विचार
– प्रवीण नारायण चौधरी
जनकपुर मे ५, ६, ७ आ ८ गते फागुन २०८२ साल – ४ दिन धरि मैथिली भाषा-साहित्य, कला, रंगकर्म, सिनेकर्म, पुस्तक मेला, चित्रकला प्रदर्शनी, विद्वत् सम्मेलन आ सब सँ बेसी आकर्षक विन्दु होयत “अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव” जाहि मे नेपाल, भारत आ अन्य मुलुक केर नाट्य समूह सब भाग लेता ।
नाटक एकटा प्रभावी उपकरण होइछ महत्वपूर्ण सन्देश समाजक आम लोक धरि पहुँचाबय केर – आर मिथिला मे ई अदौकाल सँ चलैत आबि रहल अछि । चाहे वेद-पुराणक महत्वपूर्ण सन्देश होइ अथवा सामाजिक विषय-सन्दर्भ, या फेर क्रान्ति आ आन्दोलन सँ परिवर्तनक बात होइक, सत्ताक विरूद्धे संघर्ष कियैक नहि होइक – सब फ्रन्ट पर ‘रंगकर्म’ फिट बैसैत आयल अछि ।
‘विदापत नाच’ सेहो मोटामोटी रंग-विधाक एकटा प्रभावी कला एहि मिथिला मे देखाइत रहल ।
रामलीला मंडली द्वारा रामायण पर आधारित ‘इतिहास’ केँ मंचन करैत हमरा सब जेहेन बालक सेहो अनेकों सृजनात्मक आ महत्वपूर्ण ज्ञानार्जन बाल्यकाल सँ कयलक, तेकर प्रत्यक्ष प्रमाण हम स्वयं छी ।
‘अल्हा रुदल’ केर वीरगाथाक मंचन श्रमजीवी समाज मे केना वीररस घोरैत छल, से के नहि देखने होयत । मुदा आइ ई सब हेरा गेल, हेरा रहल अछि – केना ?
कारपोरेट कल्चर आ लौन्डिया नाच के चक्कर मे हमरा सभक मौलिकता हेरा रहल अछि । कारपोरेट कल्चर केर कहब छैक जे स्त्री शरीर वा पुरुष शरीरक नंगो प्रदर्शन कयला सँ यदि ‘टका’ कमा सकैत छँ त सैह कर, मुदा टका कमो ।
आब देखिते छियैक जे बिस्लेरी पानि केर बोतल बेचत त ओकर विज्ञापन मे कच्छी-मच्छी पहिराकय मोडेल छौंड़ी ठाढ़ कय दैछ, एक न एक बेर त लोक विज्ञापन ओहि लौन्डियाक चक्कर मे देखिये लेतैक । ओकर काज भ’ गेलैक । बिस्लेरी अथवा आने कोनो ब्रान्डक तथाकथित मिनरल वाटर बोटल अपन ब्रान्डिंग कय लेलक । व्यापार वर्धन भ’ गेलैक । दैट्स आल ।
एकटा शब्द हमर मिथिला मे खूब चलैत अछि – ‘रंगारंग कार्यक्रम’, यानि करब ‘विद्यापति स्मृति’ मुदा ओहि मे सेहो चाही ‘रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम’ ।
एक बेर हमरो गामक छौंड़ा सब कहलक जे भाइजी एहि बेर कनि रंगारंग वला करितियैक । हमहुँ न आगू देखल न पाछू, बच्चा सभक बात मे पड़िकय नवीनजी सँ कहि देलियनि जे ‘रंगारंग’ वला टोली केँ सेहो आमंत्रित करबनि । ओ कय देलाह ।
हम कि कयल जे दिन मे बाबा विद्यापतिक स्मृति कय, साँझ मे कवि सम्मेलन आ तदोपरान्त भोजभात कय केँ विद्यापति बाबा सँ विदाइ लेल ।
गामघर मे राति १० बजे भोजनभात उपरान्त ‘रंगारंग सांस्कृतिक’ कार्यक्रम आरम्भ करबाक प्रचलन छैक, से भेलैक । १२ बजे राति धरि ‘पिया मोर बालक, हम तरुणी गे’, ‘के पतिया लय जायत रे मोरा प्रियतम पास’, ‘दुमका मे झुमका हेरौलनि काशी मे कनबाली’, ‘कसमस तन चोली कसैक गेलय ना, पिया डाँड़े पर घैला भसैक गेलय ना’ – ई सब कनेक-मनेक रंग घोरैत रहलैक ।
मुदा छौंड़ा सब कहलकैक…. धु भाइजी ! ई कोन रंगारंग भेलैक ? माने ओकरा सब केँ कारपोरेट कल्चर वला रंगारंग चाही, जे कि आइ-काल्हि आर्केस्ट्रा द्वारा पूरा कयल जाइछ ।
१२ बजे राति धरि गार्जियन सब आ बाहरी पाहुन सब लगभग सुतय लेल गेलाक बाद चालू भेलैक ‘रंगारंग’ । छोट-छोट कपड़ा पहिरिकय नर्तकी सब हिन्दी आ पंजाबी गीत केर डीजे झनकार – हार्ड बिट पर जखन मंच हिलबय लगलैक त छौंड़ा सभक स्थिति देखयवला छल । मार पिहकारी – हू…हू…हू… हा…हा…हा…!! से ३ बजे राति धरि बुझू ११.११ रिक्टर स्केल पर भूकम्प होइत रहलैक ।
मुदा फेर ३ बजे गामक गार्जियन माय-बहिन सब जागि जाइत छथिन, पोखरि मे स्नान, पूजापाठ, फुल तोड़बाक लेल, कियो भोरका पहर वाकिंग लेल… तखन रंगारंग पर फेर लगैछ लगाम आ शुरू होइछ ‘कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ’, ‘अबध नगरिया से अयले बरियतिया सब रंग पियरे पियरे’, माने ब्रह्म-मुहूर्त मे भगवानक भजन आ पराती सब होइत रहलैक ।
कथा समाप्त ।
भाषा, साहित्य, संस्कृति आ सभ्यता लेल विमर्श आधारित कार्यक्रम संगहि अपन मूल्य-मान्यता आ सामर्थ्यक प्रदर्शनकारी आयोजन सब ‘अत्यन्त जरूरी’ मानल जाइछ । ‘रंगा-रंग’ वर्ग मे उत्सवधर्मी समाज आ जेकरा लग मलफाइ उड़ाबय लेल टका-पैसा टन्न भंडार छैक से सब करैछ । जेना देखैत होयब – चन्दा उठा-उठाकय गामघर सब ठाम लौन्डिया लन्डन सँ लाबिकय राति भरि डीजे बजा रहल अछि अपन मिथिलाक आम समाज । विमर्शक कार्यक्रम सब केँ ई कहिकय नकारल जाइछ जे ‘भाषण सुनय लेल के जायत?’
मैथिली लेल जे मंच सजैछ ताहि मे ९०% आयोजन ‘रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम’ धरि मात्र सीमित रहैछ । लेकिन विराटनगर, जनकपुर, आदि एहि मे क्रान्ति आनिकय स्वरूप परिवर्तन करबाक कोशिश मे अछि । आश्वस्त रहू, मिथिलाक मौलिकता जिबैत रहत ।
हरिः हरः!!
