लेख विचार
प्रेषित: किर्ति नारायण झा
श्रोत: दहेज मुक्त मिथिला समूह
लेखनी के धार ,बृहस्पतिवार साप्ताहिक गतिविधि
विषय : अन्तर्जातीय बिआह केर नफा -नुकसान
प्राचीन काल सँ मिथिला अपन सुदृढ़ सांस्कृतिक आ जातिगत व्यवस्था लेल जानल जाइत अछि। मुदा, शिक्षाक प्रसार आ वैश्वीकरणक एहि युग मे अंतर्जातीय विवाहक संख्या बढ़ि रहल अछि। एकर समाज पर दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप सँ देखल जाइत अछि। लोक सभक तर्क छैन्ह जे
मिथिला मे दहेजक विकराल रूप जातिगत सीमाक भीतर बेसी देखल जाइत अछि। अंतर्जातीय विवाह मे अक्सर ‘गुण’ आ ‘प्रेम’ केँ प्राथमिकता देल जाइत अछि, जाहि सँ दहेजक कुरीति किछु कम होइत अछि। मुदा एखनो नीक लड़का अथवा लड़की के बिवाह अपन जाति मे नीक जकाँ होइत छैक, हँ निठल्ला सभक बिवाह अपन जाति मे मुस्किल छैक संगहि प्रेम प्रसंग के प्रभाव समजातीय बिवाह के बंधन के तोड़ि दैत छैक।
मिथिलाक सभ जातिक अपन खान-पान, रीति-रिवाज आ पद्धति छै। अंतर्जातीय विवाह सँ ओ विशिष्ट परम्परा सभक विलोप होयबाक डर रहैत अछि।
एकर अतिरिक्त पारिवारिक तनाव सेहो अंतर्जातीय बिवाह सँ उत्पन्न होइत छैक। आजुक समय मे सेहो ग्रामीण क्षेत्र मे एहेन विवाह केँ सहजता सँ स्वीकार नहि कएल जाइत छैक , जाहि सँ सामाजिक बहिष्कार आ मानसिक तनावक स्थिति पैदा होइत अछि।
अंतर्जातीय विवाह कें मात्र विद्रोहक नजरि सँ नै देखि क’ एकरा मानवीय स्वतंत्रता आ आधुनिक बोध कें रूप मे देखबाक आवश्यकता अछि। जँ प्रेम आ आदर्श कें आधार मानि क’ ई विवाह होइत अछि, तँ समाज बेसी मजगूत आ संगठित बनि सकैत अछि।
