“भाई-बहिनक अटूट स्नेहक पाबनि!”

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–आभा झा     

भाई-बहिनक अटूट स्नेहक पाबनि!
पारंपरिक लोक गीत सँ जुड़ल सामा-चकेवा मिथिला संस्कृतिक खासियत अछि, जे सब समुदायक बीच व्याप्त जड़ि बाधाकेँ तोड़ैत अछि।आठ दिन तक ई उत्सव मनाओल जाइत अछि और नवम दिन बहिन अपन भाईकेँ नब फसल चूड़ा एवं दही खुआ कऽ सामा-चकेवाक मूर्ति केँ पोखरिमे विसर्जित करैत छथि।एहि पाबनिकेँ मिथिलामे बड़ धूमधाम सँ मनाओल जाइत अछि।एहि पाबनिकेँ बहिन अपन भाईक दीर्घायु होइकेँ कामनाक लेल करैत छथि।एहि पाबनिमे बहिन-भाईक बीच प्रेम और स्नेहक संबंध मजबूत होइत अछि।
मिथिलांचल अपन लोक संस्कृति,पाबनि तिहार व पुनीत परंपराक लेल प्रसिद्ध अछि। भाई -बहिनक असीम स्नेहक प्रतीक लोक आस्थाक पाबनि सामा-चकेवा अछि। मिथिलाक प्रसिद्ध संस्कृति व कलाक एक अंग अछि सामा-चकेवा। आस्थाक महापर्व छठि समाप्त होइ के संग ही भाई-बहिनक अटूट स्नेह व प्रेमक प्रतीक सामा-चकेवा पाबनिक शुरूआत भऽ जाइत छैक। ग्रामीण क्षेत्रक चप्पा-चप्पा सामा-चकेवाक गीत सं अनुगूंजित अछि। एहि पाबैनक चर्चा पुराण में सेहो अछि। एहि उत्सव के दौरान बहिन सब सामा-चकेवा,चुगला,सतभईयां,टिहुली,कचबचिया
बाटो-बहिनो,पौउती,कछुआ,सवारी,वृंदावन पुतरी सहित अन्य मूर्तिक बांस सं बनल चंगेरा में सजा कऽ पारंपरिक लोकगीतक जरिये भाई के लेल मंगलकामना
करैत छथि। सामा के देवोत्थान दिन पिठार सं ढोरि कऽ सिंदूर छीटल जाइत छैक। ओकर बाद सं राति में आंगन में राखि शीत चलाओल जाइत छैक। संध्या में “सामा खेले चलली भैया संग सहेली,साम चके अबिह हे जोतला खेत में बैसिह हे,भैया जीबू हो युग युग जीबू हो तथा चुगला करे चुगली बिलैया करे मियांऊं “एहि गीतक संग सब चुगला दहन करैत छथि। भाईकेँ भावुक करय वाला गीतक पंक्ति बहिन गबैत छथि – अपना ल लिखिया भईया अन-धन लक्ष्मी हो, हमरा ल लिखिया भईया सामा और चकेवा हो।
मिथिला तथा कोसीक क्षेत्र में भातृ द्वितीया,रक्षाबंधन के जेकां भाई-बहिनक प्रेमक प्रतीक लोक पर्व सामा-चकेवा में गीत रोज होइत अछि मुदा देवोत्थान एकादशीक राति में प्रत्येक आंगन में नियमित रूप सं स्त्रीगण सब समदाउन,ब्राह्मण,गोसाउनिक गीत गाबि कऽ बनाओल गेल मूर्ति के शीत चटबैथ छथि। फेर कार्तिक पूर्णिमाक राति माटी के बनल पेटार में संदेश स्वरूप दही चूड़ा भरि सब बहिन सामा-चकेवा के अपन-अपन भाईक ठेहुन सं फोड़वा कऽ श्रद्धापूर्वक खोंइछा में लैत छथि। बेटीक द्विरागमन जेकां समदाउन गबैत विसर्जनक लेल समूह में घर सं निकलैत छथि और नदी,पोखरिक कात या खेत में चुगलाक मुँह में आगि लगा दैत छथि। मइट तथा खर सं बनल बृंदावन में आगि लगा कऽ मिझाबैत छैथ और सामा-चकेवा सहित अन्य मूर्तिक पुनः अगिला साल आबै के कामना करैत विसर्जन कैल जाइत छैक।
सामा-चकेवाक संबंध में एक कथा अछि -भगवान श्रीकृष्णक पुत्री श्यामा (सामा)और पुत्र शाम्भक बीच स्नेह आधारित ई पाबनि आइयो मिथिलांचल में पूरा उत्साहक संग मनाओल जाइत छैक। श्यामा ॠषि चारुदत्त सं ब्याहल गेल छलीह। श्यामा के घूमै में मोन लगैत छलनि। श्यामा राति में अपन दासी डिहुलीक संग वृंदावन में ॠषि मुनीक सेवा करय लेल हुनकर आश्रम में जाइत छलीह। अहि बातक जानकारी डिहुलीक द्वारा भगवान श्रीकृष्णक दुष्ट स्वभावक मंत्री चुड़क के लागि गेलनि। ओ राजा के श्यामाक खिलाफ कान भरनाई शुरू कऽ देलाह। क्रोधित भऽ भगवान श्रीकृष्ण श्यामा के वन में विचरण करय वाली पक्षी बनि जाय के शाप दऽ देलखिन। श्यामा के चिड़ई के रूप में देखि कऽ हुनकर पति चारुदत्त भगवान महादेवक पूजा अर्चना करि हुनका प्रसन्न कऽ स्वयं सेहो पक्षीक रूप प्राप्त करि लेलाह। श्यामाक भाई शाम्भ अपन बहिन-बहनोईक ई दशा सं मर्माहत भेला। बहिन-
बहनोईक उद्धारक लेल ओ अपने पिता श्रीकृष्णक आराधना शुरू केलाह। हुनकर आराधना सं प्रसन्न भऽ श्रीकृष्ण वरदान मांगै लेल कहलखिन। तखन पुत्र शाम्भ अपन बहिन-बहनोई के मानव रूप में वापस आनै के वरदान मंगलखिन। ओ श्यामाक शाप मुक्तिक उपाय बतबैत कहलखिन कि श्यामा रूपी सामा एवं चारुदत्त रूपी चकेवाक मूर्ति बना कऽ हुनकर गीत गाबै जाउ और चुड़कक मूर्ति बना कऽ हुनकर कारगुजरी के उजागर कैल जाय,तऽ दुनू पुनः अपन पुरान स्वरूप के प्राप्त कऽ सकता।
जनश्रुतिक अनुसार सामा-चकेवा पक्षीक जोड़ी मिथिला में प्रवास करै लेल पहुँच गेल छलीह। भाई शाम्भ सेहो हुनका तकैत मिथिला पहुँचलाह और ओतऽ के स्त्रीगण सब सं अपन बहिन-बहनोई के शाप सं मुक्त करै के लेल सामा-चकेवा के खेल खेलाइ के आग्रह केलखिन। हुनके आग्रह के मिथिलाक महिला सब मानलेन और अहि प्रकार शाम्भ अपन बहिन-बहनोईक उद्धार कयलाह। सामा ओहि दिन सं अपन भाईक दीर्घायुक कामना लऽ कऽ बहिन सबके पूजा करै के आशीर्वाद देलखिन।
परंपरा जीवित रहत,तखने ‘प्रेम ‘अमर रहत।
आभा झा
गाजियाबाद