहारी दृश्य आ खेत में झरल धान के चिड़ै चुनमन्नी द्वारा बिछबाक खेबाक टोली देख प्राकृतिक अद्वितीय छटा कतौ दोसर ठांव भेटब मुश्किल बुझना जाएं। एहि मौसमक विशेषता बुझू जे विभिन्न प्रकारक प्रवासी पक्षी सभ मिथिला प्रवास करय अबैत छैक।जतय अपना अनुकूल जलवायु पाबि स्थिर भ जाए छैक । ताहि लेल मिथिलाक कुशेश्वरस्थान में पक्षी विहार के रूप में सरकार के द्वारा स्थापित कयल गेल छैक।