“उत्सवमे मनोरंजनक बदलैत स्वरूप”

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— उग्रनाथ झा

उत्सव सामान्यतः उत्साह के संग संग संपादित कृत्य छि । जे धार्मिक , सांस्कृतिक आ पारंपरिक विधान सं जुड़ल आयोजन छैक । ई आयोजन व्यक्तिगत आ सार्वजनिक दूनू रूपे आयोजीत होएत छैक ।व्यक्तिगत रूप सँ आयोजीत आयोजन में कोनो कुव्यवस्था सिमित क्षेत्र के प्रभावित करैछ मुदा सार्वजनिक आयोजन अपन प्रभाव समाज पर शिघ्र आ विस्तृत दूरगामी प्रभाव दैत छैक । आयोजन अगर सार्वजनिक छैक त ओकर परिमाण सेहो विशाल होएत छैक ,जाहि मे बहुसंख्यक भागिदार रहलाह सँ अधिक जनसमुदाय के उपस्थिति रहैत छैक । एहन परिस्थिति में आंगतुक लोकनि के संयमित संवाद आ मोन बहटारबाक उपक्रमक रूपे में गायन वादन नृत्यक व्यवस्था आयोजन मंडली के द्वारा कैल जाएत छैक । एहि परंपरा के शुरुआती में अधिकतर त ग्रामिण लोकनि स्वयं नाटक मंचन करैथ , यदाकदा साटा पर अबै छलै। एहि क्रम में पूर्व में यथा उपलब्धताक अनुसार धार्मिक , मार्मिक , नैतिक आ समाज संवाद आधारित कार्यक्रमक आयोजन होएत रहल अछि। जे समाज के पथ प्रदर्शित करैत छल ।जाहि मे कार्यक्रमक रूप रेखाक निर्धारण उत्सवक आधार छल जेना धार्मिक आयोजन रहला पर भजन कीर्तन , विशेष व्यवस्था रहा पर रासलीला , रामलीला , राजा हरिश्चंद्र, राजा भर्तृहरि आ पिंगला , आल्हा ऊदल , राजा सल्हेश , कोढ़ीया नाग चम्पा ईत्यादी सदृश नाटकक संचालन होएत छल जे उपस्थित जनमानस में मानव के मानवता आ समाजिक सरोकार सँ अवगत करावैत रहैत छल । घर परिवार आ समाज के प्रति कर्तव्य के चिन्हित करैत छल ।कार्यक्रम के प्रति लोक के उत्सुकता जगेबाक बास्ते वा भारी होएत मोन उत्साह भरबाक लेल बीच बीच में बिपटा के गोसियायल जाएत छल जे अपन हास्य व्यंग सँ समाज के स्थिति परिस्थिती पर तीखगर चोट करै छल आ दर्शक दीर्घाक निंद्रा-तंद्रा भंग करै छल । जे छल मनोरंजनक भरपूर व्यवस्थाक संग जीवंत समाजक भरपूर निशानी।
समयक संग स्थिति परिवर्तन भेल हमरा लोकनि तथाकथीत रूपे विकसित भेलौ मुदा मानसिक दिवालीया होएत गेलौ आ की नै सेनै जानि ।एशनो पाउडर काजर लगा मंच पर उतरनाय , अपना वाक्य आ कला के संयोजन के माध्यमे समाज के सन्देश देनाय पछुआएल के निशानी छलैक ।तहन ओ कार्य कोना मनमाफिक । तै नाटक के माध्यमे समाजिक संनेश बिलहब छोड़ि हमरा लोकनि आधुनिकता वादी बनबाक प्रयास में स्वयं मंचन छोड़ी नर्तक आ नर्तकी के व्यवस्था भाड़ा पर करय लगलौ ।यानी एतौ बाहरी देखौस ।एहि समय के मनोरंजन के संक्रमण काल कहल जा सकै छै किएक त एहि काल में जहन बाई जी (नर्तकी) के कार्यक्रम के चलनसारि भेल त आयोजन मंडली के मजगूत अर्थ संकलन सँ तुलनात्मक अध्ययन होए लागल । समाज ओहि समिति के संबल बुझय लागल ।जे एहि तरहक आयोजन बढ़ावा दैत गेल । मुदा ओहू समय में समाजक एकटा वर्ग जे पूर्व के आयोजन के प्रथम दीर्घा के दर्शक से एहि आयोजनक सतत जीह कुचनहि एकर विरोध करैत अपना के एकोर क लेलाह। फलत एहि आयोजन के पोषक सभ स्वच्छंद भाव सँ विस्तारित आ विभत्स करैत गेलाह । विभत्सता आ पथभ्रष्टता त एते तक बढ़ि गेल देवी देवता के आयोजन में पूजा के माईक बन्न मुदा मनोरंजन में 14 टा भोम्हा । बाई जी नाच एतेक पसरल जे आर्केस्ट्रा जे युगल में गायन तक सिमित छल आब ओहूँ में नजनिया राज भ गेल । जाहि पार्टी में जतेक बेखस्मा नाच गान केनिहार ओ पाटी ततेक नामी गिरामी। ओकर भाड़ा ओतबे करगर ।
वर्तमान में समाजक सुधरैत आर्थिक स्थिति देखैत सार्वजनिक उत्सव में समाज बढ़ि चढ़ि क सहयोग राशि दैत छथि आयोजन के नाम मुदा आयोजन मंडली ओहि रूपया के स्टेज पर बेसी सं बेसी देह देखबवाला/देखाबबाली के व्यवस्था करैत छैक चाहे भागवानक प्रसाद भरिगाम बिलहाए वा नहि मुदा पांच गाम में होहकार होएबाक चाहि जे बिजली रानी जे डार लचकेलकै से कमाल छलै ।किएक त समाज आई कला पारखी कम मुदा तन निरेखी बेसी भेल जा रहल छैक ।जेकर दूरगामी भयंकर दुष्परिणाम परिलक्षित भ रहलै ।नचनीया के किछै आई देह देखेलक काल्हि सं ओकर दर्शन दूलर्भ त लाज संकोच ककरा सं । मुदा जाहि सभा में एहन कृत्य हमरा सभ देखलौ , जाहि भीड़ के एक छोड़ पर पिता बैसल त दोसर छोड़ पुत्र पुत्री । त सहजहि भान भ जाएत जे कतेक हया बांचल रहतै , कतेक संस्कार पुष्पित पल्लवित होएत । किएक त वयस्क आ प्रौढ़ त विषयक गंभीरता के बूझैत छथि मुदा किशोर वय सभ लेल एहि तरहक प्रस्तुति स्वप्न लोकक भ्रमण थीक जे मानसिक खुराफात आ कुसंस्कार प्रस्फुटीत करैछ।
एहि मंचीय कार्यक्रम लेल समितिए जिम्मेवार नहि अपितु हम अहां से हो भागी छियै किएक त जखन उत्सवक पछाति बैसार होएत छैक त समिति सं ई पुछिनिहार कम लोक भेटै छैथ जे प्रसाद कियै नै भरिगाम बटाएल , कन्या भोजन में छप्पन प्रकार कियै नै भेल मुदा सब भ पहिल प्रश्न भेटत तेसर दर्जा प्रोग्राम आनि कमिटी पाई कपचि लेलक। किएक त जे प्रसादक प्रधानता के समर्थक ओ त कोन में दबकल छथि । त कमिटी कतेक झेलै आखिर वित्त संयोजन त सालों साल करैक छै। तै समितिए पर नहि दोषारोपण होएबाक चाहि । हां दस आना छ आना में बांटल जा सकैछ।
ताहि हेतु दिनानुदिन गायन बादन नृत्य के मिश्रण सँ जे मन:शांतिक उपक्रम मनोरंजन छल से धिरे धिरे मनोत्तेजक भेल जा रहल अछि। वर्तमान में जौ देखल जाए कोनो भी उत्सव हो और ओहि मे मनोरंजन व्यवस्था में वास्तविक कलाकार के कला पर थोपड़ी नहि बजैत जतेक अलुड़ी के चमकैत अर्धनग्न शरीर देख बजैत छैक। जे कृत्य शयन कक्ष के छि से सार्वजनिक मंच पर दर्शाओल जाए छैक ।पहिनहुं सभ रस के धार बहैत छल मुदा मर्यादित ।वर्तमान में आखिर एकर जिम्मेवार केँ ? स्थिति त एहन भयावह छै जे गाम घर के मेला में सपरिवार देखनाय त दूर जौ भूलो सँ ओहि काल घरक सदस्य सं नजरि मिल जाय त लाजे कठौत भ जाएब। मनोरंजन के नाम पर एहन समाजिक विकृति पसारनाहर केँ ? अगर कियो दोषी अछि त ओ जे अपना आपके कठौत बना एहि भीड़ सं अलग क लेलक।जौ ओ ओहि आयोजन सं पूर्वहि प्रखर विरोध केने रहैत आयोजन मंडली के संबलता भेटल रहैत त ई समाज आई एतेक विषव्यापित नहि भेल रहैत ।एकटा गुण हमरा सभ के और अछि जे शुरू में अनठिआएब नवलोकक उमंग कहि मौन समर्थन देब जहन पूर्ण विषव्यापित होएब तहन अहुरिया काटब । त एखन हमरा लोकनि भसियायल मनोरंजनक रंग रुप पर अहुरिया काटि रहल छि । जाधरि गुम्मी सधने समाज के समेकित विरोधी स्वर प्रस्फुटीत नहि होएत ताधरि ई भसियायत चेतना के पुनर्सृजन के आशंका दूर दूर तक दृष्टीगोचर नहि होएछ । जाधरि सार्वजनिक उत्सव अपन मंच सं समाज के धार्मिक , नैतिक , समाजिक आ मानवीय संवेदना के संदेश दैत रहल ताधरि ई समाज जीवंत रूप में अपन आदर्श स्थापित केने रहल । मुदा वर्तमान में मंच सं अश्लीलता , नग्नता , उत्तेजना परोसि रहल अछि जेकर फलाफल समाज में चहुदिश अनाचार व्यभिचार के पसार भेल जा रहल अछि। अगर जरूरत छै त जे समाज में बोली रहैत गोंग भेल छथि हुनका मुंह सं ध्वनी निकलबाक बस सभ अपने समय सं सहि भ जाएत ।