“प्रकाशक पर्व -दीपावली”

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— आभा झा       

“#मिथिलामे_दीपोत्सव” – मिथिलामे प्रकाश पर्व दीपावलीक विशेष महत्व छैक। ओहि दिन घर-घर लक्ष्मी व गणेशक संग रामजी व सीताजीकेँ सेहो पूजल जाइत छैन्ह। सीताजी मिथिलाक धिया छलीह और रामजी रावणक अंत कऽ सीताजीकेँ सकुशल अयोध्या अनने छलखिन। एहि खुशीमे दीपावलीक दिन घर-घर दीप जरा कऽ खुशी मनाओल जाइत छैक। मिथिलामे दीपोत्सव पाबनि प्राचीन काल सँ ही पारंपरिक तरीका सँ मनबैकेँ परंपरा चलल आबि रहल अछि।स्त्रीगण सब एक मास पहिने सँ घरक साफ-सफाई में जुटि जाइत छथि।भगवती घरकेँ खूब सुंदर ढंग सँ सजाओल जाइत छैक। भगवान श्रीरामकेँ चौदह वर्षक वनवासक बाद अयोध्या वापस आबैकेँ खुशीमे दीपोत्सव मनाओल जाइत छैक। एहि परंपराकेँ अक्षुण्ण राखैत मिथिलामे दीपोत्सव खूब धूमधाम सँ मनाओल जाइत छैक। घरमे तरह-तरहकेँ पकवान सब बनैत छैक। मिथिलामे पटाखाकेँ स्थान पर हुक्का-लोलीकेँ परंपरा छैक। दीपोत्सवकेँ एक दिन पहिने बच्चा, युवा, बुज़ुर्ग घरक फाटल-पुरान वस्त्रक गोला बना कऽ राति भरि मटिया तेलमे डुबा कऽ राखैत छथि। राति कऽ ओकरा लंबा तारमे बान्हि कऽ और आगि लगा कऽ गोल-गोल घूमबैत छथि और हुक्का – लोली कहि कऽ फेकैत छथि। बच्चा सभमे खूब उत्साह देखय लेल भेटैत छैक। पटाखाकेँ जगह मिथिलाक गाममे पहिने यैह होइत छल परंतु आधुनिकताक दौरमे किछु गाममे हुक्का-लोलीक परंपरा आइयो कायम अछि। कहल जाइत अछि कि अंगराज कर्ण सेहो दीपोत्सवमे हुक्का-पाती खेलाइत छलाह। वैज्ञानिक कारणकेँ देखल जाय तऽ आगि जरेला सँ काफी मात्रामे कार्बन डाइऑक्साइड निकलैत छैक। एहि सँ कीट-पतंगक संग बैक्टीरिया सेहो खत्म भऽ जाइत छैक। वातावरणमे बेसी प्रदूषण नहिं फैलैत छैक।
मिथिलांचलमे पुरखाक विदाईकेँ लेल सेहो दीपावली पाबनि मनाओल जाइत छैक। महालयाक बाद पितृपक्षमे पितरक आगमन होइत छनि व दीपावलीक राति कऽ हुनका विदा कैल जाइत छनि। एहिमे पटुआक डारिमे खर बान्हि कऽ ओकरा दीप सँ जराओल जाइत छैक। फेर घर-घरमे धान या सरिसो छीटैत संठीकेँ अंदर-बाहर कैल जाइत छैक। मान्यता अछि कि प्रकाशक माध्यम सँ पितर धरती सँ स्वर्गक दिस चलि जाइत छथि। एहि सँ पितर खुश होइत छथि और दीपावलीक दिन हुनकर आशीर्वाद बरसैत छनि। अन्न दानक जेकां प्रकाशदान सेहो पितर तक पहुँचैत छनि। एकरा उकाऊ-टीका या उल्का भ्रमण सेहो कहल जाइत छैक।
दीपोत्सवक राति स्त्रीगण सब संठी सँ सूप पीटैत छथि। लक्ष्मी
पूजाक बाद बीच रातिमे स्त्रीगण सब एहि संठी या डारि सँ ब्रह्म मुहूर्तमे गोल सूपकेँ पीटैत छथि। पीटैत काल कहैत छथि अन्नधन लक्ष्मी घर पइसू दुख दरिद्र बाहर करू। मान्यता अछि कि एना कयला सँ घर-परिवारमे सुख-समृद्धिक आगमन होइत छैक। परिवारक लोक एक-दोसरकेँ घर भेट और आशीर्वाद लेल जाइत छथि। जे सामाजिक समरसताकेँ कायम राखैत अछि। हमरा सबके जहाँ तक संभव हो मइटक दीपकेँ प्रयोग दीपोत्सवमे करबाक चाही। बच्चा या युवा सभकेँ पटाखा छोड़ै लेल मना करबाक चाही। एहि पटाखा सँ वातावरण बहुत बेसी प्रदूषित भऽ जाइत छैक। एहि प्रदूषण पर रोक लगबै लेल पटाखा पर रोक लगेनाइ जरूरी छैक।
दीपोत्सवक सबगोटेकेँ हार्दिक बधाई 🙏🙏💐💐

आभा झा
गाजियाबाद