“भाइ-बहिनक सिनेह- भातृद्वितीया”

32

–उग्रनाथ झा     

मिथिला में बहिनक भाई के प्रति सौहार्द्रता आ आत्मिय भावनाक समर्पण के प्रतीक ई पाबनिक कार्तीक मासक शुक्ल पक्षक द्वितीया तिथि क मनाओल जएबाक कारणे भ्रातृद्वितीया के नाम सँ प्रसिद्ध अछि । जेकरा अप्रभंश में भरदूतीया कहल जाईछ। एहि दिन जे भाई बहिन के बीच व्यवहारिक कृत्य होईत छैक जेकरा “नोत ” कहल जाई छै ।नोत सँ एतय तात्पर्य आमंत्रण सं छैक जे मैथिली शब्द थिक । यानी एहि तिथिक सभ बहिन के द्वारा अपन सभ भाई (सहोदर वा रक्त संबंध अथवा मान्यता) के आमंत्रित करबाक विधान छैक । ताहि लेल एहि दिन भोरे सँ सभ बहिन अपन धर आंगन के डोरही तक गायक गोबर सँ निपक रखै छथि आ आंगन बिच में अरिपन देबाक बिधान छैक ताकी भाय जे आओता त घर आंगनक साफ स्वच्छ वातावरण रहै । तत्पश्चात पितर के कढ़ौत वा फुलहि थाड़ी , फुलही वा पितरीया लोटा में पानि ,डाटलागल छहटा पानक पात , पांच टा कुम्हरक फूल , मखान, अंकुरी ,कांस खंड(चांदीक सिक्का , या रूपैया ) , सुपाड़ी , सिंदूर पिठार, गायक घी इत्यादी के सजाय रखैल छथि । ताकी जखनहि भाय औताह त तुरतही विधिसम्मत नोत लेब । किएक त कहल जाए छै जे धूरिआएल पैरे नोत लेल जाए छै । जाहि सं भाई दिर्घजीवी आ स्नेहवान होएत छथि। एहि कामना सं बहिन आंगन के बीच देल अरिपन पर राखल पिरही जाहि पर सिंदूर पिठार लागल रहे तै ताहि पर पूब मुहे बैसाबै छथि आ स्वयं पश्चिम मुंहे बैसै छथि । भाई अंजली बद्ध रहै छथि जाहि मे बहिन के द्वारा घृत पिठार सिंदूर लगा ताहि पर डाटलागल छहटा पानक पात , पांच टा कुम्हरक फूल , मखान, अंकुरी ,कांस खंड(चांदीक सिक्का , या रूपैया ) , सुपाड़ी , राखैथ छथि तत्पश्चात लोटा में राखल जल ढारैत निम्न मंत्र पढ़ैत छथि -जौ बहिन जेठ होथि
भ्रातस्तवाग्रजाताहं भुङ्क्ष्व भक्तमिदं शुभम्।
प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः।।
जौ बहिन छोट होथि त –
भ्रातस्तवानुजाताहं भुङ्क्ष्व भक्तमिदं शुभम्।
प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः।।
मुदा आब ई मंत्र के रूपांतरित मैथिली मे छै –
यमुना नोतलनि यमके हम नोतै छी भाइकें।
हमरा नोतने भाइक अरुदा बढै।
जखन की उपरोक्त संस्कृत मंत्र के अर्थ -हे भाइ, हम अहाँक छोट /पैघ बहिन छी। अहाँ यमराज आ विशेष रूपसँ यमुनाक प्रसन्नता लेल एहि भातक भोजन करू।
एकरा नोत लेब कहल जाए छै । एहि प्रक्रिया के अंत में भाई के मुंह में अंकुरि (केराव )खुआओल जाए छै ।संगहि पिठार सिंदूर के ठोप कैल जाए छै।
नोत लेलाक बाद बहिनक घर बनल भानस के ग्रहण केनाय परमावश्यक छैक । मुदा आब त बिनू महत्वबुझनहि भोजन परंपरा में कमी आबि रहल ।जे नै होएबाक चाहि शास्त्र सम्मत रहला सं पौराणिक विरासत कायम रहत । एकरा पाछा पौराणिक कथा इएह छै जे सुर्य के पुत्र यम आ पुत्री यमी छलखिन्ह । दूनू में बहुत सिनेह छलन्हि । मुदा बहुत दिन धरि जहन दुनू भाई बहिन में भेंट नहि भेल त यमी (यमुना) भाई के भेंट करबाक लेल कैको बेर आमंत्रण देलीह मुदा यम के द्वारा आश्वासनोपरान्त नहि पहुंचथि । त यमुना निराश भय जाईत। एक दिन अचानक यम यमुना ओहिठम पहुंचलथि ई देख यमी भावविह्वल भय भाई के आतिथ्य सत्कार केलैथ । नियमानुकूल पूजन कय भोजन भात करेलथि। यमुना के ई प्रेम देख यम प्रसन्न भ उपहार स्वरूप वरदान मंगबाक आग्रह केलाह । यमुना तुरतही दुनिया में सभ भाई के अमरत्व के वरमांगि बैसली। ई सुनि यम बुझबैथि कहलन्हि जे अमरत्व नैसर्गीक न्याय के विरूद्ध छैक । हां हम वरदान दै छि जे भाई आजूक दिन बहिन सँ नौत लेताह ओ अकाल मृत्यु के प्राप्त नहि करता । इ सुनि यमुना बहुत प्रसन्न भेलीह । जाहि दिन ई घटना घटित भेल ओ दिन कार्तीक मासक शुक्ल पक्ष द्वितीया छल तै ई भातृद्वितीया /भर द्वितीया के नाम सँ प्रसिद्ध भेल । अकाल मृत्यु नहि मरता के वचन देल गेल छै तै लोक परंपरा में नोत लेबाक विकृत होईत मंत्रक बतंगर भ गेल छै — गंगा नोतलनि जमूना के हम नोतै छि भाई के , जेना गंगा जमुना के धार बहय तेहना भाई के औरदा बरहनि ।। बाघ धरैन , सांप धरैन , चुड़ा दहि खाईत गारा लगैन , डाईनक पेट में जाईन , इत्यादी फकरा सभ चलन में सुनबा में अबैत छैक । किएक त यम के वरदान छै तै अखलास सँ आब धर्रा भ गेल छै ।
मुदा भाई बहिनक ई पाबनिक के मनोरमता त बाट पर चलैत लोक के देख क पता चलैत छैक जे ललाट पर सिन्दूर पिठारक ठोप , बहिन ओतुका तरूआ पर चोट ।।