“अन्न-धन-लक्ष्मी घर होउ,दरिद्रा बाहर जाउ”

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–उग्रनाथ झा       

*मिथिला में दिपोत्सव*
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धर्म ,कर्म के निमाहै में मिथिला सतत अग्रणी रहल अछि। कोनो उत्सव हो आ ओहिमे धार्मिक दृष्टिकोण समाहित नहि हो एहन संभव नहि भ सकै छै । चाहे आधुनिके प्रचलन के ल ली त देखब जे विवाह दिवसक साल गिरह हो वा जन्म दिवस साल गिरह ओहि दिन भोरे भोर पूजा पाठ के स्थान देल जाएत छैक । एहन जे धार्मिक भावना सं ओतप्रोत मैथिल ओ दीयाबाती के उत्सव में पछुआएल कोना रहत । जखन की हमरा सभ के सांस्कृतिक विरासत रहल अछि जे नित सायंकाल गोसाउनि आ तुलसी चौरा लग दीप जराय सांझ दैत छि । एहन परंपरा के सेवक भला कतौ पछुआएल रहैथ जखन की पुरा हिंन्दु धर्मावलंबी संग संग सिक्ख जैन बौद्ध सभ अपन आराध्य के स्तुति करैत दीप प्रज्ज्वलित करैत होथि ।
मिथिला में ई पाबनि दीयाबाती के नाम सं जानल जाएत छैक। ओना त एकरा संबंध में बहुत तरहक पौराणिक कथा छैक ।मुदा मिथिला में ई पाबनि मैथिल रीति रीवाज के अनुसार मनाओल जाएत छैक ।दिवस के आगमन के आभास त सहजहि होमय लगैत छैक जहन टोल पड़ोस सभ मे झाड़ पोछ होमय लगैत छैक । घर आंगन के कहय बाट घाट तक झलकय लगैत छै । दीयाबाती दिन त घर आंगन के विशिष्ट कला अहिपन सभ सँ सजाएल जाएत छैक । ओना आब एकटा विकृति दृष्टिगोचर अछि जे परंपरागत अहिपन के स्थान आधुनिक रंगोली लेने जा रहल अछि । रंगोली देखबा में त बड मोनमोहक मुदा एकटा धरोहरक हंता त जरुर बनै छै । एहि दिन जगत जननी के गृह आगमन के अवसर पर समस्त घर आंगन बाट घाट के दीप सं प्रकाशित कैल जाएत छैक । जेकर शोभा अति रमणीय होइत छैक । एहि दिन घरक गोसाउनि के घर और दरिद्रता आ विपन्नता के स्वामी दरिद्रा के बाहर कएल जाए छैक । एहि में पुरूष आ स्त्रीगण दूनुक सहभागिता छै । जे मिथिला में नारि के वास्तविक स्वायतता , स्थान मान सम्मान के द्योतक छैक , जे देशक अन्य क्षेत्रक लोक लेल अनुकरणीय छैक ।यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यानि मैथिल मनसा वाचा कर्मणा में एकरूपता करैत छथि। सर्व प्रथम स्त्रीगण में जे घर श्रेष्ठ हेती ओ पारिवारिक कल्याणक निमित्त धानक गंभरा,दूबि , जल लय आंचर खुटक सहारा सं गोसाउनि घर करैत छैक जाहि मे “अन्न धन लक्ष्मी घर होउ,दरिद्र बाहर जाउ” के उच्चारण करैत छथि । तत्पश्चात पुरुष वर्ग में श्रेष्ठ द्वारा ख’र के बनाओल ऊक जाहि के बीच संठी घोसियाय पांच बन्हन तखन चौमुख ख’रक पुल्ली द पुनः दूटा बन्हन यानि की कुल सात बन्हन देल जाएत छैक ।ओहि उक के गोसानिक सोझा प्रज्ज्वलित कलश दीप पर पजाड़ी बाम हाथ में गंभरा आ दहिन हाथे धधकैत ऊक ल अनधन लक्ष्मी घर होई, दरिद्र बाहर होई पढ़ैत तीन बेर घर बाहर भीतर करैत बेरा बेरा सभ कोठली आ आंगन सं दरिद्रा के विदाई आ भगवति आगमनक स्वागत करैत छथि । अंततः ओहि उक के गामक कात में वा चौबटीया पर जरा के खत्म करैत छथि । आ ओकर बीचक बाचल संठी निकाल क भगवती घर मे रखै छथि जतय पूर्व सं डगरा राखल रहै छै। जाहि सं घरक महिला भोरहरीया में उठि डगहर (संठी सं डगरा पिटनाए)दैत छथि ।गोसाउनि घर भेलाक बात घरक सभ पुरूष अपन अपन उंक पजारि भांजै छथि । जतेक कोठली के चार रहै छै सभ पर उक बान्हि के देल जेबाक मान्यता छैक । जे सम्पन्नता कारक मानल जाए छै । उक आ गेनी भजबाक संबंध में इहो कहल जाएत छैक जे पितृपक्ष में जे पितर पृथ्वी लोक पर आयल रहैत छथि ओहो एही दिन एहि ऊक के प्रकाश में अपन स्वस्थान प्रस्थान करैत छथि। संगहि एहि दिन समस्त ज्ञात देवी देवता के नाम सं दीप जराओल जाएत छैक। जे अज्ञानता रुपी अंधकार पर ज्ञान रूपी प्रकाश के विजय के प्रतीक मानल जाए छैक। पूर्व में एहि दिन सेठ साहुकार व्यापारी वर्ग सभ धन्य धान्य सुखदाई श्री लक्ष्मी गणेश पूजन सरस्वती स्वरुपा खाता बही ,तिजोरी , दंड तुला पूजन करैत छलाह। मुदा आधुनिक समय में लक्ष्मी गणेश पूजा घर घर में होमय लागल , से सुखद संदेश कहल जा सकै छै । गाम गाम में सार्वजनिक रूपे काली पूजा के स्थान से हो रहल अछि एहि दिन गेनी (कपड़ा के गेंद के तार सँ बान्हल) भजबाक से हो विधान छैक ।पूर्व में लोक त बांसक कांच करची में बांसक सुपती गाथि क ओहि मे आगि लगा ओकरा भंजबाक से हो आनंद लैत छल । मुदा आब ई परंपरा विलुप्ती के कगार पर अछि। ने आब ओ देवी ने ओ कराह कहबाक तात्पर्य जे ने ओतेक आफरात बांस आ ने ओहेन भजिनिहार ।आब त दीपो के संख्या कम भेल जा रहल छैक सभक जगह विकासवादी असर देखना जाय छै , देशी विदेशी विद्युत बल्ब सभ सं घर आंगन चकमका जाए छै मुदा ओ सौम्यता / भव्यता के अभाव तखटकै छै ।मुदा आतिशबाजी क्रिड़ा में बच्चा सभ के विशेष आनंद अबैत छैक ओ सभ गेनी , फटक्का, छुड़छुड़ी आ विभिन्न प्रकारक रवाईस छोड़बाक चपलता एहि उत्सव में चान लगा दैय छैक। रवाईस छुटवाक आभास सं मन आशंकित त रहै छै मुदा उल्लास के आगा आशंका विलुप्त भय जाए छै ।
सभ परिप्रेक्ष्य के समेकित क कहि जे चारू तरफ लुकझुक करैत दीप केँ लौ , विभिन्न कलाकारी संग भंजाएत गेनी , उंक , धरती सं आकाश धरि छुटैत रवाईस आ रंग बिरंगक विस्फोटक आवाज त सहजहि आनंदक चरम दर्शन करा दैत छैक । संगहि जड़ैत दीप जे घनघोर अन्हार सं संघर्ष करैत प्रकाश प्रसारित करैत प्रेरणादैत छैक जे विकट सं विकट परिस्थिति में सकारात्मक सोच आ मुस्कान के संग संघर्ष करैत रहुं ,लाख झंझावात हो मुदा अडिग रहुं अविचल रहुं । विजय जरुर होएत, लक्ष्य जरूर भेटत।
एहि प्रकारे ई दीपोत्सव के त्योहार मानव जीवन में धर्म, कर्म , लगनशीलता के पाठ पढ़ा साल भरि लेल उर्जान्वीत करैत छैक ।